Monday, 20 April 2026

डिजिटल लोकतंत्र का ‘डार्क वेब’ : फेक न्यूज़, डेटा सौदेबाज़ी और चुनावी खेल का खतरनाक गठजोड़

डिजिटल लोकतंत्र काडार्क वेब’ : फेक न्यूज़, डेटा सौदेबाज़ी और चुनावी खेल का खतरनाक गठजोड़ 

मोबाइल की स्क्रीन पर सिमटता लोकतंत्र अब एक खतरनाक मोड़ पर खड़ा है। फेसबुक, वाट्स्प एवं इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म, जो कभी संवाद के साधन थे, आज चुनावी रणनीति के सबसे तेज़ हथियार बन चुके हैं।फ्रीसेवा के नाम पर जुटाया गया डेटा अब मतदाता की सोच को दिशा देने का औजार बन गया है। एल्गोरिद्म तय कर रहे हैं कि आप क्या देखेंगे, क्या सोचेंगे और अंततः किसे चुनेंगे। चुनावी मैदान में अब मुद्दों से ज्यादानैरेटिवलड़ रहे हैं, और सच्चाई से पहले अफवाहें जीत रही हैं। इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया की सीमाएं तकनीक की रफ्तार के सामने छोटी पड़ती दिखती हैं, जबकि राजनीतिक दल डिजिटल प्रचार पर खुलकर निवेश कर रहे हैं। गांव की चौपाल से लेकर शहर की बहस तक, हर जगह एक अदृश्य खेल चल रहा है, जहां मतदातायूजरनहीं, बल्किडेटा प्रोफाइलबन चुका है। यह सिर्फ तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा पर सवाल है। अगर समय रहते इसे नहीं समझा गया, तो आने वाले चुनाव मतपत्रों से नहीं, बल्कि मोबाइल केफॉरवर्डऔर एल्गोरिद्म के इशारों पर तय होंगे

सुरेश गांधी

लोकतंत्र कभी चौपालों में सांस लेता था, कभी नुक्कड़ों पर बहस करता था और कभी जनसभाओं में अपनी ताकत दिखाता था। लेकिन अब यह सब सिमटकर एक छोटी-सी मोबाइल स्क्रीन में कैद हो गया है। उंगलियों की हल्की-सी हरकत से जनमत बनता भी है और बिगड़ता भी। यही वह नया दौर है, जहां सूचना शक्ति है, और उसी सूचना का दुरुपयोग सबसे बड़ा खतरा भी। फेसबुक, वाट्स्प एवं इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म अब सिर्फ मनोरंजन या निजी संवाद के साधन नहीं रहे। ये आज केडिजिटल लोकतंत्रके सबसे प्रभावशाली मंच बन चुके हैं। लेकिन इसी के साथ एक गहरी चिंता भी उभर रही है, क्या यह डिजिटल विस्तार लोकतंत्र को मजबूत कर रहा है, या उसे एक अदृश्य जाल में उलझा रहा है? वैसे भी लोकतंत्र की बुनियादसूचनापर टिकी होती है. या यूं कहे लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है, सूचना। लेकिन जब यही सूचना झूठ याभ्रामकबन जाती है, तो वही ताकत सबसे बड़ा खतरा भी बन जाती है। लोकतंत्र की पूरी इमारत हिलने लगती है।

