गोधूलि में राम-भरत का मिलन, भावनाओं से
भर उठा बनारस
नाटी इमली में चारों भाइयों
के महामिलन पर गूंजे जयकारे, ऐतिहासिक रथ और अनूठी परंपरा ने खींचा श्रद्धालुओं का
ध्यान
484 वर्ष पुरानी परंपरा
के
साक्षी
बने
लाखों
श्रद्धालु,
हर-हर
महादेव
और
सियावर
रामचंद्र
के
जयकारों
से
गूंजा
नाटी
इमली
पुष्पक विमान
से
उतरे
प्रभु
श्रीराम,
चारों
भाइयों
का
महामिलन
देख
भावुक
हुए
भक्त
रथ खींचने
के
लिए
युवाओं
में
लगी
होड़,
मोबाइल
कैमरों
में
कैद
किया
ऐतिहासिक
पल
काशी की
अनूठी
रामलीला
पर
शोध
करने
जापान
से
पहुंचे
दो
शोधार्थी
सुरेश गांधी
वाराणसी। परे भूमि नहिं
उठत उठाए, बर करि कृपासिंधु
उर लाए। स्यामल गात
रोम भए ठाढ़े, नव
राजीव नयन जल बाढ़े...
रामचरितमानस की इन चौपाइयों
में वर्णित वह भावपूर्ण क्षण
गुरुवार को एक बार
फिर काशी की धरती
पर साकार हो उठा। नाटी
इमली के ऐतिहासिक मैदान
में जैसे ही भगवान
श्रीराम ने अनुज भरत
को हृदय से लगाया,
हजारों-लाखों आंखें नम हो उठीं।
किसी के चेहरे पर
आनंद की चमक थी,
तो किसी की आंखों
से अविरल अश्रुधारा बह रही थी।
चारों भाइयों के इस अलौकिक
मिलन के साथ मानो
पूरा वातावरण राममय हो गया। हर
ओर एक ही उद्घोष
गूंज रहा था—हर-हर महादेव! सियावर
रामचंद्र की जय!
काशी की विश्वप्रसिद्ध
नाटी इमली भरत मिलाप
की लीला केवल एक
धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सदियों से चली आ
रही आस्था, त्याग, भ्रातृप्रेम और सांस्कृतिक विरासत
का जीवंत उत्सव है। यहां राम
और भरत का मिलन
देखने के लिए श्रद्धालुओं
का ऐसा सैलाब उमड़ा
कि गलियां, छतें, मकानों की मुंडेरें और
मैदान का चप्पा-चप्पा
लोगों से भर गया।
जहां तक नजर जाती,
वहां तक सिर ही
सिर दिखाई दे रहे थे।
घंटों से अपने स्थान
पर डटे श्रद्धालु उस
क्षण की प्रतीक्षा कर
रहे थे, जब चारों
भाइयों का मिलन होगा।
प्रतीक्षा लंबी थी, लेकिन
आस्था का धैर्य उससे
कहीं अधिक।
तीन-चार मिनट का मिलन, सदियों की भावनाएं
गोधूलि बेला में निर्धारित
मुहूर्त का समय करीब
आते ही श्रद्धालुओं की
निगाहें लीला स्थल पर
टिक गईं। आंखों में
काजल, माथे पर चंदन,
सिर पर लाल पगड़ी
और पारंपरिक वेशभूषा में सजे राम,
लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न
के स्वरूपों को देखने के
लिए हर कोई आतुर
था। फिर वह क्षण
आया, जिसका इंतजार काशी को पूरे
वर्ष रहता है। पुष्पक
विमान के प्रतीक रथ
से उतरकर प्रभु श्रीराम अपने प्राणप्रिय अनुज
भरत से मिले। दोनों
भाइयों का आलिंगन होते
ही मैदान जयघोष से गूंज उठा।
लक्ष्मण और शत्रुघ्न के
मिलन ने भी श्रद्धालुओं
को भावविभोर कर दिया। यह
दृश्य कुछ ही मिनटों
का था, लेकिन इसकी
अनुभूति देर तक लोगों
के हृदय में ठहरी
रही। चारों भाइयों के गले मिलने
के साथ मानो रामायण
का वह प्रसंग वर्तमान
में उतर आया, जिसमें
चौदह वर्षों के विरह, प्रतीक्षा,
त्याग और प्रेम का
भाव एक आलिंगन में
सिमट जाता है। श्रद्धालुओं
के लिए यह केवल
लीला का दृश्य नहीं,
बल्कि उस आदर्श का
स्मरण था, जिसमें सत्ता
से बड़ा संबंध, अधिकार
से बड़ा त्याग और
