ज्ञानवापी-कृष्ण जन्मभूमि के बीच 1991 की दीवार, संसद तोड़ेगी या सुप्रीम कोर्ट खोलेगा रास्ता?
काशी की दीवारों पर इतिहास अब भी सांस लेता है और मथुरा की मिट्टी अब भी सवाल करती है। लेकिन इन सवालों के सामने 1991 का वह कानून खड़ा है, जिसने आजादी के दिन मौजूद धार्मिक स्वरूप को कानूनी सुरक्षा की ऐसी चट्टान में बदल दिया, जिसे पार करना अदालतों के लिए भी आसान नहीं। ज्ञानवापी और कृष्ण जन्मभूमि के विवाद इसलिए सिर्फ आस्था के सवाल नहीं रह गए हैं; वे इस बड़े प्रश्न में बदल चुके हैं कि क्या इतिहास के किसी अध्याय पर संसद हमेशा के लिए ताला लगा सकती है? अयोध्या के मामले को इसी कानून से बाहर रखा गया था। फिर काशी और मथुरा क्यों उसी कसौटी में बांध दिए गए—यह सवाल आज देश के सामने है। सवाल किसी धर्म की जीत या हार का नहीं, न्याय के दरवाजे खुले रखने का है। यदि किसी दावे में दम नहीं है तो अदालत उसे खारिज करे। यदि इतिहास, पुरातत्व और दस्तावेज किसी दावे को मजबूत करते हैं तो उसकी सुनवाई का रास्ता क्यों बंद हो? और यदि 1991 का कानून संविधान की कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरता है तो सुप्रीम कोर्ट उसे वैध ठहराए—लेकिन फैसला तो हो. देश को अनिश्चितता नहीं, निर्णय चाहिए। यही वह मोड़ है जहां केंद्र सरकार इतिहास की राजनीति करने के बजाय इतिहास को न्याय की चौखट तक पहुंचाने की पहल कर सकती है। संसद में कानून पर पुनर्विचार हो, सुप्रीम कोर्ट में सरकार अपना स्पष्ट संवैधानिक पक्ष रखे और फैसला तथ्यों पर हो। क्योंकि इतिहास को दबाने से वह मिटता नहीं, सवाल और गहरे होते हैं। अब वक्त है कि सरकार पहल करे—1991 की कानूनी दीवार के उस पार आखिर संविधान क्या कहता है, यह देश साफ-साफ जाने
सुरेश गांधी
काशी की धरती
पर उठता एक सवाल
मथुरा तक पहुंचता है
और मथुरा का सवाल दिल्ली
की सत्ता से होता हुआ
सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक
जा पहुंचता है। विवाद सिर्फ
इतना नहीं कि किसी
धार्मिक स्थल का अतीत
क्या था; असली प्रश्न
यह है कि क्या
1991 में बनाया गया कानून उस
अतीत पर न्यायिक बहस
का दरवाजा हमेशा के लिए बंद
कर सकता है? Places of Worship (Special Provisions) Act,
1991 ने 15 अगस्त 1947 को मौजूद धार्मिक
स्वरूप को संरक्षित करने
की व्यवस्था की। अयोध्या विवाद
को इससे अलग रखा
गया, लेकिन ज्ञानवापी और कृष्ण जन्मभूमि
जैसे विवाद इसी कानूनी प्रावधान
की सबसे कठिन परीक्षा
बन गए हैं। यहीं
से वह सवाल पैदा
होता है जो अब
राजनीतिक गलियारों से लेकर अदालत
की चौखट तक गूंज
रहा है—संसद इस
कानूनी दीवार को बदलेगी या
सुप्रीम कोर्ट इसकी संवैधानिक मजबूती
की अंतिम जांच करेगा?