आज का सबसे बड़ा संकट यही है कि सच अब सूचना नहीं, विकल्प बन गया है; और झूठ, एकरणनीति आज देश का मतदाता जितना जागरूक दिखता है, उतना ही वह डिजिटल भ्रमजाल के बीच खड़ा है। एक क्लिक, एक शेयर और एक फॉरवर्ड, इतना काफी है किसी भी मुद्दे को हवा देने के लिए। वाट्स्प के एक ग्रुप से निकली अफवाह, फेसबुक पर वायरल होती है और इंस्टाग्राम के जरिए भावनाओं का रूप ले लेती है। जब तक सच्चाई सामने आती है, तब तकझूठअपना काम कर चुका होता है, मतदाता की सोच को प्रभावित कर चुका होता है। यह अलग बात है कि फेसबुक, वाट्स्प एवं इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म ने सूचना को लोकतांत्रिक जरूर बनाया, लेकिन उसी के साथफेक न्यूज़को भी अभूतपूर्व ताकत दे दी। अब हर व्यक्ति एक संभावित प्रकाशक है, बिना किसी संपादकीय जिम्मेदारी, बिना किसी सत्यापन के। फेक न्यूज़ की सबसे बड़ी ताकत उसकीसच्चाईनहीं, बल्कि उसकीसंवेगशीलताहै। जो खबर गुस्सा दिलाए, वह ज्यादा फैलती है. जो डर पैदा करे, वह ज्यादा वायरल होती है, जो किसी पूर्वाग्रह को पुष्ट करे, वह तुरंत स्वीकार हो जाती है, यानी झूठ, इंसानी मनोविज्ञान का फायदा उठाता है। सच को प्रमाण चाहिए, समय चाहिए, जबकि झूठ को सिर्फशेयरचाहिए।

अफवाह का विज्ञान : क्यों तेजी से फैलता है झूठ?

डिजिटल युग में झूठ सिर्फ सूचना नहीं, बल्किभावनाबनकर फैलता है। अगर कोई खबर गुस्सा पैदा करती है, वह ज्यादा तेजी से फैलती है. अगर कोई पोस्ट डर पैदा करती है, लोग उसे तुरंत साझा करते हैं. अगर कोई संदेश किसी समुदाय या नेता के खिलाफ हो, वहवायरलहो जाता है. यानी अब सूचना का मूल्य उसकी सच्चाई से नहीं, बल्कि उसकीउत्तेजनासे तय होता है। यही कारण है कि फेक न्यूज़ आज सिर्फ तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संकट बन चुकी है।

चुनाव और फेक न्यूज : खतरनाक गठजोड़

चुनाव के समय यह संकट कई गुना बढ़ जाता है। राजनीतिक दल और उनके समर्थक सोशल मीडिया कोप्रचार के हथियारकी तरह इस्तेमाल करते हैं। विरोधी दल के खिलाफ झूठी खबरें फैलाना. एडिटेड वीडियो और पुराने फोटो को नया बताकर पेश करना. जाति, धर्म और क्षेत्र के आधार पर भावनाएं भड़काना. यह सब अब आम रणनीति का हिस्सा बन चुका है। चुनाव आयोग ने इस पर रोक लगाने के लिए दिशा-निर्देश बनाए हैं, लेकिन डिजिटल प्लेटफॉर्म की रफ्तार इतनी तेज है कि हर अफवाह को समय पर रोक पाना लगभग असंभव हो जाता है। गांवों मेंवायरल सच जहां अफवाह ही हकीकत बन जाती है. शहरों में लोग कुछ हद तक जानकारी की जांच कर लेते हैं, लेकिन ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में स्थिति अलग है। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटीसबसे बड़ा ज्ञान स्रोतबन चुकी है. एक वीडियो या मैसेज ही अंतिम सत्य मान लिया जाता है. स्थानीय स्तर पर कोईफैक्ट-चेकव्यवस्था नहीं होती. यही वजह है कि ग्राम पंचायत से लेकर विधानसभा तक, सोशल मीडिया का प्रभाव निर्णायक होता जा रहा है। एक अफवाह पूरे गांव का रुख बदल सकती है।

लोकतंत्र पर सीधा हमला

फेक न्यूज़ सिर्फ सूचना की समस्या नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सीधा हमला है। 1. मतदाता की सोच को विकृत करना : मतदाता निर्णय तथ्यों पर नहीं, बल्कि भ्रम पर लेने लगता है। 2. सामाजिक ध्रुवीकरण : जाति, धर्म और क्षेत्र के नाम पर नफरत फैलाना आसान हो जाता है। 3. संस्थाओं पर अविश्वास : जब झूठ बार-बार फैलता है, तो लोग मीडिया, सरकार और यहां तक कि इलेक्शन कमीशन आफ इंडिया जैसी संस्थाओं पर भी शक करने लगते हैं। 

