Saturday, 19 September 2026

नटराज से वंदेभारत तक... काशी की आंखों से दिखा नया तमिलनाडु

नटराज से वंदेभारत तक... काशी की आंखों से दिखा नया तमिलनाडु

चेन्नई के संग्रहालय में नटराज की कांस्य प्रतिमा के सामने खड़ा था तो लगा, समय ठहर गया है। कुछ दिन बाद आईआईटी मद्रास की प्रयोगशाला में डायमंड, क्यूआर कोड और ब्रेन से जुड़ी अत्याधुनिक तकनीक को समझते हुए लगासमय ठहरा नहीं, वह भविष्य की ओर दौड़ रहा है। यही विरोधाभास नहीं, शायद तमिलनाडु की सबसे खूबसूरत सच्चाई है। पीआईबी वाराणसी के मीडिया टूर में छह दिनों की यात्रा ने तमिलनाडु की ऐसी तस्वीर दिखाई, जो पर्यटन के चमकते फ्रेम से कहीं बड़ी है। एग्मोर संग्रहालय में चोलकालीन कांस्य कला और करोड़ों वर्ष पुराने प्राकृतिक इतिहास से मुलाकात हुई तो दक्षिणाचित्र में पुराने घरों के आंगन में दक्षिण भारत की जीवित परंपरा सांस लेती मिली। पुडुचेरी में श्री अरविंद की विचार-धारा और समुद्र का मौन मिला, वहीं उपराज्यपाल से संवाद ने विकास की दूसरी तस्वीर सामने रखी। फिर यात्रा अचानक भविष्य में प्रवेश कर गई। आईआईटी मद्रास में प्रयोगशालाओं के भीतर विज्ञान को समाज की भाषा में समझने का अवसर मिला। डायमंड से लेकर क्यूआर कोड और ब्रेन-टेक्नोलॉजी तकमहसूस हुआ कि कल का भारत कहीं दूर नहीं, हमारे सामने तैयार हो रहा है। आईसीएफ में वंदेभारत को बनते देखा तो समझ आया कि रफ्तार केवल पटरी पर नहीं दौड़ती, उसके पीछे हजारों हाथों का कौशल होता है। चेन्नई पोर्ट ने समुद्र को भारत की आर्थिक धमनियों में बदलते दिखाया। दूरदर्शन ने बदलते मीडिया संसार की कहानी सुनाई। और चेन्नई में प्रधानमंत्री के जन्मदिन आयोजन तथा डॉ. एल. मुरुगन से आत्मीय संवाद ने काशी-तमिलनाडु के रिश्ते को एक और मानवीय स्पर्श दिया। काशी लौटते हुए सामान में तस्वीरें थीं, लेकिन मन में एक नया भारत था— “तमिलनाडु घूमकर नहीं लौटा हूं; भारत को थोड़ा और समझकर लौटा हूं।” 

सुरेश गांधी 

यात्राएं केवल दूरी तय नहीं करतीं। वे दृष्टि का विस्तार भी करती हैं। कुछ यात्राएं लौटकर समाप्त हो जाती हैं और कुछ ऐसी होती हैं, जो लौटने के बाद शुरू होती हैंस्मृतियों में, सवालों में और उन तस्वीरों में, जिन्हें कैमरा तो कैद कर लेता है, लेकिन शब्द देर से पकड़ पाते हैं। तमिलनाडु की यह यात्रा मेरे लिए कुछ ऐसी ही रही। काशी से निकला था दक्षिण भारत को करीब से देखने। लौटते समय महसूस हुआ कि मैंने केवल तमिलनाडु नहीं देखा, बल्कि भारत को एक अलग कोण से देखने का अवसर पाया। चेन्नई के संग्रहालय में हजारों वर्षों की कला और सभ्यता सामने थी। दक्षिणाचित्र में परंपरा अपने घर-आंगन के साथ जीवित थी। आईआईटी मद्रास में भविष्य प्रयोगशालाओं के भीतर आकार ले रहा था। पुडुचेरी में श्री अरविंद की विचार-परंपरा और समुद्र का मौन साथ-साथ था। उपराज्यपाल से संवाद ने इस यात्रा को प्रशासनिक दृष्टि दी। आईसीएफ में वंदेभारत के पीछे की तकनीक और श्रम दिखाई दिया। चेन्नई पोर्ट ने समुद्र के रास्ते चलती अर्थव्यवस्था का विराट चेहरा दिखाया। दूरदर्शन ने बदलते मीडिया संसार की स्मृतियों को जगाया। और चेन्नई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर हुए आयोजन तथा डॉ. एल. मुरुगन से मुलाकात ने यात्रा को आत्मीय संवाद का रंग दिया। इन सबके बीच बार-बार काशी याद आती रही। क्योंकि जितना तमिलनाडु को देखा, उतना ही लगा कि भारत की विविधता को समझने के लिए एक-दूसरे के करीब जाना कितना जरूरी है।

