Monday, 7 September 2026

पीडीए का मुखौटा, ‘दलित प्रेम’ की नौटंकी!

पीडीए का मुखौटा, ‘दलित प्रेम की नौटंकी!

राजनीति में किसी दल का मूल्यांकन केवल उसके आज के नारों से नहीं होता। उसके राजनीतिक सफर, उसके नेताओं के सार्वजनिक बयान और उसके आसपास खड़े चेहरों को भी उसी कसौटी पर परखा जाता है। सपा की पीडीएपिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यकराजनीति के बीच यही सवाल अब उसके पुराने राजनीतिक दौर को लेकर भी उठ रहा है। 2016 का आजम खान प्रकरण और सपा से जुड़े अतीक अहमद का राजनीतिक अतीत फिर बहस के केंद्र में है। वह बयान जिसमें आजम खान ने डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा की ओर संकेत करते हुए जमीन को लेकर विवादित टिप्पणी की थी। उस समय मुख्यमंत्री रहे अखिलेश यादव ने उनका बचाव किया था। आज वही सियासत बाबा साहेब की विरासत और दलित सम्मान को पीडीए के केंद्र में रखती है। यह अलग बात है कि तब पीडीए का नारा नहीं था, लेकिन उस समय का राजनीतिक रुख आज की दलित राजनीति के दावे पर सवाल जरूर खड़ा करता है। दूसरी ओर अतीक अहमद का सपा से राजनीतिक जुड़ाव भी उस दौर की राजनीति की एक चर्चित तस्वीर है। बाद में अतीक के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामलों में जांच और कार्रवाई हुई। किसी आरोपी को अदालत के फैसले से पहले दोषी ठहराना उचित नहीं। लेकिन सवाल बना रहता हैक्या चुनावी प्रभाव के आगे राजनीतिक दलों की कसौटी बदल जाती है? पीडीए के नए नारों के बीच पुराने चेहरों की यह तस्वीर अखिलेश की सियासत से एक सीधा सवाल पूछ रही हैसामाजिक न्याय का दावा कितना नया है और राजनीतिक अतीत कितना पुराना

सुरेश गांधी

राजनीति में मौसम बदलते हैं, नारे बदलते हैं और समीकरण भी  बदलते हैं, लेकिन सत्ता के मंच से निकले शब्द इतिहास की स्मृति से इतनी आसानी से मिटते नहीं। समाजवादी पार्टी की मौजूदा पीडीएपिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक राजनीति के बीच आजम खान का करीब एक दशक पुराना बयान फिर सोशल मीडिया पर वायरल है। इसके साथ ही 2016 के उस राजनीतिक दौर की तस्वीर भी सामने गई है, जब समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच दलित प्रतीकों, स्मारकों और जमीन को लेकर तीखी राजनीतिक लड़ाई थी। वायरल वीडियो सितंबर 2016 का बताया जाता है। गाजियाबाद में हज हाउस के उद्घाटन कार्यक्रम में तत्कालीन सपा सरकार के कद्दावर मंत्री आजम खान ने डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा की ओर संकेत करते हुए जमीन को लेकर टिप्पणी की थी। बयान के सामने आते ही राजनीतिक विवाद खड़ा हुआ। भाजपा और बसपा ने इसे बाबा साहेब के प्रति आपत्तिजनक टिप्पणी बताते हुए विरोध किया। बाद में इसी प्रकरण को लेकर आजम खान के खिलाफ प्राथमिकी भी दर्ज हुई। मगर इस पूरे प्रसंग का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू केवल आजम खान का बयान नहीं था। उस मंच पर तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी मौजूद थे और बाद में उन्होंने आजम खान का बचाव किया। अखिलेश ने उस समय बसपा शासन में स्मारकों के निर्माण और जमीन के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठाए थे। यानी विवाद एक मंत्री के बयान से आगे बढ़कर उस समय की सपा-बसपा राजनीतिक लड़ाई का हिस्सा बन गया था। यहीं से आज की पीडीए राजनीति के संदर्भ में सवाल उठता है। यह अलग बात है कि उस दौर मेंपीडीएका नारा नहीं था, लेकिन आजम खान के बयान पर अखिलेश यादव का रुख आज कीदलित-मोहब्बतकी सियासत की कलई जरूर खोलता है।

