“निर्यात संवर्धन मिशन” बनेगा भारतीय कालीन उद्योग का टर्निंग प्वाइंट
सीईपीसी ने
कहा,
‘कारीगरों
तक
पहुँचेगा
विकास
का
असली
लाभ’
भदोही-मिर्जापुर
के
बुनकरों
में
नई
उम्मीद—सरकार
के
25,060 करोड़ के निर्यात संवर्धन
मिशन
को
सीईपीसी
ने
बताया
‘ऐतिहासिक
कदम’
सुरेश गांधी
वाराणसी. भारतीय हस्तनिर्मित कालीन उद्योग ने केंद्र सरकार
द्वारा बजट 2025-26 में घोषित “निर्यात
संवर्धन मिशन (ईपीएम)” का स्वागत करते
हुए इसे देश के
श्रम-प्रधान निर्यात क्षेत्रों के लिए ऐतिहासिक
पहल बताया है। कालीन निर्यात
संवर्धन परिषद (सीईपीसी) ने कहा है
कि इस मिशन से
भदोही, मिर्जापुर और आसपास के
बुनकरी केंद्रों में लगे लाखों
कारीगरों को प्रत्यक्ष रूप
से लाभ मिलेगा, साथ
ही भारत के पारंपरिक
कालीन उद्योग की वैश्विक प्रतिस्पर्धा
में निर्णायक बढ़त हासिल होगी।
सीईपीसी ने प्रधानमंत्री श्री
नरेंद्र मोदी, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय,
वित्त मंत्रालय तथा वस्त्र मंत्रालय
की दूरदर्शी नीतियों और निरंतर समर्थन
के लिए आभार व्यक्त
किया। सरकार का यह कदम
भारत के कला-आधारित
ग्रामीण उद्योगों को आत्मनिर्भर और
वैश्विक प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में
मील का पत्थर साबित
होगा। भदोही, मिर्जापुर और वाराणसी के
कारीगरों के लिए यह
केवल एक नीति नहीं,
बल्कि नई उम्मीद की
डोर है—जो भारत
की परंपरा, परिश्रम और प्रतिभा को
अंतरराष्ट्रीय मंच पर फिर
से चमकाने जा रही है।
निर्यात संवर्धन मिशन—हस्तनिर्मित कालीन उद्योग के लिए ‘नई सुबह’
सरकार द्वारा वित्त वर्ष 2025-26 से 2030-31 तक के लिए
25,060 करोड़ रुपये के परिव्यय के
साथ यह मिशन शुरू
किया गया है। इसका उद्देश्य
विशेष रूप से एमएसएमई,
पहली बार निर्यातकों और
श्रम-प्रधान क्षेत्रों के लिए भारत
के निर्यात पारिस्थितिकी तंत्र को और सशक्त
बनाना है। सीईपीसी के
अध्यक्ष श्री कुलदीप राज
वट्टल ने कहा यह
मिशन हमारे उद्योग के लिए एक
निर्णायक क्षण है। लंबे
समय से हमारे निर्यातकों
को खंडित समर्थन और ऊँची बाधाओं
का सामना करना पड़ता रहा
है। अब एकीकृत और
डिजिटल रूप से सक्षम
ढाँचे के साथ, भारत
के हस्तनिर्मित कालीन वैश्विक प्रतिस्पर्धा में नई पहचान
बनाएंगे।
दो स्तंभों पर टिका है मिशन—‘निर्यात प्रोत्साहन’ और ‘निर्यात दिशा’
ईपीएम के अंतर्गत दो
एकीकृत उप-योजनाएँ रखी
गई हैं— 1. निर्यात प्रोत्साहन: सस्ती व्यापार वित्त उपलब्ध कराने पर केंद्रित। 2. निर्यात
दिशा: गुणवत्ता सुधार, पैकेजिंग, ब्रांडिंग, व्यापार मेले में भागीदारी,
वेयरहाउसिंग और लॉजिस्टिक्स जैसी
गैर-वित्तीय सक्षमताएँ प्रदान करना। सीईपीसी ने कहा कि
ये दोनों योजनाएँ लंबे समय से
परिषद द्वारा सुझाए गए विकास रोडमैप
के अनुरूप हैं और कालीन