काशी से चेन्नई : एक शहर से दूसरे शहर नहीं,

एक अनुभव से दूसरे अनुभव की यात्रा

काशी से दक्षिण की ओर उड़ान भरते समय मन में कई सवाल थे। उत्तर भारत में तमिलनाडु की छवि अक्सर मंदिरों, भरतनाट्यम, संगीत, समुद्र और प्राचीन संस्कृति तक सीमित होकर रह जाती है। लेकिन क्या किसी प्रदेश की पहचान केवल उसके अतीत से तय होती है? इस यात्रा ने धीरे-धीरे जवाब दिया। तमिलनाडु में अतीत भी है और भविष्य भी। यहां मंदिर की घंटियां भी हैं और आधुनिक कारखानों की मशीनों की आवाज भी। यहां सदियों पुराने घरों की वास्तुकला भी है और अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं में चल रहा अनुसंधान भी। यहां समुद्र की लहरें भी हैं और उन्हीं लहरों के किनारे खड़ा आधुनिक बंदरगाह भी। यात्रा की असली कहानी शायद यही थी।

पहला पड़ाव : चेन्नई का संग्रहालयजब कांस्य में बोलता मिला इतिहास

चेन्नई का सरकारी संग्रहालय, एग्मोर। अंदर प्रवेश करते ही लगा जैसे समय ने अपने दरवाजे खोल दिए हों। पुरातत्व, कला, मूर्तिकला, सिक्के और धातु-कलाहर वस्तु अपने भीतर किसी युग की सांस लिए खड़ी थी। कांस्य दीर्घा में पहुंचकर नजर ठहर गई। नटराज। शिव का यह रूप केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं था। वह गति, सृजन और ब्रह्मांडीय लय का दृश्य रूप था। नटराज को देखते हुए काशी की याद आना स्वाभाविक था। काशी में शिव जीवन का हिस्सा हैंघाटों पर, मंदिरों में, गलियों में, लोकविश्वास में। यहां वही शिव दक्षिण भारतीय कांस्य कला की अद्भुत ऊंचाई में दिखाई दे रहे थे। राम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान की प्रतिमाएं हों या विष्णु, त्रिपुरांतक, दक्षिणामूर्ति, पार्वती, गणेश, लिंगोद्भव, गरुड़ और सुब्रह्मण्यएक-एक प्रतिमा भारतीय सभ्यता की उस व्यापकता की गवाही दे रही थी, जिसे किसी एक प्रदेश की सीमा में बांधना संभव नहीं। चोल, विजयनगर, होयसल और चालुक्य परंपराओं की कला को सामने देखकर लगा कि इतिहास किताब के पन्नों में बंद कोई निर्जीव अध्याय नहीं है। वह हमारे सामने खड़ा हो सकता है। वह धातु में ढल सकता है। वह पत्थर में सांस ले सकता है। और सदियों बाद भी हमसे संवाद कर सकता है। संग्रहालय में करोड़ों वर्ष पुराने प्राकृतिक परिवर्तन और पत्थर के जीवाश्म रूप में बदलने की जानकारी ने समय की कल्पना को और विराट बना दिया। हम अपने जीवन के कुछ दशकों को बहुत लंबा मान लेते हैं, जबकि पृथ्वी ने करोड़ों वर्षों का इतिहास अपने भीतर संजोया हुआ है। संग्रहालय से बाहर निकला तो मन में एक ही बात थीइतिहास पीछे नहीं था, वह हमारे सामने खड़ा था।  

