काशी की सड़क पर उतरी मां भवानी, भक्ति के रेला में बह उठा पूरा शहर
कहीं मां
के
साक्षात्
स्वरूप
के
दर्शन,
कहीं
ढाक-शंख
की
गूंज;
रोशनी
में
नहाई
गलियों
से
सजे
पंडालों
तक
उमड़ा
श्रद्धा
का
ऐसा
ज्वार
कि
हर
राह
पहुंची
देवी
के
दरबार
सुरेश गांधी
वाराणसी. काशी में इन
दिनों रास्ते सिर्फ मंजिल तक नहीं पहुंचा
रहे, मां दुर्गा के
दरबार तक ले जा
रहे हैं। गलियां केवल
गलियां नहीं रहीं, भक्ति
की पगडंडियां बन गई हैं।
चौक-चौराहे महज आवाजाही की
जगह नहीं, देवी आराधना के
जीवंत मंच बन उठे
हैं। सड़कों पर कदम बढ़ाइए
तो कहीं ढाक की
थाप बुलाती है, कहीं शंखध्वनि
मन के भीतर तक
उतर जाती है। कहीं
आरती की लौ में
मां का तेज झिलमिलाता
है तो कहीं रंग-बिरंगी रोशनी से नहाए पंडाल
के भीतर विराजमान देवी
प्रतिमा को देखकर बरबस
हाथ जुड़ जाते हैं।
लगता है, जैसे मां
दुर्गा प्रतिमा में नहीं, साक्षात्
सामने खड़ी होकर अपनी
संतानों को निहार रही
हों।
शारदीय नवरात्र ने काशी को
इस बार ऐसा रूप
दिया है कि दिन
ढलते ही शहर की
धड़कन बदल जाती है।
घरों से निकलते कदम
पंडालों की ओर बढ़ते
हैं, गलियों में लोगों का
रेला उमड़ता है और हर
मोड़ पर आस्था की
नई तस्वीर सामने आ जाती है।
बनारस का अपना अलमस्त
अंदाज भी इस भक्ति
में घुल गया है।
कोई परिवार के साथ मां
के दर्शन को निकला है,
कोई बच्चों को पंडालों की
अद्भुत सजावट दिखाने, तो कोई अपने
भीतर की मनौती लेकर
देवी के दरबार में
हाजिरी लगाने। भीड़ में अलग-अलग चेहरे हैं,
अलग-अलग कामनाएं हैं,
लेकिन सबकी निगाहें एक
ही ओर टिकी हैं—मां के मुखारविंद
पर।
काशी की दुर्गापूजा
को सिर्फ प्रतिमाओं, पंडालों और सजावट के
पैमाने पर नहीं समझा
जा सकता। यहां यह उत्सव
शहर की सामूहिक चेतना
का हिस्सा है। आस्था घर
की चौखट लांघकर सड़क
पर उतरती है और फिर
पूरी नगरी को अपने
रंग में रंग लेती
है। गंगा के घाटों
से लेकर पुरानी काशी
की संकरी गलियों तक, मंदिरों की
घंटियों से लेकर पूजा
पंडालों में गूंजते देवी
मंत्रों तक, हर ओर
एक ही अनुभूति है—काशी इन दिनों
मां की हो गई
है और मां काशी
की।
शाम होते ही रोशनी में उतर आती है देवी की नगरी
सूरज की विदाई
के साथ ही काशी
की दूसरी छवि सामने आने
लगती है। दिन में
जहां गलियां अपनी पुरानी पहचान
और बनारसी रफ्तार के साथ चलती
हैं, वहीं शाम होते-होते रंग-बिरंगी
रोशनियों की चादर ओढ़
लेती हैं। सजावटी झालरें,
चमकती लड़ियां और नियोन लाइटें
पंडालों को ऐसा रूप
देती हैं, मानो अंधेरे
आकाश से उतरकर रोशनी
ने धरती पर अपना
डेरा डाल दिया हो।
कहीं प्रवेश द्वार पर भव्य स्थापत्य
की छाप है, कहीं
रंगों और प्रकाश का
ऐसा संयोजन कि निगाह ठहर
जाए। कहीं देवी के
दरबार तक पहुंचने के
लिए श्रद्धालुओं की कतारें हैं
तो कहीं बाहर खड़े
लोग भीतर सजी प्रतिमा
की एक झलक पाने
को आतुर हैं। मां
के पट खुलते ही
प्रतीक्षा जैसे भाव-विभोर
दर्शन में बदल जाती
है। हाथ जुड़ते हैं,
सिर झुकते हैं और आंखें
कुछ पल के लिए
उसी छवि में ठहर
जाती हैं। इस दृश्य
की खूबी यह है
कि यहां दर्शक केवल
सजावट देखने नहीं आते। हर
पंडाल के भीतर उनकी
कोई न कोई निजी
आस्था भी पहुंचती है।
किसी की मन्नत है,
किसी की मनोकामना, किसी
की मां के चरणों
में कृतज्ञता तो किसी की
मुश्किल दिनों से निकलने की
प्रार्थना। प्रतिमा के सामने खड़े
होकर लोग अपनी-अपनी
भाषा में कुछ कहते
हैं, लेकिन उनके मौन की
भाषा एक ही होती
है। और फिर बनारस
की वह सहज आत्मीयता!
