जब ठुमरी में प्रेम बोलता है और बनारस सुनता है...
बनारस
केवल
एक
नगर
नहीं,
बल्कि
भारतीय
सभ्यता
की
जीवित
स्मृति
है,
जहाँ
गंगा
बहती
नहीं,
बोलती
है;
जहाँ
गलियाँ
रास्ते
नहीं,
राग
रचती
हैं।
इसी
बनारसी
चेतना,
ठुमरी
की
आत्मा
और
लोकसंगीत
की
संघर्षशील
परंपरा
को
स्वर
देती
हैं
पद्मश्री
लोकगायिका
मालिनी
अवस्थी।
यह
संवाद
उनके
व्यक्तित्व
या
गायन
तक
सीमित
नहीं,
बल्कि
काशी
की
उस
सांस्कृतिक
विरासत
का
दस्तावेज़
है,
जिसे
हमने
कभी
गौरव
माना
और
फिर
नैतिकता
के
नाम
पर
हाशिये
पर
धकेल
दिया।
प्रस्तुत
है
सीनियर
रिर्पोटर
सुरेश
गांधी
और
मालिनी
अवस्थी
के
बीच
हुए
विस्तृत
वार्ता
के
कुछ
अंश
:- खास
यह
है
कि
वार्ता
में
एक
बात
स्पष्ट
रुप
से
सामने
उभर
आयी,
ठुमरी
केवल
संगीत
नहीं
रहती,
वह
प्रेम,
प्रतीक्षा,
स्त्री-अनुभव
और
सामाजिक
प्रतिरोध
का
स्वर
बन
जाती
है।
बातचीत
आज़ादी
के
बाद
तवायफ़
और
लोकगायिकाओं
की
टूटी
परंपरा,
पहचान
के
संकट,
बनारस
की
गली-मोहल्लों
में
पली
संगीत
साधना
और
आधुनिक
बाज़ार
के
दबावों
तक
की
गयी।
मालिनी
अवस्थी
साफ़
कहती
हैं
कि
राग
तकनीक
से
नहीं,
जीवन
जीने
से
आता
है,
और
बिना
इंतज़ार,
पीड़ा
और
प्रेम
के
ठुमरी
संभव
नहीं।
यह
संवाद
संस्कृति
बनाम
बाज़ार,
स्त्री
बनाम
पाखंड
और
स्मृति
बनाम
विस्मृति
की
टकराहट
को
सामने
रखता
है।
जहां
सिर्फ़
एक
कलाकार
की
बात
नहीं,
बल्कि
उस
सभ्यता
की
पुकार
है
जो
आज
भी
पूछ
रही
है,
क्या
हम
अब
भी
सुनने
का
धैर्य
रखते
हैं?
सुरेश गांधी
फिरहाल, लोक और शास्त्रीय
संगीत केवल सुरों का
अनुशासन नहीं, बल्कि प्रेम, साधना और परंपरा का
जीवंत अनुभव है। प्रख्यात लोकगायिका
मालिनी अवस्थी जब बोलती हैं,
तो उनके शब्दों में
काशी की गलियाँ, ठुमरी
का दर्द, दादरा की शरारत और
आज़ादी की लड़ाई की
स्मृतियाँ - सांसे, एक साथ बहने
लगती हैं। बनारस लिटरेचर
फेस्टिवल के एक सत्र
के दौरान हुई यह बातचीत
केवल संगीत तक सीमित नहीं
रही, बल्कि स्त्री, परंपरा, आज़ादी, समाज और बाज़ारवाद
तक फैली। संवाद के दौरान मालिनी अवस्थी ने
काशीबाई, हुस्नाबाई, विद्याधरी बाई, दुलारी बाई सहित कई महान गायिकाओं से जुड़े संस्मरण
भी साझा किए। इसी क्रम में उन्होंने मैना बाई और तत्कालीन काशी नरेश ईश्वरीनारायण सिंह
से जुड़ा एक अत्यंत रोचक किस्सा भी सुनाया, जिसे सुनकर श्रोता मंत्रमुग्ध हो गए। मालिनी
अवस्थी ने बताया कि मैना बाई अपने पहलवान प्रेमी की उपस्थिति के बिना गाने से इंकार
कर देती थीं। एक बार जब प्रेमी मौजूद नहीं था, तो काशी नरेश ने अपने दावतखाने में ही
विशेष महफिल सजा दी और मैना बाई से ठुमरी गाने को कहा। मैना बाई ने अपने प्रेमी को
चार पहलवानों की मदद से चोरी-छिपे दावतखाने में पहुंचा दिया। जब गायन समाप्त हुआ तो
काशी नरेश ने मुस्कराते हुए पूछा— “आज बिना पहलवान को देखे कैसे गा लिया?”
