सोमनाथ केवल मंदिर नहीं, भारत की अमर आत्मा का स्वर
आक्रमणकारी शिखर तोड़ सके, आस्था नहीं, काशी और सोमनाथ सनातन चेतना के दो दिव्य केंद्र: आनंदीबेन पटेल
‘सोमनाथ
स्वाभिमान पर्व’ में गूंजा सांस्कृतिक
राष्ट्रवाद का स्वर, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी में सनातन परंपरा और राष्ट्रीय
अस्मिता पर मंथन
सुरेश गांधी
वाराणसी। सोमनाथ केवल पत्थरों से बना मंदिर नहीं,
बल्कि भारत की अमर आत्मा का स्वर है... जिसे हजार वर्षों के आक्रमण भी झुका नहीं सके।
राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने सोमवार को काशी में आयोजित ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’
में जब यह बात कही तो पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा। उन्होंने कहा कि सोमनाथ का
इतिहास भारत की पराजय का नहीं, बल्कि पुनर्जागरण, आस्था और आत्मविश्वास का इतिहास है।
काशी विश्वनाथ धाम परिसर में आयोजित इस
भव्य समारोह में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, आयुष राज्य मंत्री दयाशंकर मिश्र दयालु,
राज्य मंत्री हंसराज विश्वकर्मा, जनप्रतिनिधियों, संतों, विद्वानों और बड़ी संख्या में
श्रद्धालुओं की मौजूदगी रही। कार्यक्रम में सोमनाथ मंदिर के हजार वर्षों के संघर्ष,
पुनर्निर्माण और सनातन चेतना की गौरवगाथा को विशेष रूप से प्रस्तुत किया गया। राज्यपाल
आनंदीबेन पटेल ने कहा कि उन्होंने अपने जीवन में शायद ही ऐसा कोई आयोजन देखा हो, जिसमें
किसी मंदिर के हजार वर्षों के संघर्ष, पुनर्निर्माण और सांस्कृतिक चेतना को इतने व्यापक
रूप में प्रस्तुत किया गया हो। उन्होंने गुजरात स्थित सोमनाथ मंदिर के पुनरुत्थान की
यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि कभी वहां मंदिर के अस्तित्व पर संकट था, लेकिन आज
वही सोमनाथ रोजगार, शिक्षा, संस्कृत विश्वविद्यालय और सांस्कृतिक विकास का केंद्र बन
चुका है।
उन्होंने कहा कि तत्कालीन गुजरात नेतृत्व और आज के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दूरदृष्टि से सोमनाथ का कायाकल्प संभव हुआ। 13 वर्षों तक लगातार कार्य चला और आज भी विकास की प्रक्रिया जारी है। सबसे बड़ी बात यह है कि वहां की जनता ने मंदिर को अपना गौरव मानकर हर त्याग किया। किसी को मकान खाली करना पड़ा तो उसने बिना विरोध के किया, क्योंकि लोगों ने समझा कि यह केवल मंदिर नहीं, हमारी अस्मिता है। राज्यपाल ने काशी विश्वनाथ धाम के पुनर्विकास का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस प्रकार सोमनाथ का पुनरुत्थान हुआ, उसी प्रकार काशी में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मिलकर एक ऐतिहासिक कार्य किया। उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियों को यह समझाना होगा कि विरासत को केवल संरक्षित नहीं करना, बल्कि उसे समयानुकूल विकसित भी करना है। उन्होंने कहा कि सोमनाथ और काशी भारत की सनातन चेतना के दो अमर स्वर हैं। एक ने अरब सागर की लहरों के बीच आस्था का दीप जलाए रखा, तो दूसरे ने गंगा की धारा के साथ मोक्ष और अध्यात्म का संदेश पूरी दुनिया को दिया।
राज्यपाल ने इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि महमूद गजनवी से लेकर अलाउद्दीन खिलजी, महमूद बेगड़ा और औरंगजेब तक अनेक आक्रांताओं ने सोमनाथ मंदिर को तोड़ने और उसकी पहचान मिटाने का प्रयास किया, लेकिन हर बार मंदिर उसी तेज, उसी दिव्यता और उसी आत्मविश्वास के साथ पुनः खड़ा हो गया। उन्होंने कहा, आक्रमणकारी तलवारें समय के गर्त में खो जाती हैं, लेकिन संस्कृति की चेतना अमर रहती है। सोमनाथ हमें सिखाता है कि विनाश क्षणभंगुर होता है, जबकि सनातन शाश्वत है। राज्यपाल ने कहा कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल आर्थिक संसाधनों या तकनीकी प्रगति में नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जड़ों में निहित होती है। जो समाज अपनी विरासत से जुड़ा रहता है, वही दीर्घकाल तक जीवंत और शक्तिशाली बना रहता है।
उन्होंने कहा कि भारत ने हजारों वर्षों
के आक्रमण, राजनीतिक परिवर्तनों और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद अपनी आत्मा को जीवित
रखा है। यहां की संस्कृति केवल स्मृति नहीं, बल्कि जीवन मूल्य है। आश्रम व्यवस्था,
वेद, पुराण, संत परंपरा और अध्यात्म आज भी भारत की जीवंत शक्ति हैं। राज्यपाल ने कहा
कि आधुनिकता और परंपरा एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। “जो समाज अपनी जड़ों
से कट जाता है, वह अंततः दिशाहीन हो जाता है। लेकिन जो अपनी सांस्कृतिक चेतना को संजोकर
आगे बढ़ता है, वही स्थायी विकास करता है। उन्होंने राम, बुद्ध, कबीर और महात्मा गांधी
का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय सभ्यता ने हमेशा मानवता, संवाद, करुणा और विश्वास
का संदेश दिया है। “हमारी परंपरा विजय को विनाश नहीं, बल्कि विश्वास मानती है। राम
मर्यादा सिखाते हैं, बुद्ध करुणा का मार्ग दिखाते हैं, कबीर मनुष्य को मनुष्य से जोड़ते
हैं और गांधी सत्य व अहिंसा की शक्ति बताते हैं।
समारोह के अंत में राज्यपाल ने आयोजन
समिति को भव्य आयोजन के लिए बधाई देते हुए कहा कि सोमनाथ स्वाभिमान पर्व केवल एक धार्मिक
कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय स्वाभिमान का महायज्ञ
है। उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं और अतिथियों को शुभकामनाएं देते हुए “जय हिंद”
के उद्घोष के साथ अपना संबोधन समाप्त किया।





No comments:
Post a Comment