आक्रांताओं के नामों की विरासत : क्या हम इतिहास ढो रहे हैं या आत्मग्लानि?
सुरेश गांधी
कड़वा सच यह
है कि किसी भी
सभ्य राष्ट्र की आत्मा उसके
प्रतीकों से पहचानी जाती
है, और जब उसके
प्रतीकों पर आक्रमणकारियों की
छाया रहती है, तो
समाज अनजाने ही मानसिक दासता
में जीने लगता है।
इसीलिए आज भारत का
यह सवाल बिल्कुल स्वाभाविक
है कि जब बाबर
जैसा हमलावर केवल तलवार और
लूट की मंशा से
आया था, तो उसके
नाम पर मस्जिदें, मोहल्ले,
सड़कें और शहर क्यों
रहने चाहिए? यह प्रश्न राजनीति
का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मसम्मान का है। नाम
केवल शब्द नहीं होते;
वे स्मृति होते हैं, पहचान
होते हैं, और आने
वाली पीढ़ियों को यह बताते
हैं कि हमें किस
पर गर्व करना है
और किन गलतियों से
सीखना है। और यही
कारण है कि भारत
आज अपने नाम, अपनी
पहचान और अपनी ऐतिहासिक
चेतना को पुनः प्राप्त
करने की यात्रा पर
है, जहां उद्देश्य इतिहास
मिटाना नहीं, बल्कि आत्मग्लानि के बोझ से
मुक्त होकर अपनी सभ्यता
को उसका वास्तविक स्वरूप
लौटाना है।
वैसे भी किसी
समाज के लिए नाम
केवल ध्वनि या भाषा का
हिस्सा नहीं होते, वे
उसके इतिहास, चेतना और आत्मा का
प्रतीक होते हैं। नाम
ही तय करते हैं
कि आने वाली पीढ़ियां
किसे याद रखेंगी, वीर
को या विजेता को?
रक्षक को या आक्रमणकारी
को? जब किसी नगर
का नाम बाबर, औरंगज़ेब,
तुगलक, खिलजी या लुटेरे सेनापतियों
पर रखा जाता है
तो वह नाम इतिहास
नहीं बचाता; वह हमारी हार
की संहिता बन जाता है।
वह हमें बताता रहता
है कि एक समय
था जब हमारी सभ्यता
टूट रही थी, परंपराएँ
जल रही थीं और
मंदिरों के ध्वज जबरन
नीचे किए जा रहे
थे। इसीलिए भारतीय मन का प्रश्न
बिल्कुल स्वाभाविक है, हम अपने
ही आक्रांताओं के नाम क्यों
ढोएं?
बाबर : हमलावर, न वंशज न रक्षक
इतिहास के पन्नों को
थोड़ा उलटें। बाबर एक क्षणिक
आक्रांता था। मध्य एशिया
की पहाड़ियों से आया था।
उसे भारत की मिट्टी
से कोई आत्मीयता नहीं
थी। उसने भारत को
न अपना घर माना,
न अपनी संस्कृति। उसका
शासन काल केवल चार
वर्ष चला। परंतु इसी
अल्पकाल में उसने जो
किया, उसकी छाया सदियों
तक रही, मंदिरों के
ध्वंस, कर संरचना में
भेदभाव, स्थानीय परंपराओं का दमन, और
सत्ता को बल-प्रदर्शन
से स्थापित करने की नीति,
क्या ऐसे व्यक्ति का
नाम किसी धार्मिक स्थल,
मस्जिद पर होना तर्कसंगत
है? मस्जिद तो अल्लाह का
घर है, ईश्वर का
घर। परंतु जब उसका नाम
किसी हमलावर से जोड़ दिया
जाएं, तो वह श्रद्धा
नहीं, राजनीतिक प्रभुत्व की याद बन
जाता है।
बाबर या उसके सेनापति मीरबाकी ने जब मंदिर गिराकर मस्जिद बनाई, तो उनका उद्देश्य धार्मिक पूजन नहीं था; वह था सत्ता का संदेश देना, “देखो, इस क्षेत्र का देवता अब हमारा आदेश मानेगा।” मंदिर तोड़ना केवल वास्तुकला तोड़ना नहीं था।
भारत की संस्कृति में मंदिर, शिक्षा का केंद्र, कला का केंद्र, न्याय का केंद्र, और सामाजिक जीवन का आधार थे।
उन्हें तोड़ना भारतीय समाज की जड़ों
पर प्रहार था। तो क्या
हम उन स्मारकों को
आज भी “धार्मिक विरासत”
कहें? यह इतिहास की
गलत व्याख्या है।
नाम बदलने का विरोध, क्यावाकई इतिहास बचाना है?
जब नाम बदलने
की चर्चा होती है, कई
लोग कहते हैं, “इतिहास
मत मिटाओ।” परंतु सत्य यह है
कि नाम नहीं बदलने
का आग्रह इतिहास बचाने का नहीं, बल्कि
विजेताओं द्वारा छोड़ी गई मानसिक
कैद को ढोने का
आग्रह है। इतिहास किताबों
में रहेगा, शोधपत्रों में रहेगा, विश्वविद्यालयों
की लाइब्रेरी में रहेगा। क्या
कोई राष्ट्र अपने आक्रांताओं का
गुणगान करता है? दुनिया
में कोई उदाहरण नहीं।
दुनिया के उदाहरण, कहीं
भी आक्रांताओं की महिमा नहीं
की जाती. फ्रांस ने नेपोलियन के
क्रूर सेनापतियों के नाम मिटाए।
अमेरिका में दासता समर्थक
नायकों की मूर्तियां हटाई
गईं। यूरोप ने हिटलर काल
से जुड़े हर नाम,
हर निशान को समाप्त किया।
रूस में स्टालिन की
दमनकारी स्मृतियों को बदल दिया
गया। जापान में किसी विदेशी
आक्रांता का एक भी
नाम सार्वजनिक संरचना पर नहीं मिलता।
तो फिर भारत ही
क्यों अपने हत्यारों, लुटेरों
और विध्वंसकों के नाम ढोए.
