जब ध्वनि ने धारण किया शरीर : शिवमणि और लय का जीवित ब्रह्मांड
काशी
की
रातों
में
संगीत
केवल
सुनाई
नहीं
देता,
वह
प्रकट
होता
है,
कभी
मंत्र
की
तरह,
कभी
तूफान
की
तरह।
संकट
मोचन
संगीत
समारोह
की
दूसरी
निशा
भी
कुछ
ऐसी
ही
अलौकिक
अनुभूति
लेकर
आई,
जब
मंच
पर
बैठे
पंडित
शिवमणि
ने
ध्वनि
को
केवल
साधा
नहीं,
उसे
साकार
कर
दिया।
यह
प्रस्तुति
किसी
एक
वाद्य,
एक
शैली
या
एक
परंपरा
की
नहीं
थी;
यह
उस
अनंत
संभावना
की
थी,
जहां
एक
बाल्टी
भी
तबला
बन
सकती
है
और
एक
सांस
भी
शंखनाद।
शिवमणि
के
हाथों
में
लय
केवल
बजती
नहीं,
वह
बहती
है,
कभी
गंगा
की
तरह
शांत,
तो
कभी
प्रलय
की
तरह
उग्र।
इस
अद्भुत
क्षण
में
शास्त्रीयता
और
आधुनिकता
का
द्वंद्व
समाप्त
हो
जाता
है।
ड्रम
की
गूंज
में
भक्ति
का
कंपन
था,
और
थाली
की
थाप
में
समय
का
स्पंदन।
श्रोताओं
के
लिए
यह
केवल
एक
प्रस्तुति
नहीं,
बल्कि
एक
अनुभूति
थी,
जहां
संगीत
बाहर
नहीं,
भीतर
घटित
होता
है...
सुरेश गांधी
काशी की पावन धरती पर जब संकट मोचन संगीत समारोह की रात अपने चरम पर होती है, तब केवल संगीत नहीं, बल्कि साधना बोलती है। उस रात भी कुछ ऐसा ही हुआ, जब मंच पर एक कलाकार नहीं, बल्कि ध्वनि का जादूगर उतरा। ड्रम, बाल्टी, थाली, घंट, यहां तक कि हवा और मौन तक को संगीत में ढाल देने वाले इस कलाकार का नाम है, पंडित शिवमणि। उनकी उंगलियां केवल वाद्य नहीं बजातीं, वे समय को थिरकाती हैं। उनके लिए संगीत कोई विधा नहीं, बल्कि जीवन का विस्तार है। इसी जीवंत लय, इसी अनगढ़ ऊर्जा और इसी अनूठी साधना के बाबत प्रस्तुत है सीनियर रिपोर्टर सुरेश गांधी की उनसे विस्तृत बातचीत, जहां हर उत्तर एक कहानी है, हर शब्द एक लय। पंडित शिवमणि से यह बातचीत केवल एक साक्षात्कार नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा थी। उनके शब्दों में वही गूंज है, जो उनकी धुनों में सुनाई देती है। वे हमें यह सिखाते हैं कि संगीत केवल सुरों का मेल नहीं, बल्कि जीवन का विस्तार है, जहां हर धड़कन एक ताल है, हर सांस एक राग। और शायद यही कारण है कि जब वे मंच पर होते हैं, तो केवल संगीत नहीं बजता, जीवन स्वयं गूंज उठता है। देखें विशेष बातचीत के कुछ प्रमुख अंशः-
सुरेश
गांधी
: आपकी
प्रस्तुति
को
देखकर
ऐसा
लगा
जैसे
संगीत
किसी
वाद्य
में
नहीं,
बल्कि
आपके
भीतर
सांस
ले
रहा
हो।
यह
यात्रा
कहां
से
शुरू
हुई?
पंडित
शिवमणि
: मुस्कुराते हुए, यात्रा... यह
शब्द बहुत छोटा है।
सच कहूं तो यह
यात्रा मेरे जन्म से
पहले शुरू हो चुकी
थी। जब मैं अपनी
मां के गर्भ में
था, तब उनकी धड़कन
मेरी पहली “क्लिक ट्रैक” थी। वही लय,
वही कंपन मेरे भीतर
उतरता चला गया। मैंने
कभी किसी संगीत विद्यालय
में औपचारिक शिक्षा नहीं ली। मेरा
विद्यालय मेरी जिज्ञासा थी,
और मेरे शिक्षक थे,
आसपास की हर ध्वनि।
सवाल : आपके संगीत में प्रयोगधर्मिता सबसे अलग दिखाई देती है। बर्तन, बाल्टी, यहां तक कि बिना वाद्य के ध्वनि निकालना, यह सोच कहां से आई?