दूसरा पड़ाव : दक्षिणाचित्रजहां घर नहीं, पूरा दक्षिण भारत बसता है

अगले दिन यात्रा ने चेन्नई की शहरी गति से निकलकर एक अलग संसार का रास्ता पकड़ा। दक्षिणाचित्र। पहली नजर में लगा जैसे पुराने घरों का एक संग्रह है। लेकिन जैसे-जैसे भीतर बढ़े, समझ आया कि यहां घरों को केवल संरचनाओं की तरह नहीं बचाया गया है। यहां जीवन की स्मृतियां बचाई गई हैं। दरवाजों की बनावट, लकड़ी की नक्काशी, आंगन, रसोई, पूजा स्थल, घरेलू उपयोग की वस्तुएं और पारंपरिक स्थापत्यसब मिलकर बताते हैं कि कभी इन घरों में जीवन किस तरह बहता था। अलग-अलग दक्षिण भारतीय क्षेत्रों की स्थापत्य परंपराओं और जीवनशैली को यहां एक साथ देखना अपने आप में सांस्कृतिक यात्रा था। समुद्र की हवा के बीच पारंपरिक घरों के आंगन में खड़े होकर काशी की गलियां याद गईं। काशी में भी तो घर केवल ईंट और पत्थर नहीं हैं। वहां चौखट का अपना इतिहास है। आंगन की अपनी स्मृति है। मंदिर और घाट से जुड़ी अपनी संस्कृति है। पीढ़ियों से चली रही जीवनशैली शहर की पहचान बन जाती है। दक्षिणाचित्र में यही एहसास एक अलग भाषा और स्थापत्य में मिला। वहां खड़े होकर लगाभारत की विविधता दरअसल अलग-अलग घरों में रहने वाली एक ही सांस्कृतिक आत्मा है।एक भारत, श्रेष्ठ भारतका भाव किसी नारे से ज्यादा यहां जीवन के रूप में दिखाई दिया।

तीसरा पड़ाव : आईआईटी मद्रासजहां आज

प्रयोगशाला में लिखा जा रहा है कल का भारत

अगर संग्रहालय ने मुझे अतीत में पहुंचाया और दक्षिणाचित्र ने परंपरा के आंगन में बैठाया, तो आईआईटी मद्रास ने अचानक भविष्य के दरवाजे पर खड़ा कर दिया। यही इस यात्रा का वह पड़ाव था, जिसे मैं सबसे अधिक देर तक अपने साथ लेकर लौटा। क्योंकि यहां देखने के लिए केवल इमारतें नहीं थीं। यहां सवाल थे। प्रयोग थे। अनुसंधान था। और सबसे बढ़करभविष्य की तलाश थी। आईआईटी मद्रास की प्रयोगशालाओं और अनुसंधान से जुड़े विभिन्न पहलुओं को करीब से समझने का अवसर मिला। पत्रकार के लिए यह सामान्य भ्रमण से बिल्कुल अलग अनुभव था। अक्सर हम अखबारों में किसी नई तकनीक की एक पंक्ति पढ़ते हैं— “वैज्ञानिकों ने नई तकनीक विकसित की।लेकिन उस एक वाक्य के पीछे कितने वर्ष का शोध, कितनी प्रयोगशाला, कितनी असफलताएं, कितनी गणनाएं और कितने वैज्ञानिकों की मेहनत होती है, यह तब समझ आता है जब आप उस दुनिया के करीब खड़े होते हैं।

