Sunday, 1 February 2026

थाली से तराजू तक, करघे से कारोबार तक, आम आदमी की उम्मीदों का बजट

थाली से तराजू तक, करघे से कारोबार तक, आम आदमी की उम्मीदों का बजट 

बजट 2026 - 27 सरकार की नीतिगत प्राथमिकताओं का ऐसा दस्तावेज़ है, जो राहत और अनुशासन के बीच संतुलन साधने का प्रयास करता है। महंगाई पूरी तरह नियंत्रित होने, वैश्विक अनिश्चितता और निर्यात पर दबाव के बीच यह बजट आम आदमी, मध्यम वर्ग, किसान, मज़दूर और उद्यमी, सभी को साथ लेकर चलने की कोशिश करता दिखता है। आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता, आवास और बुनियादी ढांचे पर जोर देकर आमजन को कुछ राहत देने का संदेश दिया गया है, लेकिन ईंधन कीमतों पर ठोस कदम उठने से महंगाई पर असर सीमित रहने की आशंका है। मध्यम वर्ग को आयकर प्रक्रिया में सरलता और आंशिक राहत मिली है, पर बढ़ती शिक्षा और स्वास्थ्य लागत के अनुपात में यह पर्याप्त नहीं लगती। किसानों के लिए फसल विविधीकरण और ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर है, लेकिन आय की स्थायी गारंटी का सवाल अब भी बना हुआ है। बुनकरों, मज़दूरों और एमएसएमई सेक्टर के लिए तकनीक, कर्ज और बाज़ार तक पहुंच की बातें की गई हैं, पर ज़मीनी क्रियान्वयन ही असली कसौटी होगा। शिक्षा, रक्षा और डिजिटल अर्थव्यवस्था में निवेश भविष्य की दिशा दिखाता है। यह बजट मिडिल क्लास को सीधी आयकर राहत नहीं देता, लेकिन टैक्स सिस्टम को डर के बजाय भरोसे पर खड़ा करने की कोशिश जरूर करता है। यह बजट स्वीकार करता है कि करदाता अपराधी नहीं, बल्कि साझेदार है। अब असली परीक्षा यह है कि यह नई सोच काग़ज़ से निकलकर ज़मीन पर उतरती है या नहीं। अगर टैक्सपेयर्स को नोटिस नहीं, समाधान मिलेगा, तो यही इस बजट की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी। मतलब साफ है यह बजट बड़े वादों के बजाय सावधानी और संतुलन का संकेत देता है, जिसकी सफलता का फैसला आने वाले महीनों में ज़मीनी असर से होगा 

सुरेश गांधी

फिरहाल, आम बजट 2026 - 27 ऐसे समय पेश हुआ है, जब देश महंगाई, वैश्विक अनिश्चितता और रोज़गार की चुनौती से जूझ रहा है। या यूं कहे महँगाई अभी पूरी तरह काबू में नहीं है, वैश्विक बाज़ार में अनिश्चितता का माहौल है, निर्यात पर दबाव है, रोज़गार की मांग बढ़ रही है. ऐसे में यह बजट सिर्फ़ नंबरों का खेल नहीं, बल्कि नीति, नीयत और नज़रिये की अग्निपरीक्षा है। सरकार ने इस बजट में आम आदमी, मध्यम वर्ग, किसान, मज़दूर, उद्यमी और निर्यातकों, सभी को साथ साधने की कोशिश की है। आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बनाए रखने, आवास और बुनियादी ढांचे पर खर्च बढ़ाने से आमजन को कुछ राहत का संकेत मिला है, हालांकि ईंधन कीमतों पर बड़े फैसले होने से महंगाई पर असर सीमित रह सकता है। मध्यम वर्ग को आयकर प्रक्रिया में सरलता और आंशिक राहत दी गई है, लेकिन बढ़ती शिक्षा - स्वास्थ्य लागत के अनुपात में यह नाकाफी मानी जा रही है। किसानों के लिए फसल विविधीकरण, ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर और खाद्य प्रसंस्करण पर जोर है, पर आय की स्थायी सुरक्षा पर सवाल बरकरार हैं। बुनकरों, एमएसएमई और निर्यातकों के लिए तकनीक, कर्ज और लॉजिस्टिक्स सुधार का भरोसा दिया गया है। शिक्षा, रक्षा और डिजिटल अर्थव्यवस्था में निवेश भविष्य की दिशा दिखाता है। कुल मिलाकर बजट बड़े लोकलुभावन वादों से बचते हुए संतुलन साधने का प्रयास है, जिसकी असली परीक्षा ज़मीन पर असर से होगी।