क्षेत्र की वास्तविक समस्याओं—सीमित व्यापार वित्त, उच्च अनुपालन लागत
और अंतरराष्ट्रीय बाजार पहुंच की कमी—का
समाधान करेंगी।
श्रम-प्रधान क्षेत्रों को मिली प्राथमिकता
भारत सरकार द्वारा
वस्त्र और श्रम-प्रधान
उद्योगों को प्राथमिकता क्षेत्र
के रूप में मान्यता
देना हस्तनिर्मित कालीन उद्योग के लिए राहत
और प्रोत्साहन दोनों का संकेत है।
यह उद्योग अत्यधिक श्रम-प्रधान है
और देशभर में करीब 20 लाख
बुनकरों और कारीगरों को
प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप
से रोजगार देता है। वट्टल
ने कहा यह कदम
न केवल निर्यातकों बल्कि
हमारे ग्रामीण कारीगरों के लिए भी
बड़ा संबल है। सरकार
की यह सोच ‘मेक
इन इंडिया’ को वास्तविक अर्थों
में ‘क्राफ्ट इन इंडिया’ में
बदल रही है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म से पारदर्शिता और त्वरित सहायता
ईपीएम का डिजिटल कार्यान्वयन
ढाँचा विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) के नेतृत्व में
तैयार किया गया है।
इससे कालीन निर्यातकों को नीतिगत प्रोत्साहनों,
वित्तीय सहायता और प्रशिक्षण सुविधाओं
तक त्वरित, पारदर्शी और एकीकृत पहुंच
मिलेगी। सीईपीसी ने उम्मीद जताई
है कि यह प्लेटफॉर्म
छोटे और मझोले निर्यातकों
को सशक्त बनाते हुए भारत के
कालीन उद्योग को वैश्विक स्तर
पर नई पहचान देगा।
कारीगरों तक पहुँचेगा विकास का लाभ
सीईपीसी ने कहा कि
परिषद सरकार और उद्योग जगत
के साथ मिलकर यह
सुनिश्चित करेगी कि मिशन के
लाभ भदोही, मिर्जापुर, वाराणसी और आसपास के
कालीन समूहों में लगे कारीगरों
तक निर्बाध रूप से पहुँचें।
हमारा लक्ष्य यह सुनिश्चित करना
है कि नीतिगत लाभ
केवल कागज़ पर नहीं, बल्कि
जमीनी स्तर पर उन
हाथों तक पहुँचे जो
असल में भारत की
हस्तकला का भविष्य बुनते
हैं।
प्रधानमंत्री से हुई मुलाकात का संदर्भ
श्री कुलदीप राज
वट्टल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी के साथ हाल
ही में हुई बैठक
का भी उल्लेख किया।
उन्होंने बताया कि बैठक के
दौरान सीईपीसी ने हस्तनिर्मित कालीन
उद्योग की चुनौतियाँ और
तत्काल राहत उपायों की
आवश्यकता रखी थी। उन्होंने कहा
हमारे उद्योग को वैश्विक बाज़ार
की चुनौतियों से निपटने के
लिए नीतिगत और वित्तीय सहायता
की दरकार है। यह मिशन
उसी दिशा में सरकार
के प्रतिबद्ध दृष्टिकोण का परिणाम है।
कालीन उद्योग को मिलेगी वैश्विक पहचान
सीईपीसी को विश्वास है
कि “निर्यात संवर्धन मिशन” भारत के हस्तनिर्मित
कालीन उद्योग को न केवल
निर्यात वृद्धि बल्कि वैश्विक ब्रांड पहचान दिलाने में अहम भूमिका
निभाएगा। यह पहल भारतीय कारीगरों
की सृजनात्मकता, गुणवत्ता और परंपरा को
विश्व बाज़ार में नई ऊँचाइयाँ
दिलाने का मार्ग प्रशस्त
करेगी।

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