मनोज तिवारी के शिव-भक्ति व गीतों में उतरी काशी की आत्मा, झूमे स्रोता
बीएलएफ4 में
माटी,
स्मृति
और
संगीत
का
जीवंत
उत्सव
: मनोज
तिवारी
सुरेश गांधी
वाराणसी। बनारस लिटरेचर फेस्टिवल के चौथे संस्करण में नदेसर स्थित होटल ताज के सुर प्रवाह प्रांगण में शुक्रवार की शाम उस समय लोक-संवेदना से सराबोर हो उठी, जब भोजपुरी गायक, अभिनेता और सांसद मनोज तिवारी मंच पर आए।
जैसे ही उन्होंने सुरों की पहली डोर थामी, पूरा वातावरण भोजपुरी माटी की सुगंध, स्मृतियों की ऊष्मा और लोक-संस्कृति की जीवंतता से भर गया। यह केवल एक गायन प्रस्तुति नहीं थी, बल्कि लोक-सुर, संवाद और आत्मीयता का ऐसा सधा संगम था, जिसमें श्रोता झूमते भी रहे और गुनगुनाते भी। मनोज तिवारी ने अपने गायन की शुरुआत शिव-भक्ति से की, “हर हर महादेव, हे तीनों लोक के देवा, हे देवों के देवा...” इन पंक्तियों के साथ ही काशी की आत्मा मानो सुरों में उतर आई। सभागार में बैठे श्रोता भक्ति और भाव में एकाकार हो उठे। इसके बाद ए राजा जी... और चर्चित रिंकिया के पापा... जैसे गीतों ने माहौल को पूरी तरह लोक-उत्सव में बदल दिया। तालियों की गूंज और मुस्कानों की छाया पूरे प्रांगण में फैल गई।जेन-जी से संवाद : लोक से जुड़े रहो, वही पहचान है
हास्य, आत्मीयता और लोकगीतों का सामाजिक संदर्भ
संवाद के दौरान उन्होंने
सहज हास्य के साथ कहा,
“अब मेरी अंग्रेजी ठीक
हो गई है,” और
यह कहते ही पूरा
सभागार ठहाकों से गूंज उठा।
वहीं रिंकिया के पापा गीत
के पीछे की भावना
साझा करते हुए उन्होंने
बताया कि लोकगीत केवल
मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज का आईना
होते हैं, जो समय,
परिस्थिति और आम जन
की भावनाओं को स्वर देते
हैं।
सूरीनाम की स्मृतियां और प्रवासी भोजपुरी समाज का दर्द
लोक-गीतों की फुलझड़ी, झूम उठा पूरा प्रांगण
इसके बाद शीतला
घाट पे काशी में...,
बगल वाली जान मारेली...,
ऊपरवाली... और जिया हो
बिहार के लाला... जैसे
लोकप्रिय गीतों की ऐसी फुलझड़ी
छूटी कि श्रोता खुद
को रोक नहीं पाए।
कहीं ताली, कहीं ठेका, तो
कहीं सुर में सुर
मिलाते स्वर, पूरा प्रांगण लोक-संगीत के महोत्सव में
तब्दील हो गया। मतलब
साफ है बीएलएफ4 का
यह सत्र केवल मंचीय
गायन भर नहीं था।
यह भोजपुरी अस्मिता, लोक-संस्कृति और
नई पीढ़ी के बीच
एक सशक्त सेतु बन गया,
जहां हर सुर यही
कहता सुनाई दिया. “माटी से जुड़ल
रहे,तबही संगीत अमर
रहे।” काशी की धरती
पर लोक-सुरों का
यह उत्सव यह याद दिला
गया कि संस्कृति तब
जीवित रहती है, जब
वह स्मृति, संवाद और संवेदना के
साथ बहती है।




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