गणेश : वह देवता जिनका कोई एक घर नहीं!
काशी
से
कन्याकुमारी
तक,
गांव
के
चौरे
से
महानगरों
की
ऊंची
इमारतों
तक…
भाषा
बदली,
पूजा
की
शैली
बदली,
गणेश
के
रूप
बदले,
मगर
एक
विश्वास
नहीं
बदला—शुभारंभ
गणपति
से
ही.
भारत में किसी बच्चे
से
पूछिए—गणेश
कौन
हैं?
उत्तर
शायद
बहुत
सरल
होगा—शिव-पार्वती
के
पुत्र,
विघ्नहर्ता
और
प्रथम
पूज्य।
लेकिन
यही
उत्तर
गणेश
की
पूरी
कहानी
नहीं
है।
गणेश
को
समझना
हो
तो
किसी
एक
मंदिर
में
जाकर
नहीं
समझा
जा
सकता।
उनके
लिए
पूरा
भारत
देखना
पड़ेगा।
महाराष्ट्र
का
सार्वजनिक
गणेशोत्सव,
काशी
की
गलियों
में
विराजमान
गणपति,
दक्षिण
भारत
का
पिल्लैयार,
राजस्थान
और
गुजरात
की
मंगल
परंपराएं,
बंगाल
की
पूजा-परंपरा
और
देश
से
बाहर
भारतीय
संस्कृति
के
साथ
पहुंचे
गणेश—हर
जगह
उनका
रूप
थोड़ा
अलग
है।
लेकिन
आश्चर्य
यह
है
कि
हर
जगह
पहचान
वही
है।
यही
गणेश
की
सबसे
बड़ी
विशेषता
है।
वे
किसी
एक
प्रदेश
के
देवता
नहीं
बने।
किसी
एक
भाषा
के
देवता
नहीं
बने।
किसी
एक
संप्रदाय
की
सीमा
में
भी
नहीं
रुके।
उन्होंने
भारत
को
अपने
भीतर
जगह
दी
और
भारत
ने
उन्हें.
मूषक का छोटा आकार
और
उसकी
चंचल
प्रकृति
भारतीय
प्रतीक-परंपरा
में
विनम्रता,
साधारणता
और
अनियंत्रित
इच्छाओं
से
भी
जोड़ी
गई
है।
गणेश
का
उस
पर
आरूढ़
होना
इस
बात
का
संकेत
माना
जाता
है
कि
शक्ति
का
अर्थ
किसी
को
नष्ट
करना
नहीं,
बल्कि
उग्रता
को
साधकर
उसे
सही
दिशा
देना
है।
जिसे
संसार
ने
आतंक
माना,
गणेश
ने
उसे
साधन
बना
दिया—यही
इस
कथा
का
सबसे
सुंदर
संदेश
है
सुरेश गांधी
गणेश केवल भारत
की धार्मिक कल्पना में ही सीमित
नहीं रहे। उनकी प्रतिमाएं
और कथाएं दक्षिण तथा दक्षिण-पूर्व
एशिया की विभिन्न सांस्कृतिक
परंपराओं में भी दिखाई
देती हैं। बौद्ध परंपराओं
में भी गणपति के
रूप मिलते हैं। यानी गणेश
की यात्रा को केवल ‘एक
हिंदू देवता की यात्रा’ के
रूप में पढ़ना पर्याप्त
नहीं। यह भारतीय संस्कृति
की उस क्षमता की
कहानी भी है जिसमें
वह जहां पहुंचती है,
वहां की कला और
स्थानीय परंपरा के साथ संवाद
करती है। इसलिए अलग-अलग देशों में
गणेश का चेहरा अलग
दिखाई दे सकता है।
लेकिन उनकी पहचान फिर
भी बची रहती है।
हाथी का सिर गणेश
की पहचान है, लेकिन उनकी
सबसे बड़ी सांस्कृतिक पहचान
शायद कुछ और है।
वे शुरुआत के देवता हैं।
और शुरुआत का कोई धर्म
नहीं होता। नया बच्चा जब
पढ़ना शुरू करता है—वह शुरुआत है।
व्यापारी जब पहली बार
दुकान खोलता है—वह शुरुआत
है। किसान जब खेत में
पहला बीज डालता है—वह शुरुआत है।
युवा जब नई नौकरी
शुरू करता है—वह
शुरुआत है। परिवार जब
नया घर बसाता है—वह शुरुआत है।
समाज जब कोई नया
संकल्प लेता है—वह
शुरुआत है। हर शुरुआत
में अनिश्चितता होती है। और
शायद इसी अनिश्चितता के
सामने मनुष्य को गणेश की
याद आती है। इसीलिए
गणेश ‘विघ्नहर्ता’ से कहीं बड़े
हैं.