चुनाव : फेक न्यूज़ कापीक सीजन

चुनाव के दौरान फेक न्यूज़ अपने चरम पर होती है। एडिटेड वीडियो पुराने फोटो को नया बताना, झूठे बयान गढ़ना. यह सबचुनावी हथियारबन चुके हैं। समस्या यह है कि जब तक खंडन होता है, तब तक, “डैमेजहो चुका होता है। मतदाता के मन में संदेह बैठ चुका होता है, और वही संदेह उसके वोट को प्रभावित करता है।

एल्गोरिद्म का खेलः आपको वही दिखेगा, जो आपको प्रभावित करे

लोकतंत्र का चेहरा बदल रहा है, अब यह सिर्फ वोटिंग मशीनों और रैलियों तक सीमित नहीं, बल्किएल्गोरिद्मऔरडेटाके जटिल खेल में उलझ चुका है। सत्ता की राह अब भी जनता से होकर ही गुजरती है, लेकिन उस जनता तक पहुंचने का रास्ता अब डिजिटल हो गया है, और यही रास्ता सबसे ज्यादा नियंत्रित भी है। फेसबुक, वाट्स्प एवं इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म अब चुनावी रणनीति केवार रूमबन चुके हैं। यहां भाषण नहीं, बल्किडेटाबोलता है; यहां विचारधारा नहीं, बल्किटारगेटिंगकाम करती है। मेटा प्लेटफार्म जैसे प्लेटफॉर्म का एल्गोरिद्मसचनहीं, “एंगेजमेंटको प्राथमिकता देता है। जो ज्यादा क्लिक हो, वही ज्यादा दिखे, जो ज्यादा विवाद पैदा करे, वही ज्यादा फैले. मतलब साफ है एल्गोरिद्म इस तरह काम करता है कि आपको वही कंटेंट दिखे, जो आपकी सोच से मेल खाता हो। यानी फेक न्यूज़ को सिस्टम खुद बढ़ावा देता है, भले ही अनजाने में। यानी समस्या सिर्फ यूजर की नहीं, प्लेटफॉर्म की संरचना में भी है। इससे धीरे-धीरे आपकी सोचएकतरफाहो जाती है. विरोधी विचार आप तक पहुंचते ही नहीं. इसेइको चैंबरकहा जाता है, जहां आप सिर्फ अपनी ही आवाज सुनते हैं। यानी एल्गोरिद्मसंतुलननहीं, बल्किसंवेगको बढ़ावा देता है। यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है, क्योंकि इससे गंभीर मुद्दे पीछे छूट जाते हैं. सतही और उत्तेजक बातें आगे जाती है. बहस की जगह टकराव ले लेता है. क्योंकि लोकतंत्र संवाद और विविधता पर टिका होता है, कि एकरूपता पर।

क्या कानून नाकाफी हैं?

भारत में फेक न्यूज़ से निपटने के लिए कानून और दिशा-निर्देश मौजूद हैं, लेकिन उनकी प्रभावशीलता सीमित है। कार्रवाई धीमी है, स्रोत पकड़ना मुश्किल है, प्लेटफॉर्म की जवाबदेही स्पष्ट नहीं, चुनाव आयेग ने प्रयास जरूर किए हैं, लेकिन डिजिटल स्पेस की जटिलता उनके सामने बड़ी चुनौती है।

सिर्फ सरकार नहीं, समाज भी जिम्मेदार

फेक न्यूज़ से लड़ाई सिर्फ कानून से नहीं जीती जा सकती। 1. प्लेटफॉर्म की जवाबदेही : फेक कंटेंट हटाने और एल्गोरिद्म सुधारने की जिम्मेदारी तय हो। 2. त्वरित फैक्ट-चेक : रियल-टाइम में झूठ का खंडन जरूरी है। 3. नागरिक की सतर्कता : हरफॉरवर्डको सच मानने की आदत खत्म करनी होगी। 4. मीडिया की विश्वसनीयता : पारंपरिक मीडिया को अपनी साख मजबूत करनी होगी, ताकि लोग उस पर भरोसा करें।

लोकतंत्र की असली लड़ाई

फेक न्यूज़ के दौर में लोकतंत्र की असली लड़ाईवोटकी नहीं, “विवेककी है। अगर मतदाता सच और झूठ में फर्क नहीं कर पाएगा, तो चुनाव निष्पक्ष नहीं रहेंगे, चाहे प्रक्रिया कितनी भी पारदर्शी क्यों हो। आज जरूरत है कि हम यह समझें, लोकतंत्र सिर्फ वोट देने का अधिकार नहीं, बल्कि सही जानकारी के आधार पर निर्णय लेने की जिम्मेदारी भी है। क्योंकि जब झूठ हावी होता है, तो हार सिर्फ सच की नहीं होती, लोकतंत्र की भी होती है।

फ्री का लालच, डेटा का व्यापार : असली खेल क्या है?