डायमंड : चमक से कहीं आगे विज्ञान

डायमंड से संबंधित अनुसंधान और तकनीकी संभावनाओं को समझते हुए पहली बार महसूस हुआ कि हीरे को केवल आभूषण की दृष्टि से देखना कितना सीमित है। जिस पदार्थ को आम आदमी चमक और सुंदरता से जोड़ता है, वैज्ञानिक उसके भौतिक गुणों और तकनीकी संभावनाओं को अलग नजर से देखते हैं। प्रयोगशाला में वैज्ञानिक दृष्टि का यही फर्क दिखाई देता है। वहां किसी वस्तु का महत्व केवल यह नहीं कि वह आज क्या है। महत्व यह है कि वह कल क्या बन सकती है।

क्यूआर कोड : मोबाइल की स्क्रीन से प्रयोगशाला तक

आज QR कोड हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा है। लेकिन आईआईटी मद्रास में तकनीकी अनुसंधान के संदर्भ में QR कोड और उससे जुड़ी संभावनाओं को समझने का अवसर मिला तो यह महसूस हुआ कि तकनीक की असली कहानी उसके रोजमर्रा के उपयोग से कहीं बड़ी होती है। पत्रकार के लिए सबसे दिलचस्प चुनौती यहीं सामने आई। वैज्ञानिक जिस भाषा में किसी तकनीक को समझाता है, आम पाठक जरूरी नहीं कि उसी भाषा में उसे समझ सके। इसलिए पत्रकार को दो दुनिया के बीच पुल बनना पड़ता हैप्रयोगशाला की भाषा और समाज की भाषा के बीच। यही अवसर इस यात्रा को मेरे लिए विशेष बनाता रहा।

ब्रेन और न्यूरोटेक्नोलॉजी : मनुष्य के सबसे

 जटिल संसार को समझने की कोशिश

आईआईटी मद्रास में मस्तिष्क से जुड़े अनुसंधान और प्रयोगों को करीब से समझना भी बेहद रोचक अनुभव रहा। मनुष्य का मस्तिष्क विज्ञान की सबसे जटिल पहेलियों में से एक है। जब विज्ञान मस्तिष्क और तकनीक के संबंध को समझने की कोशिश करता है तो सवाल केवल मशीन को बेहतर बनाने का नहीं रह जाता। सवाल यह भी होता है कि तकनीक मनुष्य की क्षमताओं, व्यवहार और संकेतों को किस तरह समझ सकती है। प्रयोगशाला की दुनिया में यह सब देखकर मन में एक सवाल दर्ज हुआक्या आने वाला भारत केवल स्मार्ट मशीनों का भारत होगा, या ऐसी तकनीक का भी जो मनुष्य को बेहतर समझने में मदद करे? शायद इसका पूरा उत्तर अभी हमारे पास नहीं है। लेकिन आईआईटी मद्रास की प्रयोगशालाएं यह जरूर बताती हैं कि उस उत्तर की तलाश जारी है  

विज्ञान को पाठक तक पहुंचाना भी पत्रकारिता है

आईआईटी मद्रास के इस अनुभव की सबसे बड़ी सीख मेरे लिए यही रही. पत्रकार का काम केवल घटना को देखना नहीं। उसे समझना भी है। और फिर ऐसी भाषा में समाज तक पहुंचाना है, जिसमें जटिल विज्ञान भी पाठक के लिए सहज हो जाए। यही कारण है कि आईआईटी मद्रास मेरी डायरी में केवल एक संस्थान का दौरा नहीं है। यह उस पत्रकार के लिए एक सबक है जो यह मानता है कि विज्ञान की कहानी भी उतनी ही मानवीय हो सकती है जितनी किसी गांव, शहर या व्यक्ति की कहानी।

