Friday, 7 August 2026

भक्ति की आवाज में स्त्री का प्रतिरोध

भक्ति की आवाज में स्त्री का प्रतिरोध 

बीएचयू के एक कार्यक्रम में उठे विचारों ने स्त्री स्वतंत्रता, भक्ति साहित्य और सामाजिक न्याय पर नई चर्चा छेड़ी

सुरेश गांधी

वाराणसी. काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आयोजित एक साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार सुभाष राय ने जब कहा कि भक्ति कवयित्रियाँ साहस के साथ पितृसत्ता का प्रतिरोध रचती हैं, तो यह टिप्पणी केवल अतीत की चर्चा नहीं रही; उसने वर्तमान समाज के सामने भी कई प्रश्न खड़े कर दिए। कार्यक्रम को एक सप्ताह बीत चुका है, लेकिन उसमें उठे विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।

राय ने दक्षिण भारत की संत कवयित्रियों अंडाल और अक्का महादेवी के उदाहरणों के माध्यम से बताया कि मध्यकालीन समाज में स्त्रियों और शूद्रों पर धार्मिक प्रतिबंध थे। जब संस्थागत धर्म ने उनके लिए रास्ते बंद किए, तब उन्होंने ईश्वर तक पहुंचने के लिए अपनी भाषा, अपने गीत और अपनी अनुभूति को माध्यम बनाया। यह भक्ति केवल आत्मिक साधना नहीं थी; यह सामाजिक अवरोधों के विरुद्ध सांस्कृतिक प्रतिरोध भी थी।

अक्का महादेवी के प्रसंग को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने पति और स्वतंत्रता के बीच स्वतंत्रता को चुना। इसी तरह अंडाल की कविताओं में प्रेम निष्क्रिय प्रतीक्षा नहीं, बल्कि अधिकारपूर्वक संवाद का रूप लेता है। यह स्वर उत्तर भारतीय भक्ति परंपरा से भिन्न दिखाई देता है और इसी कारण गंभीर अध्ययन की मांग करता है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे साहित्यकार अवधेश प्रधान ने कहा कि भक्ति साहित्य भारतीय सांस्कृतिक एकता का महत्वपूर्ण आधार है। अलवार और नायनार परंपराएं बताती हैं कि उत्तर और दक्षिण भारत परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि गहरे सांस्कृतिक संबंधों से जुड़े हुए हैं। अंडाल की कल्पना में वृंदावन और दक्षिण की धरती एक ही आध्यात्मिक भूगोल का हिस्सा बन जाते हैं।

चर्चा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी रहा कि इतिहास में अनेक प्रतिभाशाली स्त्रियों की स्मृतियां दबा दी गईं। यह प्रश्न आज भी बना हुआ है कि साहित्यिक परंपराओं में स्त्री स्वर को कितनी जगह मिली है और उसकी व्याख्या किस दृष्टि से की गई है।

बीएचयू में हुई यह चर्चा दरअसल एक बड़े सांस्कृतिक विमर्श की ओर संकेत करती है। आज जब स्त्री अधिकार, समानता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नए सिरे से बहस चल रही है, तब अंडाल और अक्का महादेवी जैसी कवयित्रियां केवल धार्मिक प्रतीक नहीं रह जातीं; वे साहस, आत्मसम्मान और स्वतंत्र चेतना की ऐतिहासिक आवाज बनकर सामने आती हैं।

काशी की इस बहस का महत्व इसलिए भी है कि उसने भक्ति साहित्य को केवल पूजा-पाठ के दायरे से बाहर निकालकर सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा के प्रश्नों से जोड़ दिया है। यही वह बिंदु है जहां साहित्य अतीत की स्मृति नहीं, वर्तमान का हस्तक्षेप बन जाता है।

सुभाष राय का जन्म जनवरी 1957 में उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद के बड़ागांव में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा गांव में प्राप्त करने के बाद उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय के के.एम.आई. संस्थान से हिंदी साहित्य में प्रथम श्रेणी से स्नातकोत्तर तथा विधि की पढ़ाई पूरी की। संत कवि दादूदयाल के साहित्य पर उन्होंने पीएचडी की।

आपातकाल विरोधी आंदोलन में सक्रिय भागीदारी और जेल यात्रा के बाद वे पिछले चार दशकों से पत्रकारिता से जुड़े हैं। विभिन्न प्रतिष्ठित दैनिक समाचारपत्रों में शीर्ष पदों पर कार्य करने के पश्चात वर्तमान में लखनऊ से प्रकाशित जनसंदेश टाइम्स के प्रधान संपादक हैं।

उनकी प्रमुख कृतियों में सलीब पर सच, मूर्तियों के जंगल में, जाग मछन्दर जाग और अंधेरे के पार शामिल हैं। रजा न्यास की फेलोशिप पर दिगम्बर विद्रोहिणी अक्क महादेवी तथा आत्मसंभवा आंडाल प्रकाशित हुईं। उन्हें नई धारा रचना सम्मान, माटी रतन सम्मान, देवेंद्र कुमार बंगाली स्मृति कविता सम्मान, स्पंदन कृति आलोचना सम्मान और प्रो. शुकदेव स्मृति सम्मान सहित अनेक सम्मानों से अलंकृत किया जा चुका है। वर्तमान निवास गोमतीनगर, लखनऊ है।

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