यह सवाल पूछने से भी नहीं बचा जा सकता कि जिस राजनीतिक दल की आज की रणनीति में दलित सम्मान, सामाजिक न्याय और संविधान की रक्षा प्रमुख मुद्दे हैं, उसके अतीत के विवादित प्रसंगों और उस पर तत्कालीन नेतृत्व के रुख का मूल्यांकन कैसे किया जाए? यही सवाल वायरल वीडियो को महज सोशल मीडिया सामग्री से राजनीतिक बहस का विषय बना देता है। समाजवादी पार्टी के लिए पीडीए अब केवल चुनावी संक्षिप्त रूप नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक गठजोड़ की राजनीतिक अवधारणा है। पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को एक मंच पर लाकर सत्ता की राजनीति का नया समीकरण बनाने की कोशिश इसके केंद्र में है। ऐसे में बाबा साहेब आंबेडकर का नाम और उनकी संवैधानिक विरासत भी इस राजनीति में स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है। लेकिन लोकतंत्र में राजनीतिक स्मृति सुविधा के हिसाब से नहीं चल सकती। जो अतीत विरोधियों की आलोचना के लिए महत्वपूर्ण है, वही अतीत अपने खेमे के सामने आने पर भी उतना ही प्रासंगिक होना चाहिए। यही राजनीतिक जवाबदेही की पहली कसौटी है। इस पूरे मामले का दूसरा पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। बाबा साहेब आंबेडकर किसी एक दल, जाति या चुनावी गठजोड़ की संपत्ति नहीं हैं। उनका सबसे बड़ा योगदान संविधान, समान नागरिक अधिकार, सामाजिक बराबरी और वंचितों की राजनीतिक भागीदारी की उस दृष्टि में है, जिसने भारतीय लोकतंत्र को दिशा दी। इसलिए उनके नाम का इस्तेमाल चुनावी नारों में करने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण उनके विचारों के प्रति राजनीतिक आचरण है।

आज जब हर राजनीतिक दल दलित समाज के सम्मान और अधिकार की बात करता है, तब पुराने बयान नए सवालों के साथ लौटेंगे ही। सोशल मीडिया ने राजनीतिक स्मृति को और तीखा कर दिया है। दस वर्ष पुराना वीडियो भी एक दिन में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है और अतीत के किसी प्रसंग को वर्तमान के आईने में खड़ा कर सकता है। इसलिए असली बहस आजम खान के उस बयान से भी आगे जाती है। सवाल यह है कि क्या राजनीति में सामाजिक न्याय स्थायी प्रतिबद्धता है या बदलते चुनावी समीकरणों के साथ बदलने वाला राजनीतिक मुहावरा? समाजवादी पार्टी के लिए पीडीए का संदेश जितना बड़ा है, उसकी कसौटी भी उतनी ही कठिन है। पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकइन तीनों को साथ जोड़ने की राजनीति केवल मंचों और पोस्टरों पर नहीं, बल्कि भाषा, व्यवहार और राजनीतिक इतिहास के प्रति ईमानदार रवैये में भी दिखाई देनी चाहिए। पुराना वीडियो इसलिए फिर चर्चा में है क्योंकि उसने कोई नया बयान नहीं दिया, बल्कि पुराने शब्दों को आज की राजनीति के सामने ला खड़ा किया है। समय बदल गया, नारा बदल गया और सियासी प्राथमिकताएं भी बदल गईंअब सवाल सिर्फ इतना है कि क्या राजनीतिक नजरिया भी सचमुच बदला है?

