मैराथन की टी-शर्ट और मेडल का भी लोकार्पण
गंगा की पुकार पर दौड़ेगी काशी, ‘रन फॉर क्लीन गंगा’ में उमड़ेगा जनसैलाब
विश्व जल
दिवस
पर
नमो
घाट
से
तुलसीघाट
तक
मैराथन,
दो
श्रेणियों
में
हजारों
धावक
देंगे
स्वच्छता
का
संदेश
सुरेश गांधी
वाराणसी। यह केवल एक
मैराथन नहीं, बल्कि उस संवेदना की
अभिव्यक्ति है जो सदियों
से काशी की आत्मा
में प्रवाहित होती रही है।
जब गंगा की निर्मलता
पर संकट गहराता है,
तो काशी केवल चिंतन
नहीं करती, वह संकल्प लेती
है, उठती है और
फिर दौड़ पड़ती है।
विश्व जल दिवस (22 मार्च)
के अवसर पर आयोजित
“रन फॉर क्लीन गंगा
मैराथन-2026” इसी जीवंत चेतना
का विस्तार है, जहां हजारों
कदम गंगा की धारा
को स्वच्छ और अविरल बनाने
के लिए एक साथ
आगे बढ़ेंगे।
संकट मोचन फाउंडेशन के तत्वावधान में होने वाला यह आयोजन अब एक परंपरा ही नहीं, बल्कि जनआंदोलन का रूप ले चुका है। तुलसीघाट पर आयोजित पत्रकार वार्ता में फाउंडेशन के अध्यक्ष महंत प्रो. विश्वम्भरनाथ मिश्र ने जिस विश्वास के साथ इस पहल को रखा, वह काशी के मन में गूंजती उस पुकार का प्रतीक है, “गंगा बचेगी, तभी संस्कृति बचेगी।”
इस वर्ष मैराथन दो श्रेणियों में आयोजित होगी, 10.55 किमी और 7 किमी।
नमो घाट से आरंभ होकर काशी की तंग गलियों, प्राचीन मार्गों और सांस्कृतिक धरोहरों को स्पर्श करती यह दौड़ केवल दूरी तय नहीं करती, बल्कि यह उस चेतना को जगाती है जो गंगा को केवल नदी नहीं, बल्कि मां मानती है।
विश्वेश्वरगंज, मैदागिन, चौक, गोदौलिया, मदनपुरा,
शिवाला, लंका, अस्सी, हर मोड़ इस
बात का साक्षी बनेगा
कि काशी अपने अस्तित्व
के लिए कितनी सजग
है।
यूनियन बैंक ऑफ इंडिया और स्टाइडर्स फाउंडेशन के सहयोग से हो रहे इस आयोजन में भागीदारी के लिए रजिस्ट्रेशन जारी है, जो इस बात का संकेत है कि समाज का हर वर्ग इस मुहिम से जुड़ना चाहता है।
7 किमी के लिए 118 रुपये और 10.55 किमी के लिए 295 रुपये शुल्क निर्धारित किया गया है। सुबह 6 बजे नमो घाट से जब यह दौड़ शुरू होगी, तो यह केवल एक खेल प्रतियोगिता नहीं होगीक. यह एक संदेश होगा, एक चेतावनी भी और एक उम्मीद भी।
समापन के बाद तुलसीघाट पर होने वाला सम्मान समारोह इस बात की पुष्टि करेगा कि गंगा के लिए उठाया गया हर कदम, हर प्रयास, हर आवाज महत्वपूर्ण है।
पत्रकारों के सवालों के जवाब में महंत प्रो. मिश्र ने जिस स्पष्टता से गंगा प्रदूषण की जड़ों की ओर संकेत किया, वह हमारे तंत्र और समाज दोनों के लिए आईना है।
गंगा में गिरते सीवर केवल जल को नहीं, बल्कि हमारी चेतना को भी प्रदूषित कर रहे हैं। यदि इन्हें रोका जाए, तो गंगा की स्वाभाविक शुद्धता स्वयं लौट सकती है, यह केवल वैज्ञानिक सत्य नहीं, बल्कि आस्था का भी विश्वास है।काशी एक बार
फिर तैयार है, अपने पांवों
की गति से, अपने
संकल्प की शक्ति से
और अपनी आस्था की
ऊर्जा से यह साबित
करने के लिए कि
गंगा केवल बहती नहीं,
बल्कि हर दिल में
धड़कती है। यह दौड़
उसी धड़कन को सुनने
और उसे बचाने का
प्रयास है।





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