सोशल मीडिया का सबसे बड़ा आकर्षण है, “सब कुछ मुफ्त कोई शुल्क नहीं, कोई बाध्यता नहीं। गांव का युवा, शहर का व्यापारी, छात्र, किसान, हर कोई इस डिजिटल दुनिया में शामिल हो रहा है। लेकिन क्या सच में यह सब मुफ्त है? हकीकत यह है कि यहांमुफ्तकुछ भी नहीं। यहां कीमत चुकाई जाती है, आपके डेटा से, आपकी पसंद से, आपकी सोच से। आप क्या देखते हैं, क्या पढ़ते हैं, किस पर प्रतिक्रिया देते हैं, हर गतिविधि दर्ज होती है और उसका इस्तेमाल किया जाता है। मेटा प्लेटफार्म जैसी कंपनियों का पूरा ढांचा इसीडेटा अर्थव्यवस्थापर टिका है। आम यूजर इस व्यवस्था में ग्राहक नहीं, बल्कि एकउत्पादबन जाता है, जिसे विज्ञापनदाताओं और राजनीतिक दलों के सामने पेश किया जाता है। यही वह बिंदु है जहां लोकतंत्र और बाजार की रेखाएं धुंधली होने लगती हैं।

राजनीति का डिजिटलरण : गांव से संसद तक एक ही मंच

एक समय था जब चुनाव प्रचार का मतलब होता था, पोस्टर, बैनर, रैलियां और घर-घर संपर्क। लेकिन अब यह पूरा समीकरण बदल चुका है। आज ग्राम पंचायत का उम्मीदवार भी फेसबुक पेज बनाता है, व्हाट्सएप ग्रुप चलाता है और वीडियो संदेश जारी करता है। वहीं राष्ट्रीय स्तर की पार्टियां डेटा एनालिटिक्स और एल्गोरिद्म के जरिए मतदाताओं की सोच को समझने और प्रभावित करने की कोशिश करती हैं। यह बदलाव सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति का भी परिवर्तन है। मतदाता अबलाइवटारगेट किया जा सकता है. हर वर्ग के लिए अलग संदेश तैयार होता है. प्रचार का असर मापा भी जाता है और उसी के अनुसार रणनीति बदली जाती है. यानी चुनाव अब सिर्फ जनसमर्थन की लड़ाई नहीं, बल्किडिजिटल रणनीतिका खेल बन गया है।

क्या चुनाव आयोग बेबस है? सीमाएं और चुनौतियां

इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ा सवाल उठता है, क्या सुनाव आयेग सोशल मीडिया पर प्रभावी नियंत्रण कर सकता है? सैद्धांतिक रूप से आयोग के पास अधिकार हैं। उसनेमॉडल कोड ऑफ कंडक्टलागू किया है, सोशल मीडिया विज्ञापनों के लिए प्री-सर्टिफिकेशन की व्यवस्था की है और खर्च की निगरानी भी करता है। लेकिन व्यवहारिक स्तर पर चुनौतियां बहुत बड़ी हैं, सोशल मीडिया कंपनियां वैश्विक हैं, जबकि आयोग का अधिकार क्षेत्र राष्ट्रीय. एक पोस्ट लाखों लोगों तक सेकंडों में पहुंच जाती है. फेक अकाउंट और बॉट्स के जरिए असली स्रोत छिपा रहता है. चुनावी आचार संहिता लागू होते-होते कई बार नुकसान हो चुका होता है. यानी आयोग के पास नियम हैं, लेकिन तकनीक की गति उन नियमों से कहीं तेज है।

अफवाहों का तांडव : सच हमेशा पीछे क्यों रह जाता है?