यह किसी धर्म
को जिताने या किसी धर्म
को हराने का सवाल नहीं
है। यह सवाल है कि
भारत अपने इतिहास के
कठिन सवालों से कैसे निपटेगा—भावना से, राजनीति से
या संविधान से? अगर दावा
गलत है तो अदालत
कहे—गलत है। अगर
प्रमाण कमजोर हैं तो अदालत
कहे—प्रमाण पर्याप्त नहीं। और अगर कानून
ही सुनवाई की राह रोक
रहा है तो यह
भी संविधान की कसौटी पर
तय होना चाहिए कि
वह रोक वैध है
या नहीं। केंद्र सरकार को अब पहल
करनी चाहिए। संसद कानून की
समीक्षा करे, सुप्रीम कोर्ट
उसकी संवैधानिकता तय करे और
इतिहास को साक्ष्यों के
साथ न्याय की चौखट तक
पहुंचने दिया जाए। क्योंकि
देश को अंतहीन विवाद
नहीं चाहिए। उसे एक निर्णायक संवैधानिक
उत्तर चाहिए। और शायद यही
वह क्षण है जब
1991 की कानूनी दीवार के सामने देश
पहली बार इतने साफ
शब्दों में पूछ रहा
है— “संसद तोड़ेगी या
सुप्रीम कोर्ट खोलेगा रास्ता?”
कानून बना था विवाद रोकने के लिए, अब खुद विवाद के केंद्र में
1991 में जब यह
कानून आया, तब उसके
पीछे एक बड़ा उद्देश्य
था—आजादी के बाद धार्मिक
स्थलों के पुराने विवादों
को दोबारा खोलने से रोकना और
देश को अंतहीन धार्मिक
संघर्षों से बचाना। लेकिन
तीन दशक से ज्यादा
समय बाद परिस्थितियां एक
अलग सवाल खड़ा कर
रही हैं। अगर किसी
धार्मिक स्थल के संबंध
में कोई ऐतिहासिक दावा
सामने आता है और
दावा करने वाला पक्ष
कहता है कि उसके
पास दस्तावेज, पुरातात्विक प्रमाण या अन्य साक्ष्य
हैं, तो क्या उसे
अदालत में उन प्रमाणों
की जांच कराने का
अवसर मिलना चाहिए? या 15 अगस्त 1947 की स्थिति को
कानून की ऐसी अंतिम
सीमा मान लिया जाए
जिसके आगे न्यायिक परीक्षण
की कोई गुंजाइश ही
न रहे? यही वह
संवैधानिक गांठ है जिसे
अब खोलना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट में पहले से मौजूद है सबसे बड़ा सवाल
Places of
Worship Act की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने
वाली याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट के सामने हैं।
2022 में शीर्ष अदालत ने इस चुनौती
से जुड़े कई महत्वपूर्ण संवैधानिक
प्रश्न दर्ज किए थे।
यानी यह महज राजनीतिक
बहस नहीं है। अदालत
के सामने यह प्रश्न पहले
से मौजूद है कि संसद
की विधायी शक्ति की सीमा क्या
है, क्या कानून न्यायिक
उपचार को इस प्रकार
सीमित कर सकता है
और धार्मिक स्वतंत्रता तथा समानता जैसे
संवैधानिक अधिकारों पर इसका क्या
प्रभाव पड़ता है। यहीं से
केंद्र सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण
हो जाती है।
केंद्र के सामने दो रास्ते—और दोनों आसान नहीं
पहला रास्ता है
संसद। केंद्र सरकार चाहे तो 1991 के
कानून में संशोधन का
प्रस्ताव ला सकती है।
वह यह तय कर
सकती है कि ऐतिहासिक
और पुरातात्विक साक्ष्यों से जुड़े अत्यंत
सीमित मामलों में न्यायिक परीक्षण
का रास्ता उपलब्ध हो। यह पूर्ण
निरसन से अलग रास्ता
होगा। इसमें कानून की मूल भावना—धार्मिक स्थलों को बार-बार
विवाद का अखाड़ा बनने
से रोकना—भी बची रह
सकती है और वास्तविक
ऐतिहासिक दावों के न्यायिक परीक्षण
की संभावना भी बन सकती
है। दूसरा रास्ता है सुप्रीम कोर्ट।
सरकार अदालत में अपना स्पष्ट
संवैधानिक पक्ष रख सकती
है। वह कानून का
बचाव करे या उसके
कुछ प्रावधानों पर संवैधानिक आपत्ति
जताए—लेकिन अस्पष्टता की स्थिति लंबे
समय तक नहीं चल
सकती। क्योंकि फैसला अंततः अदालत को ही करना
है।
काशी-मथुरा को राजनीतिक नारे से ज्यादा चाहिए
ज्ञानवापी और कृष्ण जन्मभूमि
का प्रश्न जितना धार्मिक है, उतना ही
राजनीतिक भी। लेकिन इसका
समाधान केवल राजनीतिक मंचों
से संभव नहीं। यदि
किसी पक्ष का दावा
गलत है तो अदालत
उसे खारिज करे। यदि साक्ष्य
अपर्याप्त हैं तो मुकदमा
आगे न बढ़े। और
यदि किसी दावे के
पीछे गंभीर ऐतिहासिक व पुरातात्विक आधार
है, तो उसे न्यायिक
कसौटी पर परखने का
अवसर मिले। न्याय की खूबसूरती यही
है कि वह पहले
से किसी पक्ष को
विजेता घोषित नहीं करता। यही
कारण है कि इस
पूरे विवाद को ‘मंदिर बनाम
मस्जिद’ की भाषा में
सीमित करना समस्या को
और उलझाएगा। असल बहस है—इतिहास के किसी दावे
को अदालत में सुनने का
दरवाजा खुला रहना चाहिए
या नहीं?
