अयोध्या में भगवा ध्वज : आस्था का उत्कर्ष व राष्ट्रचेतना का उदय
सुरेश गांधी
अयोध्या की सुबह मंगलवार
को ठीक वैसी ही
थी, जैसा किसी पुराण
की पंक्ति में वर्णित होता
है, आकाश में लहराती
अरुणिमा, सरयू किनारे उठती
हल्की धुंध, दूर से आती
शंखध्वनि और बीच में
जनमन का अद्भुत उछाह।
ऐसा लगता था जैसे
समय स्वयं ठहर गया हो,
जैसे पांच सौ वर्षों
के संघर्ष, आक्रोश, पीड़ा और प्रतीक्षा
का महाकाव्य अचानक अपनी अंतिम पंक्ति
पर पहुंच गया हो। और
उस अंतिम पंक्ति ने जब इतिहास
के पन्नों को बंद किया,
तो एक नई कहानी
की शुरुआत हो चुकी थी,
एक भव्य, सांस्कृतिक, आत्मगौरव और राष्ट्रीय पुनर्जागरण
की कहानी। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के शिखर पर
भगवा धर्मध्वज का आरोहण केवल
एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था। वह
एक ऐसी ऐतिहासिक घोषणा
थी, जिसने भारत की सांस्कृतिक
आत्मा को पुनः उसके
सिंहासन पर स्थापित कर
दिया। और इस ध्वजारोहण
का क्षण जब प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी, आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत और
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की
उपस्थिति में अभिजीत मुहूर्त
में संपन्न हुआ, तो अयोध्या
ही नहीं, पूरा भारत भावनाओं
के महाप्लावन से भर उठा।
यह क्षण एक मंदिर
के शिखर पर ध्वज
फहराने का क्षण भर
नहीं था, यह भारतीय
सभ्यता के पुनर्जागरण का
घोषणा - पत्र था।
राम मंदिर के
शिखर पर फहराता 10×20 फीट
का समकोण भगवा ध्वज केवल
कपड़े का टुकड़ा नहीं,
वह उस संघर्ष का
प्रतीक है जो 500 वर्षों
तक मंद-मंद प्रज्ज्वलित
आग की तरह जलता
रहा। ध्वज पर अंकित
दीप्तिमान सूर्य श्रीराम की तेजस्विता का
प्रतीक है, कोविदार वृक्ष
सूर्यवंश की अमिट विरासत
का, और ॐ भारतीय
चेतना की अनश्वरता का
संदेश देता है। यह
धर्मध्वज बताता है, “सत्य अमर
है, धर्म अमर है,
और जो मानवता के
हित में खड़ा है,
वह कभी पराजित नहीं
होता।” प्रधानमंत्री मोदी ने ध्वजारोहण
के बाद कहा, “आने
वाली सहस्र शताब्दियों तक यह धर्मध्वज
प्रभु राम के आदर्शों
का उद्घोष करता रहेगा।” यह
उद्घोष केवल अयोध्या का
नहीं, यह पूरे भारतीय
उपमहाद्वीप, पूरे वैश्विक रामभक्त
समुदाय का उद्घोष है।
यह उद्घोष उन करोड़ों भारतवासियों
का उद्घोष है जिन्होंने सदियों
तक अपने तन-बुद्धि-धन से इस
संघर्ष को जीवित रखा।
अयोध्या कभी धार्मिक आस्था
का केंद्र रही, कभी राजनीतिक-सामाजिक संघर्ष का, कभी सियासत
का मंच और कभी
कानून की कसौटी। लेकिन
आज, 2025 की यह अयोध्या
कुछ और ही है,
यह आस्था का वैश्विक केंद्र
बन चुकी है। यह
संघर्ष की भूमि नहींकृ,
उत्सवों की वैश्विक राजधानी
बन चुकी है। योगी
आदित्यनाथ ने बिल्कुल ठीक
कहा, “अयोध्या संघर्ष से निकलकर एक
नए दौर में प्रवेश
कर चुकी है।” अयोध्या
में आज, महर्षि वाल्मीकि
अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट, आधुनिक रामपथ, चौदहकोसीदृ- पंचकोसी परिक्रमा मार्ग, स्मार्ट सुविधाएं, सोलर सिटी का
दर्जा, - सब कुछ इस
बात का संकेत है