रास्ते में किसी से
पंडाल का पता पूछिए
तो वह केवल दिशा
नहीं बताता, अपनी पसंद का
दरबार भी गिना देता
है। कहां की प्रतिमा
निराली है, किस पंडाल
की सजावट मन मोह रही
है, किस रास्ते से
दर्शन आसान होंगे—इन
चर्चाओं के बीच दुर्गोत्सव
शहर का साझा उत्सव
बन जाता है। यहां
मां के दर्शन की
राह में परिचय की
जरूरत नहीं, श्रद्धा ही सबसे बड़ा
परिचय है।
पंडालों में प्रतिमा नहीं, साक्षात् मां के विराजने का अहसास
काशी के दुर्गापूजा पंडालों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी कल्पनाशीलता है। कारीगरों की उंगलियां, कलाकारों की दृष्टि और आयोजकों की महीनों की तैयारी मिलकर ऐसा संसार रचती है, जिसमें प्रवेश करते ही बाहरी दुनिया कुछ देर के लिए पीछे छूट जाती है। कहीं पारंपरिक बंगाली दुर्गोत्सव की छाप है, कहीं भारतीय स्थापत्य की भव्यता, कहीं लोककला की सहज सुंदरता तो कहीं समकालीन विषयों के जरिये समाज को संदेश देने की कोशिश। देवी प्रतिमाओं के चेहरे पर उकेरे गए भाव, नेत्रों की तीक्ष्णता, आभूषणों की बारीकी और हाथों में धारण किए गए अस्त्र-शस्त्र उनकी कलात्मकता को विशेष बनाते हैं। सिंह पर आरूढ़ मां, महिषासुर का वध करती देवी और उनके साथ विराजमान लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश व कार्तिकेय—यह पूरा दृश्य श्रद्धालुओं के लिए केवल पौराणिक आख्यान का चित्रण नहीं रह जाता। वह शक्ति, करुणा, साहस और सृजन के प्रतीकों से साक्षात्कार बन जाता है। कुछ पंडालों में प्रतिमाओं का स्वरूप इतना प्रभावशाली है कि सामने पहुंचकर निगाह सहज ही ठहर जाती है। प्रकाश की व्यवस्था देवी के मुखमंडल को अलग आभा देती है। कहीं पारंपरिक रंगों का संयम है, कहीं भव्य सज्जा की चमक। लेकिन हर जगह उस क्षण का अपना महत्व है, जब दर्शनार्थी प्रतिमा के सामने पहुंचता है और कुछ पल के लिए जैसे आसपास की हलचल से कट जाता है। यही काशी की दुर्गापूजा का भावनात्मक पक्ष है। बाहर श्रद्धालुओं का रेला है, ढाक और शंख की गूंज है, बच्चों की चहक है, लोगों की आवाजाही है; लेकिन प्रतिमा के सामने पहुंचते ही एक अलग शांति मन में उतरने लगती है। किसी के होंठों पर मंत्र हैं, किसी की आंखें बंद हैं, कोई बस निहार रहा है। आस्था के इस संसार में हर व्यक्ति अपने ढंग से मां से जुड़ता है।
नई सड़क से सोनारपुरा तक मां के दरबार, हर इलाके का अपना अंदाज
काशी की दुर्गापूजा
का वैभव किसी एक
चौक, किसी एक मोहल्ले
या किसी एक पंडाल
में सिमटने वाला नहीं। इसकी
असली छटा तो उन
रास्तों पर बिखरी है,
जहां एक पंडाल से
निकलते ही दूसरे दरबार
की रोशनी बुलाने लगती है। नई
सड़क, चेतगंज, हथुआ मार्केट, लक्सा,
भेलूपुर, सोनारपुरा, शिवाला, बंगाली टोला और लहुराबीर
तक देवी आराधना के
अलग-अलग रंग दिखाई
