कुत्ते हमारे जीवन के कालभैरव हैं, उनसे प्रेम करना आशीर्वाद कमाना है : सुदेशना
सीनियर चार्टर्ड अकाउंटेंट सुदेशना बसु का मानना है कि कुत्ते केवल पशु नहीं, बल्कि हमारे जीवन के कालभैरव हैं, मौन प्रहरी और संरक्षक। उनसे प्रेम करना, सम्मान देना और उन्हें जीने का अधिकार देना सभ्य समाज की पहचान है। कुछ घटनाओं के आधार पर सभी कुत्तों को खतरनाक ठहराना सामूहिक दंड जैसा है, ठीक वैसे ही जैसे मुट्ठी भर आतंकियों के कारण पूरे समाज को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। समस्या कुत्तों में नहीं, बल्कि व्यवस्था और असंवेदनशीलता में है। समाधान हिंसा या विस्थापन नहीं, बल्कि टीकाकरण, नसबंदी, नियमित भोजन और सामुदायिक देखभाल है। डॉग एडॉप्शन पीड़ा के पूरे चक्र को तोड़ता है और समाज को अधिक करुणामय बनाता है। सामाजिक सेवा में उनके योगदान के लिए आईसीएआई ने उन्हें सीए वोमेन इन सोशल सर्विसेज अवार्ड से सम्मानित किया है। यह सम्मान पेशेवर सफलता के साथ सामाजिक जिम्मेदारी निभाने की प्रेरणा देता है। प्रस्तुत है सीनियर रिर्पोटर सुरेश गांधी की वाराणसी ब्रांच ऑफ आईसीएआई (आईसीएआई) की पूर्व चेयरमैन एवं इंडो-अमेरिकन चैंबर ऑफ कॉमर्स की पूर्व चेयरमैन सुदेशना बसु की खास बातचीत के प्रमुख अंश :-
सुरेश गांधी
फिरहाल, वाराणसी की संकरी गलियों
से लेकर देश के
अन्य महानगरों की चौड़ी सड़कों
तक, एक सवाल आज
हर संवेदनशील नागरिक को भीतर तक
झकझोर रहा है। क्या
सड़क पर रहने वाले
कुत्ते हमारी समस्या हैं या हमारी
असंवेदनशील व्यवस्था का शिकार? क्या
कुछ घटनाओं के आधार पर
पूरे समुदाय को दोषी ठहराना
न्याय है? और क्या
सभ्य समाज की पहचान
यह नहीं कि वह
सबसे कमजोर प्राणी के साथ कैसा
व्यवहार करता है? इन्हीं
सवालों के केंद्र में
है सीए सुदेशना बसु,
जो न केवल एक
सफल सीनियर चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं, बल्कि सामाजिक
सरोकारों, विशेषकर डॉग केयर और
पशु अधिकारों को लेकर मुखर
और संवेदनशील आवाज़ भी हैं।
वे वाराणसी ब्रांच ऑफ आईसीएआई की
पूर्व चेयरमैन रह चुकी हैं
और इंडो-अमेरिकन चैंबर
ऑफ कॉमर्स की भी पूर्व
चेयरमैन रही हैं। हाल
ही में इंस्टीट्यूट ऑफ
चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया ( आईसीएआई)
ने उन्हें “थर्ड सीए वोमेन
एक्सीलेंस अवार्ड - सीए वोमेन इन
सोशल सर्विसेज अवार्ड” के लिए चयनित
किया है। यह सम्मान
1 फरवरी को इंडिया एक्सपो
सेंटर एंड मार्ट (डब्ल्यूओएफए
यानी वोफा), ग्रेटर नोएडा में प्रदान किया
जाएगा। इसी अवसर पर
वरिष्ठ रिपोर्टर सुरेश गांधी ने उनसे विशेष
बातचीत की, जो सिर्फ़
एक इंटरव्यू नहीं, बल्कि हमारे समय की नैतिक,
सामाजिक और संवैधानिक बहस
का दस्तावेज़ बन जाती है।
प्रश्न
: आप
अक्सर
कहती
हैं
कि
“कुत्ते
हमारे
जीवन
के
कालभैरव
हैं।”
यह
विचार
कैसे
बना?
