गंगा की चीख : मुझे योजनाएं नहीं, नालों से आजादी चाहिए!
गंगा आज सिर्फ बह नहीं रही, बल्कि चीख रही है, एक ऐसी चीख जिसे सुनने का दावा तो हर कोई करता है, लेकिन समझने की कोशिश कोई नहीं करता। हर साल नए संकल्प, नई योजनाएं, नए बजट और नए उद्घाटन३ लेकिन गंगा की हालत जस की तस। सवाल यह है कि आखिर गंगा को चाहिए क्या? जवाब जितना सरल है, उतना ही असहज भीकृगंगा को योजनाएं नहीं, नालों से मुक्ति चाहिए। वाराणसी से लेकर कानपुर तक गंगा की धारा में जो जहर घुल रहा है, वह किसी एक कारण का परिणाम नहीं, बल्कि वर्षों की लापरवाही, अधूरी योजनाओं और कमजोर अमल का नतीजा है। वैज्ञानिक आंकड़े साफ बताते हैं कि गंगा में गिरने वाला लगभग 90 फीसदी प्रदूषण शहरों के सीवेज और उद्योगों से आता है, जबकि आमजन की गतिविधियों की हिस्सेदारी नगण्य है। बावजूद इसके, बहस अक्सर आस्था पर टिक जाती है और असली गुनहगार, नाले और सिस्टम, परदा डालकर बच निकलते हैं। सच्चाई यह है कि जब तक हर दिन गिरने वाले लाखों लीटर गंदे पानी को गंगा तक पहुंचने से पहले रोका नहीं जाएगा, तब तक कोई भी “मिशन”, कोई भी “प्रोजेक्ट” और कोई भी “घोषणा” गंगा को निर्मल नहीं बना सकती। यह वक्त है सच्चाई को स्वीकार करने का, क्योंकि गंगा की यह चीख अब सिर्फ एक नदी की नहीं, बल्कि पूरे देश की आत्मा की पुकार बन चुकी है
सुरेश गांधी
गंगा... भारतीय सभ्यता की आत्मा, संस्कृति
की जीवनरेखा और करोड़ों लोगों
की आस्था का केंद्र। हिमालय
से निकलकर सागर तक बहने
वाली यह धारा केवल
जल नहीं, बल्कि जीवन का प्रतीक
है। सदियों से गंगा ने
इस देश को पोषित
किया है, लेकिन आज
वही गंगा प्रदूषण के
बोझ तले कराह रही
है। सवाल उठता है,
क्या गंगा को साफ
करना इतना कठिन है?
या हमने इसे कठिन
बना दिया है? पिछले
एक दशक में गंगा
सफाई के नाम पर
हजारों करोड़ रुपये खर्च
हुए। घाटों का सौंदर्यीकरण हुआ,
सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) बने, “नमामि गंगे” जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं
शुरू हुईं। लेकिन इन सबके बावजूद
गंगा की धारा कई
स्थानों पर अब भी
दूषित है। यह विरोधाभास
ही इस पूरे विमर्श
का केंद्र है, जब संसाधनों
की कमी नहीं, तो
परिणाम क्यों नहीं?
गंगा प्रदूषण का असली चेहरा
गंगा प्रदूषण को
लेकर अक्सर भावनात्मक बहस होती है,
लेकिन इसका समाधान वैज्ञानिक
दृष्टिकोण से ही संभव
है। विशेषज्ञों के अनुसार गंगा
में प्रदूषण के मुख्य स्रोत
हैं : घरेलू सीवेज (85 से 90 फीसदी), औद्योगिक कचरा (10से 12 फीसदी), धार्मिक गतिविधियां (बहुत कम, लगभग
5 से 10 फीसदी). यह आंकड़े एक
सच्चाई उजागर करते हैं, जिसे
हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं।
हम गंगा की सफाई
को आस्था से जोड़कर देखते
हैं, जबकि समस्या का
मूल कारण शहरीकरण और
औद्योगिक विस्तार है।
आस्था और वास्तविकता का टकराव
संकट मोचन फाउंडेशन के अध्यक्ष, संकट मोचन मंदिर के महंत और आईआईटी बीएचयु में इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर विश्वम्भरनाथ मिश्र का कहना है कि वाराणसी, जिसे
काशी कहा जाता है, गंगा के किनारे बसी वह नगरी है जहां हर दिन हजारों लोग स्नान, पूजा और आरती के लिए आते हैं। लेकिन इसी काशी में हर दिन लाखों लीटर सीवेज भी गंगा में गिरता है। पिछले वर्षों में यहां कई एसटीपी बनाए गए - दीनापुर, रामनगर, भगवतीपुर आदि। इनकी कुल क्षमता बढ़ाई गई, लेकिन कई नालों का अब भी डायवर्जन नहीं हुआ. कई प्लांट पूरी क्षमता से नहीं चल रहे. सीवर नेटवर्क अधूरा है. यानी गंगा तक पहुंचने से पहले गंदे पानी को रोकने की प्रक्रिया अब भी अधूरी है।कानपुर : उद्योगों का काला सच