देते हैं। कहीं भव्य
स्थापत्य का आकर्षण है,
कहीं बंगाली परंपरा की आत्मीयता, कहीं
शास्त्रीय कला की मोहक
प्रस्तुति तो कहीं मोहल्ले
की सामूहिक श्रद्धा से सजा मां
का दरबार।
नई सड़क पर भव्यता, हथुआ मार्केट में अंकोरवाट की झलक
नई सड़क और
गोदौलिया की ओर बढ़ते
ही दुर्गोत्सव की भव्यता का
अलग संसार सामने आता है। यहां
सनातन धर्म इंटर कॉलेज
की दुर्गापूजा अपनी पारंपरिक प्रतिमा
और आकर्षक विद्युत सज्जा के लिए पहचानी
जाती है। रोशनी से
सजा प्रवेश द्वार, पंडाल की कलात्मक बनावट
और देवी के दर्शन
के लिए पहुंचते श्रद्धालु
इस क्षेत्र को उत्सव का
प्रमुख केंद्र बनाते हैं। उधर चेतगंज
के हथुआ मार्केट में
इस बार कंबोडिया के
प्रसिद्ध अंकोरवाट मंदिर की स्थापत्य शैली
से प्रेरित पंडाल विशेष आकर्षण का केंद्र बना।
मंदिर के शिखरों और
स्थापत्य की छाप वाली
इस संरचना में भारतीय दुर्गोत्सव
के बीच दक्षिण-पूर्व
एशिया की सांस्कृतिक विरासत
की झलक दिखाई देती
है। पंडाल की कल्पना बताती
है कि काशी के
कलाकार और आयोजक धार्मिक
उत्सव को केवल परंपरा
तक सीमित नहीं रखते, बल्कि
स्थापत्य और कला की
नई दुनिया से भी जोड़ते
हैं। पंडाल के भीतर मां
दुर्गा की प्रतिमा के
सामने पहुंचते ही बाहरी भव्यता
का अर्थ बदल जाता
है। बाहर स्थापत्य की
कलात्मकता निगाह खींचती है, भीतर मां
का स्वरूप मन को ठहरने
पर विवश करता है।
यही दुर्गोत्सव की खूबी है—दर्शन की राह में
कला मिलती है और कला
के बीच आस्था अपना
स्थान बना लेती है।
चेतगंज से लहुराबीर तक, रोशनी और श्रद्धा की कतार
चेतगंज और लहुराबीर के
आसपास दुर्गापूजा की रौनक काशी
के पुराने शहरी जीवन के
साथ घुलती नजर आती है।
हथुआ मार्केट से लेकर जगतगंज
की ओर तक पंडालों
के दर्शन के लिए निकलते
लोगों की आवाजाही उत्सव
को विस्तार देती है। बाजारों
की हलचल के बीच
देवी आराधना का वातावरण बनता
है तो आसपास की
गलियां भी रोशनी और
सजावट से नई छवि
ग्रहण कर लेती हैं।
जगतगंज में पारंपरिक पूजा-विधि और सामुदायिक
सहभागिता का अपना आकर्षण
है। यहां मां के
दर्शन के साथ पूजा
की तैयारियों, अनुष्ठानों और सामूहिक आयोजन
की परंपरा भी उत्सव का
हिस्सा बनती है। किसी
परिवार के लिए यह
वर्षों पुरानी परंपरा से जुड़ने का
अवसर है तो किसी
के लिए मां के
दरबार में पहली बार
पहुंचने का उत्साह। इन
इलाकों में शाम के
समय एक पंडाल से
दूसरे पंडाल की ओर बढ़ते
कदम काशी के उत्सव
की व्यापकता का अहसास कराते
हैं। कहीं ढाक की
थाप सुनाई देती है, कहीं
देवी गीतों की धुन। कहीं
आरती के लिए हाथ
जुड़ते हैं तो कहीं
मां की प्रतिमा को
निहारते श्रद्धालु कुछ देर के
लिए रास्ते की हलचल भूल
जाते हैं।
भेलूपुर और कमच्छा में कलात्मकता का आकर्षण
भेलूपुर और कमच्छा की
ओर दुर्गोत्सव का रंग कुछ
अलग अंदाज में दिखाई देता
