“घुस्कोर पंडित” : अभिव्यक्ति की आड़ में आस्था पर हमला कब तक?
विवादित फिल्म शीर्षकों और कथानकों को लेकर देश में एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सांस्कृतिक आस्था के बीच टकराव की बहस तेज हो गई है। हाल में चर्चा में आई फिल्म “घुस्कोर पंडित” ने इस विमर्श को और गहरा कर दिया है। फिल्म के शीर्षक और ट्रेलर में धार्मिक पहचान से जुड़े शब्दों को भ्रष्टाचार और सामाजिक विकृतियों से जोड़कर प्रस्तुत किए जाने पर समाज के एक बड़े वर्ग ने आपत्ति जताई है। यह विवाद केवल एक फिल्म तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि इसने यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर धार्मिक प्रतीकों और सांस्कृतिक परंपराओं को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करना उचित है। खास यह है कि फिल्म उद्योग कई बार धार्मिक विषयों को लेकर संतुलित दृष्टिकोण नहीं अपनाता और सेंसर बोर्ड की भूमिका भी सवालों के घेरे में आती है। राष्ट्रवादी और सांस्कृतिक दृष्टिकोण रखने वाले वर्ग का मानना है कि कला और सिनेमा को समाज को जोड़ने का माध्यम बनना चाहिए, न कि वैचारिक टकराव का कारण। मतलब साफ है रचनात्मक स्वतंत्रता के साथ सामाजिक जिम्मेदारी और सांस्कृतिक संवेदनशीलता का संतुलन बनाए रखना समय की बड़ी आवश्यकता बन चुका है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि मनोरंजन या सांस्कृतिक षड्यंत्र कब तक सहेगा देश? कला या कटाक्ष? के नाम पर धार्मिक प्रतीकों को निशाना बनाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर कब लगेगी रोक? फिल्मी परदे पर संस्कृति का अपमान, आखिर चुप क्यों है सेंसर? मनोरंजन के नाम पर धार्मिक पहचान पर वार, आखिर सीमा कौन तय करेगा? क्या यह रचनात्मक स्वतंत्रता या सुनियोजित वैचारिक हमला है? सिनेमा की आड़ में परंपराओं पर प्रहार, क्या यही अभिव्यक्ति की आज़ादी है? बार-बार आस्था ही क्यों निशाने पर? मनोरंजन के बहाने धार्मिक अस्मिता से खिलवाड़, समाज कब तक सहेगा?
सूरेश गांधी
भारतीय सिनेमा को लंबे समय
से समाज का दर्पण
कहा जाता रहा है।
यह माध्यम केवल मनोरंजन तक
सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, सांस्कृतिक विमर्श और वैचारिक प्रवाह
का महत्वपूर्ण मंच भी रहा
है। लेकिन हाल के वर्षों
में फिल्म उद्योग की दिशा को
लेकर गंभीर सवाल उठने लगे
हैं। विशेष रूप से कुछ
विवादित फिल्म शीर्षकों और कथानकों ने
यह बहस तेज कर
दी है कि क्या
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के
नाम पर धार्मिक परंपराओं
और सांस्कृतिक प्रतीकों को निशाना बनाया
जा सकता है? हाल
ही में चर्चाओं में
आई फिल्म “घुस्कोर पंडित” इस बहस के
केंद्र में है। फिल्म
का शीर्षक सामने आते ही समाज
के एक बड़े वर्ग
में असंतोष देखने को मिला। इसके
ट्रेलर ने इस विवाद
को और गहरा कर
दिया। फिल्म में धार्मिक पहचान
से जुड़े शब्दों को
भ्रष्टाचार और सामाजिक विडंबना
से जोड़कर प्रस्तुत करने के प्रयास
ने यह सवाल खड़ा
कर दिया है कि
क्या सिनेमा अब समाज को
जोड़ने के बजाय वैचारिक
टकराव का माध्यम बनता
जा रहा है?