विघ्न केवल सड़क पर
पड़ा पत्थर नहीं होता। कभी
डर विघ्न है। कभी असफलता
का भय। कभी संशय।
कभी अहंकार। कभी अधीरता। कभी
यह डर कि नया
काम सफल होगा या
नहीं। गणेश की उपासना
इसलिए केवल बाहरी बाधा
हटाने की प्रार्थना नहीं
मानी जा सकती। वह
मनुष्य को नई शुरुआत
के लिए मानसिक साहस
भी देती है। गणेश
के सामने खड़ा मनुष्य दरअसल
अपने भीतर यह विश्वास
जगाता है कि रास्ता
कठिन हो सकता है,
लेकिन शुरुआत करनी ही होगी।
गणेश को गणपति कहा
गया, विनायक कहा गया, गजानन
कहा गया, एकदंत कहा
गया, लंबोदर कहा गया। दक्षिण
भारत में उनके लिए
‘पिल्लैयार’ जैसे स्थानीय संबोधन
प्रचलित हुए। अलग-अलग
भाषाओं में नाम बदले,
लोककथाएं बदलीं, पूजा के तरीके
बदले, लेकिन देवता का भाव नहीं
बदला। यह सामान्य बात
नहीं है। भारत जैसा
विशाल देश जहां हर
कुछ सौ किलोमीटर पर
भाषा, खानपान, वेशभूषा और लोकपरंपरा बदल
जाती है, वहां कोई
देवता अगर इतनी सहजता
से हर क्षेत्र में
स्वीकार हो जाए तो
उसके पीछे केवल धार्मिक
विश्वास नहीं, एक गहरी सांस्कृतिक
स्वीकार्यता भी होती है।
गणेश की यही यात्रा उन्हें
दूसरे देवताओं से अलग तरह
से पढ़ने का अवसर देती
है।
गणेश मंदिर से ज्यादा ‘शुरुआत’ में मिलते हैं
किसी नए घर
की दहलीज पर गणेश। नई
दुकान में गणेश। नई
पुस्तक के पहले पन्ने
पर गणेश। विवाह के निमंत्रण पर
गणेश। नए व्यवसाय के
उद्घाटन में गणेश। बच्चे
की पढ़ाई शुरू कराते समय
गणेश। किसी शुभ कार्य
से पहले गणेश। यानी
गणेश की उपस्थिति केवल
मंदिर तक सीमित नहीं
है। वे भारतीय जीवन
के ‘आरंभ-बिंदु’ पर
बैठे देवता हैं। हिंदू परंपरा
में किसी नए कार्य
से पहले गणेश का
स्मरण करने की परंपरा
इसी कारण इतनी व्यापक
हुई कि उन्हें शुरुआत
और विघ्नों के निवारण से
जोड़ा गया। यहां गणेश
की एक अद्भुत विशेषता
सामने आती है— मनुष्य
सफलता मिलने के बाद देवता
को याद करे, यह
सामान्य बात है; लेकिन
सफलता शुरू होने से
पहले ही किसी देवता
को याद करना एक
अलग सांस्कृतिक सोच है। गणेश
उसी सोच के देवता
हैं।
वह देवता जो घर से निकलकर समाज बन गए
गणेशोत्सव की आधुनिक सार्वजनिक
परंपरा ने गणेश को
एक और नया आयाम
दिया। गणेश घर की
पूजा से बाहर आए
और सार्वजनिक उत्सव का केंद्र बने।
यहां गणेश केवल आराधना
नहीं रहे। वे सामूहिकता
बन गए। लोग एक
साथ आए। पंडाल बने।
कला आई। संगीत आया।
नाटक हुए। सामाजिक गतिविधियां
जुड़ीं। अर्थात गणेश की प्रतिमा
के चारों ओर एक पूरा
समाज खड़ा हो गया।
यही कारण है कि
गणेशोत्सव को केवल धार्मिक