बता दें, आम बजट किसी सरकार का सबसे बड़ा राजनीतिक - आर्थिक बयान होता है। यह सिर्फ़ यह नहीं बताता कि सरकार पैसा कहां खर्च करेगी, बल्कि यह भी साफ़ करता है कि सरकार किस भारत को प्राथमिकता देती है, आम आदमी को, मध्यम वर्ग को, उद्योग को या वैश्विक बाज़ार को। हर बजट का असली इम्तिहान आम आदमी की रसोई में होता है। ष्ही वजह है कि सरकार ने आवश्यक वस्तुओं दाल, खाद्य तेल, गेहूँ, चावल की उपलब्धता बनाए रखने के लिए आयात नीति में लचीलापन, बफर स्टॉक, सप्लाई चेन सुधार जैसे कदम गिनाए हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि जब तक ईंधन की कीमत, परिवहन लागत, और बिजली दरें नियंत्रण में नहीं आतीं, तब तक महँगाई आम आदमी की जेब पर चोट करती रहेगी। ग्रामीण और शहरी आवास योजनाओं के बजट में बढ़ोतरी से उम्मीद है कि ईंट, सीमेंट, स्टील की माँग बढ़ेगी, रोज़गार बनेगा, गरीब और निम्न मध्यम वर्ग को छत मिलेगी.

अगर एक पंक्ति में समझा जाए तो यह कहा जा सकता है कि सरकार ने इस बार आयकर में सीधी राहत देने के बजाय टैक्सपेयर्स को भय और जटिलता से राहत देने का रास्ता चुना है। मिडिल क्लास को जहां आयकर स्लैब या स्टैंडर्ड डिडक्शन में बढ़ोतरी की उम्मीद थी, वहां वह उम्मीद पूरी नहीं हुई। लेकिन इसके बदले सरकार ने इनकम टैक्स कानून को अपराध की श्रेणी से बाहर निकालने की दिशा में बड़ा कदम जरूर उठा दिया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्पष्ट किया कि नया इनकम टैक्स एक्ट 2025, जो 1 अप्रैल 2026 से लागू होगा, टैक्स सिस्टम को दंडात्मक नहीं बल्कि सुविधाजनक और भरोसेमंद बनाने की कोशिश है। इस बजट का सबसे ज़्यादा इंतज़ार नौकरीपेशा मध्यम वर्ग कर रहा था। आयकर में बदलाव नई कर व्यवस्था को और आकर्षक बनाने की कोशिश की गई है. स्लैब सरल, रिटर्न प्रक्रिया आसान, स्टैंडर्ड डिडक्शन में सुधार, इससे करदाता को मानसिक राहत ज़रूर मिली है। लेकिनमहँगाई के अनुपात में कर राहत अभी भी सीमित है।