कि यहां आस्था और
आधुनिकता हाथ में हाथ
डालकर चल रही हैं।
यह वही अयोध्या है,
जो कभी विवादों में
उलझी रहती थी; यह
वही अयोध्या है, जिसे कभी
राजनीतिक खांचों में बांटने की
कोशिश की गई थी;
और यह वही अयोध्या
है, जहां आज दुनिया
के हर कोने से
रामभक्त उमड़ रहे हैं।
राम मंदिर का
विषय केवल धर्म और
आस्था का विषय नहीं
रहा, यह भारतीय राजनीति
की सबसे जटिल और
निर्णायक धुरी रहा है।
आज जब ध्वज शिखर
पर लहरा रहा है,
तब कहा जा सकता
है, भाजपा की ऐतिहासिक वादाबद्धता
की पूर्णता हो गयी है.
1992 से लेकर 2014, और 2014 से 2025 तक, भाजपा और
उसके वैचारिक संगठनों की राजनीति के
केंद्र में राम मंदिर
रहा। आज यह ध्वज
उस यात्रा के पूर्णता का
प्रतीक है। जबकि कांग्रेस
और विपक्ष मंदिर मुद्दे पर वर्षों तक
दुविधा में रहा। आज
जब मंदिर खड़ा है, तो
विपक्ष अपनी भूमिका के
पुनर्मूल्यांकन में जुटा है।
कांग्रेस एक बार फिर
“नरम हिंदुत्व” और “सबका धर्म-सम्मान” की राह तलाश
रही है। क्षेत्रीय दलों
के लिए नई चुनौती
बन गयी है. उत्तर
प्रदेश की राजनीति में
सपा, बसपा और अन्य
दल अब यह समझ
चुके हैं कि अयोध्या
की धारा बदल चुकी
है। मंदिर मुद्दा अब ‘सरकार बनवाने’
या ‘गिराने’ का विषय नहीं,
यह जनमानस का स्थायी भाव
बन चुका है। जो
भी दल “राम और
राष्ट्र” की धारा को
समझेगा, वही भविष्य की
राजनीति में स्थान पाएगा।
साथ ही इस धर्मध्वजा
के साथ 2027, 2029 और 2034 के चुनावों की
बुनियाद भी पड़ गयी
है. मतलब साफ है
अयोध्या का यह क्षण
आने वाले चुनावों में
निर्णायक भूमिका निभाएगा। मंदिर केवल धार्मिक भावनाओं
से नहीं, विकास, विरासत, आत्मगौरव और सांस्कृतिक पुनर्जागरण
से भी जुड़ गया
है।
यह ध्वजारोहण केवल
एक अनुष्ठान नहीं, यह करोड़ों भारतीयों
की मानस यात्रा का
अंत और आरंभ दोनों
है। सदियों के घाव आज
भर रहे हैं. मंदिर
विवाद ने करोड़ों लोगों
की चेतना को हर दौर
में झकझोरा है। आज वे
घाव भरने लगे हैं।
यह मनोवैज्ञानिक उपचार है, एक ऐसी
याद जो अब दर्द
नहीं, गौरव बन गई
है। जहां तक सांस्कृतिक
आत्मसम्मान का पुनर्जीवन का
सवाल है तो, लंबे
समय तक भारत की
परंपराओं को “पिछड़ा” और
“अंधविश्वास” कहा गया। आज
वही परंपराएं विश्व मंच पर सम्मान
पा रही हैं। राम
मंदिर इसका प्रतीक है।
या यूं कहे राम
मंदिर की पूर्णता के
साथ नए भारत के
मानस का गठन हो
रहा है. आज का
युवा भारत विज्ञान और
तकनीक के साथ अपनी
जड़ों को भी उतने
ही गर्व से स्वीकार
कर रहा है। अयोध्या
उसके लिए आधुनिकता और
परंपरा दोनों का संगम बन
रही है। जो एक
बार फिर उसके विरासत
यानी भारत का सांस्कृतिक
मानचित्र फिर से रेखांकित
हो रहा है. राम
मंदिर का निर्माण केवल
एक वास्तु परियोजना नहीं, यह भारतीय सभ्यता
का पुनर्लेखन है। पर्यटन और
आर्थिकी का नया केंद्र
बन गया है. अयोध्या
हर दिन लाखों लोगों
का स्वागत कर रही है।
यह भारत की अर्थव्यवस्था
में एक नए अध्याय
की शुरुआत है। होटल, परिवहन,
हस्तशिल्प, रोजगार, हर चीज़ में
अप्रत्याशित वृद्धि हो रही है।
साथ ही विश्व में
भारत की सांस्कृतिक उपस्थिति
भी दर्ज हो गयी
है.
