Tuesday, 31 March 2026

काशी के मंच पर ‘साझेदारी’ की चमक, लेकिन तस्वीर से गायब रहा एक अहम चेहरा

काशी के मंच परसाझेदारीकी चमक, लेकिन तस्वीर से गायब रहा एक अहम चेहरा 

मध्य प्रदेशउत्तर प्रदेश के औद्योगिक रिश्तों को नई दिशा देने का दावा, पर दृश्य प्रस्तुति ने खड़े किए कई असहज सवाल

सुरेश गांधी

वाराणसी. काशी की धरती एक बार फिर बड़े राजनीतिक और औद्योगिक संदेशों की साक्षी बनी। देश की सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले इस शहर में मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच औद्योगिक साझेदारी को मजबूत करने के लिए भव्य आयोजन किया गया। मंच सजा, समझौते हुए, भविष्य की संभावनाओं के सपने दिखाए गए और एलईडी स्क्रीन पर विकास की नई इबारत लिखी जाती रही। लेकिन इस चमक-दमक के बीच एक ऐसा खालीपन भी था, जिसने पूरे आयोजन की तस्वीर को अधूरा कर दिया। यह खालीपन थायोगी आदित्यनाथ की अनुपस्थिति का। सवाल केवल इतना नहीं कि मुख्यमंत्री कार्यक्रम में क्यों नहीं आए। सवाल इससे कहीं बड़ा हैजब समझौता दो राज्यों के बीच था, तो दृश्य और संदेश में संतुलन क्यों नहीं दिखा? क्यों मंच से लेकर स्क्रीन तक एक पक्ष की उपस्थिति इतनी प्रमुख रही कि दूसरा पक्ष लगभग गायब नजर आया? कार्यक्रम में मोहन यादव की मौजूदगी स्वाभाविक थी। उन्होंने अपनी सरकार के विजन और योजनाओं को प्रमुखता से रखा। लेकिन जब आयोजन काशी में हो रहा होजो उत्तर प्रदेश की पहचान का केंद्र हैतो वहां के मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति केवल प्रोटोकॉल का मामला नहीं रह जाती, बल्कि यह एक प्रतीकात्मक सवाल बन जाती है। 

आज के दौर में राजनीति केवल फैसलों से नहीं, बल्कि दृश्य प्रस्तुति (विसुअल ऑप्टिक्स) से भी संचालित होती है। एलईडी स्क्रीन, होर्डिंग और डिजिटल बैनर केवल सजावट नहीं होते, वे एक संदेश गढ़ते हैं। इस कार्यक्रम में जो संदेश उभरा, वह साझेदारी से ज्यादा एकतरफा प्रस्तुति का लगा। यह स्थिति तब और असहज हो जाती है जब जनता यह महसूस करने लगे किसाझा प्रयासका मंच कहींएक पक्षीय प्रदर्शनमें तब्दील हो गया। यह भी संभव है कि योगी आदित्यनाथ की अनुपस्थिति महज व्यस्तताओं या पूर्व निर्धारित कार्यक्रमों का परिणाम हो। शासन-प्रशासन में यह सामान्य बात है कि हर कार्यक्रम में शीर्ष नेतृत्व की मौजूदगी संभव नहीं होती। लेकिन सवाल तब उठता है जब उनकी अनुपस्थिति के साथ-साथ उनकी दृश्य उपस्थिति भी पूरी तरह गायब हो जाए। क्या यह केवल आयोजन की चूक थी, या फिर यह जानबूझकर तय की गई प्रस्तुति? अगर यह चूक थी, तो यह एक गंभीर प्रशासनिक कमी है। और अगर यह रणनीति थी, तो यह साझेदारी की भावना के विपरीत एक संकेत है।

वाराणसी जैसे शहर में, जहां हर आयोजन अपने आप में एक संदेश होता है, वहां इस तरह की असंतुलित प्रस्तुति कई तरह की व्याख्याओं को जन्म देती है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या आयोजकों ने स्थानीय नेतृत्व और भावनाओं का पर्याप्त सम्मान किया? क्या इस आयोजन में साझेदारी का भाव केवल कागजों तक सीमित रह गया? औद्योगिक समझौते केवल कागजी दस्तावेज नहीं होते, वे विश्वास और समन्वय की नींव पर टिके होते हैं। जब दो राज्य मिलकर आगे बढ़ने की बात करते हैं, तो उस साझेदारी का हर पहलूचाहे वह मंच हो, संदेश हो या प्रस्तुतिसंतुलित और समावेशी होना चाहिए।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक और बड़ा सवाल खड़ा किया हैक्या आज की राजनीति मेंऑप्टिक्स” (दिखावट), वास्तविक साझेदारी पर भारी पड़ने लगी है? क्या हम विकास के नाम पर ऐसे आयोजनों को केवलइवेंट मैनेजमेंटतक सीमित कर रहे हैं, जहां वास्तविक साझेदारी की भावना पीछे छूट जाती है? जरूरत इस बात की है कि ऐसे आयोजनों में केवल समझौते ही नहीं, बल्कि साझा सम्मान और संतुलन भी नजर आए। क्योंकि जब तस्वीर अधूरी होती है, तो संदेश भी अधूरा रह जाता है। काशी का यह आयोजन विकास की दिशा में एक कदम जरूर था, लेकिन इसकी प्रस्तुति ने यह याद दिला दिया कि साझेदारी केवल कागजों पर नहीं, बल्कि मंच और संदेश दोनों में बराबरी से दिखनी चाहिए।

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