इस पर मैना बाई ने विनम्रता से उत्तर दिया— “गुस्ताखी माफ़ हुज़ूर, वो यहां आए भी
हैं और सामने बैठकर सुन भी रहे हैं।” यह किस्सा ठुमरी में प्रेम, समर्पण और
भावनात्मक निर्भरता को बखूबी उजागर करता है। ठुमरी केवल सुर नहीं, संस्कार है.
सुरेश
गांधी
: बनारस
को
आप
कैसे
परिभाषित
करती
हैं?
क्या
यह
सिर्फ़
एक
शहर
है
या
उससे
कहीं
अधिक?
मालिनी
अवस्थी
: बनारस कभी सिर्फ़ शहर
नहीं रहा। यह एक
जीवित सभ्यता है। यहाँ गंगा
बहती नहीं, स्मृति को साथ लेकर
चलती है। यहाँ संगीत
मंच की चीज़ नहीं,
जीवन का स्वभाव है।
बनारस में सुर पैदा
नहीं होते, साधे जाते हैं।
सुरेश
गांधी
: आपकी
ठुमरी
में
प्रेम,
प्रतीक्षा
और
मौन
का
भाव
बहुत
गहरा
होता
है।
यह
भाव
कहाँ
से
आता
है?
मालिनी अवस्थी : काशी की ठुमरी परंपरा में प्रेम शोर नहीं करता। यहाँ नायिका तय करती है कि जब तक वह आएगा नहीं, तब तक राग नहीं खुलेगा। यह प्रेम की शर्त नहीं, उसकी शुद्धता है। प्रेम अधिकार नहीं जताता, प्रतीक्षा करता है। ठुमरी को केवल तकनीक या राग के स्तर पर नहीं समझा जा सकता। इसके लिए समय, इंतज़ार, भाव और जीवन अनुभव चाहिए। उन्होंने कहा कि आज जब ठुमरी को सिर्फ प्रस्तुति भर बना दिया गया है, तब काशी की परंपरा हमें याद दिलाती है कि ठुमरी का मूल प्रेम और रस में है, प्रदर्शन में नहीं।
सुरेश
गांधी
: पुराने
समय
में
दरबारों
और
महफिलों
में
संगीत
का
अनुशासन
कैसा
था?
मालिनी
अवस्थी
: रामनगर के दरबार हों
या काशी नरेश की
बैठकें, वहाँ कलाकार सत्ता
से ऊपर नहीं था,
लेकिन सत्ता भी संगीत के
आगे नतमस्तक थी। राजा जानता
था कि ठुमरी आदेश
से नहीं, अनुराग से जन्म लेती
है।
सुरेश
गांधी
: आज
शास्त्रीय
संगीत
में
तकनीक
बहुत
बढ़
गई
है,
लेकिन
आप
अक्सर
रस
की
कमी
की
बात
करती
हैं।
मालिनी
अवस्थी
: राग को बरतना आसान
है, रस को साधना
कठिन। जिसने जीवन में प्रतीक्षा,
अपमान, तिरस्कार और प्रेम नहीं
जिया, वह ठुमरी का
दर्द कैसे उतारेगा? ठुमरी
भोग की नहीं, तप
की कला है।
सुरेश
गांधी
: बनारस
की
गलियों
और
मोहल्लों
का
संगीत
से
क्या
रिश्ता
है?