सवाल
: आपके
पिता
स्वयं
ड्रमर
थे,
लेकिन
शुरुआत
में
उन्होंने
आपको
ड्रम
बजाने
से
रोका।
उस
संघर्ष
को
आप
कैसे
याद
करते
हैं?
जवाब
: वह संघर्ष नहीं, बल्कि तपस्या थी। मेरे पिता
चाहते थे कि मैं
पढ़-लिखकर एक “सुरक्षित” जीवन
जिऊं। लेकिन शायद भगवान ने
पहले ही तय कर
लिया था कि मेरा
जीवन लय में ही
बीतेगा। जब भी मैं
ड्रम बजाता, वे मुझे डांटते।
कभी-कभी हाथ पर
भी मारते। लेकिन मेरी मां... (थोड़ा रुकते हैं)....
वह मेरी सबसे बड़ी
शक्ति थीं। उन्होंने ही
मुझे चम्मच दिए, बर्तन दिए,
और कहा, “बजाओ।”
सवाल
: आपकी
प्रस्तुति
में
शरीर
भी
संगीत
का
हिस्सा
बन
जाता
है,
जैसे
हर
अंग
लय
में
बह
रहा
हो।
यह
कैसे
संभव
होता
है?
जवाब
: संगीत केवल हाथों से
नहीं, पूरे शरीर से
निकलता है। जब आप
पूरी तरह संगीत में
डूब जाते हैं, तो
शरीर स्वयं एक वाद्य बन
जाता है। कभी-कभी
मुझे भी लगता है
कि मैं नहीं बजा
रहा, बल्कि लय मुझे बजा
रही है।
सवाल
: आपका
ए.
आर.
रहमान
के
साथ
लंबा
और
गहरा
संबंध
रहा
है।
उनके
साथ
काम
करने
का
अनुभव
कैसा
रहा?
जवाब
: रहमान केवल एक संगीतकार
नहीं, एक आध्यात्मिक अनुभव
हैं। हमारी दोस्ती बचपन से है,
जब वह दिलीप थे।
उनके साथ काम करते
समय सबसे खास बात
यह होती है कि
वह आपको स्वतंत्रता देते
हैं। वह कहते हैं,
“शिवा, जो महसूस करो,
वही बजाओ।” “रोजा” से लेकर “स्लमडॉग
मिलियनेयर” तक, हमने साथ
में जो भी रचा,
वह केवल संगीत नहीं,
बल्कि भावनाओं का प्रवाह है।
सवाल
: “रॉकस्टार”
और
“रंग
दे
बसंती”
जैसे
प्रोजेक्ट्स
में
आपकी
लय
ने
अलग
पहचान
बनाई।
इन
रचनाओं
की
प्रक्रिया
कैसी
होती
है?
जवाब
: हर फिल्म की अपनी आत्मा
होती है। “रॉकस्टार” में
एक बेचैनी थी, एक विद्रोह
था, तो उसकी लय
भी वैसी ही बनी।
“रंग दे बसंती” में
ऊर्जा थी, जोश था,
तो उसमें ढोल, दरबुका और
भांगड़ा की लय का
मिश्रण आया। मैं हमेशा
कोशिश करता हूं कि
लय कहानी के साथ चले,
उससे अलग न हो।
सवाल
: संकट
मोचन
में
आपकी
प्रस्तुति
में
भक्ति
और
आधुनिकता
का
अद्भुत
संगम
दिखा।
आप
इसे
कैसे
देखते
हैं?
जवाब
: काशी... (आंखें बंद करते हैं)...
