सावन के तीसरे सोमवार पर हेलिकॉप्टर से शिवभक्तों का स्वागत, बाबा विश्वनाथ के दरबार में उमड़ा आस्था का सैलाब
पुष्पवर्षा से निहाल हुई काशी, हर-हर महादेव से गूंजा आसमान
मैदागिन से
गोदौलिया
तक
अटूट
कतारें,
दशाश्वमेध
से
धाम
तक
भक्तों
का
रेला
18 दिनों में 41 लाख
से
अधिक
श्रद्धालुओं
ने
किए
दर्शन-जलाभिषेक
सुरेश गांधी
वाराणसी. काशी में सावन
का तीसरा सोमवार केवल कैलेंडर की
एक तारीख नहीं था, बल्कि
सोमवार की भोर से
लेकर रात तक पूरी
नगरी शिवमय रही। गंगा की
लहरों से उठती आस्था,
गलियों में गूंजता डमरू,
मंदिरों में बजते घंटे-घड़ियाल, कांवड़ियों के कंठ से
निकलता ‘बोल बम’ और
हर दिशा में गूंजता
‘हर-हर महादेव’—सोमवार
को काशी ने शिवभक्ति
की ऐसी तस्वीर रची,
जिसमें आस्था और उत्सव एकाकार
हो गए। इसी बीच
आसमान से बरसी गुलाब
की पंखुड़ियों ने इस दृश्य
को और अलौकिक बना
दिया।
शिवभक्तों और कांवड़ियों पर
जिला प्रशासन की ओर से
हेलिकॉप्टर से पुष्पवर्षा की
गई। पुलिस आयुक्त मोहित अग्रवाल और जिलाधिकारी सत्येंद्र
कुमार ने हेलिकॉप्टर से
श्रद्धालुओं पर गुलाब की
पंखुड़ियां बरसाकर उनका स्वागत किया।
जैसे ही आकाश में
हेलिकॉप्टर की गड़गड़ाहट सुनाई
दी और उसके बाद
फूलों की बारिश शुरू
हुई, नीचे उमड़े श्रद्धालुओं
में उत्साह की लहर दौड़
गई। किसी ने हाथ
उठाकर स्वागत किया तो किसी
के कंठ से अनायास
ही ‘हर-हर महादेव’
का जयघोष फूट पड़ा। आसमान
से बरसते फूल और धरती
पर शिवनाम का घोष—काशी
के इस दृश्य ने
सावन के तीसरे सोमवार
को यादगार बना दिया।
रविवार की रात से ही कतार में आस्था
बाबा विश्वनाथ के
जलाभिषेक की उत्कंठा ऐसी
थी कि रविवार की
रात से ही श्रद्धालु
गंगा स्नान कर कतारों में
लग गए। पूरी रात
इंतजार के बावजूद चेहरों
पर थकान से अधिक
बाबा के दर्शन की
आतुरता दिखाई दी। सोमवार की
भिनसारे मंगला आरती के बाद
जब बाबा दरबार के
पट खुले तो मानो
भक्तों के धैर्य का
बांध टूट पड़ा। पूरा
परिसर ‘हर-हर महादेव’
के जयघोष से गूंज उठा।
मैदागिन से गोदौलिया के
आगे तक और दशाश्वमेध
घाट से प्रवेश द्वार
संख्या एक होते हुए
प्रवेश द्वार संख्या चार के आगे
तक श्रद्धालुओं की अटूट कतारें
दिखाई दीं। कतारों में
कोई हाथ में लुटिया
लिए था तो किसी
के हाथ में कलश
था। किसी की डलिया
बेलपत्र-धतूरा, भांग और बैजयंती
की माला से सजी
थी। कांवड़ियों के केसरिया बाने
से काशी की गलियां
जैसे भगवा रंग में
रंग गईं। ऊपर इंद्रदेव
भी भक्तों पर मेहरबान रहे।
मेघों ने आसमान पर
वितान तान दिया और
बीच-बीच में बरसती
फुहारों ने उमस से
राहत दी। बारिश की
बूंदों के बीच भी
कतार नहीं टूटी। हर
मन में बस एक
ही अभिलाषा थी—बाबा के
दरबार तक पहुंचना और
अपने हाथों से गंगाजल अर्पित
करना।
दर्शन मिलते ही चेहरे पर खिली काशी
घंटों के इंतजार के
बाद जब श्रद्धालुओं की
बारी आई और उन्होंने
बाबा विश्वनाथ के दरबार में
पहुंचकर शीश नवाया तो
मानो सारी प्रतीक्षा सफल
हो गई। किसी ने
गंगाजल चढ़ाया, किसी ने गोदुग्ध
अर्पित किया और किसी
ने बेलपत्र चढ़ाकर भोलेनाथ से सुख-समृद्धि
की कामना की। दर्शन के
बाद चेहरों पर ऐसी तृप्ति
थी, जैसे मन की
कोई अधूरी साध पूरी हो
गई हो। सावन के
18वें दिन तक श्रीकाशी
विश्वनाथ धाम में लगभग
41 लाख से अधिक श्रद्धालु
दर्शन और जलाभिषेक कर
