Saturday, 19 September 2026

हिंदी केवल भाषा नहीं, हमारी स्मृति और सांस्कृतिक चेतना की धड़कन

हिंदी केवल भाषा नहीं, हमारी स्मृति और सांस्कृतिक चेतना की धड़कन

हिंदी सप्ताह में गीत से नाटक तक विद्यार्थियों की रचनात्मक प्रतिभा को मिला मंच, विजेताओं को किया गया पुरस्कृत

हिंदी सप्ताह का समापन : गीत, कविता, कहानी और नाटक के जरिए विद्यार्थियों ने रची भाषा की रंगीन दुनिया

सुरेश गांधी

वाराणसी। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि किसी समाज की स्मृतियों, संवेदनाओं और सांस्कृतिक चेतना को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सहेजने वाली जीवंत धरोहर भी है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के श्री रणवीर संस्कृत विद्यालय में आयोजित हिंदी सप्ताह-2026 के समापन समारोह में हिंदी के इसी व्यापक स्वरूप की झलक दिखाई दी। 14 से 19 सितंबर तक चले सप्ताह के दौरान विद्यार्थियों ने गीत, सुलेख, कहानी लेखन, स्वरचित काव्य और नाटक जैसी विभिन्न प्रतियोगिताओं के माध्यम से हिंदी के प्रति अपनी रचनात्मकता और लगाव को अभिव्यक्त किया।

शनिवार को आयोजित समापन एवं पुरस्कार वितरण समारोह में प्रतियोगिताओं में स्थान प्राप्त विद्यार्थियों को पुरस्कृत किया गया। पुरस्कार पाकर विद्यार्थियों के चेहरे पर उत्साह और आत्मविश्वास की चमक दिखाई दी। समारोह ने यह संदेश भी दिया कि भाषा का विकास केवल पुस्तकों और पाठ्यक्रमों तक सीमित नहीं, बल्कि उसके निरंतर प्रयोग और सृजनात्मक अभिव्यक्ति से होता है।

मातृभाषाओं में ज्ञान-विज्ञान की अपार संभावनाएं

समारोह के मुख्य अतिथि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के सहायक आचार्य प्रो. महेंद्र प्रसाद कुशवाहा ने कहा कि सभी भारतीय भाषाओं में ज्ञान-विज्ञान के विकास की अपार संभावनाएं मौजूद हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा को समृद्ध बनाने के लिए मातृभाषाओं का संरक्षण और संवर्धन आवश्यक है। उन्होंने विद्यार्थियों का आह्वान किया कि वे हिंदी के प्रति सजग रहें और दैनिक जीवन में इसके अधिकाधिक प्रयोग को बढ़ावा दें। उनके अनुसार भाषा तभी जीवंत रहती है, जब नई पीढ़ी उसे केवल पढ़ती नहीं, बल्कि बोलती, लिखती और अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम भी बनाती है।

जिस भाषा में सपने देखते हैं, वह हिंदी है

विशिष्ट अतिथि डॉ. अमित कुमार पाण्डेय, अतिथि प्राध्यापक, भारत अध्ययन केन्द्र, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने लोक कथाओं के माध्यम से विद्यार्थियों से संवाद किया। उन्होंने कहा, “जिस भाषा में हम कथाएं और कहानियां सुनते हैं और जिस भाषा में सपने देखते हैं, वह हिंदी है।उन्होंने कहा कि हिंदी हमारी संवेदना, स्मृति और सांस्कृतिक चेतना से गहराई से जुड़ी भाषा है। किसी भाषा के प्रति सम्मान केवल उसके शब्दों के प्रति सम्मान नहीं, बल्कि उस भाषा में संचित संस्कृति, लोकजीवन और पीढ़ियों के अनुभवों के प्रति सम्मान भी है। विद्यार्थियों को हिंदी के अध्ययन और प्रयोग के लिए प्रेरित करते हुए उन्होंने कहा कि भाषा के प्रति सम्मान हमारी सांस्कृतिक पहचान को और मजबूत करता है।

प्रतियोगिताओं ने दिया अभिव्यक्ति को मंच

हिंदी सप्ताह के दौरान विद्यालय में विद्यार्थियों की रचनात्मक प्रतिभा को सामने लाने के लिए विभिन्न प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं। हिंदी गीत में सुर और संवेदना का मेल दिखा तो सुलेख में अक्षरों की सुंदरता और अनुशासन सामने आया। कहानी लेखन ने विद्यार्थियों की कल्पनाशीलता को शब्द दिए, वहीं स्वरचित काव्य में उनकी भावनाओं ने कविता का रूप लिया। नाटक के जरिए विद्यार्थियों ने संवाद, अभिनय और सामूहिक अभिव्यक्ति के माध्यम से हिंदी को मंच पर जीवंत किया। इस तरह पूरा सप्ताह भाषा को महज विषय के रूप में पढ़ने के बजाय उसे जीने, महसूस करने और रचने का अवसर बना रहा। समापन समारोह में इन्हीं प्रयासों को सम्मान मिला। विद्यालय के अध्यापक डॉ. संजय त्रिपाठी ने अतिथियों का स्वागत किया। उप-प्राचार्या एवं कार्यक्रम संयोजिका डॉ. आराधना तिवारी ने धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. नरगिस फातमा ने किया। समारोह में विद्यालय के शिक्षक एवं कर्मचारी उपस्थित रहे।

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