अखिलेश की सियासत में अपराध के चर्चित चेहरों की मौजूदगी 

सपा के साथ लंबे समय तक जुड़े रहे आजम खान इसका एक बड़ा उदाहरण हैं। वह अखिलेश यादव सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे और पार्टी के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते रहे। बाद के वर्षों में उनके खिलाफ जमीन, जौहर विश्वविद्यालय और अन्य मामलों में मुकदमे और जांच हुईं। I ईडी ने जौहर विश्वविद्यालय से जुड़े मामले में आजम खान के खिलाफ मनी-लॉन्ड्रिंग केस दर्ज किया था और उनसे तथा उनके परिवार के सदस्यों से पूछताछ हुई थी। इसी राजनीतिक परिदृश्य में अतीक अहमद का नाम भी आता है। वह पहले सपा से विधायक रह चुके थे। बाद में उनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामलों और कथित आपराधिक गतिविधियों से अर्जित धन से संपत्ति बनाने को लेकर ईडी की जांच हुई। I ईडी ने 2021 में उनके खिलाफ मनी-लॉन्ड्रिंग केस दर्ज किया था। ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है क्या अपराध की गंभीर छवि चुनावी राजनीति में अयोग्यता की वजह बनी या जातीय, क्षेत्रीय और चुनावी प्रभाव ने उसे ढक दिया? यही सवाल अखिलेश यादव की आज की राजनीति के सामने भी खड़ा होता है। आज सपा संविधान, सामाजिक न्याय और पीडीए के नाम पर नई राजनीतिक भाषा गढ़ रही है। दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समाज को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने का दावा उसकी रणनीति के केंद्र में है। लेकिन इस नई भाषा की विश्वसनीयता का परीक्षण उसके अतीत से भी होगा। आज की राजनीति अगर अपराध के खिलाफ शून्य-सहनशीलता की बात करती है तो कल के राजनीतिक रिश्तों पर भी सवाल पूछे जाएंगे। सवाल यह नहीं कि किसी नेता ने अपराध किया या नहींवह अदालत तय करेगी। सवाल यह है कि राजनीतिक दलों ने किसे अपना बनाया, किसे मंच दिया और किसकी राजनीतिक ताकत को अपने विस्तार का साधन बनाया। यही वह बिंदु है जहांमाफिया प्रेमजैसे राजनीतिक आरोपों की जगह तथ्य आधारित बहस जरूरी हो जाती है। क्योंकि राजनीति में असली परीक्षा सिर्फ यह नहीं कि आप आज क्या कहते हैं, बल्कि यह भी है कि आपके राजनीतिक सफर में कल किन चेहरों के साथ खड़े दिखाई दिए थे। पीडीए की नई राजनीति के सामने इसलिए एक पुराना आईना हैजिसमें नारे नए हैं, लेकिन सवाल पुराने हैं। सामाजिक न्याय की सियासत को अगर सचमुच नई दिशा देनी है तो उसे अपने अतीत के असहज सवालों से भी उतनी ही ईमानदारी से गुजरना होगा, जितनी ईमानदारी से वह अपने विरोधियों से सवाल पूछती है।

मुस्लिम सियासत का हिसाब: वादा कितना, अमल कितना?

सपा की राजनीति में मुस्लिम प्रतिनिधित्व हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। अखिलेश सरकार ने 2012 के बाद अल्पसंख्यक कल्याण के लिए बजट बढ़ाया, ‘हमारी बेटी उसका कलजैसी योजना शुरू की और 2013 में 85 सरकारी योजनाओं में अल्पसंख्यकों के लिए 20 फीसदी हिस्सेदारी का फैसला भी किया। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। 2012 के सपा घोषणापत्र में मुस्लिमों के लिए आबादी के अनुपात में आरक्षण, सुरक्षा बलों में विशेष भर्ती और आतंकवाद के आरोप में फंसे निर्दोष मुस्लिम युवकों को न्याय जैसे वादे किए गए थे। पांच साल बाद पड़ताल में अलग मुस्लिम आरक्षण और विशेष भर्ती जैसे वादों के पूरी तरह लागू नहीं होने की बात सामने आई। मुजफ्फरनगर दंगों के बाद कानून-व्यवस्था का सवाल भी सरकार के सामने बड़ा बना रहा। यही वह जगह है जहांमुस्लिम वोटबैंककी राजनीति और वास्तविक नीतिगत डिलीवरी के बीच बहस शुरू होती है। दूसरी ओर आजम खान जैसे प्रभावशाली मुस्लिम नेता का सपा में लंबे समय तक केंद्रीय स्थान रहा। अतीक अहमद भी सपा के टिकट पर फूलपुर से लोकसभा सांसद चुने गए थे। बाद में उनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामलों में जांच हुई। इसलिए सवाल यह नहीं कि सपा ने मुसलमानों के लिए कुछ किया या नहींरिकॉर्ड बताता है कि योजनाएं भी थीं। सवाल यह है कि जिन वादों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व का आधार बनाया गया, उनका कितना हिस्सा जमीन पर उतरा और राजनीति में प्रभावशाली चेहरों को मिली जगह का पैमाना क्या रहा? यही सवाल आज की पीडीए राजनीति के सामने भी खड़ा है।

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