चौथा पड़ाव : पुडुचेरीसमुद्र के किनारे ठहरता हुआ विचार

तमिलनाडु यात्रा में पुडुचेरी का रंग बिल्कुल अलग था। चेन्नई की गति के बाद पुडुचेरी में जैसे समय कुछ धीमा हो जाता है। फ्रांसीसी स्थापत्य की छाप, समुद्र के किनारे की हवा, शांत गलियां और श्री अरविंद से जुड़ी आध्यात्मिक स्मृतियांसब मिलकर इसे एक अलग अनुभव बनाते हैं। श्री अरविंद की धरती पर पहुंचना केवल पर्यटन नहीं था। यह विचार से मुलाकात थी। उनकी चिंतन परंपरा में आध्यात्मिकता और आधुनिक चेतना का जो संवाद दिखाई देता है, वह आज भी प्रासंगिक लगता है। काशी में आध्यात्मिकता जीवन के बीच बहती है। पुडुचेरी में उसका एक शांत, अंतर्मुखी और विचारप्रधान रूप दिखाई देता है। समुद्र की लहरें लगातार किनारे से टकरा रही थीं और मन में प्रश्न उठ रहा थाबाहरी विकास की दौड़ में क्या हम अपने भीतर ठहरने की जगह बचा पा रहे हैं? पुडुचेरी ने इसका उत्तर शब्दों में नहीं दिया। उसने मौन में दिया।

उपराज्यपाल से संवाद : पुडुचेरी की एक और तस्वीर

पुडुचेरी में उपराज्यपाल से मुलाकात ने यात्रा को एक नया आयाम दिया। किसी प्रदेश को केवल पर्यटक की नजर से देखने और प्रशासनिक नजर से समझने में अंतर होता है। वहां के विकास, प्रशासन, पर्यटन, विरासत और स्थानीय परिस्थितियों को समझने का अवसर मिला। पत्रकार के लिए ऐसे संवाद इसलिए महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि उसके सामने किसी स्थान की केवल तस्वीर नहीं, बल्कि उसके पीछे की व्यवस्थाओं और चुनौतियों की परतें भी खुलती हैं। पुडुचेरी ने इसलिए मुझे समुद्र से ज्यादा दिया।

उसने मुझे यह सोचने का अवसर दिया कि किसी क्षेत्र की पहचान उसकी इमारतों और पर्यटन स्थलों से ही नहीं, बल्कि वहां की शासन व्यवस्था, समाज और भविष्य की योजनाओं से भी बनती है।

पांचवां पड़ाव : आईसीएफजहां रेल के

डिब्बे नहीं, भारत की गति बनती है

इतिहास और आध्यात्म के बाद यात्रा पहुंची आधुनिक औद्योगिक भारत के एक महत्वपूर्ण केंद्र परइंटीग्रल कोच फैक्ट्री। रेल के डिब्बे हम रोज देखते हैं। संग्रहालय के नटराज से आईआईटी मद्रास की प्रयोगशालाओं, दक्षिणाचित्र के आंगन से वंदेभारत की रफ्तार और चेन्नई पोर्ट के समुद्री विस्तार तक छह दिनों में देखे भारत के अनेक रंग. ते हुए देखते हैं, उसके पीछे की निर्माण प्रक्रिया को करीब से देखना इस यात्रा के सबसे रोमांचक अनुभवों में रहा। वंदेभारत केवल एक ट्रेन के रूप में नहीं, बल्कि आधुनिक रेल निर्माण की बदलती क्षमता के प्रतीक के रूप में सामने आई। और यहां यात्रा का एक अद्भुत संयोग भी सामने आया। कुछ दिन पहले संग्रहालय में चोलकालीन कांस्य कला देखी थी। अब आईसीएफ में आधुनिक तकनीक से बनती रेल। एक तरफ सदियों पहले कलाकार धातु को आकार दे रहा था। दूसरी तरफ आज इंजीनियर और तकनीशियन धातु को गति का आकार दे रहे थे। धातु वही, लेकिन समय बदल गया। यही भारत की निरंतरता है।

