मन्नत से मंच तक : जब जसपिंदर के सुर बने हनुमत चरणों का अर्पण
काशी की आध्यात्मिक वायुमंडल में जब जसपिंदर नरूला के कंठ से भक्ति के स्वर फूटे, तो यह केवल एक संगीत प्रस्तुति नहीं, बल्कि वर्षों पुरानी मन्नत के पूर्ण होने का भावुक क्षण बन गया। संकट मोचन संगीत समारोह के मंच पर उन्होंने जिस श्रद्धा और समर्पण के साथ “राम आएंगे” और “भज ले राम” जैसे भजन प्रस्तुत किए, उसमें उनकी पूरी साधना और जीवन-दर्शन समाहित दिखा। कुछ वर्ष पूर्व काशी आगमन के दौरान हनुमत दरबार में की गई प्रार्थना आज साकार हुई, और यही अनुभूति उनकी आंखों की नमी और स्वर की गहराई में स्पष्ट झलकी। अपने पचास वर्षों के संगीत सफर को वह तपस्या मानती हैं, एक ऐसी यात्रा, जिसमें सिद्धांत, परिश्रम और ईश्वर में अटूट विश्वास ही उनके मार्गदर्शक रहे। युवाओं को संदेश देते हुए उनका सरल किंतु प्रभावी वाक्य गूंजता है, “सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता।” जसपिंदर नरूला के लिए संगीत केवल पेशा नहीं, बल्कि साधना है, और यही कारण है कि उनके सुर सीधे हृदय से निकलकर श्रोताओं की आत्मा को स्पर्श करते हैं
सुरेश गांधी
जसपिंदर नरूला : काशी में गाना
अपने आप में एक
अनूठा अनुभव है, एक जीवंत
आध्यात्मिक ऊर्जा है। लेकिन जब
बात संकट मोचन मंदिर
की हो, तो यह
अनुभव और भी गहरा
हो जाता है। यहां
गाना केवल प्रस्तुति नहीं,
बल्कि एक अर्पण है।
मुझे ऐसा लगा जैसे
मैं नहीं गा रही,
बल्कि मुझसे गवाया जा रहा है।
यहां हर सुर सीधे
हनुमान जी तक पहुंचता
है। आज मैंने जो
भी गाया, वह मेरी ओर
से एक विनम्र भेंट
थी। कुछ वर्ष पहले
जब मैं गंगा महोत्सव
में आई थी, तब
मैंने हनुमान जी के दरबार
में माथा टेका था
और मन ही मन
एक मन्नत मांगी थी, एक दिन
मुझे यहां भजन गाने
का अवसर मिले। आज
वह मन्नत पूरी हुई है।
यह मेरे लिए अत्यंत
भावुक क्षण है... ये
खुशी के आंसू हैं।
प्रश्न : आपकी गायकी में
सूफी, भक्ति और शास्त्रीय संगीत
का अद्भुत संगम दिखाई देता
है। यह संतुलन कैसे
संभव हुआ?
प्रश्न : आपने फिल्मी दुनिया
में अपार सफलता हासिल
की, फिर भी भक्ति
और शास्त्रीय संगीत से जुड़ी रहीं।
इसका क्या कारण रहा?
प्रश्न : “प्यार तो होना ही
था” गीत ने आपके
करियर को नई ऊंचाई
दी। उस दौर को
कैसे याद करती हैं?
प्रश्न : आपके संगीत सफर
की शुरुआत कैसे हुई?
प्रश्न : आपने अपने करियर
में कई बड़े संगीतकारों
के साथ काम किया।
उस अनुभव को कैसे देखती
हैं?
प्रश्न : संकट मोचन में
आपकी प्रस्तुति के दौरान “राम
आएंगे” और “भज ले
राम” जैसे भजनों ने
लोगों को भाव-विभोर
कर दिया। उस क्षण आपकी
अनुभूति क्या थी?
प्रश्न : आपने युवाओं को
मेहनत और ईश्वर में
विश्वास का संदेश दिया।
आज के समय में
यह कितना जरूरी है?
उत्तर : आज की दुनिया बहुत तेज हो गई है। हर कोई जल्दी सफलता चाहता है, धैर्य की कमी दिखती है। लेकिन मैं यही कहना चाहूंगी कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। मैंने 50 वर्षों तक लगातार मेहनत की है। यह कोई एक दिन की उपलब्धि नहीं है। अगर आप ईश्वर में विश्वास रखते हैं और अपने काम के प्रति ईमानदार हैं, तो सफलता जरूर मिलती है। मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता। जो लोग साधना से नहीं गुजरते
, वे सफलता को टिकाकर नहीं रख पाते।उत्तर : काशी के श्रोता
बहुत विशेष होते हैं। वे
केवल सुनते नहीं, बल्कि महसूस करते हैं। यहां
संगीत आत्मा से जुड़ जाता
है। जब मैंने देखा
कि लोग छतों पर,
बाहर स्क्रीन के सामने खड़े
होकर भी सुन रहे
हैं, तो मुझे लगा
कि यह केवल मेरा
नहीं, बल्कि संगीत का सम्मान है।
प्रश्न : मंदिर के महंत से
मुलाकात और काशी की
पौराणिकता के बारे में
जानकर आपकी क्या प्रतिक्रिया
रही?
