Wednesday, 26 August 2026

राखी का धागा नहीं, रिश्तों की धड़कन है रक्षाबंधन

राखी का धागा नहीं, रिश्तों की धड़कन है रक्षाबंधन 

राखी का धागा जितना महीन है, उसके भीतर छिपा रिश्ता उतना ही गहरा। कलाई पर बंधने वाला यह सूत सदियों से भाई-बहन के बीच सिर्फ रक्षा का वचन नहीं, बल्कि विश्वास, स्नेह, स्मृतियों और जिम्मेदारी का अदृश्य अनुबंध लिखता आया है। इस बार 28 अगस्त को जब श्रावण पूर्णिमा की उजली सुबह भाई की कलाई पर राखी सजेगी, तो उसके साथ बदलते समय में बदलते रिश्ते की एक नई कहानी भी लिखी जाएगी। कभी बहन भाई से अपनी रक्षा का भरोसा मांगती थी, आज वही बहन संकट की घड़ी में भाई के सामने ढाल बनकर खड़ी है। कभी राखी का अर्थ था—‘भाई मेरी रक्षा करना’, अब इसका अर्थ है—‘हम एक-दूसरे के साथ हैं।तकनीक ने दुनिया को करीब किया, मगर रिश्तों में दूरियां भी बढ़ाईं। ऐसे समय में रक्षाबंधन उन रिश्तों की वापसी का पर्व है, जिनकी कोई ऑनलाइन स्थिति नहीं होती, जिनका कोई पासवर्ड नहीं होता और जिन्हें कोई स्क्रीन पूरी तरह नहीं समझ सकती। शतभिषा नक्षत्र, पूर्णिमा, पंचक और ग्रह-नक्षत्रों के संयोगों के बीच इस बार की राखी एक सवाल भी छोड़ती हैक्या रक्षा सिर्फ कलाई की होनी चाहिए या रिश्तों की भी? क्योंकि असली राखी वही है, जो धागे से उतरकर जीवनभर साथ निभाने की प्रतिज्ञा बन जाए। यानी इस बार रक्षाबंधन की कहानी सिर्फ कलाई पर बंधे एक धागे की नहीं है। यह उस पूर्णिमा की कहानी है, जिसमें तिथि बदल रही है, नक्षत्र अपनी चाल चल रहा है, पंचक अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है, भद्रा सूर्योदय से पहले विदा हो रही है और उसी दिन आकाश में एक चंद्रग्रहण भी आकार ले रहा है। राखी का धागा इसलिए इस बार और भी खास हैक्योंकि यह सिर्फ रक्षा का वचन नहीं, बल्कि बदलते समय में रिश्तों को बचाए रखने का संकल्प भी है 

सुरेश गांधी  

राखी का धागा महीन जरूर है, मगर इसमें रिश्तों की सदियों पुरानी मजबूती बंधी है। कलाई पर बंधते ही यह धागा केवल भाई को बहन की रक्षा का वचन नहीं दिलाता, बल्कि बहन के स्नेह, विश्वास और साथ का भी आश्वासन देता है। यही वजह है कि बदलते समय में रक्षाबंधन का अर्थ भी विस्तार पा रहा है। अब बहन केवल भाई से अपनी रक्षा का वचन लेने वाली नहीं, बल्कि संकट की घड़ी में उसके सामने चट्टान की तरह खड़ी होने वाली सहयात्री, संबल और सुरक्षा-कवच भी है। इस बार 28 अगस्त, शुक्रवार को रक्षाबंधन मनाया जाएगा। संयोग यह भी है कि इसी दिन साल का दूसरा और अंतिम चंद्रग्रहण होगा। हालांकि भारत में इसकी दृश्यता को लेकर स्थानीय खगोलीय परिस्थितियां महत्वपूर्ण हैं, इसलिए ग्रहण के धार्मिक प्रभाव और सूतक के विषय में स्थानीय पंचांग को ही अंतिम आधार माना जाना चाहिए। रक्षाबंधन की तिथि, पूर्णिमा, भद्रा और मुहूर्त की गणना भी स्थान के अनुसार कुछ अंतर रख सकती है। खास यह है कि इस बार रक्षाबंधन सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि चंद्रमा, नक्षत्र और पंचांग के कई संयोगों से सजा ऐसा पर्व है, जिसकी अपनी अलग खगोलीय कहानी है। 28 अगस्त, शुक्रवार को जब बहनें भाइयों की कलाई पर राखी बांधेंगी, तब आसमान में श्रावण पूर्णिमा का चंद्रमा होगा और चंद्रमा कुंभ राशि के शतभिषा नक्षत्र में विचरण करेगा। इसी दिन पंचक भी रहेगा। खास बात यह कि जिस भद्रा को राखी बांधने में सबसे बड़ा निषेध माना जाता है, वह वाराणसी की गणना के अनुसार सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाएगी। यानी इस बार राखी का धागा केवल भाई की कलाई पर नहीं बंधेगा, बल्कि उसके साथ श्रावण पूर्णिमा की धार्मिक आस्था, शुक्रवार की सौम्यता, शतभिषा की नक्षत्रीय ऊर्जा और भाई-बहन के रिश्ते की सदियों पुरानी परंपरा भी जुड़ जाएगी।