केंद्र पहल करे तो राजनीतिक अर्थ भी बड़ा होगा
केंद्र सरकार यदि संसद में
संशोधन की पहल करती
है तो यह केवल
एक राजनीतिक निर्णय नहीं होगा। यह
संकेत होगा कि सरकार
ऐतिहासिक विवादों का समाधान कानून
और संविधान के रास्ते से
चाहती है। और यदि
सरकार सुप्रीम कोर्ट में मजबूत संवैधानिक
पैरवी करती है तो
वह यह सुनिश्चित कर
सकती है कि इस
विवाद का फैसला भावनाओं
या राजनीतिक दबाव में नहीं,
बल्कि संविधान की व्याख्या के
आधार पर हो। दोनों
रास्ते एक-दूसरे के
विरोधी भी नहीं हैं।
संसद कानून बना सकती है,
लेकिन उसकी संवैधानिकता का
अंतिम प्रहरी सुप्रीम कोर्ट है। यही भारतीय
लोकतंत्र की खूबसूरती भी
है और उसकी शक्ति
भी।
सबसे बड़ा सवाल—1947 ही अंतिम सीमा क्यों?
इस कानून की
बहस का सबसे संवेदनशील
बिंदु यही है। 15 अगस्त
1947 को धार्मिक स्वरूप को अंतिम कानूनी
आधार मानने का उद्देश्य निश्चित
रूप से स्थिरता और
शांति था। लेकिन आलोचना
यह है कि इससे
उस तारीख से पहले के
इतिहास से जुड़े संभावित
दावों के न्यायिक परीक्षण
का रास्ता अत्यधिक सीमित हो जाता है।
दूसरी ओर, कानून के
समर्थकों की दलील है
कि यदि अतीत के
हर धार्मिक विवाद को खोल दिया
गया तो देश कभी
समाप्त न होने वाले
मुकदमों और सामाजिक तनाव
में फंस सकता है।
दोनों तर्क गंभीर हैं।
इसीलिए समाधान संसद और सुप्रीम
कोर्ट के संवैधानिक संवाद
से निकलना चाहिए—सड़क की बहस
से नहीं।
अब फैसला टालने से सवाल खत्म नहीं होंगे
ज्ञानवापी हो, कृष्ण जन्मभूमि हो या भविष्य में सामने आने वाला कोई और विवाद—यदि कानून की व्याख्या अस्पष्ट रहती है तो हर नया मामला उसी सवाल को फिर जन्म देगा। इसलिए देश को एक स्पष्ट संवैधानिक स्थिति चाहिए। केंद्र सरकार को पहल करनी चाहिए। वह चाहे कानून में सीमित और स्पष्ट संशोधन का रास्ता चुने, चाहे सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक सवाल पर अपना अंतिम दृष्टिकोण रखे—लेकिन अनिश्चितता को स्थायी समाधान नहीं बनाया जा सकता। क्योंकि इतिहास जितना पीछे छूटता है, उसके सवाल उतने ही राजनीतिक होते जाते हैं।


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