विरह से बड़ा प्रेम
है।
आरती, राजतिलक और जयकारों से गूंजा मैदान
चारों भाइयों के महामिलन के
बाद नाटी इमली मैदान
में पारंपरिक रीति से आरती
उतारी गई। भगवान श्रीराम,
लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न
के स्वरूपों के दर्शन के
लिए श्रद्धालुओं में उत्साह दिखाई
दिया। इसके बाद राजतिलक
की रस्म ने आयोजन
की धार्मिक गरिमा को और बढ़ा
दिया। जय श्रीराम के
उद्घोष के बीच श्रद्धालु
हाथ जोड़कर प्रभु के दर्शन करते
रहे। कई लोग भावविभोर
होकर नतमस्तक हो गए, तो
अनेक श्रद्धालुओं ने इस दृश्य
को अपने मोबाइल कैमरों
में सहेज लिया। आयोजन
स्थल के आसपास युवाओं
का उत्साह देखते ही बन रहा
था। रथ के साथ
चलने, उसे खींचने और
उसके समीप पहुंचकर तस्वीर
लेने के लिए युवाओं
में होड़ लगी रही।
कोई अपने साथियों के
साथ सेल्फी ले रहा था,
तो कोई रथ और
चारों भाइयों के स्वरूपों को
कैमरे में कैद कर
रहा था। परंपरा की
गंभीरता के बीच नई
पीढ़ी का यह उत्साह
काशी की सांस्कृतिक विरासत
के प्रति उसके जुड़ाव को
भी दर्शा रहा था।
रथ खींचने के लिए युवाओं में लगी होड़
भरत मिलाप के
दौरान रथ श्रद्धालुओं के
आकर्षण का प्रमुख केंद्र
रहा। जैसे ही रथ
आगे बढ़ा, उसे खींचने और
उसके साथ चलने के
लिए युवाओं में उत्साह उमड़
पड़ा। रथ के आसपास
लोगों की भीड़ जुटी
रही। पारंपरिक आयोजन में शामिल होने
की खुशी उनके चेहरों
पर साफ झलक रही
थी। मोबाइल कैमरों और तस्वीरों के
जरिए युवा इस ऐतिहासिक
पल को यादगार बनाना
चाहते थे। आयोजकों के
मुताबिक, रथ करीब 200 वर्ष
पुराना है और इसका
वजन लगभग छह टन
बताया जाता है। समय
के साथ शहर की
जीवनशैली बदली, पीढ़ियां बदलीं, लेकिन इस रथ और
भरत मिलाप से जुड़ी आस्था
का आकर्षण बना हुआ है।
यही कारण है कि
हर वर्ष इस आयोजन
में बड़ी संख्या में
लोग पहुंचते हैं।
484 वर्ष से चली आ रही परंपरा
चित्रकूट रामलीला समिति के व्यवस्थापक पं.
मुकुंद उपाध्याय ने बताया कि
नाटी इमली का भरत
मिलाप लगभग 483 वर्ष पुरानी परंपरा
है। संत मेघा भगत
द्वारा स्थापित इस आयोजन को
आज भी पारंपरिक मर्यादा
और धार्मिक अनुशासन के साथ निभाया
जाता है। उन्होंने बताया
कि निर्धारित मुहूर्त में होने वाला
भाइयों का मिलन कुछ
ही मिनटों का होता है,
लेकिन इसकी तैयारी और
इसके पीछे जुड़ी भावनाएं
पूरे वर्ष श्रद्धालुओं के
मन में जीवित रहती
हैं। इस आयोजन की
विशिष्टता यह भी है
कि राम, लक्ष्मण, भरत
और शत्रुघ्न के स्वरूप धारण
करने वाले पात्रों के
लिए विशेष नियमों और संयम का
पालन किया जाता है।
परंपरा के अनुसार, स्वरूप
धारण करने वाले युवक
आयोजन से पहले खानपान
में संयम रखते हैं।
गंगा स्नान, पूजा-पाठ और
फलाहार जैसी धार्मिक दिनचर्या
का पालन भी इस
परंपरा से जुड़ा बताया
जाता है। स्थानीय मान्यता
है कि गोधूलि बेला
में होने वाला यह
मिलन विशेष आध्यात्मिक अनुभूति से जुड़ा है।
लाख श्रद्धालुओं की मौजूदगी का दावा
नाटी इमली मैदान
से लेकर जैतपुरा, लोहटिया
और मैदागिन तक भरत मिलाप
देखने के लिए श्रद्धालुओं
की भारी भीड़ उमड़ी।
आयोजन स्थल के आसपास
