क्रांतिकारियों की धरती पर भगवा उदय, बंगाल में सत्ता नहीं विचार बदला है! शुरू हुआ ‘योगी मॉडल’ का नया अध्याय?
कोलकाता के ऐतिहासिक ब्रिगेड परेड ग्राउंड में जब भगवा वस्त्रों में शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तब केवल सरकार नहीं बदली, बल्कि बंगाल की राजनीति का दशकों पुराना रंग भी बदलता दिखाई दिया। “जय श्रीराम” के नारों, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मौजूदगी और योगी आदित्यनाथ के हाथों शुभेंदु को पहनाए गए भगवा गमछे ने इस शपथ ग्रहण को एक साधारण राजनीतिक समारोह से कहीं बड़ा प्रतीक बना दिया। रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती पर हुए इस सत्ता परिवर्तन को भाजपा समर्थक “सनातन चेतना का उदय” और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सपनों की पूर्ति बता रहे हैं। कभी वामपंथ और तृणमूल की राजनीति का गढ़ रहे बंगाल में अब “योगी मॉडल”, बुलडोजर कार्रवाई, माफिया पर प्रहार और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की चर्चा तेज है। यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि उस बंगाल की नई वैचारिक कहानी है जिसने कभी वंदे मातरम्, स्वामी विवेकानंद और नेताजी सुभाष को जन्म दिया था। अब सवाल यही है क्या बंगाल सचमुच एक नए राजनीतिक युग में प्रवेश कर चुका है? क्या बंगाल में शुरू हुआ ‘योगी मॉडल’ का नया अध्याय?
सुरेश गांधी
पश्चिम बंगाल ने आखिरकार वह राजनीतिक दृश्य देख लिया जिसकी कल्पना दशकों तक केवल राजनीतिक विमर्शों में की जाती रही। कोलकाता के ऐतिहासिक ब्रिगेड परेड ग्राउंड में जब शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तब केवल सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ, बल्कि बंगाल की वैचारिक राजनीति में भी एक बड़ा बदलाव दर्ज हो गया। यह संयोग ही नहीं, प्रतीक भी था कि यह शपथ ग्रहण गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती के अवसर पर हुआ। वही रवींद्र, जिन्होंने बंगाल की आत्मा को साहित्य, संस्कृति और राष्ट्रचेतना से जोड़ा था। और उसी दिन उस बंगाल में पहली बार ऐसी सरकार बनी, जिसे भाजपा समर्थक खुलकर “सनातन विचारों वाली सरकार” कह रहे हैं। शुभेंदु अधिकारी का भगवा परिधान, मंच पर “जय श्रीराम” के गूंजते नारे, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मौजूदगी की मौजूदगी, और योगी आदित्यनाथ द्वारा शुभेंदु को भगवा गमछा पहनाना और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सपनों की चर्चा — इन सबने मिलकर बंगाल की राजनीति को एक नए प्रतीकवाद से भर दिया।
यह केवल सरकार बदलने की कहानी नहीं है। यह उस बंगाल की कहानी है जिसने कभी भारत को वंदे मातरम् दिया, क्रांतिकारियों की लंबी परंपरा दी, लेकिन बाद के दशकों में राजनीतिक हिंसा, वैचारिक संघर्ष और तुष्टिकरण की राजनीति के आरोपों में उलझता चला गया। अब भाजपा इसे “बंगाल के पुनर्जागरण” के रूप में प्रस्तुत कर रही है।पश्चिम बंगाल भारतीय राजनीति का वह राज्य रहा है जहां लंबे समय तक वामपंथी विचारधारा का दबदबा रहा। फिर तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी ने “मां, माटी और मानुष” के नारे के साथ सत्ता संभाली। लेकिन भाजपा का दावा है कि पिछले कुछ वर्षों में बंगाल की जनता राजनीतिक हिंसा, भ्रष्टाचार, कट्टर तुष्टिकरण और प्रशासनिक अराजकता से थक चुकी थी।
इसी पृष्ठभूमि में शुभेंदु अधिकारी का उदय हुआ। कभी ममता बनर्जी के सबसे विश्वस्त सहयोगियों में गिने जाने वाले शुभेंदु भाजपा में आए और फिर वही नेता बंगाल में भाजपा के सबसे बड़े चेहरे बन गए। भवानीपुर जैसी प्रतिष्ठित सीट पर ममता बनर्जी को हराना केवल चुनावी जीत नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक राजनीतिक संदेश बन गया।
अब जब उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तो भाजपा समर्थकों ने इसे “डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सपनों की पूर्ति” बताया। डॉ. मुखर्जी ने ही भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी, जो आगे चलकर भाजपा बनी।बंगाल में
भाजपा की सरकार बनना
इसलिए भी ऐतिहासिक माना
जा रहा है क्योंकि
यह वही धरती है
जहां से राष्ट्रवाद और
सांस्कृतिक चेतना की कई धाराएं
निकली थीं।
योगी मॉडल की चर्चा क्यों तेज हुई?
