काशी की सड़कों पर उतरीं मां भवानी, हर
गली बनी दरबार
हथुआ मार्केट में अंकोरवाट,
शिवपुर में हवामहल की छटा; चेतगंज से सोनारपुरा तक रोशनी में नहाई काशी, पंडालों में
मां के साक्षात् दर्शन का अहसास, श्रद्धालुओं के रेले से गुलजार हुए चौक-चौराहे
सुरेश गांधी
वाराणसी। काशी में इन दिनों सड़कें केवल रास्ता
नहीं, मां दुर्गा के दरबार तक पहुंचने का जरिया बन गई हैं। गलियां सजधजकर तैयार हैं,
चौक-चौराहे रोशनी से नहा उठे हैं और पंडालों में विराजमान मां भगवती के दर्शन को श्रद्धालुओं
का रेला उमड़ रहा है। कहीं ढाक की थाप है तो कहीं शंखध्वनि, कहीं आरती की लौ में दमकता
मां का मुखारविंद तो कहीं रंग-बिरंगी रोशनी में नहाया भव्य प्रवेश द्वार। शाम ढलते
ही ऐसा लगता है, मानो पूरी काशी मां की अगवानी में सड़क पर उतर आई हो।
शारदीय नवरात्र में काशी की दुर्गापूजा इस बार भी आस्था, कला और भव्यता का अनूठा संसार रच रही है। पंडालों की ओर बढ़ते कदम, दर्शन के लिए कतारों में खड़े श्रद्धालु और देवी स्तुति से गूंजता वातावरण शहर को देवीमय बना रहा है। बनारसी मिजाज में कहें तो जिधर निकल जाइए, उधर मां का दरबार सजा है। कहीं प्रतिमा की भव्यता निगाहें बांध लेती है तो कहीं पंडाल की कलात्मकता कदम रोक देती है। मां के सामने पहुंचते ही भीड़ के बीच भी मन ठहर जाता है और हाथ अपने आप जुड़ जाते हैं।
हथुआ मार्केट में अंकोरवाट, शिवपुर में
हवामहल
काशी के प्रमुख दुर्गापूजा पंडाल इस बार
अपनी अलग-अलग विषयवस्तु और कलात्मक कल्पना से आकर्षित कर रहे हैं। चेतगंज स्थित हथुआ
मार्केट में प्रीमियर बॉयज क्लब का पंडाल कंबोडिया के प्रसिद्ध अंकोरवाट मंदिर की स्थापत्य
शैली से प्रेरित है। विशाल शिखरों और भव्य प्रवेश द्वार की छटा पंडाल को विशिष्ट रूप
देती है। विदेशी स्थापत्य की अनुकृति के बीच मां दुर्गा की प्रतिमा भारतीय आस्था और
कला की जीवंत पहचान बनकर सामने आती है। उधर शिवपुर मिनी स्टेडियम में राजस्थान के प्रसिद्ध
हवामहल की तर्ज पर बना पंडाल श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है। इसकी स्थापत्य शैली
काशी में बैठे-बैठे राजस्थान की ऐतिहासिक विरासत का अहसास कराती है। पंडालों की ये
कल्पनाएं बताती हैं कि दुर्गोत्सव में धार्मिक श्रद्धा के साथ भारत की विविध स्थापत्य
परंपराओं को भी जगह मिल रही है।
नई सड़क से चेतगंज तक रोशनी का संसार
नई सड़क, सनातन धर्म इंटर कॉलेज, लहुराबीर
और जगतगंज की ओर बढ़ने पर दुर्गोत्सव के अलग-अलग रंग दिखाई देते हैं। कहीं पारंपरिक
प्रतिमाओं की छटा है तो कहीं साज-सज्जा में आधुनिक कल्पनाशीलता। बाजारों की हलचल के
बीच देवी गीतों की गूंज और पंडालों की रोशनी वातावरण को उत्सवी बना रही है। मच्छोदरी
और जंगमबाड़ी के पंडाल भी काशी के दुर्गोत्सव के प्रमुख केंद्रों में शामिल हैं। शाम
होते ही इन इलाकों में परिवारों के साथ दर्शन करने निकले लोगों की आवाजाही बढ़ जाती
है। बच्चे पंडालों की सजावट निहारते हैं, बुजुर्ग मां के सामने शीश नवाते हैं और युवा
प्रतिमाओं की कलात्मकता को कैमरे में सहेजते हैं। हर चेहरे पर उत्सुकता और हर कदम में