पूर्णिमा के साथ भद्रा का गणित, फिर राखी का शुभ समय

रक्षाबंधन श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस वर्ष पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त की सुबह शुरू होकर 28 अगस्त की सुबह तक रहेगी। भद्रा के कारण 27 अगस्त को राखी बांधने से बचने की परंपरा है। भद्रा समाप्त होने के बाद 28 अगस्त को रक्षासूत्र बांधने का समय माना जाएगा। काशी क्षेत्र की पंचांग गणना के अनुसार 28 अगस्त की सुबह 5:37 बजे से 9:48 बजे तक राखी बांधने का प्रमुख समय रहेगा। हालांकि पाठकों को अंतिम मुहूर्त के लिए अपने स्थानीय पंचांग अथवा आचार्य से समय का मिलान कर लेना चाहिए।

शतभिषा नक्षत्र में सजेगा रक्षाबंधन

इस बार रक्षाबंधन के दिन चंद्रमा कुंभ राशि में शतभिषा नक्षत्र में रहेगा। वैदिक परंपरा में शतभिषा को गहनता, अनुशासन, उपचार और आत्ममंथन से जोड़कर देखा जाता है। ऐसे में इस बार की राखी का संदेश भी केवल औपचारिक रक्षा तक सीमित होकर रिश्तों को भीतर से मजबूत करने का बन सकता है। दिन की शुरुआत अतिगंड योग से होगी और इसके बाद सुकर्मा योग का प्रभाव आएगा। पंचांग में पंचक की स्थिति भी रहेगी। इसलिए धार्मिक कर्मकांड में केवल एक योग या नक्षत्र देखकर निर्णय लेने के बजाय संपूर्ण पंचांग और स्थानीय मुहूर्त को देखना अधिक उचित होगा।

तीन राशियों के लिए शुभ संकेत!

ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार रक्षाबंधन के आसपास सूर्य और देवगुरु बृहस्पति की स्थिति कई राशियों के लिए सकारात्मक परिणाम देने वाली हो सकती है। हालांकि ज्योतिषीय फलादेश को आस्था और परंपरा के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए।

मेष : आय बढ़ेगी, घर में शुभता : मेष राशि वालों के लिए यह समय उत्साह और सकारात्मक बदलाव लेकर आने वाला माना जा रहा है। आर्थिक स्थिति में सुधार के संकेत हैं। आय के नए रास्ते खुल सकते हैं। लंबे समय से अटके काम गति पकड़ सकते हैं। घर में मांगलिक आयोजन का वातावरण बन सकता है। मानसिक तनाव कम होने से आत्मविश्वास बढ़ेगा।

सिंह : मेहनत को मिलेगा सम्मान : सिंह राशि वालों के लिए रक्षाबंधन का समय कार्यक्षेत्र में उपलब्धियों का संकेत दे रहा है। जिम्मेदारी बढ़ सकती है और पदोन्नति अथवा नई भूमिका के अवसर बन सकते हैं। कारोबारियों को लाभ मिल सकता है। लंबे समय से अटका धन वापस आने की उम्मीद बन सकती है।