यह शहर केवल एक
स्थान नहीं, एक भावना है।
यहां आकर आप आधुनिक
और प्राचीन के बीच का
अंतर भूल जाते हैं।
जब मैंने “रघुपति राघव” को वेस्टर्न बीट्स
के साथ प्रस्तुत किया,
तो मेरा उद्देश्य केवल
एक था, भक्ति को
नए रूप में प्रस्तुत
करना, ताकि नई पीढ़ी
भी उससे जुड़ सके।
सवाल
: आपने
मंच
पर
एक
युवा
कलाकार
को
बुलाया।
यह
पहल
क्यों?
जवाब
: क्योंकि हर कलाकार कभी
न कभी एक शुरुआत
करता है। अगर मुझे
मंच न मिलता, तो
शायद मैं भी आज
यहां न होता। मैं
चाहता हूं कि हर
युवा यह महसूस करे
कि मंच उसका भी
है।
सवाल
: आपके
जीवन
में
सबसे
अनमोल
वस्तु
क्या
है?
जवाब
: एक मोमबत्ती... जो मुझे रहमान
की मां ने दी
थी। उन्होंने कहा था, “जब
भी काम शुरू करो,
इसे जलाना।” वह केवल एक
मोमबत्ती नहीं, एक आशीर्वाद है।
सवाल
: आप
आज
के
युवा
संगीतकारों
को
क्या
संदेश
देना
चाहेंगे?
जवाब
: संगीत को केवल करियर
मत बनाइए, उसे साधना बनाइए।
तकनीक जरूरी है, लेकिन भावना
उससे भी ज्यादा जरूरी
है। और सबसे महत्वपूर्ण,
अपने भीतर की आवाज
को सुनिए।
ड्रम, धुन और दुआएं
डिड-डिग-डिग,
तुम-टी-तुम, शुवे...ईप... की अनोखी ध्वनियों
से शुरू हुई यह
संध्या किसी पारंपरिक प्रस्तुति
की तरह नहीं, बल्कि
एक प्रयोगधर्मी संगीत प्रयोगशाला की तरह प्रतीत
हुई। पहली प्रस्तुति में
ही मंच पर ड्रम,
बाल्टी, थाली, घंट, परात जैसे
सामान्य वस्त्रों के साथ पखावज
और मेंडोलिन का ऐसा संयोजन
हुआ कि “रघुपति राघव
राजाराम” और “गोविंद बोलो
हरि गोपाल बोलो” जैसे भजनों को
साउथ इंडो-वेस्टर्न अंदाज
में एक नया, ऊर्जावान
और आक्रामक रूप मिल गया।
शिवमणि का जादू : जब हर वस्तु बन गई वाद्य
इस प्रयोगधर्मी प्रस्तुति
के केंद्र में थे प्रसिद्ध
पर्कशनिस्ट पंडित शिवमणि, जिनकी उंगलियां जैसे किसी मशीन
की गति से ड्रम,
बाल्टी और बर्तनों पर
थिरक रही थीं। कभी
बिना किसी वाद्य को
छुए केवल मुंह से
ही उन्होंने वेस्टर्न बीट्स की सटीक नकल
कर श्रोताओं को स्तब्ध कर
दिया। ऐसा प्रतीत हो
रहा था मानो वाद्य
यंत्र उन्हें नहीं, बल्कि वे स्वयं वाद्यों
के नियंत्रण में हों। उनके
साथ मेंडोलिन पर यू. राजेश
और पखावज पर विश्वंभर नाथ
मिश्र की संगत ने
इस प्रस्तुति में शास्त्रीयता और
आध्यात्मिकता का गहरा रंग
घोल दिया।
लोकल से ग्लोबल तक : युवा प्रतिभा को मंच
प्रस्तुति के बीच शिवमणि
ने काशी के युवा
कलाकार प्रियेश पाठक को मंच
पर आमंत्रित किया। माइक और मुख
से निकली ड्रम-पैड की
बीट्स ने दर्शकों को
चौंका दिया। यह क्षण इस
मंच की परंपरा को
भी रेखांकित करता है, जहां
एक स्वयंसेवक से मंच कलाकार
बनने की प्रेरणा मिलती
है।
भक्ति और समरसता का संदेश
इस निशा की सबसे खास यह रही, पांच मुस्लिम कलाकारों द्वारा शास्त्रीय सुरों में हनुमत वंदना। यह प्रस्तुति केवल संगीत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक समरसता और भारतीय गंगा-जमुनी तहजीब का जीवंत उदाहरण बन गई।



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