छठा पड़ाव : चेन्नई पोर्टसमुद्र के रास्ते चलती अर्थव्यवस्था

चेन्न पोर्ट ने यात्रा को एक और विशाल परिप्रेक्ष्य दिया। समुद्र को हम सामान्यतः प्रकृति के रूप में देखते हैं। लेकिन बंदरगाह पर पहुंचकर समुद्र अर्थव्यवस्था का एक विशाल मार्ग बन जाता है। जहाज, कंटेनर, क्रेन, माल, लॉजिस्टिक्स और लगातार चलती गतिविधियांहर चीज एक बड़ी आर्थिक व्यवस्था का हिस्सा दिखाई देती है। यहीं महसूस हुआ कि देश का विकास केवल सड़कों, इमारतों और शहरों के भीतर नहीं होता। समुद्र भी विकास की कहानी लिखता है। उत्तर भारत से आए एक पत्रकार के लिए यह अनुभव इसलिए भी खास था कि काशी जैसी स्थल-आधारित सांस्कृतिक नगरी से हजारों किलोमीटर दूर समुद्र के किनारे खड़े होकर भारत के व्यापार और परिवहन की दूसरी दुनिया दिखाई दे रही थी। गंगा की याद आई। काशी के लिए गंगा जीवनरेखा है। भारत के लिए समुद्र व्यापार का विराट द्वार। एक नदी से निकली मेरी यात्रा समुद्र के किनारे आकर भारत की आर्थिक धमनियों से जुड़ गई।

सातवां पड़ाव : दूरदर्शनतकनीक बदल गई, कहानी कहने का दायित्व नहीं

दूरदर्शन कार्यालय पहुंचना मेरे लिए स्वाभाविक रूप से अधिक आत्मीय अनुभव था। पत्रकार होने के नाते मीडिया संस्थान की दुनिया हमेशा आकर्षित करती है। कैमरे के सामने दिखाई देने वाली खबर के पीछे कितनी बड़ी तकनीकी और मानवीय व्यवस्था काम करती है, यह ऐसे संस्थान में जाकर ही महसूस होता है। एक समय था जब घरों में समाचार का अर्थ थानिर्धारित समय पर टीवी के सामने बैठना। आज मोबाइल पर खबर हर क्षण मौजूद है। माध्यम बदल गया। तकनीक बदल गई। दर्शक की आदत बदल गई। लेकिन पत्रकारिता का मूल प्रश्न वही हैतथ्य क्या है और उसे समाज तक जिम्मेदारी के साथ कैसे पहुंचाया जाए? दूरदर्शन ने इस बदलती यात्रा को याद करने का अवसर दिया।

चेन्नई में प्रधानमंत्री के जन्मदिन का आयोजन : एक अलग रंग

यात्रा के अंतिम हिस्से में चेन्नई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में शामिल होने का अवसर मिला। एक पत्रकार के लिए किसी सार्वजनिक आयोजन को देखने का अर्थ केवल मंच, भाषण और भीड़ को देखना नहीं होता। उसके लिए महत्वपूर्ण होता है आयोजन का वातावरण, लोगों की भागीदारी, संवाद के विषय और अलग-अलग क्षेत्रों के बीच बनने वाले संबंधों को समझना। काशी से आए पत्रकारों के संदर्भ में यह अनुभव और भी महत्वपूर्ण रहा। बार-बार काशी और तमिलनाडु के सांस्कृतिक रिश्तों की चर्चा सामने आती रही। तब लगा कि उत्तर और दक्षिण के बीच दूरी नक्शे पर भले हजारों किलोमीटर हो, लेकिन सांस्कृतिक संवाद में वह दूरी बहुत छोटी हो सकती है।

डॉ. एल. मुरुगन से मुलाकात : यात्रा की आत्मीय स्मृति

यात्रा के दौरान डॉ. एल. मुरुगन से मुलाकात भी मेरे लिए यादगार रही। ऐसी मुलाकातें किसी यात्रा के औपचारिक कार्यक्रम से आगे निकलकर संवाद का हिस्सा बन जाती हैं। काशी से आए पत्रकारों के साथ बातचीत में तमिलनाडु, संस्कृति, मीडिया और देश के विभिन्न हिस्सों के बीच संबंधों पर संवाद हुआ। यात्रा के दौरान जितने संस्थान देखे, उतना ही महसूस किया कि भारत को समझने के लिए केवल इमारतों और योजनाओं को देखना पर्याप्त नहीं। गों से मिलना भी जरूरी है। क्योंकि अंततः संस्कृति किताबों या संग्रहालयों में नहीं, मनुष्यों के बीच जीवित रहती है।