यह प्रश्न जितना सांस्कृतिक है, उतना ही
मानसिक मुक्ति का प्रश्न भी
है।
आत्मग्लानि, वह एहसास जो नामों में छिपा जख्म बन गया
जब कोई हिन्दू, कोई भारतीय, अपनी गली या अपने शहर का नाम किसी आक्रमणकारी के नाम पर सुनता है, तो मन अनायास ही सिकुड़ जाता है। यह पीड़ा केवल धर्म की नहीं, यह राष्ट्रीय अस्मिता की है।
यह
केवल यह नहीं कहती
कि बाबर आया था,
यह कहती है, भारत
कभी पराजित हुआ था। यह
स्मरण शिक्षा नहीं है। यह
स्मरण मानसिक गुलामी है।
भारतीय पुनर्जागरण, नामों की वापसी आत्मसम्मान की वापसी है
आखिर नाम क्यों महत्वपूर्ण है?
नाम सामूहिक स्मृति
की धारा है। नाम
ही तय करते हैं,
बच्चे कौन-सा इतिहास
सीखेंगे, समाज किसे आदर्श
मानेगा, राष्ट्र किस पर गर्व
करेगा, और किन स्मृतियों
को हृदय में बोझ
की तरह ढोएगा। क्या
हम अपनी विरासत वीरों
की बनाना चाहते हैं या दमनकारियों
की? यह प्रश्न आज
हर भारतीय के सामने है।
क्या मस्जिद का नाम बदलना धर्म- विरोध है? नहीं, यह न्याय है
मस्जिद सम्माननीय धार्मिक स्थल हैं। उनका
सम्मान हर भारतीय का
कर्तव्य है। लेकिन मस्जिद
का नाम किसी आक्रांता
के नाम पर हो,
यह सम्मान नहीं, यह ऐतिहासिक भूल
है। मस्जिद अल्लाह की है, किसी
बाबर की नहीं। मस्जिद
नमाज़ का स्थल है,
सत्ता-प्रदर्शन का प्रतीक नहीं।
इसलिए नाम बदलना धर्म-विरोध नहीं; यह धर्म को
राजनीति के दाग से
मुक्त करना है।
हमें किस दिशा में बढ़ना चाहिए?
1. ऐतिहासिक पुनर्मूल्यांकन
: देश में सभी महत्वपूर्ण
स्थलों का निष्पक्ष इतिहास
सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत
हो। स्मारकों और धार्मिक स्थलों
का जीनियोलॉजी रिकॉर्ड बनाया जाए।
2. सांस्कृतिक पहचान
की
बहाली
: जहाँ मंदिरों को तोड़कर इमारतें
बनी, वहाँ सत्य के
आधार पर समाधान होना
चाहिए। यह न्याय का
मार्ग है, प्रतिशोध का
नहीं।
3. आक्रांताओं के
नाम
हटाना
: सड़कें, मोहल्ले, नगर, इन पर
विदेशी आक्रांताओं के नाम होना
इतिहास नहीं, हमारी कमजोरी है। उन्हें भारत
की मिट्टी की सुगंध वाले
नाम दिए जाएँ।
4. जनता की
भागीदारी
: नाम-बदलाव सरकार नहीं, समाज की इच्छा
का परिणाम होना चाहिए। जनमत
सबसे बड़ा प्रमाण है।
विद्यालयों की नई पीढ़ी क्या सीखे?
क्या हम चाहते
हैं कि बच्चे यह
सीखें कि, इस नगर
का नाम उस आक्रांता
पर है जिसने यहां
का मंदिर तोड़ा? या फिर यह,
यह नगर हमारे पूर्वजों
की संस्कृति, परंपरा और देवी-देवताओं
के नाम पर है?
एक राष्ट्र वही बनता है
जो अपनी अगली पीढ़ी
के भीतर सम्मान की
भावना रोपता है, न कि
पराजय की स्मृतियाँ।
भारत को अपने नाम वापस चाहिए
किसी समाज की स्वतन्त्रता केवल राजनीतिक नहीं होती। उसका वास्तविक उत्कर्ष तब होता है जब वह, अपने प्रतीकों को, अपने नामों को, अपनी स्मृतियों को, और अपनी धरोहर को, वापस पा ले। बाबर, औरंगज़ेब, तुगलक, खिलजी, ये भारत की गौरवगाथा के नायक नहीं हैं। ये वे नाम हैं जिनसे भारत केवल पीड़ा याद करता है। तो फिर हम इन्हें ढोए क्यों? भारत अब उत्तर दे रहा है, हम अब अपनी सभ्यता की पहचान लौटाना चाहते हैं। यह लड़ाई किसी धर्म की नहीं, न किसी राजनीतिक दल की, यह लड़ाई आत्मा की स्वतंत्रता की लड़ाई है। जब भारत अपने इतिहास की परछाइयों को हटाएगा, तभी वह अपने भविष्य की प्रकाशरेखा गढ़ पाएगा। और यह शुरुआत नामों से होती है। जी हां, नामों से ही।







No comments:
Post a Comment