धनु : भाग्योदय का समय : धनु राशि के स्वामी देवगुरु बृहस्पति हैं। ऐसे में रक्षाबंधन के बाद का समय इस राशि के जातकों के लिए विशेष उत्साह देने वाला माना जा रहा है। नौकरी की तलाश कर रहे लोगों को अवसर मिल सकता है। समाज और परिवार में प्रतिष्ठा बढ़ेगी। भाई-बहनों के साथ संबंध और मधुर होंगे।

ज्योतिषीय उपाय : रक्षाबंधन के दिन राखी बांधने या बंधवाने के बाद श्रद्धानुसार भगवान श्रीकृष्ण और माता लक्ष्मी की पूजा करें। परिवार की सुख-समृद्धि और भाई-बहन के दीर्घ जीवन की कामना करें।

अब बहन भी भाई की रक्षा करती है

रक्षाबंधन की पारंपरिक तस्वीर में बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है और भाई उसकी रक्षा का वचन देता है। लेकिन बदलते समाज ने इस तस्वीर में एक खूबसूरत रंग और जोड़ दिया है। अब बहन भी भाई की रक्षा कर रही है। मुसीबत में उसके साथ खड़ी हो रही है। आर्थिक संकट में सहारा बन रही है। बीमारी में अस्पताल के बाहर रातें गुजार रही है। नौकरी छूटने पर हौसला दे रही है। गलत रास्ते पर जाने से रोक रही है। और जब भाई किसी संकट में फंसता है तो वही बहन परिवार के सामने सबसे पहले ढाल बनकर खड़ी होती है। इसलिए आज राखी के धागे का अर्थ एकतरफा नहीं रहा। भाई बहन की रक्षा करे और बहन भाई के विश्वास की। भाई बहन की इज्जत की ढाल बने और बहन भाई के आत्मविश्वास की। यही आधुनिक रक्षाबंधन की सबसे खूबसूरत तस्वीर है।

रक्षा सूत्र केवल भाई की कलाई के लिए नहीं

भारतीय परंपरा में रक्षा सूत्र का अर्थ व्यापक है। जिसे हम अपने लिए सुरक्षा, मंगल और शुभता का प्रतीक मानते हैं, उसे किसी भी ऐसे व्यक्ति के हाथ पर बांधा जा सकता है जिसके साथ हमारा प्रेम, विश्वास और सम्मान का संबंध हो। बहन भाई को, गुरु शिष्य को, माता-पिता संतान को और परिवार का सदस्य अपने प्रियजन को रक्षा सूत्र बांध सकता है। अपने इष्टदेव को भी रक्षा सूत्र अर्पित करने की परंपरा रही है। इसका मूल भाव एक ही है

तुम सुरक्षित रहो, तुम्हारा जीवन मंगलमय हो और विपत्तियां तुमसे दूर रहें।

बहन-बहन भी बांधें राखी, हर रिश्ता बने बराबर

बदलते सामाजिक परिवेश में रक्षाबंधन को एक नए अर्थ में देखने की जरूरत है। जिन परिवारों में केवल बेटियां हैं, वहां किसी भाई की अनुपस्थिति को कमी क्यों माना जाए? बहन बहन को राखी बांध सकती है। बेटी माता-पिता को रक्षा सूत्र बांध सकती है। माता-पिता बच्चों को रक्षा सूत्र बांध सकते हैं। क्योंकि असली सवाल यह नहीं कि किसने किसकी रक्षा करनी है, बल्कि यह है कि कौन किसके साथ खड़ा रहेगा।  यही रक्षाबंधन को रस्म से रिश्ते और रिश्ते से जिम्मेदारी में बदल देता है।