फिल्म “घुस्कोर पंडित” का ट्रेलर सामाजिक
व्यंग्य और राजनीतिक नाटक
के रूप में प्रस्तुत
किया गया है। ट्रेलर
में एक ऐसे कथित
धार्मिक व्यक्ति का चित्रण दिखाया
गया है, जो समाज
में प्रभाव और सत्ता हासिल
करने के लिए धार्मिक
पहचान का उपयोग करता
है। संवादों और दृश्यों में
धार्मिक प्रतीकों को भ्रष्टाचार और
सामाजिक दोहरेपन से जोड़ा गया
है। फिल्म निर्माता इसे सामाजिक कुरीतियों
को उजागर करने का प्रयास
बता रहे हैं, लेकिन
आलोचकों का कहना है
कि व्यंग्य के नाम पर
यदि किसी धार्मिक पहचान
को लगातार नकारात्मक प्रतीकों के रूप में
प्रस्तुत किया जाए तो
यह संतुलित अभिव्यक्ति नहीं बल्कि वैचारिक
पक्षपात माना जा सकता
है। प्रश्न यह भी उठ
रहा है कि क्या
सामाजिक सुधार के नाम पर
केवल उन प्रतीकों को
निशाना बनाया जा रहा है,
जिनके खिलाफ विरोध अपेक्षाकृत कम होता है।
क्या सिनेमा अब दर्पण कम
और विचारधारात्मक प्रयोगशाला ज्यादा बनता जा रहा
है? क्या रचनात्मक स्वतंत्रता
के नाम पर किसी
धर्म, परंपरा और सांस्कृतिक प्रतीकों
का अपमान करना वैध माना
जा सकता है? फिल्म
का ट्रेलर सामने आने के बाद
जिस तरह से धार्मिक
पहचान से जुड़े शब्दों
को भ्रष्टाचार और सामाजिक विकृति
के प्रतीक के रूप में
प्रस्तुत किया गया, उसने
बड़े वर्ग को यह
सोचने पर मजबूर कर
दिया है कि आखिर
भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपराएं
ही बार-बार व्यंग्य
और विवाद का केंद्र क्यों
बनती हैं।
शीर्षक से उपजा आक्रोश
“घुस्कोर” शब्द भ्रष्टाचार और
अवैध गतिविधियों का प्रतीक माना
जाता है, जबकि “पंडित”
शब्द भारतीय संस्कृति में ज्ञान, परंपरा
और धार्मिक सम्मान का प्रतीक है।
ऐसे में दोनों शब्दों
का संयोजन कई लोगों के
लिए आस्था और सांस्कृतिक पहचान
पर प्रहार जैसा प्रतीत हो
रहा है। धार्मिक और
सांस्कृतिक संगठनों का कहना है
कि जब किसी धार्मिक
पहचान को नकारात्मक संदर्भ
में प्रस्तुत किया जाता है,
तो इससे समाज में
भ्रम और असंतोष पैदा
होता है। उनका तर्क
है कि फिल्म उद्योग
को यह समझना होगा
कि भारत में धर्म
केवल व्यक्तिगत विश्वास नहीं बल्कि सामाजिक
संरचना का आधार है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता : अधिकार बनाम जिम्मेदारी
भारतीय संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की
स्वतंत्रता देता है। अनुच्छेद
19(1)(ए) इस अधिकार को
मौलिक अधिकार के रूप में
मान्यता देता है। लेकिन
अनुच्छेद 19(2) यह भी स्पष्ट
करता है कि अभिव्यक्ति
की स्वतंत्रता पर सार्वजनिक व्यवस्था,
नैतिकता और सामाजिक सद्भाव
के आधार पर प्रतिबंध
लगाए जा सकते हैं।
राष्ट्रवादी विचारधारा के समर्थकों का
कहना है कि अभिव्यक्ति
की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है,
लेकिन यदि इस स्वतंत्रता
का उपयोग सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान
को बार-बार निशाना
बनाने के लिए किया
जाए तो यह सामाजिक
संतुलन को कमजोर कर
सकता है। मतलब साफ
है भारतीय संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की
स्वतंत्रता देता है। लेकिन
यह स्वतंत्रता पूर्णतः निरंकुश नहीं है। संविधान
स्पष्ट करता है कि
अभिव्यक्ति का अधिकार सार्वजनिक
व्यवस्था, सामाजिक सद्भाव और धार्मिक सम्मान
की सीमाओं में ही मान्य
है। राष्ट्रवादी विचारधारा के समर्थकों का
तर्क है कि यदि
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के
नाम पर किसी विशेष
धर्म या सांस्कृतिक पहचान
का लगातार उपहास किया जाए, तो
यह लोकतांत्रिक संतुलन को कमजोर करता
है। यह भी सवाल
उठता है कि जब
किसी अन्य धर्म या
समुदाय से जुड़े विषयों
पर टिप्पणी होती है, तो
अक्सर तीखी प्रतिक्रिया और
बड़े स्तर पर विरोध
देखने को मिलता है।
ऐसे में फिल्म उद्योग
का चयनात्मक साहस भी बहस
का विषय बनता जा
रहा है।
क्या फिल्म उद्योग में चयनात्मक साहस है?