चुके हैं। तीसरे सोमवार
को अकेले मंगला आरती से शयन
आरती तक लगभग पांच
लाख से अधिक श्रद्धालुओं
ने बाबा का दर्शन-पूजन और अभिषेक
किया। यह आंकड़ा बताता
है कि काशी में
सावन केवल पर्व नहीं,
बल्कि करोड़ों आस्थाओं को जोड़ने वाला
विराट आध्यात्मिक उत्सव है।
अर्धनारीश्वर स्वरूप में बाबा की अलौकिक छवि
सावन की परंपरा
के अनुरूप तीसरे सोमवार को श्रीकाशी विश्वनाथ
धाम में बाबा विश्वनाथ
की चल रजत प्रतिमा
का अर्धनारीश्वर स्वरूप में श्रृंगार किया
गया। सायंकाल श्रृंगार आरती के समय
बाबा का यह अद्भुत
स्वरूप भक्तों के आकर्षण का
केंद्र रहा। अर्धनारीश्वर—जहां
शिव और शक्ति एक
ही स्वरूप में प्रतिष्ठित हैं—का दर्शन करते
हुए श्रद्धालु देर तक उस
अलौकिक छवि को निहारते
रहे। किसी ने हाथ
जोड़ लिए, किसी की
आंखें नम हो गईं
तो कोई उस दिव्य
स्वरूप को अपने मन
में संजोकर आगे बढ़ गया।
दर्शन पाकर श्रद्धालुओं के
चेहरे पर कृतज्ञता और
हृदय में भक्ति की
अनुभूति साफ दिखाई दी।
काशी की धड़कनों में बस गया ‘बोल बम’
तीसरे सोमवार को काशी की
गलियां किसी जीवंत आध्यात्मिक
चित्र की तरह नजर
आईं। कहीं डमरू निनाद
था तो कहीं शंख
की ध्वनि। कहीं घंटे-घड़ियाल
बज रहे थे तो
कहीं कांवड़ियों के कंठ से
‘बोल बम’ का उद्घोष
वातावरण को गुंजायमान कर
रहा था। दशाश्वमेध और
आसपास के घाटों पर
गंगा स्नान के बाद श्रद्धालुओं
की टोलियां बाबा विश्वनाथ की
ओर बढ़ती रहीं। किसी के कंधे
पर कांवड़ थी, किसी के
हाथ में गंगाजल से
भरा पात्र। माथे पर भस्म,
गले में रुद्राक्ष और
तन पर केसरिया वस्त्र—काशी में शिवभक्ति
का रंग जितना दिखाई
दे रहा था, उससे
कहीं अधिक महसूस हो
रहा था।
कालभैरव से विश्वनाथ तक शिवमय काशी
श्रीकाशी विश्वनाथ धाम के साथ
काशी के कोतवाल बाबा
कालभैरव मंदिर समेत प्रमुख शिवालयों
में भी सुबह से
श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती
रही। शिवालयों में जलाभिषेक के
लिए भक्तों का तांता लगा
रहा। सावन के तीसरे
सोमवार और नागपंचमी के
संयोग ने धार्मिक उल्लास
को और बढ़ा दिया।
प्रशासन ने भीड़, यातायात
और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर विशेष
इंतजाम किए। श्रद्धालुओं की
सुगम आवाजाही, कतार प्रबंधन और
मंदिर क्षेत्र की निगरानी पर
विशेष ध्यान रहा। कांवड़ियों और
आम श्रद्धालुओं की सुविधा के
लिए व्यवस्थाएं लगातार संचालित होती रहीं।
आस्था का आंकड़ा भी बना नया अध्याय
सावन के 18 दिनों
में 41 लाख से अधिक
श्रद्धालुओं का बाबा विश्वनाथ
के दरबार में पहुंचना काशी
की बढ़ती धार्मिक आस्था और देशभर में
बाबा विश्वनाथ धाम के प्रति
आकर्षण का प्रमाण है।
तीसरे सोमवार की भीड़ ने
इस आध्यात्मिक प्रवाह को और विराट
बना दिया। काशी में सावन
की यही तो खासियत
है—यहां शिव केवल
मंदिर के गर्भगृह में
नहीं, बल्कि गलियों की सांसों, घाटों
की लहरों और भक्तों के
जयघोष में बसते हैं।
सोमवार को हेलिकॉप्टर से
बरसी गुलाब की पंखुड़ियां मानो
उसी अनंत आस्था पर
प्रशासन की ओर से
पुष्पांजलि थीं। आसमान से
फूल बरसते रहे और धरती
से ‘हर-हर महादेव’
उठता रहा। गंगा किनारे
बसी काशी ने तीसरे
सोमवार को फिर साबित
किया कि यहां सावन
आता नहीं, उतरता है—हर मन
में, हर गली में
और हर सांस में।

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