एक नजर में रक्षाबंधन 2026

तारीख: 28 अगस्त 2026, शुक्रवार

पर्व: श्रावण पूर्णिमा/रक्षाबंधन

पूर्णिमा शुरू: 27 अगस्त, सुबह 9:08 बजे

पूर्णिमा समाप्त: 28 अगस्त, सुबह 9:48 बजे

वाराणसी में राखी बांधने का समय: सुबह 5:37 से 9:48 बजे तक

भद्रा: सूर्योदय से पहले समाप्त

चंद्र राशि: कुंभ

नक्षत्र: शतभिषा

योग: अतिगंड, सुबह करीब 7:28 बजे तक; इसके बाद सुकर्मा

करण: बव, पूर्णिमा समाप्ति तक

पंचक: प्रभावी

सूर्य राशि: सिंह

अयन: दक्षिणायन

मास: श्रावण

विक्रम संवत: 2083

शक संवत: 1948

यम-यमी से शुरू होती है भाई-बहन के रिश्ते की प्राचीन कथा

भाई-बहन के रिश्ते की जड़ें भारतीय परंपरा में अत्यंत पुरानी हैं। ऋग्वेद के यम-यमी सूक्त में भाई-बहन के संबंध और उसकी मर्यादा का उल्लेख मिलता है। यम और यमी सूर्य की संतान माने गए हैं। इस विमर्श में भाई-बहन के रिश्ते की मर्यादा और पवित्रता का भाव सामने आता है। रक्षाबंधन इसी व्यापक भारतीय भावभूमि में विकसित हुआजहां रक्षा केवल शरीर की नहीं, बल्कि मर्यादा, सम्मान, विश्वास और संबंधों की भी है।

नारी का सबसे निश्छल रूप बहन के रिश्ते में

नारी मां है तो ममता, बेटी है तो उम्मीद, पत्नी है तो जीवनसंगिनी और बहन है तो निश्छल अपनापन। बहन के रिश्ते में अधिकार भी है और अपनापन भी। वह भाई की कमियों पर डांट सकती है, उसकी गलतियों पर नाराज हो सकती है और दुनिया से छिपाकर उसके आंसू भी पोंछ सकती है। बड़ी बहन में कई भाइयों को मां की छाया दिखाई देती है। छोटी बहन बचपन की गुड़िया बनकर जीवनभर मन में बसी रहती है। बड़ा भाई शक्ति-स्तंभ बनता है तो छोटा भाई बहन के लिए उसकी जान का टुकड़ा। इसीलिए भाई-बहन का रिश्ता समय के साथ पुराना नहीं होता, बल्कि स्मृतियों के कारण और गहरा होता जाता है।  

तकनीक बढ़ी, रिश्तों की जरूरत और बढ़ी

मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने दुनिया को मुट्ठी में ला दिया, लेकिन रिश्तों के बीच दूरियां भी बढ़ाई हैं। आज एक ही घर में रहने वाले लोग कई बार एक-दूसरे से बात करने के लिए मोबाइल का सहारा लेते हैं। ऐसे समय में रक्षाबंधन हमें याद दिलाता है कि कुछ रिश्ते नेटवर्क से नहीं, नेह से चलते हैं। सात समंदर पार रहने वाली बहन राखी भेजती है। भाई वीडियो कॉल पर बहन के सामने कलाई आगे करता है। कहीं डाक से राखी पहुंचती है तो कहीं ऑनलाइन उपहार। माध्यम बदल गया, भावना नहीं। दूरी बढ़ी है, लेकिन राखी की डोर छोटी नहीं हुई।

बहन का प्यार स्वस्थ समाज की बुनियाद

रक्षाबंधन का सामाजिक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जिस समाज में बेटियों को सम्मान मिलता है, वहां महिलाओं की सुरक्षा और गरिमा का भाव मजबूत होता है। भाई को बचपन से बहन का सम्मान करना सिखाना केवल पारिवारिक संस्कार नहीं, बल्कि सामाजिक संस्कार भी है। बहन के रूप में नारी को समझने वाला पुरुष समाज की हर महिला के प्रति सम्मान का भाव विकसित कर सकता है। इसलिए रक्षाबंधन केवल मिठाई, राखी और उपहार का त्योहार नहीं है। यह बेटी, बहन और नारी के सम्मान का सामाजिक संदेश भी है।