छह दिनों में तमिलनाडु के कितने चेहरे

वापसी से पहले जब पूरी यात्रा को पीछे मुड़कर देखा तो लगा कि एक ही तमिलनाडु के भीतर कितने तमिलनाडु मिले। संग्रहालय में हजारों वर्ष पुराना इतिहास मिला। दक्षिणाचित्र में घरों और परंपराओं में जीवित संस्कृति मिली। आईआईटी मद्रास में प्रयोगशालाओं में तैयार होता भविष्य मिला। पुडुचेरी में श्री अरविंद की विचार-परंपरा और समुद्र का मौन मिला।  उपराज्यपाल से संवाद में प्रशासन और विकास की तस्वीर मिली। आईसीएफ में आधुनिक भारत की इंजीनियरिंग क्षमता दिखाई दी। वंदेभारत में उस क्षमता की गति दिखाई दी। चेन्नई पोर्ट में समुद्र से जुड़ी अर्थव्यवस्था का विस्तार दिखाई दिया। दूरदर्शन में मीडिया की बदलती दुनिया दिखाई दी। प्रधानमंत्री के जन्मदिन आयोजन में सार्वजनिक संवाद का एक अलग रंग मिला। डॉ. एल. मुरुगन से मुलाकात में आत्मीय संवाद मिला। इन सबके बीच बार-बार एक ही चीज दिखाई दीकाशी और तमिलनाडु के बीच एक सांस्कृतिक पुल। काशी लौटते हुए : साथ क्या आया? पसी का दिन हमेशा थोड़ा अलग होता है। सामान में कपड़े थे। मोबाइल में तस्वीरें थीं। कैमरे में वीडियो थे। डायरी में नोट्स थे। लेकिन यात्रा की सबसे बड़ी चीज इनमें से कोई नहीं थी। वह थीदृष्टि। चेन्नई पीछे छूट रहा था। समुद्र दूर हो रहा था। पुडुचेरी की गलियां स्मृति में बदल रही थीं। आईआईटी मद्रास की प्रयोगशालाएं अब तस्वीरों में थीं। आईसीएफ की मशीनों की आवाज पीछे छूट चुकी थी। दूरदर्शन का कैमरा भी अब यात्रा की स्मृति था। लेकिन मन में सब साथ चल रहे थे। और जैसे ही काशी की ओर वापसी हुई, लगा कि अब काशी को भी शायद पहले जैसी नजर से नहीं देख पाऊंगा। काशी के घाटों को देखते हुए पुडुचेरी का समुद्र याद आएगा। काशी के मंदिरों में चोलों की कांस्य कला याद आएगी। किसी स्टेशन पर वंदेभारत गुजरती मिलेगी तो आईसीएफ के वे हाथ याद आएंगे, जिन्होंने उसे आकार दिया। किसी युवा विद्यार्थी को तकनीक पर काम करते देखूंगा तो आईआईटी मद्रास की प्रयोगशालाएं याद आएंगी। और जब किसी खबर को कैमरे के सामने आते देखूंगा तो चेन्नई दूरदर्शन की दुनिया याद आएगी।

यात्रा ने मुझे क्या सिखाया?