आयकर : जेल नहीं, जुर्माना

अब तक टैक्स कानून की सबसे बड़ी आलोचना यही रही है कि छोटी, छोटी तकनीकी गलतियों पर भी टैक्सपेयर्स को जुर्माना, नोटिस और जेल की धमकी झेलनी पड़ती थी। बजट में इसी डर को खत्म करने की कोशिश दिखाई देती है। अब अगर किसी टैक्सपेयर्स की आय में गड़बड़ी पाई जाती है या टैक्स छिपाया गया है, तो जेल नहीं होगी, बल्कि जुर्माना लगाकर मामला निपटाया जा सकेगा। यह बदलाव टैक्स कानून के डिक्रिमलाइजेशन की दिशा में ऐतिहासिक माना जा रहा है। खास बात यह है कि यह राहत उन मामलों में दी जा रही है, जहां गलती जानबूझकर नहीं, बल्कि नियमों की जटिलता, तकनीकी चूक या जानकारी की कमी के कारण हुई हो।

एनआरआई को बड़ी राहत : प्रॉपर्टी बेचना हुआ आसान

बजट में एनआरआई टैक्सपेयर्स के लिए भी बड़ी राहत दी गई है। अब भारत में प्रॉपर्टी बेचने पर एनआरआई को टिन नंबर लेने की जरूरत नहीं होगी। अब यह जिम्मेदारी भारतीय खरीदार की होगी कि वह पैन के जरिए टीडीएस काटकर जमा करे। इसके अलावा विदेश में रखी गई छोटी संपत्तियों को लेकर भी सरकार ने नरमी दिखाई है। अगर किसी टैक्सपेयर्स की विदेश में रखी गैर-अचल संपत्ति की कुल कीमत 20 लाख रुपये से कम है और उसका खुलासा नहीं हुआ है, तो तो जुर्माना लगेगा और ही अभियोजन। यह कदम उन लाखों लोगों को राहत देता है, जो विदेश में छोटी बचत या निवेश रखते हैं, लेकिन जटिल नियमों के कारण उन्हें घोषित नहीं कर पाते थे।

तकनीकी चूक अब अपराध नहीं

बजट में टैक्स सिस्टम को सरल बनाने के लिए कई तकनीकी बदलाव किए गए हैं ऑडिट में देरी, ट्रांसफर प्राइसिंग रिपोर्ट देना, दस्तावेजी चूक, अब इन पर दंड की जगह मामूली शुल्क लिया जाएगा। यह स्वीकारोक्ति है कि टैक्स सिस्टम अब तक आम करदाता के लिए जरूरत से ज्यादा कठिन रहा है।

मिडिल क्लास : उम्मीद टूटी, लेकिन कुछ राहत की किरणें

इस बजट से मिडिल क्लास को सबसे ज्यादा निराशा स्टैंडर्ड डिडक्शन को लेकर हुई। 75 हजार रुपये की सीमा को 1 लाख रुपये करने की उम्मीद पूरी नहीं हुई। हालांकि, कुछ अप्रत्यक्ष राहतें जरूर दी गई हैं, कैंसर और शुगर सहित 17 जरूरी दवाएं ड्यूटी फ्री, जूते चप्पल, स्मार्टफोन, बैटरी जैसे रोजमर्रा के सामान सस्ते, विदेश में पढ़ाई और इलाज पर टीसीएस ब्याज 5 फीसदी से घटाकर 2 फीसदी, यह राहत सीधी जेब में नहीं, लेकिन खर्च कम करने के जरिए महसूस होगी।

शेयर बाजार : टैक्स बढ़ा, भरोसा डगमगाया

इस बजट का सबसे नकारात्मक असर शेयर बाजार पर पड़ा। सिक्योरिटी ट्रांजैक्शन टैक्स (एसटीटी) को 0.10 फीसदी से बढ़ाकर 0.15 फीसदी करने के फैसले ने बाजार को झटका दिया और निवेशकों के करीब 8 लाख करोड़ रुपये डूब गए। यह सवाल उठता है कि क्या सरकार निवेशकों को लंबी अवधि के लिए प्रोत्साहित करना चाहती है या बाजार को सिर्फ राजस्व का जरिया मान रही है।

