हर दिल से निकला राम, नरूला के सुरों ने जगाई काशी
संकट मोचन
की
रात
: राम
आएंगे
की
पुकार,
बनी
आस्था
का
महासागर,
जिसे
काशी
सदियों
तक
याद
रखेगी
बनारस घराने
की
परंपरा
से
लेकर
भक्ति
की
गूंज
तक,
तबला,
सितार
और
सुरों
की
त्रिवेणी,
पर
केंद्र
में
रहीं
जसपिंदर
नरूला
सुरेश गांधी
वाराणसी. काशी की आध्यात्मिकता
जब संगीत से मिलती है,
तो वह केवल एक
आयोजन नहीं रह जाती,
वह एक जीवंत अनुभूति
बन जाती है। संकट
मोचन संगीत समारोह की दूसरी और
तीसरी निशा इसी अनुभूति
की साक्षी बनी, जहां परंपरा,
साधना और भक्ति एक
साथ प्रवाहित हुईं। लेकिन इस संगीतमयी श्रृंखला
का केंद्रबिंदु बनीं पद्मश्री सम्मानित
गायिका जसपिंदर नरूला, जिनकी उपस्थिति और प्रस्तुति ने
पूरी महफ़िल को एक अलग
ही ऊंचाई प्रदान कर दी।
परंपरा की थाप : तबले पर बनारस घराने की गूंज
दूसरी निशा की पांचवीं
प्रस्तुति में बनारस घराने
की समृद्ध परंपरा जीवंत हो उठी, जब
पं. किशन महाराज के
पौत्र पं. शुभ महाराज
मंच पर आए। उन्होंने
500 वर्ष प्राचीन बंदिश और 250 वर्ष पुरानी गत
को दुगुन में प्रस्तुत कर
गुरु परंपरा को सजीव कर
दिया। “धा-धा धिन...”
से शुरू हुई उनकी
थाप कभी ढोल की
गूंज सी प्रतीत होती,
तो कभी पखावज की
गंभीरता लिए मंदिर की
दीवारों से टकराती। लगभग
60 मिनट की प्रस्तुति में
उन्होंने तीन ताल के
टुकड़े, तोड़े, तिहाइयां, परन और गतफर्द
का ऐसा विस्तार किया
कि श्रोता संगीत के सूक्ष्म आयामों
में खो गए। उन्होंने
अपने गुरुओं, पं. समता प्रसाद,
पं. किशन महाराज और
पं. हरि महाराज, को
याद करते हुए उस
परंपरा की झलक दी,
जिसे काशी की इन
दीवारों ने सदियों से
संजोया है।
सितार और तबले की जुगलबंदी : स्वर और लय का संवाद
छठी प्रस्तुति में
पं. कुशल दास (सितार)
और पं. संजू सहाय
(तबला) ने राग परमेश्वरी
में आलाप, जोड़ और झाला
के माध्यम से ऐसा वातावरण
रचा, जिसमें संगीत साधना का चरम दिखाई
दिया। विलंबित और द्रुत गत
की जुगलबंदी में उनकी तानें
और लयकारी इस तरह एक-दूसरे से संवाद करती
रहीं कि लगा मानो
मंदिर परिसर में “राम सिया
राम” का अनहद नाद
गूंज रहा हो। उनींदी
आंखों के बीच भी
श्रोता इस संगीत में
डूबे रहे, यह संगीत
की उस शक्ति का
प्रमाण था, जो समय
और थकान दोनों को
भुला देती है।
और फिर... महफ़िल के केंद्र में जसपिंदर नरूला
इन सभी प्रस्तुतियों
के बीच, तीसरी निशा
का वह क्षण आया
जब पूरा वातावरण एक
नई ऊर्जा से भर उठा,
जब मंच पर आईं
जसपिंदर नरूला। उनके आते ही
तालियों की गूंज ने
मंदिर प्रांगण को जीवंत कर
दिया। उन्होंने “जय श्री राम”
के उद्घोष के साथ अपनी
प्रस्तुति आरंभ की, और
देखते ही देखते पूरा
परिसर भक्ति में डूब गया।
“राम आएंगे, आएंगे...” जैसे ही यह
भजन उनके कंठ से
निकला, वातावरण राममय हो उठा। “तू
न संभाले तो मुझे कौन
संभाले... हनुमान!” की पुकार ने
हर श्रोता के भीतर छिपे
भावों को जागृत कर
दिया। “मनवा रे मनवा,
जीवन है संग्राम... भज
ले राम-राम...” इन
पंक्तियों में उन्होंने जीवन
का वह सार प्रस्तुत
किया, जो हर युग
में प्रासंगिक है। उनके सुरों
में केवल मधुरता नहीं,
बल्कि एक गहरी आस्था
और समर्पण था।
श्रद्धा का सैलाब : जहां संगीत जिया जाता है
मंदिर परिसर में इतनी भीड़
उमड़ी कि आंगन छोटा
पड़ गया। लोग छतों
पर बैठे, एलईडी स्क्रीन के बाहर खड़े
होकर भी इस प्रस्तुति
का आनंद लेते रहे।
यह दृश्य काशी की उस
परंपरा को जीवंत करता
है, जहां संगीत केवल
सुना नहीं जाता, बल्कि
जिया जाता है।
संदेश और साधना : पचास वर्षों की यात्रा का सार
प्रस्तुति के बीच जसपिंदर
नरूला ने अपने जीवन
के अनुभव साझा करते हुए
कहा कि उनकी यह
यात्रा सिद्धांतों, मूल्यों और कड़ी मेहनत
पर आधारित रही है। उन्होंने
युवाओं को संदेश देते
हुए कहा, “सफलता का कोई शॉर्टकट
नहीं होता। ईश्वर में विश्वास और
समर्पण ही जीवन को
दिशा देता है, और
मेहनत ही कामयाबी का
असली मार्ग है।”
संगीत से साधना तक की पहचान
जसपिंदर नरूला ने अपने करियर
में फिल्मी गीतों से लेकर भक्ति
और सूफी संगीत तक
हर क्षेत्र में अपनी छाप
छोड़ी है। प्यार तो
होना ही था के
गीत से मिली पहचान
और पद्म श्री से
सम्मानित होने तक की
यात्रा उनकी साधना का
प्रमाण है।
जब सुर बन जाए प्रार्थना
संकट मोचन की इस संगीतमयी रात्रि ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि काशी में संगीत केवल कला नहीं, बल्कि आत्मा की साधना है। तबले की थाप, सितार की तान और जसपिंदर नरूला के भक्ति-रस में डूबे स्वरकृइन सबने मिलकर एक ऐसी महफ़िल रची, जो केवल स्मृतियों में नहीं, बल्कि आत्मा में बस जाती है। और अंततः यही अनुभूति शेष रह जाती है, जब जीवन संग्राम बन जाए, तो राम-नाम ही सबसे बड़ा सहारा है३ और जब सुर साधना बन जाएं, तो वही संगीत ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग बन जाता है।

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