सुदेशना
बसु
: देखिए, कालभैरव का अर्थ सिर्फ़
भय नहीं होता, कालभैरव
संरक्षक भी होते हैं।
जो बिना बोले चेतावनी
देते हैं, जो रात
भर जागकर पहरा देते हैं,
जो संकट आने से
पहले संकेत देते हैं। सड़कों
पर रहने वाले कुत्ते
यही भूमिका निभाते हैं। वे हमारी
गलियों, मोहल्लों, कॉलोनियों के मौन प्रहरी
हैं। उनसे प्रेम करना,
उन्हें सम्मान देना और उन्हें
जीने का अधिकार देना,
दरअसल अपने जीवन में
आशीर्वाद कमाना है।
प्रश्न
: हाल
के
वर्षों
में
कुत्तों
को
लेकर
समाज
में
डर
और
आक्रोश
बढ़ा
है।
आप
इसे
कैसे
देखती
हैं?
सुदेशना
बसु
: यह डर कुत्तों से
नहीं, घटनाओं के अतिरंजित प्रस्तुतिकरण
से पैदा हुआ है।
कुछ काटने की घटनाओं के
आधार पर पूरे समुदाय
को खतरनाक घोषित कर देना, यह
वही मानसिकता है, जो भीड़
को हिंसक बनाती है। मैं हमेशा
कहती हूँ, जिस प्रकार
आतंकवादी मुट्ठी भर लोग होते
हैं, लेकिन पूरा समाज आतंकवादी
नहीं होता, उसी तरह कुछ
कुत्तों के आक्रामक व्यवहार
से सभी कुत्तों को
दोषी ठहराना अन्याय है।
प्रश्न
: आपने
सुप्रीम
कोर्ट
के
दृष्टिकोण
पर
भी
सवाल
उठाए
हैं।
क्या
कहना
चाहेंगी?
सुदेशना बसु : मैं अदालत का सम्मान करती हूँ, लेकिन संवेदनशीलता पर संवाद ज़रूरी है। कुत्ते भी धरती के प्राणी हैं। उन्हें भी स्वच्छंद रूप से घूमने और जीने का अधिकार है। यदि किसी क्षेत्र में समस्या है तो समाधान हिंसा या विस्थापन नहीं, बल्कि नसबंदी, टीकाकरण
और सामुदायिक देखभाल है।प्रश्न
: तो
समस्या
कुत्ते
नहीं,
व्यवस्था
है?
सुदेशना
बसु
: बिल्कुल। जब हम कचरा
प्रबंधन नहीं करते, जब
हम उन्हें भूखा रखते हैं,
जब हम डर और
पत्थर से उनका स्वागत
करते हैं, तो आक्रामकता
बढ़ेगी ही। जहाँ समाज
ने उन्हें अपनाया है, नियमित भोजन
और देखभाल दी है, वहाँ
आक्रामकता स्वतः कम हुई है।
प्रश्न
: आपके सामाजिक कार्यों को आईसीएआई ने
राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित
किया है। यह सम्मान
क्या मायने रखता है?
सुदेशना
बसु
: यह सिर्फ़ मेरा सम्मान नहीं
है। यह उस सोच
का सम्मान है कि पेशेवर
सफलता और सामाजिक जिम्मेदारी
साथ-साथ चल सकती
हैं। सीए वोमेन इन
सोशल सर्विसेज अवार्ड मुझे यह याद
दिलाता है कि अगर
एक अकाउंटेंट सामाजिक मुद्दों पर आवाज़ उठा
सकती है, तो हर
नागरिक उठा सकता है।
प्रश्न
: डॉग
एडॉप्शन
को
लेकर
आप
लगातार
अभियान
चला
रही
हैं।
क्यों?
सुदेशना
बसु
: क्योंकि गोद लेना सबसे
बड़ा समाधान है। एक सड़क
के पिल्ले को गोद लेना,
सिर्फ़ उसकी ज़िंदगी बदलना
नहीं, बल्कि सड़कों पर पीड़ा के
एक पूरे चक्र को
तोड़ना है। कम भूख,
कम चोटें, कम खामोश चीखें,
यही असली बदलाव है।
प्रश्न
: आप
समाज
को
क्या
संदेश
देना
चाहेंगी?