जहां महिलाएं खुश, वहां घर में समृद्धि

भारतीय परंपरा में स्त्री को लक्ष्मी स्वरूप माना गया है। इसी कारण घर की महिलाओं का सम्मान और प्रसन्नता परिवार की समृद्धि से जोड़ी गई है। रक्षाबंधन पर बहन को महंगा उपहार देने से अधिक महत्वपूर्ण है उसे सम्मान, सुरक्षा, बराबरी और निर्णयों में हिस्सेदारी देना। क्योंकि सबसे बड़ा उपहार कोई वस्तु नहींसम्मान है। सबसे बड़ी राखी कोई रेशम का धागा नहींविश्वास है। और सबसे बड़ा रक्षा वचन कोई शब्द नहींमुसीबत में साथ खड़े रहना है।

राखी का नया मंत्र : “तुम मेरी ढाल, मैं तुम्हारा संबल

रक्षाबंधन की परंपरा सदियों पुरानी है, लेकिन इसका संदेश आज भी उतना ही नया है। कल तक भाई बहन से कहता था—“मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा।आज बहन भी कह सकती है— “तुम अकेले नहीं हो, जरूरत पड़ी तो मैं भी तुम्हारे साथ खड़ी रहूंगी।यही रक्षाबंधन का बदलता चेहरा है। यही उस कच्चे धागे की असली ताकत है। क्योंकि राखी आखिर धागा नहींदो दिलों के बीच खिंची वह अदृश्य रेखा है, जिसके इस पार भाई है और उस पार बहन; मगर संकट की घड़ी में दोनों एक-दूसरे के लिए एक ही तरफ खड़े मिलते हैं।

एक रक्षा-सूत्र, हजार रिश्ते

आज जरूरत है कि रक्षाबंधन को केवल भाई-बहन के त्योहार के रूप में देखकर परिवार, समाज और इंसानियत के बीच भरोसे का पर्व बनाया जाए। राखी भाई की कलाई पर बंधे, मगर उसका संदेश पूरे समाज तक पहुंचेबेटी सुरक्षित हो, बहन सम्मानित हो, भाई जिम्मेदार हो और परिवार प्रेम से जुड़ा हो। यही वह रक्षाबंधन होगा, जिसमें धागा छोटा होगा, लेकिन उसका अर्थ बहुत बड़ा। रक्षा केवल करने का वचन नहींएक-दूसरे के लिए खड़े रहने का संकल्प है।

शुक्रवार का दिन भी अपने आप में खास

28 अगस्त को शुक्रवार है। ज्योतिषीय परंपरा में शुक्रवार को शुक्र ग्रह का दिन माना जाता है और शुक्र का संबंध प्रेम, सौंदर्य, संबंधों और पारिवारिक सौहार्द से जोड़ा जाता है। यही संयोग रक्षाबंधन के भाव को और गहरा करता हैप्रेम के रिश्ते को रक्षा के संकल्प में बदलने वाला दिन।

राखी सिर्फ धागा नहीं, पांच संकल्पों का सूत्र

इस बार रक्षाबंधन को एक नए अंदाज में देखने की जरूरत है। राखी की तीन लड़ियों में केवल भाई की कलाई नहीं, बल्कि रिश्ते के तीन बड़े संकल्प बांधे जा सकते हैंसम्मान, सुरक्षा और साथ। बहन के लिए भाई का संरक्षण केवल उसकी शारीरिक सुरक्षा तक सीमित रहे और भाई के लिए बहन का स्नेह केवल त्योहार तक सीमित हो। बदलते समय में राखी का असली अर्थ यही है कि दोनों एक-दूसरे की ढाल बनें।

काशी में सुबह से सजेगी भाई-बहन के रिश्ते की डोर

श्रावण के अंतिम चरण और पूर्णिमा के इस पर्व पर काशी में घरों से लेकर बाजारों तक राखी की रौनक दिखाई देगी। रंग-बिरंगी राखियों के साथ इस बार पारंपरिक मौली, रुद्राक्ष, चंदन, स्वस्तिक और धार्मिक प्रतीकों वाली राखियों की मांग भी विशेष आकर्षण का केंद्र बनेगी। पूजन की थाली में रोली, अक्षत, दीप, मिठाई और राखी के साथ बहन भाई के माथे पर तिलक लगाएगी। आरती के बाद रक्षा सूत्र बांधकर उसके सुख, स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना करेगी। भाई भी बहन को उपहार देने के साथ जीवनभर उसके साथ खड़े रहने का संकल्प दोहराएगा।

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