उत्सव मानना उसके सामाजिक प्रभाव
को छोटा कर देना
होगा।
मिट्टी का गणेश और करोड़ों की आस्था
गणेश की सबसे
सुंदर बात यह भी
है कि उन्हें पाने
के लिए विशाल मंदिर
जरूरी नहीं। एक छोटी-सी
मिट्टी की प्रतिमा भी
पर्याप्त है। एक घर
का कोना भी पर्याप्त
है। एक दीपक भी
पर्याप्त है। कुछ फूल
भी पर्याप्त हैं। और सबसे
बड़ी बात—भक्ति के
लिए भाषा की बाध्यता
नहीं। इसलिए गणेश का लोकजीवन
इतना व्यापक हुआ। महंगे मंदिरों
के गणेश भी हैं
और साधारण कुम्हार के चाक पर
बने गणेश भी। सोने-चांदी के गणेश भी
हैं और नदी की
मिट्टी से बने गणेश
भी। देवता की कीमत नहीं
होती; भक्त की भावना
होती है। गणेश की
लोकप्रियता का यह लोकतांत्रिक
पक्ष उन्हें आम भारतीय के
और करीब ले जाता
है।
विसर्जन में छिपा एक बड़ा भारतीय विचार
गणेशोत्सव का सबसे भावुक
दृश्य विसर्जन है। जिस गणेश
को घर लाने के
लिए उत्साह था, उसी गणेश
को कुछ दिनों बाद
विदा किया जाता है।
यह दृश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान
नहीं। इसे भारतीय दर्शन
के एक गहरे भाव
से भी जोड़ा जा
सकता है— आगमन जितना
सत्य है, प्रस्थान भी
उतना ही सत्य है।
मिट्टी से प्रतिमा बनी।
उसमें प्राण-भाव स्थापित हुआ।
भक्त ने उसे परिवार
का सदस्य माना। पूजा की। प्रसाद
चढ़ाया। उत्सव मनाया। और फिर उसी
प्रतिमा को जल में
समर्पित कर दिया। यानी
भारतीय संस्कृति देवता को भी स्वामित्व
की वस्तु नहीं बनने देती।
हम कहते हैं—आइए।
फिर कहते हैं—जाइए।
और विश्वास रखते हैं कि
अगली बार फिर आइएगा।
शायद यही भारतीय विरह
का सबसे सुंदर धार्मिक
रूप है।
गणेश की सबसे आधुनिक बात
आज का मनुष्य
पहले से ज्यादा सुविधाओं
के बीच है, लेकिन
अनिश्चितता से शायद पहले
से ज्यादा घिरा हुआ है।
तकनीक तेज हो गई।
काम तेज हो गया।
सूचना तेज हो गई।
निर्णय तेज हो गए।
लेकिन मनुष्य का डर खत्म
नहीं हुआ। ऐसे समय
में गणेश की प्रासंगिकता
और बढ़ जाती है।
क्योंकि गणेश हमें भविष्य
की गारंटी नहीं देते। वे
हमें शुभ शुरुआत का
साहस देते हैं। यही
कारण है कि हजारों
साल की सांस्कृतिक यात्रा
के बाद भी गणेश
पुराने नहीं लगते। वे
हर नई पीढ़ी के
सामने फिर से खड़े
हो जाते हैं। नए
रूप में। नई कला
में। नई भाषा में।
नई तकनीक में। लेकिन उसी
पुराने विश्वास के साथ— “आरंभ
शुभ हो।”
गणेश का कोई एक घर नहीं
शायद इसीलिए गणेश
का सबसे बड़ा परिचय
किसी एक मंदिर, शहर
या प्रदेश से नहीं दिया
जा सकता। उनका घर काशी
भी है। मुंबई भी।