मालिनी
अवस्थी
: बनारस का संगीत किसी
अकादमी में नहीं पला।
यह उन्हीं गलियों में पका जहाँ
से शवयात्राएँ निकलती हैं, जहाँ मंदिर
की घंटी और मस्जिद
की अज़ान साथ सुनाई
देती है। वही ट्रैफिक,
वही शोर, उसी में
रियाज़।
सुरेश
गांधी
: काशी
की
परंपरा
को
समझने
के
लिए
किन
कलाकारों
को
सुनना
अनिवार्य
है?
मालिनी
अवस्थी
: सिद्धेश्वरी देवी, रसूलन बाई, गिरजा देवी
और महादेव मिश्रा, इन चारों को
सुने बिना बनारस को
नहीं समझा जा सकता।
ये केवल कलाकार नहीं,
पूरी सभ्यता हैं। सिद्धेश्वरी देवी
की दादी, नानी, मां और मौसी
सभी उच्च कोटि की
ठुमरी गायिकाएं थीं। ठुमरी परंपरा
को समृद्ध करने में उनके
पूरे परिवार का योगदान अविस्मरणीय
है। “हम कलाकारों की
कई-कई पीढ़ियां उनके
ऋण से कभी मुक्त
नहीं हो सकतीं.
सुरेश
गांधी
: आज़ादी
के
बाद
लोकगायिकाओं
और
तवायफ़
परंपरा
के
साथ
क्या
हुआ?
मालिनी
अवस्थी
: 1947 के बाद हमने अंग्रेज़ों
जैसा नैतिकतावादी चश्मा पहन लिया। 1952 के
एक क़ानून ने कलाकारों की
पहचान को संकट में
डाल दिया। घराने बिखर गए, लोगों
ने अपनी पहचान छुपाई।
यह हमारी सांस्कृतिक स्मृति का सबसे बड़ा
नुकसान है।
सुरेश
गांधी
: क्या
यह
संकट
आज
भी
जारी
है?
मालिनी
अवस्थी
: बिल्कुल। प्रतिष्ठा का डर आज
भी कलाकारों को चुप रखता
है। पहचान सामने आ जाएगी, यही
भय सबसे बड़ा है।
सुरेश
गांधी
: काशी
की
गायिकाओं
को
आप
किस
रूप
में
देखती
हैं?
मालिनी
अवस्थी
: वे सिर्फ़ कलाकार नहीं थीं, वे
समाज के पाखंड पर
प्रश्न थीं। उन्होंने प्रेम
को स्वर दिया, लेकिन
उसे बाज़ार नहीं बनने दिया।
सुरेश
गांधी
: आज
सिनेमा
और
दृश्य
माध्यमों
के
दौर
में
यह
परंपरा
कहाँ
खड़ी
है?
मालिनी
अवस्थी
: विडंबना यह है कि
दृश्य माध्यमों में स्त्री देह
के प्रदर्शन पर समाज सहज
है, लेकिन संगीत में स्त्री की
स्वतंत्रता उसे असहज करती
है। यही दोहरा मापदंड
है।
सुरेश
गांधी
: स्वतंत्रता
आंदोलन
के
समय
संगीत
की
क्या
भूमिका
थी?
मालिनी
अवस्थी
: उस समय संगीत श्रृंगार
नहीं, राष्ट्रबोध था। गांधी जी,
महामना मदन मोहन मालवीय
जैसे लोग संगीत और
साहित्य के संरक्षक थे।
संगीत सामाजिक चेतना का माध्यम था।
सुरेश
गांधी
: आज
के
दौर
में
साहित्य,
संगीत
और
सिनेमा
का
संबंध
कैसे
देखती
हैं?
मालिनी
अवस्थी
: अगर ये तीनों संवेदनशीलता
के साथ मिलें तो
समाज बदल सकता है।
लेकिन बाज़ार के दबाव में
यह मिलन संस्कृति को
नुकसान भी पहुँचा सकता
है।
सुरेश
गांधी
: बनारस
लिटरेचर
फेस्टिवल
जैसे
मंचों
का
महत्व?