मां के दर्शन की चाह दिखाई देती है।
सोनारपुरा-शिवाला में बंगाली दुर्गोत्सव
की छटा
सोनारपुरा, शिवाला और बंगाली टोला की
गलियों में दुर्गापूजा का रंग अपनी सांस्कृतिक आत्मीयता के साथ सामने आता है। बंगाली
परंपरा के अनुसार सजी प्रतिमाएं, ढाक की थाप, शंखध्वनि और विधि-विधान से होने वाली
पूजा इन इलाकों को विशेष पहचान देते हैं। यहां दुर्गोत्सव केवल प्रतिमा-दर्शन नहीं,
बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक परंपरा का उत्सव है। ईगल परिवार की ओर से स्थापित
प्रतिमा में ओडिसी नृत्य की त्रिभंग मुद्रा का प्रयोग इसी कलात्मक विविधता का उदाहरण
है। मां दुर्गा के दस हाथों की शास्त्रीय मुद्राएं शक्ति और लय का भाव जगाती हैं। देवी
लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिकेय और गणेश को भी नृत्यशैली से जोड़कर प्रस्तुत किया गया
है। महिषासुर के चित्रण में पौराणिक आख्यान को कलात्मक रूप दिया गया है। इस तरह प्रतिमा
के माध्यम से भारतीय शास्त्रीय नृत्य और धार्मिक परंपरा का सुंदर मेल दिखाई देता है।
विश्वनाथ धाम में शिव-शक्ति की आराधना
दुर्गोत्सव की आध्यात्मिक छटा श्री काशी
विश्वनाथ धाम में भी दिखाई दे रही है। नवरात्र के आठवें दिन मां भगवती की उपासना के
साथ बाबा विश्वनाथ के प्रति श्रद्धा निवेदित की गई। मां विशालाक्षी के लिए श्रृंगार
सामग्री बाबा विश्वेश्वर के समक्ष श्रद्धापूर्वक अवलोकित कराने के बाद प्रेषित की गई।
देवी महात्म्य के अंतर्गत नवदुर्गा सप्तशती के पाठ से मां आदिशक्ति की महिमा का स्मरण
किया गया। मंदिरों से पंडालों तक फैली यह आराधना काशी की उस परंपरा को सामने लाती है,
जिसमें शिव और शक्ति की उपासना एक-दूसरे से जुड़ी है। कहीं वैदिक मंत्रोच्चार है तो
कहीं ढाक की थाप पर गूंजती देवी स्तुति। पूजा की विधियां अलग हैं, लेकिन श्रद्धा का
भाव एक है।
हर राह मां के दरबार तक
काशी की दुर्गापूजा की असली भव्यता किसी
एक पंडाल में नहीं, बल्कि पूरे शहर में बिखरी है। हथुआ मार्केट का अंकोरवाट, शिवपुर
का हवामहल, नई सड़क की रौनक और सोनारपुरा की बंगाली परंपरा—हर
जगह मां के स्वागत का अलग अंदाज है। रंग-बिरंगी झालरों से जगमगाती गलियां, देवी गीतों
से गूंजते रास्ते और दर्शन के लिए उमड़ते श्रद्धालु इस उत्सव को सामूहिक आस्था का स्वरूप
देते हैं। नवरात्र की अष्टमी से नवमी तक बढ़ता उत्साह और दशमी की विदाई की प्रतीक्षा,
दोनों में भक्ति का गहरा भाव छिपा है। प्रतिमा विसर्जन के समय मां को अगले वर्ष फिर
आने का निमंत्रण देते श्रद्धालुओं की आंखें नम होंगी, लेकिन मन में उत्सव की स्मृतियां
बनी रहेंगी। काशी में इन दिनों मां केवल पंडालों में विराजमान नहीं हैं। वह रोशनी से
सजी गलियों, शंखध्वनि से गूंजते चौक-चौराहों और दर्शन को उमड़ते जनसमूह के बीच हर ओर
अनुभूत हो रही हैं। बनारसी अंदाज में कहें तो पूरा शहर मां के दरबार में हाजिरी लगाने
निकला है—और हर गली यही कह रही है, जय माता दी!


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