स्वरों की
नींव
पर
सजा
रागों
का
महल
जब काशी ने ओढ़ी सुरों की चादर : दूसरी निशा में जाग उठा संगीत का आत्मलोक
सुर, साधना
और
समरसता
की
रात,
काशी
में
गूंजा
रागों
का
अनंत
संसार
सुरेश गांधी
वाराणसी। काशी की आध्यात्मिक
वेला में जब रात
अपने चरम पर होती
है, तब संकट मोचन
संगीत समारोह केवल एक आयोजन
नहीं रह जाता, बल्कि
वह साधना, समर्पण और सुरों का
जीवंत महाकुंभ बन जाता है।
103वें समारोह की दूसरी निशा
भी कुछ ऐसी ही
रही, जहां थकान का
अस्तित्व संगीत की तरंगों में
विलीन हो गया और
हर श्रोता सुरों की धारा में
डूबता चला गया. दिनभर
की व्यस्तता और रात्रि जागरण
के बावजूद जैसे ही शाम
ढली, मंदिर परिसर में संगीत प्रेमियों
का सैलाब उमड़ पड़ा। यह
वही काशी है, जहां
संगीत केवल सुना नहीं
जाता, बल्कि जिया जाता है।
और जब मंच सजा,
तो लगा मानो स्वरों
की नींव पर रागों
का एक विराट महल
खड़ा हो रहा हो।
ड्रम, धुन और दैवीय स्पंदन : पहली प्रस्तुति ने बांधा समां
मोहन वीणा और सात्विक वीणाः शांति का राग, आत्मा का संवाद
दूसरी प्रस्तुति में ग्रैमी सम्मानित पंडित विश्व मोहन भट्ट और उनके सुपुत्र सलिल भट्ट ने मोहन वीणा और सात्विक वीणा की जुगलबंदी से वातावरण को दिव्यता से भर दिया। राग विश्वरंजनी में आलाप, जोड़ और झाला के क्रम ने जैसे श्रोताओं को ध्यान की अवस्था में पहुंचा दिया। मध्य लय और द्रुत लय की गतकारी के साथ तीन ताल की प्रस्तुति में दोनों वाद्यों के बीच संवाद ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो दो साधक आत्मा के स्तर पर एक-दूसरे से संवाद कर रहे हों। रामधुन के साथ इस प्रस्तुति का समापन हुआ, जिसने पूरे वातावरण को भक्ति में रंग दिया। तबले पर पं. रामकुमार मिश्र और कौशिक कुंवर की संगत ने इस जुगलबंदी को और प्रभावशाली बना दिया।
तबला जुगलबंदी : लय के भीतर संवाद का सौंदर्य
तीसरी प्रस्तुति में अजराड़ा घराना
के जरगाम अकरम खां और
दिल्ली घराना के खुर्रम अली
नियाजी ने तबले की
जुगलबंदी प्रस्तुत कर श्रोताओं को
लय की गहराइयों से
परिचित कराया। तीनताल में पेशकार, कायदा,
टुकड़ा और रेला की
प्रस्तुति के दौरान दोनों
कलाकारों के बीच सवाल-जवाब का क्रम
अत्यंत रोचक रहा। हर
तिहाई के साथ श्रोताओं
की वाहवाही गूंज उठती। संवादिनी
पर मोहित साहनी और सारंगी पर
अमान खां की संगत
ने इस प्रस्तुति में
मधुरता का स्पर्श जोड़ा,
जिससे पूरी प्रस्तुति एक
संतुलित संगीत अनुभव बन गई।
चौथी प्रस्तुति में रामपुर घराना के गुलाम अब्बास खां ने अपने गायन से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। राग बिहाग में विलंबित ख्याल से शुरुआत करते हुए उन्होंने स्वर विस्तार की ऐसी बुनावट रची कि वातावरण पूरी तरह रसमय हो उठा।
इसके बाद द्रुत
लय में छोटा ख्याल
और राग सोहनी की
बंदिश “ऐसो कन्हाई मानत
नाहीं” ने प्रस्तुति को
चरम पर पहुंचा दिया।
तबले पर उस्ताद अकरम
खां, संवादिनी पर पं. धर्मनाथ
मिश्र और सारंगी पर
विनायक सहाय की संगत
ने इस प्रस्तुति को
और अधिक प्रभावशाली बना
दिया।
बनारस घराने की थाप : जब इतिहास ने ली ताल में सांस
सितार की साधना : राग परमेश्वरी में डूबा परिसर
छठवीं प्रस्तुति में कोलकाता से
आए विख्यात सितार वादक पं. कुशल
दास ने राग परमेश्वरी
में आलापचारी से शुरुआत की।
उनके सितार के सुर जैसे
मंदिर परिसर में एक अदृश्य
धारा की तरह बहने
लगे। इसके बाद तीनताल
में गतकारी और राग ललित
के स्पर्श ने इस प्रस्तुति
को आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान की। तबले पर
पं. संजू सहाय की
संगत ने इस प्रस्तुति
को और भी सजीव
बना दिया। श्रोता इस दौरान पूर्णतः
ध्यानमग्न दिखाई दिए।
अंतिम प्रस्तुति : भैरव के साथ भोर की आहट
दूसरी निशा की अंतिम
प्रस्तुति में पं. जसराज
के शिष्य पं. रतन मोहन
शर्मा ने अपने पुत्र
स्वर शर्मा के साथ गायन
प्रस्तुत किया। राग भैरव की
गंभीरता और प्रातःकालीन रागों
की मधुरता ने इस प्रस्तुति
को एक अद्भुत समापन
प्रदान किया। ऐसा लगा मानो
संगीत स्वयं भोर का स्वागत
कर रहा हो। तबले
पर पं. रामकुमार मिश्र
और संवादिनी पर पं. धर्मनाथ
मिश्र की संगत ने
इस प्रस्तुति को पूर्णता प्रदान
की।
संगीत बना साधना, काशी बनी साक्षी
इस प्रकार संकट मोचन की दूसरी निशा केवल प्रस्तुतियों का क्रम नहीं रही, बल्कि यह एक आध्यात्मिक यात्रा बन गईकृजहां हर राग एक प्रार्थना था, हर ताल एक ध्यान। काशी ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि यहां संगीत केवल कला नहीं, बल्कि साधना है, और जो इस साधना में डूब गया, वह स्वयं को पा गया।






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