शपथ ग्रहण समारोह में सबसे चर्चित दृश्य वह रहा जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपना भगवा गमछा उतारकर शुभेंदु अधिकारी को पहनाया। राजनीति में प्रतीकों का बहुत महत्व होता है। इस एक दृश्य ने बंगाल की नई सरकार को लेकर नई चर्चाओं को जन्म दे दिया। क्या बंगाल अब “योगी मॉडल” पर चलेगा?
‘जय श्रीराम’ से ‘वंदे मातरम्’ तक बदलता बंगाल
कुछ वर्ष पहले तक बंगाल में “जय श्रीराम” का नारा राजनीतिक विवाद का विषय बन जाता था। लेकिन इस बार शपथ ग्रहण समारोह में यही नारा हजारों समर्थकों की आवाज बन गया।
भाजपा इसे बंगाल में बदलते राजनीतिक मानस का संकेत मान रही है। दरअसल बंगाल की सांस्कृतिक चेतना हमेशा से धार्मिक और राष्ट्रवादी तत्वों से जुड़ी रही है।वंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने “वंदे मातरम्” लिखा, स्वामी विवेका नंद ने आध्यात्मिक राष्ट्रवाद का संदेश दिया, सुभाष चंद बोस ने सशस्त्र संघर्ष की राह चुनी और रवींद्रनाथ टैगोर ने राष्ट्रवाद को सांस्कृतिक चेतना से जोड़ा।
भाजपा
अब इन्हीं प्रतीकों को अपने राजनीतिक
विमर्श से जोड़ने की
कोशिश कर रही है।
पार्टी यह संदेश देना
चाहती है कि हिंदुत्व
और बंगाली संस्कृति परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के
पूरक हैं।
ममता युग का अंत या नई शुरुआत?
पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी एक युग का नाम रही हैं। सड़क संघर्ष से लेकर मुख्यमंत्री बनने तक उनकी राजनीति ने बंगाल को गहराई से प्रभावित किया। लेकिन भाजपा ने लगातार उन पर राजनीतिक हिंसा, भ्रष्टाचार और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के आरोप लगाए।सामाजिक संतुलन का संदेश
नई सरकार के
मंत्रिमंडल में दिलीप घोष,
अग्निमित्रा पॉल, अशोक कीर्तनिया
और खुदीराम टुडू जैसे नेताओं
को शामिल करके भाजपा ने
सामाजिक संतुलन का संदेश देने
की कोशिश की है। ब्राह्मण,
महिला, मातुआ और आदिवासी समाज
को प्रतिनिधित्व देकर भाजपा ने
स्पष्ट संकेत दिया है कि
वह बंगाल में व्यापक सामाजिक
गठबंधन तैयार करना चाहती है।
विशेष रूप से मातुआ
समुदाय भाजपा की राजनीति में
महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के मुद्दे पर
भाजपा ने इस समुदाय
को अपने साथ जोड़ने
की कोशिश की थी। अब
सरकार बनने के बाद
यह देखना होगा कि भाजपा
अपने वादों को किस हद
तक पूरा कर पाती
है।
बंगाल की अर्थव्यवस्था और नई उम्मीदें
राजनीतिक बदलाव के साथ आर्थिक
उम्मीदें भी जुड़ी हुई
हैं। बंगाल कभी भारत का
सबसे बड़ा औद्योगिक केंद्र
हुआ करता था। कोलकाता
व्यापार, शिक्षा और संस्कृति का
राष्ट्रीय केंद्र माना जाता था।
लेकिन पिछले दशकों में उद्योगों के
पलायन और निवेश की
कमी ने राज्य की
आर्थिक स्थिति को प्रभावित किया।
भाजपा अब “विकसित बंगाल”
का नारा दे रही
है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी
अपने संबोधन में बंगाल को
“भारत की विकास यात्रा
का अग्रणी राज्य” बनाने की बात कही।
नई सरकार के सामने सबसे
बड़ी चुनौती होगी :- उद्योग निवेश वापस लाना. रोजगार बढ़ाना.