है। यहां प्रीमियर बॉयज
क्लब की दुर्गापूजा विशेष
पहचान रखती है। ऐतिहासिक
मंदिरों और स्थापत्य से
प्रेरित पंडालों की परंपरा ने
इस आयोजन को अलग आकर्षण
दिया है। इस वर्ष
दुर्गापूजा से जुड़ी तैयारियों
में कंबोडिया के अंकोरवाट मंदिर
की अनुकृति और पारंपरिक दुर्गा
प्रतिमा की स्थापना की
चर्चा रही। इस क्षेत्र
में पंडाल-दर्शन के लिए पहुंचने
वाले श्रद्धालुओं के लिए उत्सव
केवल प्रतिमा तक पहुंचने का
अनुभव नहीं है। सजावट,
प्रवेश द्वार, प्रकाश व्यवस्था और देवी के
दरबार की पूरी संरचना
मिलकर एक ऐसा दृश्य
रचती है, जिसे लोग
देर तक निहारते हैं।
मां की प्रतिमा के
सामने पहुंचते ही कलात्मकता के
बीच भक्ति का भाव प्रमुख
हो उठता है।
लक्सा, सोनारपुरा और शिवाला में बंगाली दुर्गोत्सव की आत्मीयता
काशी की दुर्गापूजा
का जिक्र बंगाली टोला, सोनारपुरा और शिवाला के
बिना अधूरा है। इन इलाकों
में बंगाली समुदाय की पूजा-परंपरा
का अपना सांस्कृतिक रंग
है। पारंपरिक प्रतिमाएं, विधि-विधान से
होने वाली पूजा, ढाक
की थाप और सामूहिक
आराधना दुर्गोत्सव को विशिष्ट बनाते
हैं। सोनारपुरा और शिवाला की
गलियों में मां के
दर्शन के लिए निकलते
श्रद्धालु काशी की पुरानी
बसावट के बीच एक
अलग उत्सवी संसार का अनुभव करते
हैं। कहीं पूजा की
तैयारी में जुटे लोग
हैं, कहीं देवी के
समक्ष अर्पित किए जाने वाले
फूल और भोग सजाए
जा रहे हैं, तो
कहीं आरती के समय
मां के दरबार में
श्रद्धालुओं की कतार लग
जाती है। लक्सा और
आसपास के क्षेत्रों में
भी दुर्गापूजा की परंपरा धार्मिक
आयोजन को सामुदायिक उत्सव
का रूप देती है।
यहां पंडालों में पहुंचने वाले
लोग केवल दर्शन कर
लौटने की जल्दी में
नहीं दिखते; वे सजावट देखते
हैं, प्रतिमा की कलात्मकता निहारते
हैं और अपने परिवार
के साथ इस उत्सवी
माहौल को जीते हैं।
बंगाली दुर्गोत्सव की विशेषता है
कि इसमें पूजा के साथ
कला, संगीत और सामूहिक सहभागिता
का गहरा संबंध दिखाई
देता है। ढाक की
गूंज और शंखध्वनि के
बीच मां के दर्शन
का क्षण श्रद्धालुओं के
लिए भावनात्मक अनुभव बन जाता है।
बंगाली टोला से गंगा घाटों तक, आस्था की अपनी राह
बंगाली टोला और पांडेय
घाट की ओर जाने
वाली गलियों में दुर्गोत्सव का
अनुभव काशी की गंगा-संस्कृति से भी जुड़ता
है। एक ओर मां
के दरबार में पूजा-अर्चना,
दूसरी ओर गंगा की
निकटता और पुरानी काशी
की गलियों का परिवेश—ये
सब मिलकर उत्सव को विशिष्ट बनाते
हैं। यहां की सांस्कृतिक
पहचान में बंगाली परंपरा
और काशी की धार्मिक
चेतना एक-दूसरे के
साथ चलती दिखाई देती
हैं। प्रतिमाओं के पारंपरिक स्वरूप,
पूजा की विधियां और
सामुदायिक आयोजन इस बात का
अहसास कराते हैं कि दुर्गोत्सव
की जड़ें केवल किसी एक
मोहल्ले में नहीं, बल्कि
पीढ़ियों से चली आ
