Wednesday, 29 July 2026

योगी का समरसता सूत्र और उत्तर भारत का नया सियासी समीकरण

योगी का समरसता सूत्र और उत्तर भारत का नया सियासी समीकरण 

गंगा के तट पर बसे काशी ने सदियों से संतों की वाणी को सुना है, पर कुछ अवसर ऐसे आते हैं जब वही वाणी राजनीति की दिशा भी बदलती दिखाई देती है। संत रविदास के 650वें प्रकाश पर्व पर सीर गोवर्धनपुर में जो मंच सजा, वह केवल श्रद्धा का मंच नहीं था; वह उत्तर भारत की बदलती सामाजिक राजनीति का दर्पण भी था। योगी आदित्यनाथ के शब्दों में भक्ति थी, पर उनके चयनित प्रतीकों में भविष्य की राजनीति की स्पष्ट रेखाएं भी दिखाई दे रही थीं। रविदास, वाल्मीकि, निषादराज और शबरीये नाम भाषण में एक के बाद एक नहीं आए, बल्कि मानो उत्तर भारत के अलग-अलग सामाजिक द्वारों पर एक साथ दस्तक दी गई हो। काशी से जालंधर तक संत परंपरा की कड़ी जोड़ना, पंजाब के रविदासिया समाज का उल्लेख करना और सामाजिक समरसता को राष्ट्रव्यापी अभियान का रूप देना इस बात का संकेत है कि भाजपा अब सांस्कृतिक स्मृतियों के सहारे नए सामाजिक गठबंधनों की रचना करना चाहती है. मतलब साफ है योगी ने रविदास-वाल्मीकि-निषादराज-शबरी के बहाने भाजपा का सामाजिक विस्तार किया है, जिसका लाभ आने वाले चुनावों में दिखेगा. खासकर अखिलेश के पीडीए व मायावती की दलित सियासत पर जोर का झटका धीरे लगने वाला साबित हो सकता है

सुरेश गांधी

काशी में संत शिरोमणि गुरु रविदास महाराज के 650वें प्रकाश पर्व पर आयोजित समरसता संकल्प अभियान को केवल धार्मिक उत्सव मानना राजनीतिक घटनाक्रम को सतही ढंग से पढ़ना होगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का पूरा भाषण दरअसल उत्तर प्रदेश से लेकर पंजाब तक फैले उस सामाजिक भूगोल को संबोधित करता दिखाई दिया, जहां दलित, वंचित, पिछड़े और संत परंपरा से जुड़े समुदाय निर्णायक राजनीतिक महत्व रखते हैं। इस कार्यक्रम ने यह स्पष्ट संकेत दिया कि भाजपा अब हिंदुत्व की पारंपरिक राजनीति से आगे बढ़कर संत-समाज आधारित सामाजिक विस्तार की नई रणनीति पर काम कर रही है। सबसे महत्वपूर्ण संकेत भदोही को पुनःसंत रविदास नगरके रूप में स्थापित करने की घोषणा थी। यह केवल नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की बहुजन राजनीति के इतिहास में दर्ज एक पुराने प्रतीकात्मक संघर्ष की पुनर्व्याख्या है।

बता दें, भदोही जनपद का गठन 30 जून 1994 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने वाराणसी जिले के कुछ हिस्सों को अलग कर किया था। प्रारंभिक नाम भदोही रखा गया। बाद में मुख्यमंत्री मायावती ने संत रविदास जयंती के अवसर पर इसका नाम बदलकर संत रविदास नगर कर दिया। सत्ता परिवर्तन के बाद समाजवादी पार्टी सरकार ने पुनः इसका नाम भदोही कर दिया। अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संत रविदास की 650वीं जयंती वर्ष के अवसर पर घोषणा की है कि जिले की पहचान संत रविदास नगर के रूप में ही बनी रहेगी। योगी आदित्यनाथ ने उसी नाम को स्थायी पहचान देने का संदेश देकर यह स्पष्ट किया कि भाजपा दलित प्रतीकों पर वैचारिक और राजनीतिक दावेदारी मजबूत करना चाहती है। ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है क्या नाम परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन का पर्याय बन सकता है? संत रविदास का स्वप्न केवल सम्मानजनक संबोधन नहीं, बल्कि जाति-विहीन, श्रमसम्मानित और अवसर-समान समाज का था। यदि शिक्षा, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और सम्मान के अवसरों में वास्तविक बदलाव नहीं आता, तो प्रतीकों की चमक स्थायी सामाजिक परिवर्तन का विकल्प नहीं बन सकती।