यह आरोप लंबे
समय से लगाया जाता
रहा है कि फिल्म
उद्योग धार्मिक विषयों को लेकर समान
दृष्टिकोण नहीं अपनाता। कई
समीक्षक मानते हैं कि भारतीय
परंपराओं और धार्मिक प्रतीकों
को अक्सर रूढ़िवाद और अंधविश्वास के
रूप में प्रस्तुत किया
जाता है, जबकि अन्य
धार्मिक विषयों पर अपेक्षाकृत सावधानी
बरती जाती है। “घुस्कोर
पंडित” जैसे शीर्षक इस
बहस को और गहरा
करते हैं कि क्या
फिल्म उद्योग केवल उन विषयों
पर साहस दिखाता है,
जहां विरोध की संभावना कम
होती है। यह सवाल
सामाजिक विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा
बनता जा रहा है।
सेंसर बोर्ड की भूमिका : निष्पक्षता या औपचारिकता?
केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड का उद्देश्य फिल्मों
को प्रमाणित करते समय सामाजिक
संतुलन बनाए रखना होता
है। लेकिन विवादित शीर्षकों और कथानकों को
लेकर सेंसर बोर्ड की भूमिका पर
लगातार सवाल उठते रहे
हैं। राष्ट्रवादी चिंतकों का कहना है
कि सेंसर बोर्ड को केवल तकनीकी
प्रमाणन संस्था नहीं बल्कि सांस्कृतिक
संतुलन की जिम्मेदारी निभाने
वाली संस्था के रूप में
कार्य करना चाहिए। यदि
किसी फिल्म का शीर्षक ही
धार्मिक पहचान को नकारात्मक रूप
में प्रस्तुत करता है, तो
उस पर गंभीर विचार
आवश्यक है।
सांस्कृतिक आत्मसम्मान और राष्ट्र की पहचान
भारत केवल एक
राजनीतिक राष्ट्र नहीं बल्कि हजारों
वर्षों पुरानी सांस्कृतिक सभ्यता है। यहां धर्म
और परंपरा केवल पूजा पद्धति
नहीं बल्कि जीवन शैली और
सामाजिक पहचान का हिस्सा हैं।
जब फिल्मों में इन प्रतीकों
को व्यंग्य या उपहास के
रूप में प्रस्तुत किया
जाता है, तो यह
केवल धार्मिक भावनाओं का मुद्दा नहीं
रहता बल्कि सांस्कृतिक आत्मसम्मान का प्रश्न बन
जाता है। राष्ट्रवादी विचारधारा
के समर्थकों का मानना है
कि कला का उद्देश्य
समाज को जोड़ना होना
चाहिए, न कि सांस्कृतिक
विभाजन को बढ़ाना।
सोशल मीडिया और जनभावना का विस्फोट
डिजिटल युग में फिल्म
का ट्रेलर ही फिल्म की
दिशा तय कर देता
है। “घुस्कोर पंडित” के ट्रेलर के
सामने आते ही सोशल
मीडिया पर व्यापक बहस
शुरू हो गई। कई
लोगों ने इसे सांस्कृतिक
अपमान बताया, जबकि कुछ ने
इसे रचनात्मक स्वतंत्रता का हिस्सा माना।
लेकिन यह स्पष्ट हो
गया कि समाज अब