सुदेशना
बसु
: कुत्ते हमसे बहुत कुछ
नहीं माँगते, बस अपनापन, थोड़ा
सा प्यार और सम्मान। सभ्यता
का पैमाना यह नहीं कि
हम कितने शक्तिशाली हैं, बल्कि यह
है कि हम सबसे
कमजोर के साथ कैसा
व्यवहार करते हैं।
प्रश्न
: एक बड़ा सवाल यह
है कि क्या सुप्रीम
कोर्ट की नजर मानवीय
दृष्टिकोण पर नहीं गई,
जब उसने कुत्तों, गायों
जैसे बेज़ुबान पशुओं पर प्रतिबंध या
कैद जैसे फैसले दिए?
सुदेशना
बसु
: यह कहना कि सुप्रीम
कोर्ट मानवीय दृष्टिकोण से पूरी तरह
चूक गया, एकांगी होगा।
न्यायालय का पहला दायित्व
मानव जीवन और सार्वजनिक
सुरक्षा है। ऐसे में
जब पशुओं से जुड़ी घटनाएँ
भय या खतरे का
कारण बनती हैं, तो
अदालत निवारक और प्रशासनिक नियंत्रण
की ओर जाती है।
यह असंवेदनशीलता नहीं, बल्कि सुरक्षा-केंद्रित दृष्टिकोण है।
प्रश्न
: क्या
इसका
मतलब
यह
है
कि
पशुओं
के
अधिकारों
को
नज़रअंदाज़
किया
जा
रहा
है?
सुदेशना
बसु
: बिलकुल नहीं। संविधान के अनुच्छेद 48 ए
और 51 ए (जी) पशु
संरक्षण और करुणा की
बात करते हैं। लेकिन
ये नीति-निर्देशक तत्व
और मौलिक कर्तव्य हैं। इसलिए अदालतें
प्रायः सरकार और स्थानीय निकायों
को दिशा-निर्देश देती
हैं, स्वयं नीतिगत हस्तक्षेप सीमित रखती हैं।
प्रश्न
: कुत्तों
या
गायों
को
शेल्टर
या
नियंत्रण
में
रखने
के
आदेश
अमानवीय
क्यों
लगते
हैं?
सुदेशना
बसु
: क्योंकि इन आदेशों में
सह-अस्तित्व और संवेदनशीलता की
भाषा स्पष्ट नहीं होती। जबकि
अधिकांश मामलों में ये स्थायी
प्रतिबंध नहीं, बल्कि अस्थायी और प्रशासनिक नियंत्रण
होते हैं, जैसे नसबंदी,
टीकाकरण या संवेदनशील क्षेत्रों
में अस्थायी रोक।
प्रश्न
: तो
फिर
समाज
में
असंतोष
क्यों
बढ़ता
है?
सुदेशना
बसु
: क्योंकि समाधान का मानवीय पक्ष
सामने नहीं आता। जब
करुणा, सामुदायिक देखभाल और वैज्ञानिक समाधान
स्पष्ट रूप से नहीं
बताए जाते, तो फैसले कठोर
प्रतीत होते हैं और
समाज में ध्रुवीकरण बढ़ता
है।
प्रश्न
: आपके
अनुसार
सही
रास्ता
क्या
है?
सुदेशना
बसु
: सही रास्ता संतुलन है, मानव सुरक्षा
और पशु अधिकार दोनों
का। केवल प्रतिबंध नहीं,
बल्कि नसबंदी, टीकाकरण, सामुदायिक सहभागिता और जागरूकता को
नीति और न्याय का
हिस्सा बनाया जाना चाहिए। यही
सभ्यता की कसौटी है।
करुणा ही समाधान है
सीए सुदेशना बसु
से यह बातचीत केवल
कुत्तों की नहीं, यह
हमारे समाज के नैतिक
स्वास्थ्य की बातचीत है।
आज जब हर समस्या
का हल बुलडोज़र, लाठी
या विस्थापन में खोजा जा
रहा है, तब यह
आवाज़ याद दिलाती है
कि करुणा कोई कमजोरी नहीं,
बल्कि सबसे बड़ी ताक़त
है। कुत्ते हमारे जीवन के कालभैरव
हैं, उन्हें हटाने की नहीं, समझने
और संभालने की ज़रूरत है।
गोद लीजिए, खरीदिए नहीं। करुणा चुनिए, हिंसा नहीं।



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