रही सांस्कृतिक स्मृतियों में हैं। गंगा
के घाटों के आसपास का
वातावरण इस अनुभूति को
और गहरा करता है।
मां के दर्शन के
बाद लौटते श्रद्धालु, गलियों में गूंजते देवी
गीत और रोशनी से
सजे रास्ते—काशी की दुर्गापूजा
को केवल धार्मिक आयोजन
नहीं रहने देते, उसे
शहर की सामूहिक स्मृति
का हिस्सा बना देते हैं।
ईगल परिवार की प्रतिमा में ओडिसी की त्रिभंग मुद्रा, नृत्य में साकार देवी की शक्ति
काशी के पंडालों
में इस बार भारतीय
शास्त्रीय कला की विविधता
भी आकर्षण का केंद्र है।
ईगल परिवार की ओर से
स्थापित दुर्गा प्रतिमा में मां को
ओडिसी नृत्य की प्रसिद्ध त्रिभंग
मुद्रा में दर्शाया गया
है। यह मुद्रा शरीर
के तीन हिस्सों में
लयात्मक वक्रता के कारण पहचानी
जाती है और भारतीय
शास्त्रीय नृत्य की विशिष्ट सौंदर्य-परंपरा का प्रतिनिधित्व करती
है। इस प्रस्तुति में
मां दुर्गा के दस हाथों
की शास्त्रीय मुद्राएं देवी के आयुधों
और उनकी शक्ति को
कलात्मक अर्थ देती हैं।
देवी का स्वरूप यहां
केवल युद्ध और विजय का
प्रतीक नहीं, बल्कि लय, संतुलन, शांति
और मातृत्व की अभिव्यक्ति भी
बन जाता है। साथ
में विराजमान मां लक्ष्मी, मां
सरस्वती, कार्तिकेय और गणेश को
भी इसी नृत्यशैली की
कल्पना से जोड़ा गया
है। इससे पूरी प्रतिमा-सज्जा में एकरूपता और
कलात्मक प्रवाह दिखाई देता है। महिषासुर
को महिष की खोपड़ी
के भीतर नृत्य करते
हुए दिखाने की कल्पना भी
इस प्रस्तुति को विशिष्ट बनाती
है। पौराणिक कथा को एक
अलग कलात्मक भाषा में व्यक्त
करने का यह प्रयास
दर्शक को केवल दृश्य
सौंदर्य तक सीमित नहीं
रखता, बल्कि भारतीय नृत्य, मूर्तिकला और देवी उपासना
के परस्पर संबंधों की ओर भी
ध्यान खींचता है। यहां कला पूजा से
अलग नहीं होती, बल्कि
उसी की अभिव्यक्ति बन
जाती है। देवी का
स्वरूप शास्त्रीय नृत्य की मुद्रा में
है, लेकिन भाव वही सनातन
है—अधर्म पर धर्म की
विजय, अहंकार पर शक्ति की
जीत और सृजन की
रक्षा के लिए सामर्थ्य
का जागरण। इस तरह पंडाल
भारतीय परंपरा को किसी संग्रहालय
की वस्तु की तरह नहीं,
जीवंत सांस्कृतिक विरासत के रूप में
सामने रखता है।
श्री काशी विश्वनाथ धाम में शक्ति और शिव की आराधना
काशी में दुर्गोत्सव
का एक आध्यात्मिक पक्ष
श्री काशी विश्वनाथ धाम
में भी दिखाई देता
है, जहां नवरात्र के
अनुष्ठानों के बीच बाबा
विश्वनाथ के प्रति श्रद्धा
निवेदित की गई। नवरात्र
के आठवें दिन मां भगवती
की उपासना के साथ धार्मिक
विधि-विधान संपन्न हुए। मां विशालाक्षी
के लिए श्रृंगार सामग्री
बाबा श्री विश्वेश्वर के
समक्ष श्रद्धापूर्वक अवलोकित कराने के बाद प्रेषित
की गई। देवी महात्म्य
के अंतर्गत नवदुर्गा सप्तशती का पवित्र पाठ
कर मां आदिशक्ति की
महिमा का स्मरण किया
गया। यह परंपरा काशी
की धार्मिक चेतना में शिव और