अपनी सांस्कृतिक पहचान को लेकर पहले
से अधिक सजग हो
चुका है।
विवादित शीर्षक और सामाजिक असंतोष
इतिहास बताता है कि कला
और साहित्य का समाज पर
गहरा प्रभाव पड़ता है। जब
फिल्मों के माध्यम से
किसी धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान
को लगातार नकारात्मक रूप में प्रस्तुत
किया जाता है, तो
इससे सामाजिक असंतोष और वैचारिक टकराव
पैदा हो सकता है।
मेरा मानना है कि विवादित
शीर्षक केवल प्रचार का
माध्यम नहीं बल्कि सामाजिक
ध्रुवीकरण का कारण भी
बन सकते हैं।
रचनात्मक स्वतंत्रता बनाम सांस्कृतिक मर्यादा
राष्ट्रवादी दृष्टिकोण यह मानता है
कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण
है, लेकिन यह स्वतंत्रता सांस्कृतिक
मर्यादा के साथ संतुलित
होनी चाहिए। यदि कला समाज
की संवेदनाओं को नजरअंदाज करती
है, तो वह समाज
से दूर हो जाती
है। फिल्म उद्योग को यह समझना
होगा कि भारत जैसे
बहुसांस्कृतिक समाज में संवेदनशील
विषयों पर संतुलन बनाए
रखना केवल नैतिक नहीं
बल्कि सामाजिक आवश्यकता है।
संतुलन और संवाद ही रास्ता
विवादित फिल्म शीर्षकों और कथानकों को
लेकर बढ़ते तनाव के
बीच समाधान संतुलन में ही है,
सेंसर बोर्ड को सांस्कृतिक संवेदनशीलता
को प्राथमिकता देनी चाहिए. फिल्म
निर्माताओं को शोध और
जिम्मेदारी के साथ विषय
चुनने चाहिए. समाज को लोकतांत्रिक
संवाद के माध्यम से
अपनी बात रखनी चाहिए.
सरकार को अभिव्यक्ति की
स्वतंत्रता और सांस्कृतिक सम्मान
के बीच संतुलन बनाना
चाहिए.
सिनेमा को समाज जोड़ने का माध्यम बनना होगा
“घुस्कोर पंडित” जैसे विवादित शीर्षक
केवल फिल्म उद्योग की दिशा का
संकेत नहीं देते, बल्कि
यह भी दर्शाते हैं
कि भारतीय समाज अपनी सांस्कृतिक
पहचान को लेकर कितना
संवेदनशील है। यदि सिनेमा
समाज का दर्पण है,
तो उसे समाज के
सम्मान और आत्मसम्मान को
भी प्रतिबिंबित करना होगा। रचनात्मक
स्वतंत्रता तब तक सार्थक
है जब तक वह
समाज को जोड़ने का
कार्य करे, न कि
विभाजन और विवाद को
जन्म दे। भारतीय सिनेमा
की असली ताकत उसकी
विविधता और सांस्कृतिक गहराई
में है। यदि फिल्म
उद्योग इस मूल भावना
को समझे और सम्मान
दे, तो वह केवल
मनोरंजन का माध्यम नहीं
बल्कि राष्ट्र निर्माण का सशक्त साधन
बन सकता है।
व्यंग्य या लक्षित वैचारिक हमला?