उत्तर : कार्यक्रम के बाद मेरी
मुलाकात पंडित विश्वंभरनाथ मिश्र से हुई। उन्होंने
मुझे काशी की परंपरा,
गोस्वामी तुलसीदास और मंदिर की
स्थापना की कथा सुनाई।
उसे सुनकर मैं सच में
भावुक हो गई। काशी
केवल एक शहर नहीं,
बल्कि एक जीवंत आध्यात्मिक
अनुभव है। मैं खुद
को सौभाग्यशाली मानती हूं कि मुझे
यहां गाने का अवसर
मिला।
फिरहाल, यह संवाद केवल
एक साक्षात्कार नहीं, बल्कि एक साधिका की
आत्मकथा का अंश है।
उनका जीवन-दर्शन सामने
आया, जहां संगीत, भक्ति
और संघर्ष एक-दूसरे के
पूरक बन जाते हैं।
जसपिंदर नरूला की आवाज़ में
जो गूंज है, वह
केवल सुरों की नहीं, बल्कि
वर्षों की तपस्या, विश्वास
और समर्पण की है। काशी
की इस पावन भूमि
पर उन्होंने एक बार फिर
यह सिद्ध कर दिया, जब
संगीत साधना बन जाता है,
तो वह केवल सुना
नहीं जाता... वह जिया जाता
है। समारोह में उनकी प्रस्तुति
ने यह साबित कर
दिया कि उनकी आवाज़
में आज भी वही
ऊर्जा और भावनात्मक गहराई
है। “भज ले राम...
राम... राम...” जैसे भजनों की
गूंज ने पूरे मंदिर
परिसर को भक्तिमय बना
दिया। श्रोता झूम उठे, और
हर सुर के साथ
आस्था का प्रवाह और
प्रगाढ़ होता गया। उनकी
गायकी में भाव, ऊर्जा
और आध्यात्मिकता का ऐसा संगम
देखने को मिला, जिसने
श्रोताओं को भीतर तक
स्पर्श किया। यह केवल एक
प्रस्तुति नहीं, बल्कि एक साधना थी,
एक ऐसी साधना, जिसमें
सुर ईश्वर को समर्पित हो
जाते हैं।
संगीत अगर साधना बन जाए, तो वह सीधे आत्मा तक पहुंचता है
जसपिंदर नरूला का गायन केवल
सुरों का संयोजन नहीं,
बल्कि एक सांस्कृतिक विरासत
का संरक्षण है। वे उस
परंपरा की प्रतिनिधि हैं,
जिसने पंजाब के लोक, सूफी
और शास्त्रीय संगीत की मौलिकता को
सहेजते हुए उसे वैश्विक
मंच तक पहुंचाया। आज
जब पंजाबी संगीत दुनिया भर में अपनी
धाक जमा रहा है,
तो उसमें नरूला जैसे कलाकारों का
योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। अपने फिल्मी
सफर में “प्यार तो
होना ही था” जैसे
गीत से उन्होंने जो
पहचान बनाई, उसने 90 के दशक की
पूरी पीढ़ी को झूमने
पर मजबूर कर दिया था।
लेकिन लोकप्रियता के शिखर पर
पहुंचने के बाद भी
उन्होंने शास्त्रीय संगीत और भक्ति परंपरा
से अपना नाता कभी
नहीं तोड़ा। यही उनकी साधना
की सबसे बड़ी विशेषता
है। संकट मोचन मंदिर
के पावन प्रांगण में
उनकी प्रस्तुति इस साधना का
सजीव उदाहरण बनी। उन्होंने “सतनाम
वाहेगुरु” के उच्चारण के
साथ जब “हे गोविंद,
हे गोपाल” का भजन आरंभ
किया, तो वातावरण में
एक अद्भुत आध्यात्मिक कंपन महसूस हुआ।
उनके स्वर में गुरबाणी
की पवित्रता और भक्ति की
गहराई स्पष्ट झलक रही थी।
इसके बाद “मनवा रे
जीवन है संग्राम, भज
ले राम-राम...” जैसे
भजनों ने जीवन के
संघर्षों के बीच भक्ति
को सहारा बनाने का संदेश दिया।
“सूरज की गर्मी से
तपते हुए तन को,
मिल जाए तरुवर की
छाया...” जैसी पंक्तियों ने
मानो श्रोताओं को शीतलता और
सुकून का अनुभव कराया।
“तुलसी भरोसे राम के, निर्भय
हो के सोय...” का
गायन करते हुए उन्होंने
रामभक्ति की उस निष्कपट
आस्था को स्वर दिया,
जो हर भय को
समाप्त कर देती है।
वहीं “हे गोविंद! हे
गोपाल! दया निधान...” जैसे
भजनों में उनकी आवाज़
एक प्रार्थना बनकर गूंज उठी।
कार्यक्रम के अंतिम चरण
में जब उन्होंने “मेरी
झोपड़ी के भाग आज
खुल जाएंगे, राम आएंगे...” का
गायन शुरू किया, तो
पूरा वातावरण भक्ति और उत्साह से
भर गया। श्रोता झूम
उठे, हाथ उठाकर प्रभु
का स्मरण करने लगे और
पूरा प्रांगण रामनाम के जयकारों से
गूंज उठा।








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