मुख्यमंत्री के भाषण में संत रविदास के साथ महर्षि वाल्मीकि, निषादराज, माता शबरी और बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर का लगातार उल्लेख हुआ। यह सूची आकस्मिक नहीं थी। उत्तर प्रदेश में दलित और अति पिछड़े समुदायों का बड़ा हिस्सा इन प्रतीकों से सांस्कृतिक जुड़ाव रखता है, जबकि पंजाब में रविदासिया समुदाय महत्वपूर्ण सामाजिक और राजनीतिक शक्ति है। काशी से जालंधर तक संत रविदास की पावन मिट्टी भेजने, पंजाब से विशेष रेल सेवाओं और राष्ट्रीय स्तर पर अभियान चलाने की घोषणाओं ने इस संदेश को और स्पष्ट कर दिया कि कार्यक्रम की परिधि केवल पूर्वांचल नहीं, बल्कि उत्तर भारत का व्यापक सामाजिक मानचित्र था। योगी आदित्यनाथ ने संत रविदास की प्रसिद्ध पंक्तिऐसा चाहूं राज मैं, जहां मिले सबन को अन्नको प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना से जोड़ते हुए कहा कि वर्ष 2020 से 81 करोड़ लोगों को नि:शुल्क राशन दिया जा रहा है। यहां धार्मिक-सांस्कृतिक स्मृति और कल्याणकारी राज्य की नीति को एक सूत्र में बांधने की कोशिश दिखाई देती है। भाजपा की राजनीति में यह प्रवृत्ति लगातार मजबूत हुई है कि संतों, महापुरुषों और लोकनायकों की वाणी को सरकारी योजनाओं की वैधता के साथ जोड़ा जाए।

काशी का चयन भी अत्यंत अर्थपूर्ण है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र होने के कारण काशी भाजपा की सांस्कृतिक राजनीति का राष्ट्रीय मंच बन चुकी है। यहां से निकला संदेश देशव्यापी प्रभाव रखता है। समरसता संकल्प अभियान को फरवरी 2027 तक चलाने का निर्णय बताता है कि इसे केवल एक समारोह नहीं, बल्कि लंबी अवधि के सामाजिक संपर्क अभियान के रूप में देखा जा रहा है। कलश यात्रा, संत संपर्क, समरसता यात्रा और युवा संवाद जैसे कार्यक्रम इस बात के संकेत हैं कि पार्टी बूथ स्तर तक सांस्कृतिक-सामाजिक नेटवर्क तैयार करना चाहती है। कार्यक्रम का एक अन्य महत्वपूर्ण आयाम विपक्ष पर वैचारिक दबाव बनाना था। समाजवादी पार्टी पर संत रविदास नगर का नाम बदलने और आंबेडकर से जुड़े संस्थानों की उपेक्षा करने के आरोपों के माध्यम से भाजपा ने सामाजिक न्याय की राजनीति की नैतिकता को चुनौती देने की कोशिश की। इससे यह संदेश देने का प्रयास हुआ कि दलित सम्मान और बहुजन प्रतीकों की रक्षा का दावा अब केवल पारंपरिक बहुजन दलों तक सीमित नहीं रहा।

फिर भी इस पूरी राजनीति की वास्तविक परीक्षा प्रतीकों से आगे जाकर होगी। संत रविदास का स्वप्न जाति-विहीन, श्रमसम्मानित और समान अवसर वाले समाज का था। यदि शिक्षा, रोजगार, सामाजिक प्रतिनिधित्व और आर्थिक अवसरों में ठोस सुधार दिखाई देते हैं, तभी यह समरसता अभियान स्थायी सामाजिक परिवर्तन का आधार बन सकेगा। अन्यथा नामकरण, प्रतिमाओं और सांस्कृतिक आयोजनों की राजनीति सीमित प्रभाव तक सिमट सकती है। राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो काशी का यह आयोजन भाजपा की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है जिसमें सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, कल्याणकारी राजनीति और बहुजन प्रतीकों को एक साझा राजनीतिक आख्यान में पिरोया जा रहा है। योगी आदित्यनाथ का भाषण इस नई राजनीति का घोषणापत्र जैसा थाजहां संत परंपरा आस्था का विषय भर नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक विस्तार का माध्यम बनती दिखाई देती है। आने वाले चुनावों में यह स्पष्ट होगा कि काशी से निकला यह समरसता संदेश उत्तर प्रदेश की सीमाओं से आगे बढ़कर पंजाब सहित पूरे उत्तर भारत के सामाजिक मानस में कितनी गहरी जगह बना पाता है। 

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