डिजिटल युग का सबसे खतरनाक पहलू है, अफवाहों की रफ्तार। एक भ्रामक पोस्ट, एक एडिटेड वीडियो या एक झूठी खबर, कुछ ही मिनटों में हजारों-लाखों लोगों तक पहुंच जाती है। लोग उसे बिना जांचे-परखे आगे बढ़ा देते हैं। जब तक सच्चाई सामने आती है, तब तक, मतदाता का मन प्रभावित हो चुका होता है. सामाजिक तनाव पैदा हो चुका होता है. राजनीतिक ध्रुवीकरण गहरा हो चुका होता है. ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां डिजिटल साक्षरता अभी सीमित है, यह प्रभाव और भी गहरा होता है। वहां एक वायरल मैसेज हीसचबन जाता है। यही वह स्थिति है, जहां लोकतंत्र की निष्पक्षता पर सबसे बड़ा खतरा मंडराता है।

पैसे का खेल : डिजिटल प्रचार और असमानता

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रचारफ्रीनहीं है, कम से कम राजनीतिक दलों के लिए तो बिल्कुल नहीं। पार्टियां भारी-भरकम रकम खर्च कर टारगेटेड विज्ञापन चलाती हैं। यानी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पहुंच (रीच) भी अबखरीदीजाती है। यह विज्ञापन इतने सटीक होते हैं कि हर व्यक्ति को उसकी सोच और रुचि के अनुसार कंटेंट दिखता है। इसका सीधा असर यह होता है कि बड़े दलों को ज्यादा फायदा मिलता है. छोटे उम्मीदवार पीछे छूट जाते हैं. “समान अवसरका सिद्धांत कमजोर पड़ जाता है. यानी लोकतंत्र का मैदान बराबरी का नहीं रह जाता, बल्कि पैसे और तकनीक की ताकत से झुकने लगता है। आयोग ने खर्च की सीमा तय की है, लेकिन डिजिटल विज्ञापन की निगरानी अभी भी चुनौतीपूर्ण है। कई बार खर्चअप्रत्यक्षरूप से होता है, थर्ड पार्टी पेज, इनफ्लुएंसर और ग्रुप्स के जरिए। यानी पैसा सीधे नहीं दिखता, लेकिन उसका असर साफ नजर आता है।

समाधान : क्या किया जा सकता है?

समस्या जितनी जटिल है, समाधान भी उतना ही बहुआयामी होना चाहिए। पहला, कानूनी सख्ती और जवाबदेही. सोशल मीडिया कंपनियों को स्थानीय कानूनों के दायरे में लाना होगा। उन्हें यह बताना होगा कि कौन-सा विज्ञापन किसने दिया और कितना खर्च हुआ। दूसरा, रियल-टाइम निगरानी. चुनाव के दौरान एक विशेष तंत्र होना चाहिए, जो फेक न्यूज और भ्रामक कंटेंट पर तुरंत कार्रवाई करे। तीसरा, डिजिटल साक्षरता. जनता को यह सिखाना होगा कि हर वायरल चीज सच नहीं होती। जागरूक मतदाता ही लोकतंत्र की असली ताकत है। चौथा : राजनीतिक इच्छाशक्ति, जब तक राजनीतिक दल खुद इस खेल में पारदर्शिता नहीं अपनाएंगे, तब तक कोई भी नियम पूरी तरह प्रभावी नहीं हो सकता। मतलब साफ है त्वरित फैक्ट-चेक तंत्र यानी हर वायरल कंटेंट की तुरंत जांच और खंडन जरूरी है। सोशल मीडिया कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि फेक अकाउंट और बॉट्स पर कड़ी कार्रवाई हो. सबसे जरूरी है, यूजर खुद सतर्क बने। हर संदेश को सच मानने से पहले उसकी पुष्टि करे। फेक न्यूज़ फैलाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, खासकर चुनाव के दौरान।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा

आज लोकतंत्र की लड़ाई मैदान में नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन पर लड़ी जा रही है। यहां तो कोई स्पष्ट नियम है, कोई सीमाएं। यानी आज लोकतंत्र एक नए मोड़ पर खड़ा है। फेक न्यूज़ इस लड़ाई का सबसे बड़ा हथियार बन चुकी है, एक ऐसा हथियार, जो बिना आवाज के हमला करता है और बिना निशान छोड़े असर डालता है। मतलब साफ है एक ओर तकनीक ने उसे तेज, व्यापक और सशक्त बनाया है, तो दूसरी ओर वही तकनीक उसे भ्रम, दुष्प्रचार और असमानता के खतरे में भी डाल रही है। यह तय करना अब हमारे हाथ में है कि हम इस तकनीक का इस्तेमाल लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए करेंगे या उसे एकडिजिटल जालमें फंसने देंगे। अगर समय रहते संतुलन नहीं बनाया गया, तो वह दिन दूर नहीं जब चुनाव मतपेटियों से नहीं, बल्कि एल्गोरिद्म और वायरल पोस्ट से तय होंगे। या यूं कहे वह दिन दूर नहीं जब मतदाता का निर्णय उसकी सोच से नहीं, बल्कि उसके मोबाइल में आएफॉरवर्डसे तय होगा। और तब लोकतंत्र का चेहरा वही होगा, जो हमें स्क्रीन पर दिखाया जाएगा, कि वह, जो सच्चाई में मौजूद है।

चुनाव का नया गणित : डेटा ही असली ताकत

पहले चुनावी रणनीति अनुभव और जमीनी फीडबैक पर आधारित होती थी। अब यहडेटा एनालिटिक्सपर टिकी है। मेटा प्लेब्टफार्म जैसे प्लेटफॉर्म यूजर्स की हर गतिविधि का विश्लेषण करते हैं, कौन किस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देता है, किस तरह के वीडियो ज्यादा देखता है, किस समय ऑनलाइन रहता है. यह डेटा राजनीतिक दलों के लिए सोने की खान है। अब प्रचारएक जैसानहीं होता, हर व्यक्ति के लिए अलग होता है। यानी हर मतदाता को वही दिखाया जाता है, जो उसे प्रभावित कर सके।

माइक्रो-टारगेटिंग : मतदाता अबडेटा प्रोफाइल

डिजिटल चुनावी रणनीति का सबसे ताकतवर हथियार है, माइक्रो-टारगेटिंग। युवा मतदाताओं को रोजगार और स्टार्टअप के संदेश, किसानों को समर्थन मूल्य और योजनाओं की जानकारी, महिलाओं को सुरक्षा और कल्याण योजनाओं का प्रचार. हर वर्ग के लिए अलगनैरेटिवतैयार किया जाता है। इसका फायदा यह है कि संदेश सटीक होता है। लेकिन खतरा यह है कि मतदाता कोपूरा सचनहीं, बल्किचुना हुआ सचदिखाया जाता है।

संतुलन ही समाधान

1. एल्गोरिद्म की पारदर्शिता : कंपनियों को बताना होगा कि कंटेंट कैसे और क्यों दिखाया जा रहा है। 2. डिजिटल खर्च की सख्त निगरानी : हर विज्ञापन का स्रोत और खर्च सार्वजनिक होना चाहिए। 3. स्वतंत्र फैक्ट-चेक सिस्टम : रियल-टाइम में गलत सूचना का खंडन जरूरी है। 4. मतदाता की जागरूकता : सबसे बड़ा हथियार अब भी जागरूक नागरिक ही है।

सत्ता की नई कुंजी, डेटा और धारणा

आज सत्ता की कुंजी सिर्फ जनसमर्थन नहीं, बल्किडेटाऔरधारणाबन चुकी है। जो पार्टी इन दोनों को साध लेती है, वह चुनावी मैदान में बढ़त बना लेती है। लेकिन सवाल यह है, क्या यह लोकतंत्र का स्वस्थ रूप है? अगर मतदाता की सोच कोडिजिटल टूल्सके जरिए नियंत्रित किया जाएगा, तो लोकतंत्र का मूल उद्देश्यकृस्वतंत्र और निष्पक्ष निर्णय, कहां रह जाएगा? समय गया है कि इसअंदरूनी खेलको समझा जाए, उस पर सवाल उठाए जाएं और उसे संतुलित किया जाए। क्योंकि लोकतंत्र सिर्फ जीतने का नाम नहीं है, यह निष्पक्षता, पारदर्शिता और विश्वास का नाम है।  

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