एमएसएमई, टेक्सटाइल और बुनकर : रणनीतिक फोकस

बजट में मैन्युफैक्चरिंग और टेक्सटाइल सेक्टर पर विशेष ध्यान दिया गया है। इएमएस सेक्टर के लिए 40,000 करोड़, पीएलआई स्कीम का दायरा बढ़ा, खादी, हथकरघा और हस्तशिल्प के लिए महात्मा गांधी ग्राम स्वराज पहल. यह साफ संकेत है कि सरकार बांग्लादेश जैसी प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्थाओं को चुनौती देने की तैयारी में है।

बचत बनाम उपभोग

सरकार चाहती है कि लोग खर्च भी करें (अर्थव्यवस्था को गति मिले) और बचत भी करें (भविष्य सुरक्षित हो) इसी संतुलन में बीमा, पेंशन और दीर्घकालिक निवेश को बढ़ावा दिया गया है।

किसान : एमएमएमई से आगे आय की गारंटी का सवाल

भारत में बजट की आत्मा किसान होता है। खेती को लाभकारी बनाने का दावा, सरकार का ज़ोर, अब फसल विविधीकरण, प्राकृतिक खेती, खाद्य प्रसंस्करण पर है, ताकि किसान सिर्फ़ खेत में नहीं, बाज़ार में भी मज़बूत हो।

ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर

सड़क, बिजली, सिंचाई और गोदाम, इन पर निवेश से गाँव की अर्थव्यवस्था को गति देने की कोशिश है। लेकिन किसान संगठनों का कहना है किनीतियाँ काग़ज़ पर अच्छी हैं, ज़मीन पर असर दिखना बाकी है।

करघे की आवाज़ और बाज़ार की चुनौती

पूर्वांचल, काशी, भदोही, मिर्ज़ापुर, जहाँ करघा सिर्फ़ रोज़गार नहीं, संस्कृति है। कारपेट और हथकरघा सेक्टर बजट में डिजाइन डेवलपमेंट, टेक्नोलॉजी अपग्रेड, ईकॉमर्स सपोर्ट जैसे प्रावधान गिनाए गए हैं। लेकिन बुनकरों की असली चिंता है, कच्चे माल की कीमत, बिचौलियों का दबाव, स्थायी आमदनी है. मतलब साफ है यहाँ बजट की भाषा और ज़मीनी सच्चाई के बीच अभी भी दूरी है।

मज़दूर वर्ग : रोज़गार से सम्मान तक

असंगठित मज़दूर भारत की सबसे बड़ी श्रमशक्ति है। रोज़गार सृजन, इन्फ्रास्ट्रक्चर, हाउसिंग और मैन्युफैक्चरिंग पर निवेश से रोज़गार बढ़ने की उम्मीद है।

सामाजिक सुरक्षा

श्रम कार्ड, स्वास्थ्य बीमा और पेंशन योजनाएँ, नीति मौजूद है, अब पहुंच सबसे बड़ा सवाल है।

एमएसएमई और उद्यमी : रीढ़ को कितना सहारा?

छोटे और मध्यम उद्योग देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। कर्ज और क्रेडिट, सरकार ने सस्ते कर्ज, क्रेडिट गारंटी की बात कही है, जिससे छोटे उद्यमी को राहत मिल सकती है।

अनुपालन का बोझ

डिजिटल सिस्टम से नियम सरल करने का दावा है, लेकिन छोटे कारोबारी अभी भी जटिलताओं से जूझ रहे हैं।

निर्यातक : वैश्विक मंदी में भारतीय उम्मीद

कालीन, वस्त्र, हस्तशिल्प, इंजीनियरिंग, हर सेक्टर दबाव में है. कारपेट और टेक्सटाइल ईयूएफटीए जैसे समझौते उम्मीद जगाते हैं, लेकिन अमेरिकी बाज़ार की सुस्ती, यूरोपीय अनिश्चितता, निर्यातकों की चिंता बढ़ा रही है।

लॉजिस्टिक्स सुधार

बंदरगाह, रेल और एयर, कार्गो पर निवेश से निर्यात लागत घटने की संभावना है।

शिक्षा : डिग्री नहीं, स्किल का भारत

डिजिटल और स्किल एजुकेशन, एआई, एड - टेक, स्किल यूनिवर्सिटी, भविष्य की ज़रूरतों पर फोकस है। लेकिन सवाल यह है क्या यह सुधार सरकारी स्कूलों और ग्रामीण भारत तक पहुँचेगा?