चेन्नई भी। जयपुर भी।
कोलकाता भी। गांव भी।
महानगर भी। और वह
छोटा-सा घर भी
जहां गणेश की मिट्टी
की प्रतिमा के सामने एक
दीपक जल रहा है।
गणेश का घर शायद
वहां है जहां कोई
मनुष्य किसी नई शुरुआत
से पहले उम्मीद के
साथ हाथ जोड़ता है।
और यही कारण है
कि गणेश केवल मंदिरों
में नहीं रहते— वे
भारतीय मन की उस
जगह रहते हैं, जहां
हर बार कोई नई
सुबह जन्म लेती है।
गणेश इसलिए अमर नहीं हैं
कि उनकी प्रतिमाएं बार-बार बनती हैं;
गणेश इसलिए अमर हैं क्योंकि
मनुष्य हर युग में
नई शुरुआत करता है और जब
तक शुरुआत रहेगी, गणेश का स्मरण
भी रहेगा।
जब विशालकाय मूषक के आगे थर्रा उठा वन…
गणेश जी के चरणों में बैठा छोटा-सा मूषक देखने में जितना साधारण लगता है, उससे जुड़ी कथा उतनी ही रोचक और रहस्यमयी है। गणेश-कथा की विभिन्न पुराणिक एवं लोकपरंपराओं में मूषक के जन्म और गणेश का वाहन बनने के प्रसंग के अलग-अलग विवरण मिलते हैं। गणेश पुराण और मुद्गल पुराण से जुड़ी परंपराओं में क्रौंच नामक गंधर्व के मूषक बनने की कथा विशेष रूप से प्रसिद्ध है। कथा के अनुसार, एक बार क्रौंच नामक गंधर्व इंद्र की सभा में पहुंचा। इसी दौरान अनजाने में उसका पैर ऋषि वामदेव के पैर पर पड़ गया। ऋषि ने क्रोधित होकर उसे मूषक बनने का श्राप दे दिया। क्रौंच ने क्षमा मांगी, लेकिन श्राप वापस लेना संभव नहीं था। तब ऋषि ने वर दिया कि आगे चलकर वह भगवान शिव के पुत्र गणेश का वाहन बनेगा। श्राप के प्रभाव से क्रौंच एक विशाल और उग्र मूषक बन गया। उसके उत्पात से वनवासी, ऋषि और आश्रम परेशान हो उठे। वह खेतों और घरों को नुकसान पहुंचाता और अपने रास्ते में आने वाली चीजों को तहस-नहस कर देता था। एक दिन उसने ऋषि पराशर के आश्रम को भी उजाड़ दिया। ऋषि उस समय गणेश जी का ध्यान कर रहे थे। मूषक के आतंक से परेशान ऋषियों ने गणेश से इसका समाधान करने की प्रार्थना की। गणेश जी ने अपने पाश से उस विशाल मूषक को पकड़ लिया और अपने सामने ला खड़ा किया। मूषक ने अपनी भूल स्वीकार कर क्षमा मांगी। गणेश ने उसे दंड देने के बजाय अपने साथ रहने का अवसर दिया और अपना वाहन बनने का प्रस्ताव रखा। लेकिन जैसे ही गणेश उस पर सवार हुए, विशालकाय मूषक उनका भार संभाल नहीं सका। उसने अपनी असमर्थता जताई। तब गणेश ने स्वयं को उसके लिए हल्का कर लिया। यहीं से एक अद्भुत संबंध की शुरुआत हुई— जिस मूषक से पूरा वन भयभीत था, वही गणेश के चरणों का सेवक और उनका वाहन बन गया।
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