अगर वाराणसी में सीवेज समस्या है, तो कानपुर में उद्योग गंगा के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। चमड़ा उद्योग (टेनरी) से निकलने वाला केमिकल युक्त पानी, क्रोमियम और अन्य भारी धातुएं गंगा में पहुंचाता है. पानी को जहरीला बनाता है. जलीय जीवन को खत्म करता है. हालांकि सरकार ने ईटीपी (इंफ्लूयेंट ट्रीटमेंट प्लांट) और एसटीपी ( सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट) स्थापित किए हैं, लेकिन उनका संचालन और निगरानी अब भी सवालों के घेरे में है।
नमामि गंगे : उपलब्धियां और सीमाएं
“नमामि गंगे” परियोजना को भारत सरकार की सबसे बड़ी नदी संरक्षण योजना माना जाता है। इसके तहत, सैकड़ों किमी सीवर लाइन बिछाई गई कई एसटीपी बनाए गए, घाटों का सौंदर्यीकरण हुआ, जनजागरूकता अभियान चलाए गए, कुछ सकारात्मक परिणाम भी सामने आए, कई स्थानों पर जल गुणवत्ता में सुधार, खुले में शौच की समस्या में कमी, घाटों की सफाई बेहतर हुई, लेकिन चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं : सीवेज की कुल मात्रा अधिक : एसटीपी का अधूरा उपयोग, रखरखाव में लापरवाही, निगरानी की कमी.
क्यों जरूरी है ट्रीटमेंट
गंगा में गिरने
वाला सीवेज पानी में बीओडी
(बॉयोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड) को बढ़ाता है।
जब बीओडी बढ़ता है, पानी
में ऑक्सीजन की मात्रा घटती
है, मछलियां और अन्य जीव
मरने लगते हैं, पानी
पीने योग्य नहीं रहता. इसलिए
जरूरी है कि हर
बूंद गंदे पानी को
पहले वैज्ञानिक तरीके से ट्रीट किया
जाए।
क्या होना चाहिए आगे?
गंगा को स्वच्छ
और अविरल बनाने के लिए कुछ
ठोस कदम आवश्यक हैं
: 1. सीवेज प्रबंधन को प्राथमिकता. हर
शहर के सभी नालों
को सीटीपी से जोड़ना होगा।
2. डिसेंट्रलाइज्ड ट्रीटमेंट सिस्टम : छोटे-छोटे स्थानीय
प्लांट स्थापित करने होंगे, ताकि
सीवेज का तुरंत निस्तारण
हो सके। 3. उद्योगों पर सख्त नियंत्रण
: ईटीपी का नियमित निरीक्षण
और उल्लंघन पर कड़ी कार्रवाई।
4. जनभागीदारी : स्थानीय लोगों को गंगा संरक्षण
से जोड़ना होगा। 5. प्रभावी मॉनिटरिंग सिस्टम : रियल टाइम मॉनिटरिंग
और पारदर्शिता जरूरी है।
आस्था बनाम जिम्मेदारी
गंगा के प्रति
आस्था भारतीय समाज की सबसे
बड़ी ताकत है। लेकिन
यह आस्था तभी सार्थक होगी
जब इसके साथ जिम्मेदारी
भी जुड़ी हो। हम
गंगा को “मां” कहते
हैं, तो क्या यह
हमारा कर्तव्य नहीं कि हम
उसे प्रदूषण से बचाएं?
समय की मांग, दिशा बदलने की
गंगा की सफाई का सवाल अब सिर्फ पर्यावरण का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्तित्व का प्रश्न बन चुका है। आज जरूरत है, दिखावे से बाहर निकलने की, योजनाओं की बजाय परिणाम पर ध्यान देने की, और सबसे महत्वपूर्ण, सीवेज को गंगा में जाने से रोकने की. क्योंकि सच यही है, गंगा को साफ करने के लिए अरबों रुपये नहीं, बल्कि सही दिशा और मजबूत इच्छाशक्ति चाहिए। अगर हम आज नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। गंगा आज भी बह रही है... लेकिन सवाल है, क्या वह निर्मल बहेगी, या हमारी लापरवाही के बोझ तले दम तोड़ देगी?









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