काशी की कंदराओं में गूंजा ‘हिंदू राष्ट्र’ का स्वर : आस्था, विवाद और सवालों के बीच शास्त्री का संदेश
ज्ञानवापी से लेकर राष्ट्र की अवधारणा तक, बागेश्वर पीठाधीश्वर के बयान ने फिर छेड़ी बहस
सुरेश गांधी
वाराणसी। सनातन की अनादि नगरी काशी, जहां हर श्वास में इतिहास और हर आहट में आस्था बसती है, वहीं एक बार फिर वैचारिक तरंगों का ज्वार उठ खड़ा हुआ। धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के काशी प्रवास के दौरान दिया गया बयान अब केवल धार्मिक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बनता जा रहा है।
एक समारोह में काशी आएं शास्त्री ने जहां काशी विश्वनाथ मंदिर की महिमा का गुणगान किया, वहीं ज्ञानवापी परिसर को लेकर दिए गए उनके कथन ने एक बार फिर इतिहास, न्याय और राजनीति के त्रिकोण को जीवंत कर दिया।
“कलंक हटेगा, अभिषेक होगा” - ज्ञानवापी पर आस्था का उद्घोष
काशी की उदारता : सहअस्तित्व का जीवंत उदाहरण
शास्त्री ने काशी को
“उदारता का सर्वोच्च प्रतीक”
बताया। उन्होंने कहा कि यहां
हिंदू और मुस्लिम समुदाय
साथ रहते हैं और
परस्पर आर्थिक-सामाजिक संबंधों में जुड़े हैं।
उन्होंने यह भी उल्लेख
किया कि मंदिरों के
आसपास मुस्लिम दुकानदारों की उपस्थिति इस
सहअस्तित्व की जीवंत मिसाल
है। यह टिप्पणी उस
गंगा-जमुनी तहजीब की ओर इशारा
करती है, जिसने काशी
को केवल धार्मिक ही
नहीं, बल्कि सांस्कृतिक राजधानी भी बनाया है।
“हिंदू राष्ट्र” की पुकार, विचार या विवाद?
काशी : जहां हर विचार बनता है विमर्श
काशी केवल मंदिरों और घाटों का शहर नहीं, बल्कि विचारों की प्रयोगशाला भी है। यहां उठी हर आवाज देशव्यापी चर्चा का रूप ले लेती है। धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का यह बयान भी उसी परंपरा का हिस्सा है, जहां धर्म, राजनीति और समाज एक-दूसरे से टकराते भी हैं और संवाद भी करते हैं।
आस्था बनाम संवैधानिक संतुलन
इस पूरे प्रकरण
को केवल एक भाषण
या विवाद के रूप में
देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह
उस गहरे द्वंद्व का
प्रतीक है, जिसमें एक
ओर सांस्कृतिक अस्मिता की पुनर्स्थापना की
आकांक्षा है, तो दूसरी
ओर संविधान द्वारा स्थापित बहुलतावादी ढांचा। भारत की शक्ति
उसकी विविधता में निहित है।
काशी इसका जीवंत उदाहरण
है, जहां मंदिर की
घंटियां और अज़ान की
आवाजें साथ गूंजती हैं।
ऐसे में किसी भी
विचार को आगे बढ़ाते
समय यह सुनिश्चित करना
आवश्यक है कि सामाजिक
संतुलन और सद्भावना बनी
रहे।
काशी की आत्मा क्या कहती है?
काशी की आत्मा
संघर्ष नहीं, समन्वय की पक्षधर रही
है। यहां हर विचार
को स्थान मिला, लेकिन किसी एक विचार
को सर्वोपरि नहीं बनाया गया।
शास्त्री का बयान आस्था
की अभिव्यक्ति है, लेकिन यह
भी उतना ही सत्य
है कि भारत की
पहचान उसकी समावेशी प्रकृति
में है। अब प्रश्न
यह नहीं कि ‘क्या
कहा गया’, बल्कि यह है कि
‘समाज उसे किस दिशा
में ले जाता है’।





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