रक्षा : आत्मनिर्भरता का बजट

रक्षा बजट में बढ़ोतरी से साफ़ है कि सीमा सुरक्षा, स्वदेशी हथियार, टेक्नोलॉजी सरकार की प्राथमिकता में हैं।

उपभोक्ता : सुविधा, सुरक्षा और भरोसा

डिजिटल भुगतान, उपभोक्ता संरक्षण और साइबर सुरक्षा, आम उपभोक्ता को भरोसा देने की कोशिश बजट में दिखती है।

संतुलन का प्रयास, परिणाम पर नज़र

बजट तो पूरी तरह लोकलुभावन है, पूरी तरह कॉरपोरेटमुखी। यह एक संतुलन साधने की कोशिश है। लेकिन भारत में बजट की सफलता का पैमाना एक ही है, घोषणाएं नहीं, ज़मीनी असर। आम आदमी की थाली, किसान की फसल, बुनकर का करघा, मज़दूर की मज़दूरी और उद्यमी की उम्मीद, अगर इन सबमें हलचल दिखी, तो यही बजट की असली जीत होगी।

हाई-स्पीड रेल से हरित उद्योग तक, यूपी को विकास की नई रफ्तार

बजट में यूपी को विकास की कई बड़ी सौगातें दीं। बजट में परिवहन, औद्योगिक विकास, पर्यटन और सतत विकास से जुड़ी घोषणाओं से प्रदेश की अर्थव्यवस्था को नई गति मिलने की उम्मीद है। केंद्रीय बजट में देश में 7 हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर के निर्माण की घोषणा की गई है, जिनमें दिल्ली - वाराणसी और वाराणसी - सिलीगुड़ी कॉरिडोर उत्तर प्रदेश के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। इन परियोजनाओं से प्रदेश को तेज, आधुनिक और विश्वस्तरीय रेल कनेक्टिविटी मिलेगी, जिससे व्यापार, पर्यटन और रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे। पूर्वांचल को एक और बड़ी सौगात देते हुए बजट में वाराणसी और पटना में जहाज मरम्मत (शिप मेंटीनेंस) सुविधा स्थापित करने की घोषणा की गई है। इससे अंतर्देशीय जल परिवहन को मजबूती मिलेगी और स्थानीय उद्योगों रोजगार को बढ़ावा मिलेगा। हरित विकास की दिशा में अगले पांच वर्षों में ₹20 हजार करोड़ की लागत से पांच औद्योगिक क्षेत्रों में कार्बन कैप्चर परियोजनाएं प्रस्तावित की गई हैं, जिससे उत्तर प्रदेश में टिकाऊ औद्योगिक विकास को प्रोत्साहन मिलेगा। सांस्कृतिक पर्यटन के क्षेत्र में भी बजट में बड़ी घोषणा हुई है। सारनाथ सहित देश के 15 पुरातात्विक स्थलों को जीवंत सांस्कृतिक गंतव्य के रूप में विकसित किया जाएगा, जिससे धार्मिक और विरासत पर्यटन को नई ऊंचाई मिलेगी। बजट में पूंजीगत व्यय बढ़ाकर 12.20 लाख करोड़ रुपये किया गया है। कुल मिलाकर यह बजटविकसित भारतके साथविकसित उत्तर प्रदेशकी दिशा में मजबूत आधार तैयार करता है।

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