मतलब साफ है
राम केवल भारत के
देवता नहीं, एशिया के बड़े हिस्से
में सांस्कृतिक आदर्श हैं। अयोध्या का
भव्य मंदिर उन देशों के
साथ भारत के आध्यात्मिक
संबंधों को और गहरा
करेगा। अयोध्या भारतीय वास्तु और कला का
महाग्रंथ बन गया है.
नागर शैली में बना
यह मंदिर हिंदू स्थापत्य का सर्वोत्तम उदाहरण
बन चुका है। यह
आने वाले सैकड़ों वर्षों
तक वास्तुशास्त्र का अध्ययन केंद्र
रहेगा। आने वाली पीढ़ियों
पर इस का गहरा
प्रभाव रहेगा, ’रामराज्य’ का आधुनिक संस्करण
यानी रामराज्य का अर्थ आज
के समय में राजनीतिक
और सामाजिक दोनों संदर्भों में बदला है।
अब इसका अर्थ, पारदर्शी
शासन, न्याय, समान अवसर, गरीबों
तक योजनाओं की वास्तविक पहुंच,
धर्म और अध्यात्म के
प्रति सम्मान, सबको समाहित करता
है। नई पीढ़ी के
लिए सांस्कृतिक दिशा - सूचक बन गया
है अयोध्या. राम मंदिर बच्चों
और युवाओं को यह सिखाएगा
कि, धर्म का अर्थ
कट्टरता नहीं, बल्कि कर्तव्य, मर्यादा और सत्य है।
परंपरा के साथ तकनीक
का युग आरंभ है
अयोध्या. अयोध्या का विकास दिखाता
है कि परंपरा और
तकनीक एक ही मंच
पर खड़े हो सकते
हैं। डिजिटल इंडिया और सांस्कृतिक विरासत
का यह संगम आने
वाले युग की पहचान
बनेगा। मंदिर आने वाली पीढ़ियों
को यह याद दिलाता
रहेगा “जो राष्ट्र अपनी
जड़ों को नहीं भूलता,
वही महान बनता है।”
पीएम मोदी का ‘धर्मध्वज-तत्वज्ञान’ : नीतियों का आध्यात्मिक मॉडल
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने
ऐतिहासिक भाषण में धर्मध्वज
के सात तत्वों का
वर्णन किया, रथ के पहिए
: शौर्य और धैर्य, ध्वजा
: सत्य और सर्वोच्च आचरण,
घोड़े : बल, विवेक, संयम
और परोपकार, लगाम : क्षमा, करुणा और समभाव, यह
केवल आध्यात्मिक दर्शन नहीं, यह आज के
शासन तंत्र, नीति-निर्माण और
समाज-निर्माण का सांस्कृतिक मॉडल
है।
मोदी-योगी-भागवत : तीन ध्रुवों का संगम
इस ऐतिहासिक क्षण
का सबसे बड़ा राजनीतिक-सामाजिक संदेश यह है कि
मोदी राष्ट्रीय नेतृत्व के प्रतीक, योगी
धार्मिक-प्रशासनिक दृढ़ता के प्रतीक, मोहन
भागवत सांस्कृतिक और वैचारिक मार्गदर्शन
के प्रतीक, तीनों एक मंच पर
खड़े दिखाई दिए। यह त्रिकोणीय
संगम आने वाले वर्षों
में भारतीय राजनीति, समाज और संस्कृति
की दिशा तय करेगा।
धर्मध्वज का आरोहण भारत की आत्मा का आरोहण है
मेरा मानना है,
