अयोध्या से उठी बहस, 2027 तक गूंजेगी : निशाने पर आस्था, जवाबदेही और सियासत
राम मंदिर में चढ़ावे में कथित गड़बड़ी का मामला अब महज एक आपराधिक जांच का विषय नहीं रह गया है। एसआईटी की जांच आगे बढ़ने के साथ-साथ उत्तर प्रदेश की राजनीति भी नए मोड़ पर पहुंच गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इसे दोषियों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई और विपक्ष की 'आस्था विरोधी राजनीति' के खिलाफ वैचारिक संघर्ष के रूप में पेश कर रहे हैं, जबकि समाजवादी पार्टी इसे करोड़ों श्रद्धालुओं के दान, पारदर्शिता और जवाबदेही का सवाल बनाकर जनसंवाद चला रही है। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी भी निष्पक्ष जांच की मांग कर रही हैं, वहीं बसपा प्रमुख मायावती राजनीतिक बयानबाजी के बजाय साक्ष्यों को जांच एजेंसी के समक्ष रखने की बात कह रही हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या यह विवाद भाजपा के सबसे मजबूत 'राम नैरेटिव' को चुनौती देगा, या योगी आदित्यनाथ इसे अपने आक्रामक हिंदुत्व और सुशासन की राजनीति के पक्ष में नए जनादेश में बदल देंगे?
सुरेश गांधी
उत्तर प्रदेश की राजनीति में
लंबे समय बाद ऐसा
मुद्दा सामने आया है, जिसने
आस्था, प्रशासन और चुनावी रणनीति—तीनों को एक साथ
बहस के केंद्र में
ला खड़ा किया है।
अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे में कथित गड़बड़ी के आरोपों ने अब कानूनी जांच की सीमाएं पार कर राजनीतिक विमर्श का रूप ले लिया है। गांवों की चौपालों से लेकर शहरों की चाय की दुकानों तक एक ही सवाल गूंज रहा है—क्या यह केवल चोरी का मामला है या 2027 के विधानसभा चुनाव की शुरुआती बिसात? 22 जनवरी 2024 को रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा भाजपा के लिए केवल धार्मिक आयोजन नहीं थी।
यह
उसके तीन दशक लंबे
राजनीतिक और वैचारिक संघर्ष
का चरम बिंदु था।
भाजपा ने इसे अपने
सबसे मजबूत राजनीतिक प्रतीक के रूप में
स्थापित किया। ऐसे में मंदिर
प्रबंधन से जुड़ा कोई
भी विवाद स्वाभाविक रूप से राजनीतिक
असर पैदा करता है।
भाजपा अब यही कह रही है कि उसने आरोप दबाए नहीं, बल्कि कार्रवाई की। दूसरी ओर, अखिलेश यादव लगातार प्रेस कॉन्फ्रेंस और जनसभाओं में इस मुद्दे को "श्रद्धालुओं के दान की जवाबदेही" का सवाल बना रहे हैं।
उनका "डोनेशन फर्स्ट" वाला तंज भाजपा पर सीधा राजनीतिक हमला है। सपा गांव-गांव पीडीए पंचायतों और जनसंवाद के जरिए इस बहस को फैलाने में जुटी है।
इधर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी पीछे हटने वालों में नहीं हैं। वे हर सभा में विपक्ष को कारसेवकों पर गोली चलवाने, तुष्टीकरण और "कब्रिस्तान की राजनीति" की याद दिला रहे हैं। साथ ही विपक्ष को मथुरा और काशी जैसे मुद्दों पर भी अपना रुख स्पष्ट करने की चुनौती दे रहे हैं।राजनीतिक भाषा में देखें तो दोनों ओर से लगातार सियासी तीर चल रहे हैं। यह तस्वीर किसी चुनावी नूराकुश्ती जैसी भी दिखाई देती है, जहां दोनों पक्ष अपने-अपने समर्थकों को संदेश देने में जुटे हैं।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प सवाल यह है कि क्या विपक्ष वास्तव में भाजपा के सबसे मजबूत "राम नैरेटिव" में सेंध लगा पा रहा है?यहां राजनीतिक परिदृश्य पिछले कुछ वर्षों की तुलना में बदला हुआ दिखता है। समाजवादी पार्टी अब केवल मंडल और पीडीए की राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहती।
अखिलेश यादव मंदिर जाते हैं, ब्राह्मण सम्मेलन करते हैं और धार्मिक प्रतीकों से दूरी नहीं बनाते। आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल पिछले कुछ वर्षों से सार्वजनिक मंचों पर हनुमान चालीसा का पाठ करते रहे हैं और अपनी राजनीति में धार्मिक प्रतीकों को भी स्थान देते दिखाई दिए हैं।
कांग्रेस, जिसे कभी भाजपा "राम विरोधी" बताती थी, अब खुलकर राम मंदिर के विरोध की राजनीति नहीं करती।
उसकी मांग भी पारदर्शिता और जवाबदेही तक सीमित रहती है। उधर बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने इस पूरे विवाद पर अलग रास्ता अपनाया। उन्होंने इसे राजनीतिक नौटंकी बताते हुए कहा कि यदि किसी के पास सबूत हैं तो उन्हें एसआईटी को सौंपना चाहिए। वे न तो भाजपा के पक्ष में खुलकर दिखीं और न ही विपक्षी हमले का हिस्सा बनीं। इसे कई विश्लेषक उनकी स्वतंत्र राजनीतिक रणनीति के रूप में देखते हैं। यानी तस्वीर साफ है आज शायद ही कोई बड़ा दल खुलकर राम मंदिर का विरोध करना चाहता हो। राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अब मंदिर के अस्तित्व पर नहीं, बल्कि उसके प्रबंधन और पारदर्शिता पर केंद्रित होती दिखाई दे रही है।पार्टी लंबे समय से
समाजवादी पार्टी के शासनकाल को
कानून-व्यवस्था, बाहुबल और माफिया राजनीति
के मुद्दे पर घेरती रही
है। उसके नेताओं का
दावा है कि वर्तमान
सरकार ने माफिया के
खिलाफ बुलडोजर कार्रवाई, गैंगस्टर कानून, संपत्ति जब्ती और पुलिस अभियानों
के जरिए अपराध पर
सख्ती दिखाई है। वहीं समाजवादी
पार्टी इन कार्रवाइयों को
कई बार चयनात्मक और
राजनीतिक प्रेरित बताती रही है। ऐसे
में राम मंदिर प्रकरण
की जांच भी दोनों
दलों के बीच 'सुशासन
बनाम राजनीतिक आरोप' की नई बहस
का हिस्सा बनती दिख रही
है।









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