शक्ति की अभिन्नता को
रेखांकित करती है। यहां
बाबा विश्वनाथ की नगरी में
मां भगवती की आराधना कोई
अलग अध्याय नहीं, बल्कि उसी आध्यात्मिक परंपरा
का विस्तार है, जिसमें सृजन,
शक्ति और चेतना एक-दूसरे से जुड़े हैं।
नवरात्र में देवी के
विविध स्वरूपों की उपासना और
शिव के प्रति श्रद्धा
का यह भाव काशी
के धार्मिक जीवन को विशेष
अर्थ देता है। मंदिर
के अनुष्ठानों से लेकर पंडालों
में हो रही आरती
तक, पूजा की विधियां
अलग हो सकती हैं,
लेकिन श्रद्धा का केंद्र एक
है। कोई शास्त्रीय मंत्रों
के साथ मां का
आह्वान करता है, कोई
भजन गाता है, कोई
प्रतिमा के आगे दीप
जलाता है। काशी की
पहचान इसी विविधता में
निहित है, जहां परंपराएं
एक-दूसरे से टकराती नहीं,
बल्कि एक व्यापक सांस्कृतिक
संसार रचती हैं।
ढाक की थाप पर थिरकती आस्था, शंखध्वनि में गूंजती काशी
दुर्गापूजा की बात हो
और ढाक की थाप
का जिक्र न आए, ऐसा
कैसे हो सकता है!
बंगाली दुर्गोत्सव की पहचान बनी
ढाक जब पंडालों में
गूंजती है, तो वातावरण
में एक अलग ही
ऊर्जा भर जाती है।
उसके साथ शंखध्वनि उठे,
आरती की घंटियां बजें
और देवी स्तुति के
स्वर हवा में तैरने
लगें, तो दृश्य अपने
आप उत्सव में बदल जाता
है। इन ध्वनियों के
बीच श्रद्धालुओं की आवाजाही लगातार
बनी रहती है। कहीं
परिवार एक साथ दर्शन
कर रहा है, कहीं
बुजुर्ग हाथ जोड़कर मां
का आशीर्वाद मांग रहे हैं,
कहीं बच्चों की निगाहें प्रतिमा
के आभूषणों और पंडाल की
सजावट पर टिकी हैं।
युवाओं के लिए यह
दृश्य आस्था के साथ शहर
की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ने का
अवसर भी है। मोबाइल
कैमरों में दृश्य कैद
होते हैं, लेकिन मां
के सामने बिताए गए कुछ पल
अक्सर तस्वीरों से आगे निकल
जाते हैं। काशी की
दुर्गापूजा में यही विविध
रंग इसे विशिष्ट बनाते
हैं। धार्मिक अनुष्ठान, लोकविश्वास, शास्त्रीय कला, सामुदायिक सहभागिता
और आधुनिक सजावट—सभी एक ही
उत्सव में अपनी जगह
पाते हैं। इसीलिए यहां
दुर्गोत्सव केवल किसी एक
मोहल्ले या समुदाय का
आयोजन नहीं लगता। यह
पूरे शहर का उत्सव
बन जाता है, जिसमें
हर रास्ता किसी न किसी
दरबार तक पहुंचता है।
सड़कों पर उमड़ा रेला, हर रास्ते पर देवी दर्शन की चाह
नवरात्र के दिनों में
पंडालों की ओर बढ़ते
लोगों का दृश्य काशी
के उत्सव को अलग विस्तार
देता है। शाम होते
ही घरों से निकलते
परिवार, दर्शन के लिए आगे
बढ़ते श्रद्धालु और एक पंडाल
से दूसरे पंडाल तक पहुंचने की
उत्सुकता—इन सबके बीच
शहर की सड़कों पर
जनजीवन का एक अलग
रूप दिखाई देता है। भीड़
का यह रेला केवल
लोगों की संख्या से
नहीं बनता, बल्कि उस साझा भाव
से बनता है जो
हजारों अनजान लोगों को एक ही
दिशा में ले जाता
है। किसी को मां
की प्रतिमा देखनी है, किसी को