सीमावर्ती सुरक्षा
मजबूत करना. राजनीतिक हिंसा रोकना. भ्रष्टाचार पर नियंत्रण. इंफ्रास्ट्रक्चर
का विस्तार. अगर शुभेंदु अधिकारी इन मोर्चों पर
सफल होते हैं, तो
बंगाल राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा का
सबसे बड़ा मॉडल बन
सकता है।
बुलडोजर राजनीति बनाम संवैधानिक संतुलन
भाजपा समर्थकों के बीच “बुलडोजर
मॉडल” को लेकर उत्साह
जरूर है, लेकिन संवैधानिक
विशेषज्ञ लगातार यह भी कहते
रहे हैं कि किसी
भी कार्रवाई को कानून के
दायरे में रहकर ही
करना होगा। उत्तर प्रदेश में बुलडोजर कार्रवाई
भाजपा समर्थकों के लिए “सख्त
शासन” का प्रतीक बनी,
जबकि विपक्ष ने इसे “राजनीतिक
प्रतिशोध” बताया। बंगाल में अगर ऐसी
कोई नीति अपनाई जाती
है, तो निश्चित रूप
से राजनीतिक और कानूनी बहस
तेज होगी। इसलिए शुभेंदु अधिकारी के सामने चुनौती
केवल शक्ति प्रदर्शन की नहीं, बल्कि
लोकतांत्रिक संतुलन बनाए रखने की
भी होगी।
रवींद्रनाथ टैगोर की धरती पर नई वैचारिक बहस
रवींद्रनाथ टैगोर ने राष्ट्रवाद को
मानवता और संस्कृति से
जोड़कर देखा था। बंगाल
हमेशा विचारों की भूमि रहा
है। यहां राजनीतिक बहसें
केवल चुनाव तक सीमित नहीं
रहतीं, बल्कि साहित्य, संस्कृति और बौद्धिक विमर्श
से भी जुड़ती हैं।
अब जब भाजपा यहां
सत्ता में आई है,
तो यह बहस और
तेज होगी कि क्या
हिंदुत्व और बंगाली अस्मिता
साथ-साथ चल सकते
हैं? भाजपा का दावा है
कि उसका हिंदुत्व सांस्कृतिक
राष्ट्रवाद पर आधारित है।
वहीं विपक्ष इसे बंगाल की
उदार सांस्कृतिक परंपरा के लिए चुनौती
बता रहा है। आने
वाले वर्षों में यही वैचारिक
संघर्ष बंगाल की राजनीति का
सबसे बड़ा केंद्र बन
सकता है।
क्या बंगाल में स्थायी हो पाएगी भाजपा?
भारत की राजनीति
में बंगाल हमेशा कठिन राज्य माना
गया है। यहां की
जनता भावनात्मक मुद्दों के साथ-साथ
सांस्कृतिक और बौद्धिक विमर्श
को भी महत्व देती
है। भाजपा के लिए सत्ता
में आना बड़ी उपलब्धि
है, लेकिन सत्ता को स्थायी बनाना
उससे भी बड़ी चुनौती
होगी। अगर भाजपा केवल
वैचारिक नारों तक सीमित रही,
तो बंगाल की जनता जल्दी
निराश हो सकती है।
लेकिन अगर सरकार विकास,
रोजगार, कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक सुधार
पर ठोस काम करती
है, तो बंगाल की
राजनीति में स्थायी बदलाव
संभव है।
एक नई राजनीतिक सुबह या केवल प्रतीकों की राजनीति?







.jpeg)




No comments:
Post a Comment