की गलियों और मकानों की
छतों पर भी लोग
जमे रहे। भीड़ का
दबाव इतना अधिक था
कि कई स्थानों पर
आगे बढ़ना मुश्किल हो गया। इसके
बावजूद श्रद्धालु अपने स्थान पर
डटे रहे और महामिलन
के उस क्षण का
इंतजार करते रहे, जिसके
लिए वे दूर-दूर
से पहुंचे थे। समिति के
व्यवस्थापक पं. मुकुंद उपाध्याय
के अनुसार, इस वर्ष करीब
लाख श्रद्धालु आयोजन के साक्षी बने।
हालांकि, यह आयोजकों का
अनुमानित आंकड़ा है। नाटी इमली
से आसपास के क्षेत्रों तक
फैली भीड़ ने एक
बार फिर काशी की
धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं
के व्यापक जनाधार को सामने रखा।
काशी की लीला पर शोध करने जापान से पहुंचे शोधार्थी
नाटी इमली का
भरत मिलाप केवल श्रद्धालुओं को
ही आकर्षित नहीं करता, बल्कि
देश-विदेश के शोधकर्ताओं की
रुचि का विषय भी
है। इस वर्ष जापान
से दो शोधार्थी इस
ऐतिहासिक लीला का अध्ययन
करने काशी पहुंचे। उन्होंने
लीला स्थल, उससे जुड़े ऐतिहासिक
प्रसंगों, पारंपरिक आयोजन पद्धति और करीब 200 वर्ष
पुराने रथ की विशेषताओं
को समझा। लाखों लोगों की भागीदारी, कुछ
ही मिनटों में संपन्न होने
वाले महामिलन और यदुवंशी समाज
की परंपरागत भूमिका ने उनका ध्यान
विशेष रूप से आकर्षित
किया। शोधार्थियों ने आयोजन को
प्रत्यक्ष देखा और इससे
जुड़े सांस्कृतिक पहलुओं को समझने का
प्रयास किया। यह उपस्थिति इस
बात की ओर संकेत
करती है कि काशी
की लोकपरंपराएं केवल स्थानीय धार्मिक
जीवन का हिस्सा नहीं
हैं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत के अध्ययन के
लिए भी महत्वपूर्ण हैं।
आस्था के आलिंगन में सिमट गई काशी
नाटी इमली का
भरत मिलाप हर वर्ष एक
ही संदेश को नए सिरे
से जीवंत करता है—रिश्तों
की गरिमा, त्याग की महत्ता और
प्रेम की शक्ति। राम
और भरत का आलिंगन
उस आदर्श का प्रतीक है,
जिसमें चौदह वर्षों का
वनवास, भाई की प्रतीक्षा
और राजधर्म की मर्यादा एक
साथ दिखाई देती है। भरत
के लिए अयोध्या का
राजसिंहासन कभी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा
का विषय नहीं बना;
उन्होंने राम की खड़ाऊं
को ही राज्य का
प्रतीक मानकर अपने कर्तव्य का
निर्वाह किया। भरत मिलाप इसी
त्याग और भ्रातृप्रेम की
स्मृति को जन-जन
तक पहुंचाता है। गुरुवार को
नाटी इमली में भी
यही भाव दिखाई दिया।
कोई हाथ जोड़कर खड़ा
था, कोई आंखें बंद
कर प्रार्थना कर रहा था,
तो कोई नम आंखों
से चारों भाइयों को निहार रहा
था। कुछ ही मिनटों
में संपन्न होने वाली लीला
ने हजारों लोगों को एक साझा
भाव में बांध दिया।
रथ आगे बढ़ा, जयकारों
की गूंज देर तक
सुनाई देती रही, लेकिन
लोगों के मन में
उस आलिंगन की छवि ठहर
गई। काशी की यही
विशेषता है—यहां परंपराएं
केवल निभाई नहीं जातीं, उन्हें
जिया जाता है। नाटी
इमली का भरत मिलाप
इसी जीवंत सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है,
जहां इतिहास वर्तमान से मिलता है,
आस्था भावनाओं में ढलती है
और राम-भरत का
मिलन हर वर्ष लोगों
को प्रेम, मर्यादा और त्याग का
नया संदेश दे जाता है।


No comments:
Post a Comment