आरती में शामिल होना
है, किसी को वर्षों
से चली आ रही
पारिवारिक परंपरा निभानी है। कई लोगों
के लिए पंडाल-दर्शन
नवरात्र की अनिवार्य स्मृति
है, जिसके बिना पर्व अधूरा
लगता है। संकरी गलियों
वाली काशी में जब
श्रद्धालु एक साथ निकलते
हैं, तो शहर की
पुरानी बनावट और उत्सव की
नई ऊर्जा आमने-सामने दिखाई
देती हैं। कहीं रास्ते
के दोनों ओर सजे घर
हैं, कहीं ऊपर से
लटकती झालरें, कहीं पंडाल के
प्रवेश द्वार पर आकर्षक सज्जा
और कहीं दूर से
सुनाई देती ढाक की
आवाज। राह चलते लोग
भी कुछ क्षण ठहरकर
उस दृश्य को निहार लेते
हैं। शहर के रोजमर्रा
के जीवन में जैसे
अचानक एक उत्सवी अध्याय
जुड़ जाता है। इस
भीड़ में भक्ति का
उत्साह जितना जरूरी है, उतना ही
जरूरी एक-दूसरे के
लिए जगह बनाना भी
है। बुजुर्गों, बच्चों और महिलाओं की
सुविधा, रास्तों पर अनुशासन और
आयोजनों के आसपास सुचारु
आवाजाही से ही यह
उत्सव सभी के लिए
सुखद बन सकता है।
मां के दरबार तक
पहुंचने की आतुरता तभी
पूरी होती है, जब
दर्शन के साथ श्रद्धालुओं
की सुरक्षा और सुविधा भी
बनी रहे।
काशी की दुर्गापूजा में दिखती भारत की सांस्कृतिक आत्मा
काशी के पूजा
पंडालों की खासियत है
कि वे एक ही
धार्मिक भावना के भीतर कला
और संस्कृति के अनेक रूपों
को जगह देते हैं।
बंगाल की दुर्गोत्सव परंपरा,
उत्तर भारत की देवी
आराधना, भारतीय स्थापत्य की छवियां, शास्त्रीय
नृत्य की मुद्राएं और
आधुनिक प्रकाश-सज्जा—सब मिलकर ऐसा
दृश्य रचते हैं, जिसमें
भारत की सांस्कृतिक विविधता
सामने आती है। यह
विविधता केवल सजावट में
नहीं, लोगों की भागीदारी में
भी दिखाई देती है। अलग-अलग भाषाएं बोलने
वाले, विभिन्न क्षेत्रों से आए और
अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि
से जुड़े लोग मां के
दर्शन के लिए एक
ही कतार में खड़े
दिखाई देते हैं। पंडालों
में कला देखने वाला
दर्शक भी उसी स्थान
पर श्रद्धालु बन जाता है।
संस्कृति यहां किसी एक
रूप में स्थिर नहीं,
बल्कि निरंतर जीवंत रहने वाली परंपरा
के रूप में सामने
आती है। काशी की
पहचान सदियों से इसी सांस्कृतिक
निरंतरता से बनी है।
पुरानी गलियां आधुनिक रोशनी से जगमगाती हैं,
पारंपरिक प्रतिमाएं नई कलात्मक कल्पनाओं
से सजती हैं और
धार्मिक अनुष्ठानों के साथ समकालीन
विषय भी जगह पाते
हैं। बदलाव के बीच परंपरा
का बने रहना और
परंपरा के भीतर नए
प्रयोगों का स्वागत करना—यही इस उत्सव
का व्यापक संदेश है।
अष्टमी की आस्था से नवमी की प्रतीक्षा तक
नवरात्र का प्रत्येक दिन
अपने साथ अलग धार्मिक
भाव लेकर आता है।
अष्टमी पर मां महागौरी
की आराधना, दुर्गा सप्तशती का पाठ, हवन
और अनेक घरों में
कन्या पूजन की परंपरा
श्रद्धालुओं के लिए विशेष
महत्व रखती है। देवी
को शक्ति, पवित्रता और करुणा के
स्वरूप में स्मरण करते