फिल्म “घुस्कोर पंडित” के ट्रेलर में
एक ऐसे कथित धार्मिक
व्यक्ति का चित्रण किया
गया है जो समाज
में प्रभाव और सत्ता हासिल
करने के लिए धार्मिक
पहचान का उपयोग करता
है। ट्रेलर में कई संवाद
और दृश्य ऐसे हैं जो
धर्म और आस्था से
जुड़े प्रतीकों को भ्रष्टाचार से
जोड़ते नजर आते हैं।
फिल्म निर्माता इसे सामाजिक व्यंग्य
और धार्मिक आडंबर के खिलाफ संदेश
बता रहे हैं। लेकिन
आलोचकों का कहना है
कि व्यंग्य के नाम पर
यदि किसी एक धर्म
या परंपरा को लगातार नकारात्मक
प्रतीकों के रूप में
दिखाया जाए तो यह
रचनात्मकता नहीं बल्कि वैचारिक
पक्षपात बन जाता है।
यह भी सवाल उठ
रहा है कि क्या
फिल्मकार समाज की कुरीतियों
को उजागर करने के लिए
संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हैं या केवल
उन प्रतीकों को निशाना बनाते
हैं जिनके खिलाफ विरोध की संभावना कम
होती है।
ट्रेलर से भड़की बहस
फिल्म का कथानक एक
भ्रष्ट और विवादित पुलिस
अधिकारी के जीवन संघर्ष
पर आधारित बताया जा रहा है,
लेकिन इसके शीर्षक और
प्रस्तुति ने सामाजिक विमर्श
को अधिक तीखा बना
दिया है। ट्रेलर के
अनुसार फिल्म की कहानी एक
ऐसे पुलिस अधिकारी के इर्द-गिर्द
घूमती है, जो अपने
विभाग में प्रभावशाली होने
के बावजूद भ्रष्टाचार और नैतिक द्वंद्व
के आरोपों से घिरा हुआ
है। कहानी में सत्ता, अपराध
जगत और व्यक्तिगत निर्णयों
के परिणामों को रोमांचक घटनाक्रम
के माध्यम से प्रस्तुत करने
का प्रयास किया गया है।
ट्रेलर में यह भी
संकेत मिलता है कि एक
छोटी मानवीय घटना उसे बड़े
आपराधिक षड्यंत्र में उलझा देती
है और यहीं से
कथानक तीव्र मोड़ लेता है।
हालांकि फिल्म की कहानी को
क्राइम-ड्रामा के रूप में
प्रस्तुत किया जा रहा
है, लेकिन सबसे बड़ा विवाद
इसके शीर्षक को लेकर सामने
आया है। “घूसखोर” जैसे
शब्द को रिश्वतखोरी और
भ्रष्टाचार से जोड़कर देखा
जाता है, जबकि “पंडित”
शब्द भारतीय समाज में ज्ञान,
परंपरा और धार्मिक सम्मान
का प्रतीक माना जाता है।
इन दोनों शब्दों के संयोजन ने
समाज के एक वर्ग
में यह भावना पैदा
की है कि धार्मिक
पहचान को नकारात्मक प्रतीकों
के साथ जोड़कर प्रस्तुत
किया जा रहा है।
यही कारण है कि
ट्रेलर जारी होने के
बाद कई सामाजिक और
सांस्कृतिक संगठनों ने आपत्ति जताई।
उनका कहना है कि
फिल्मों को सामाजिक कुरीतियों
को उजागर करने का अधिकार
है, लेकिन किसी धार्मिक या
सांस्कृतिक पहचान को नकारात्मक संदर्भ
में प्रस्तुत करना सामाजिक सौहार्द
के लिए चुनौती बन
सकता है। बढ़ते विरोध
के बाद फिल्म की
प्रचार सामग्री और ट्रेलर को
कई डिजिटल मंचों से हटाए जाने
की खबरें भी सामने आईं,
जिससे विवाद और गहरा गया।
“घूसखोर पंडित” का ट्रेलर इस
बात का संकेत है
कि भारतीय समाज में कला,
आस्था और अभिव्यक्ति के
बीच संवाद लगातार जारी है। यह
बहस लोकतंत्र की स्वस्थ परंपरा
का हिस्सा है, लेकिन जरूरी
यह है कि यह
संवाद संतुलन और संवेदनशीलता के
साथ आगे बढ़े। सिनेमा
यदि समाज को जोड़ने
और जागरूक करने का माध्यम
बने, तो वह अपनी
रचनात्मक शक्ति का सकारात्मक उपयोग
कर सकता है।


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