राम मंदिर का धर्मध्वज केवल
अयोध्या का ध्वज नहीं,
यह भारत के पुनर्जागरण,
पुनर्परिभाषा और पुनर्स्थापन का
ध्वज है। यह वह
क्षण है जब, अतीत
के संघर्ष मिट गए, वर्तमान
का उत्सव खिल उठा, और
भविष्य की दिशा निर्धारित
हो गई। अयोध्या में
फहराया यह केसरिया धर्मध्वज
आने वाली सदियों तक
यह बताता रहेगा कि “धर्म की
ज्योति कभी बुझती नहीं,
सत्य कभी पराजित नहीं
होता, और रामराज्य का
सपना केवल अतीत नहीं,
भारत का भविष्य भी
है।” पीएम मोदी, मोहन
भागवत और सीएम योगी
की उपस्थिति में शिखर पर
लहराया केसरिया ध्वज; 140 करोड़ भारतीयों की
आस्था, सम्मान और आत्मगौरव का
प्रतीक बन गया है.
25 नवंबर इतिहास के ऐसे क्षण
की साक्षी बनी, जिसका इंतजार
500 वर्षों से था। श्रीराम
जन्मभूमि मंदिर के शिखर पर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभिजीत
मुहूर्त में धर्मध्वज फहराया।
वैदिक मंत्रोच्चार, शंखनाद और जयघोष के
बीच जैसे ही केसरिया
ध्वज शिखर पर पहुंचा,
पूरा परिसर ‘जय श्रीराम’ के
उद्गारों से गूंज उठा।
उनके साथ आरएसएस सरसंघचालक
मोहन भागवत और मुख्यमंत्री योगी
आदित्यनाथ भी मौजूद रहे।
यह सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान
नहीं, बल्कि नए युग का
शुभारंभ बताया गया, एक ऐसा
युग जिसमें भारत की सांस्कृतिक
चेतना, अस्मिता, विकास और विरासत एक
साथ खड़े दिखाई दे
रहे हैं। ध्वजारोहण के
बाद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा
कि राम मंदिर पर
फहराता यह भगवा ध्वज
धर्म, मर्यादा, सत्य-न्याय और
राष्ट्रधर्म का प्रतीक है।
यह उद्घोष है कि धर्म
का प्रकाश अमर है और
रामराज्य के मूल्य कालजयी
हैं। उन्होंने कहा, “करोड़ों भारतीयों के मन में
जो विश्वास जागा था, आज
वही विश्वास इस भव्य राम
मंदिर के रूप में
हमारे सामने खड़ा है। यह
धर्मध्वज सदियों के सपनों की
सिद्धि है।” गुलामी की
मानसिकता से मुक्ति पर
जोर. मोदी ने कहा
कि भारत की सांस्कृतिक
चेतना को लंबे समय
तक दबाया गया, पर आज
‘भारत के कण-कण
में राम’ का संकल्प
फिर जीवंत खड़ा है। उन्होंने
कहा, “भारत को गुलामी
की मानसिकता से मुक्त करना
ही होगा। आने वाली सदियों
तक यह धर्मध्वज प्रभु
राम के आदर्शों और
सिद्धांतों का उद्घोष करेगा।”






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