मालिनी
अवस्थी
: ऐसे मंच संवाद रचते
हैं। यहाँ संगीत प्रस्तुति
नहीं, विमर्श बनता है। स्मृति
और वर्तमान का सेतु यहीं
बनता है।
सुरेश
गांधी
: नई
पीढ़ी
के
कलाकारों
के
लिए
आपका
संदेश?
मालिनी
अवस्थी
: जल्दी मत कीजिए। ठहरिए।
प्रेम कीजिए। इंतज़ार कीजिए। राग को जीने
दीजिए। बनारस को समझने के
लिए सुनना पड़ता है, और
आज सबसे दुर्लभ चीज़
वही है।
सुरेश
गांधी
: काशी
और
संगीत
का
रिश्ता
आप
कैसे
देखती
हैं?
मालिनी
अवस्थी
: काशी में संगीत किसी
मंच से शुरू नहीं
होता। यहाँ तो प्रेम
से शुरुआत होती है। यहाँ
पहले इंतज़ार किया जाता है,
जब तक सामने वाला
आए नहीं, तब तक गाया
नहीं जाता। यह आकर्षण का,
खामोशी का प्रेम है।
काशी ने सिखाया कि
राग तकनीक से नहीं, भाव
से खुलता है। भाव नहीं
है तो न रस
है, न संगीत।
सुरेश
गांधी
: आज
के
समय
में
शास्त्रीय
और
लोक
गायन
में
क्या
कमी
महसूस
होती
है?
मालिनी अवस्थी
: आज हर कोई ठुमरी,
दादरा गाना चाहता है,
लेकिन इंतज़ार नहीं करना चाहता।
सालों-साल की साधना,
गुरु के पास बैठना,
मोहल्लों की धूल, ट्रैफिक
जाम, वही गलियाँ, ये
सब झेले बिना ठुमरी
नहीं पकती। मैं साफ़ कहना
चाहती हूँ, भाव नहीं
है, रस नहीं है,
तो वह गायन केवल
प्रदर्शन है, प्रेम नहीं।
सुरेश
गांधी
: प्रश्नः
बनारस
की
परंपरा
में
स्त्रियों
और
तवायफों
की
भूमिका
को
आप
कैसे
देखती
हैं?
मालिनी
अवस्थी
: यह बहुत बड़ा और
बहुत दुखद अध्याय है।
1947 के बाद हमने अंग्रेज़ों
की तरह नैतिकता का
चाबुक चलाया। 1952 के क़ानूनों ने
गाने वाली स्त्रियों की
पहचान को अपराध बना
दिया। जो कल तक
संस्कृति की वाहक थीं,
वे अचानक बदनामी का चेहरा बना
दी गईं। उनकी
सबसे बड़ी लड़ाई यही
रही, “पहचान सामने आ जाएगी।
सुरेश
गांधी
: आज़ादी
की
लड़ाई
और
संगीत
का
संबंध?
मालिनी
अवस्थी
: जब गांधी जी बनारस आए
और कहा कि आप
लोग देश के लिए
गाइए, तो संगीत सिर्फ़
कला नहीं रहा, प्रतिरोध
बन गया। चौक से
लेकर काशी तक, गीतों
में आज़ादी की आग थी।
लोक और संगीत ने
वह कहा, जो भाषण
नहीं कह पाए।
सुरेश
गांधी
: आज
का
सिनेमा
और
समाजकृआपकी
चिंता
क्या
है?
मालिनी
अवस्थी
: आज 6 साल की बच्ची
को मल्टीप्लेक्स में ऐसी फ़िल्में
दिखा दी जाती हैं,
जिनमें स्त्री केवल उपभोग है।
और हम खुश होते
हैं। यहीं से समाज
गिरता है। संगीत, सिनेमा
और साहित्य, तीनों अगर गलत ढंग
से मिल गए, तो
पीढ़ियाँ खराब हो जाती
हैं।




No comments:
Post a Comment