हुए लोग परिवार की
सुख-शांति और समाज के
कल्याण की कामना करते
हैं। पंडालों में उमड़ती भीड़
और मंदिरों में पूजा-अर्चना
के बीच नवमी के
अनुष्ठानों की प्रतीक्षा भी
बढ़ती है। देवी के
दर्शन का उत्साह धीरे-धीरे पर्व के
अगले पड़ाव की ओर बढ़ता
है। हर दिन के
साथ श्रद्धा का यह संसार
नए रंग ग्रहण करता
है, लेकिन मां के प्रति
समर्पण का भाव बना
रहता है। दशमी पर
प्रतिमा विसर्जन के साथ दुर्गोत्सव
का एक अध्याय पूरा
होगा। गंगा के तट
पर पहुंचने वाली प्रतिमाएं, विदाई
के गीत, नम आंखें
और मां को अगले
वर्ष फिर आने का
निमंत्रण—यह सब काशी
की दुर्गापूजा को भावनाओं की
ऐसी गहराई देता है, जिसमें
उत्सव और विरह साथ-साथ चलते हैं।
विसर्जन केवल एक धार्मिक
प्रक्रिया नहीं, बल्कि उस आत्मीय संबंध
की अभिव्यक्ति है, जिसे श्रद्धालु
पूरे नवरात्र मां के साथ
महसूस करते हैं। काशी
में मां आती हैं,
घर-घर और गली-गली विराजती हैं,
भक्तों के बीच उत्सव
बनकर रहती हैं और
फिर विदा होती हैं।
लेकिन उनकी विदाई के
बाद भी गलियों में
गूंजती ढाक, पंडालों की
स्मृतियां और दर्शन के
वे क्षण लंबे समय
तक मन में बसे
रहते हैं।
इसीलिए काशी की दुर्गापूजा सिर्फ देखी नहीं, महसूस की जाती है
इस समय काशी
को देखने का अर्थ केवल
रोशनी से सजे पंडालों
की सैर करना नहीं
है। यह उस शहर
को महसूस करना है, जहां
धर्म और संस्कृति रोजमर्रा
के जीवन से अलग
नहीं हैं। यहां आस्था
किसी बंद परिसर में
कैद नहीं रहती। वह
सड़क पर उतरती है,
गलियों में चलती है,
संगीत में गूंजती है,
कलाकार के हाथों आकार
लेती है और श्रद्धालु
की आंखों में चमक उठती
है। कहीं मां दुर्गा
की त्रिभंग मुद्रा में शास्त्रीय कला
का वैभव है, कहीं
धूप-दीप और मंत्रोच्चार
में सदियों पुरानी साधना, कहीं विश्वनाथ धाम
में शिव-शक्ति की
आराधना तो कहीं पंडाल
के बाहर दर्शन की
प्रतीक्षा में खड़ा जनसमूह।
इन सभी दृश्यों को
जोड़ने वाला सूत्र है—श्रद्धा। बनारसी
मिजाज में कहें तो
इन दिनों काशी में मां
का दरबार सिर्फ पंडालों के भीतर नहीं
सजा है; पूरा शहर
ही दरबार बना हुआ है।
जिस ओर नजर उठती
है, उत्सव का कोई नया
रंग दिखाई देता है। जिस
रास्ते से गुजरिए, मां
के दर्शन की कोई न
कोई राह निकल आती
है। ढाक की थाप,
शंख की गूंज, आरती
की लौ और भक्तों
का यह रेला मिलकर
ऐसा दृश्य रच रहे हैं,
जिसमें काशी की आत्मा
अपने पूरे सांस्कृतिक वैभव
के साथ सामने आ
खड़ी होती है। यही
काशी है—जहां भक्ति
केवल मन में नहीं
रहती, सड़कों पर दिखाई देती
है; जहां देवी की
प्रतिमा केवल कला का
रूप नहीं, करोड़ों भावनाओं का केंद्र बन
जाती है; और जहां
दुर्गापूजा के दिनों में
पूरा शहर मानो एक
स्वर में कह उठता
है—जय माता दी!
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