इस यात्रा की सबसे बड़ी सीख यह नहीं कि तमिलनाडु खूबसूरत है। यह तो पहले से पता था। सबसे बड़ी सीख यह रही कि भारत को समझने के लिए भारत के अलग-अलग हिस्सों को एक-दूसरे के सामने रखकर देखना जरूरी है। काशी और तमिलनाडु अलग नहीं हैं। उनकी भाषाएं अलग हो सकती हैं। उ0नके स्थापत्य अलग हो सकते हैं। उनके भोजन अलग हो सकते हैं। उनकी लोक परंपराएं अलग हो सकती हैं। लेकिन उनके भीतर जो सांस्कृतिक चेतना बहती है, उसमें अनेक समान सूत्र दिखाई देते हैं। और शायद यही भारत की सबसे बड़ी ताकत है। यह देश एकरूप होकर एक नहीं बना। यह विविध होकर एक बना है। अतीत और भविष्य के बीच खड़ा भारत. इस पूरी यात्रा का सबसे खूबसूरत दृश्य मेरे लिए शायद कोई एक स्थान नहीं, बल्कि दो अलग-अलग दृश्य थे। एक तरफ संग्रहालय में खड़ा नटराज। दूसरी तरफ आईआईटी मद्रास की प्रयोगशाला। एक तरफ सदियों पुरानी कांस्य प्रतिमा। दूसरी तरफ भविष्य की तकनीक पर काम करते युवा वैज्ञानिक। एक तरफ दक्षिणाचित्र का पारंपरिक आंगन। दूसरी तरफ आईसीएफ की आधुनिक उत्पादन व्यवस्था। एक तरफ पुडुचेरी का शांत समुद्र। दूसरी तरफ चेन्नई पोर्ट की आर्थिक हलचल। इन सभी को जोड़कर देखें तो एक तस्वीर उभरती हैभारत अपने अतीत को छोड़कर भविष्य की ओर नहीं बढ़ रहा। वह अपने अतीत को साथ लेकर भविष्य की ओर बढ़ रहा है। यही तमिलनाडु यात्रा की सबसे बड़ी कहानी है।

और अंत में...

यात्राएं समाप्त हो जाती हैं। लेकिन यात्राओं से मिले सवाल साथ रहते हैं। क्या हम भारत को वास्तव में जानते हैं? क्या हम एक-दूसरे की विरासत को उतनी ही आत्मीयता से समझते हैं, जितनी अपनी विरासत को? क्या आधुनिक तकनीक और प्राचीन परंपरा साथ चल सकती हैं? क्या विज्ञान को आम आदमी की भाषा में पहुंचाना हमारी पत्रकारिता की नई जिम्मेदारी नहीं है? तमिलनाडु ने इन सवालों के कई उत्तर अपने ढंग से दिए। संग्रहालय ने कहाअपना अतीत मत भूलो। दक्षिणाचित्र ने कहाअपनी परंपरा को जीते रहो। आईआईटी मद्रास ने कहाभविष्य प्रयोगशालाओं में तैयार होता है। पुडुचेरी ने कहाविकास के बीच भीतर ठहरना भी जरूरी है। आईसीएफ ने कहातकनीक को गति में बदला जा सकता है। चेन्नई पोर्ट ने बतायाभारत की अर्थव्यवस्था की पहुंच समुद्र तक है। दूरदर्शन ने याद दिलायामाध्यम बदलते हैं, संवाद की जिम्मेदारी नहीं। और काशी लौटते हुए मन ने कहाभारत को समझने के लिए भारत को देखना होगा। उत्तर से दक्षिण, पूरब से पश्चिमएक-दूसरे की आंखों से। चेन्नई से लौटते समय मेरे पास सिर्फ तस्वीरें नहीं थीं। मेरे पास नटराज की मुद्रा थी। दक्षिणाचित्र के आंगन की स्मृति थी। आईआईटी मद्रास की प्रयोगशालाओं में दिखाई दिया भविष्य था। डायमंड और QR कोड से लेकर ब्रेन टेक्नोलॉजी तक नई दुनिया की जिज्ञासा थी। पुडुचेरी का समुद्र था। अरविंदो की विचार-छाया थी। वंदेभारत की रफ्तार थी। चेन्नई पोर्ट का विराट विस्तार था। दूरदर्शन के कैमरे की रोशनी थी। मुलाकातों की आत्मीयता थी। और सबसे ऊपरकाशी को दक्षिण से जोड़कर देखने की एक नई दृष्टि थी। शायद इसी को यात्रा की असली उपलब्धि कहते हैं। मैं तमिलनाडु घूमकर नहीं लौटा हूं। मैं भारत को थोड़ा और समझकर काशी लौटा हूं।

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