Saturday, 11 July 2026

अदालत ही तय करेगी इतिहास का सच, सड़क नहीं

अदालत ही तय करेगी इतिहास का सच, सड़क नहीं 

देश के न्यायालयों में इस समय केवल मुकदमों की सुनवाई नहीं हो रही, बल्कि इतिहास, आस्था, पुरातत्व और संविधान से जुड़े अनेक प्रश्न भी न्यायिक कसौटी पर परखे जा रहे हैं। बीते कुछ वर्षों में राम जन्मभूमि से लेकर काशी के ज्ञानवापी परिसर, मथुरा की श्रीकृष्ण जन्मभूमि, धार की भोजशाला, संभल, कुतुब मीनार और ताजमहल तक कई ऐसे मामले राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आए हैं, जिन्होंने भारतीय इतिहास की स्थापित धारणाओं पर नए सवाल खड़े किए हैं। इन मामलों में हिंदू पक्ष की ओर से अदालतों में पैरवी कर रहे सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन का कहना है कि उनकी पूरी कानूनी लड़ाई किसी विचारधारा या समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि न्यायालय के समक्ष उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों, ऐतिहासिक अभिलेखों, पुरातात्विक साक्ष्यों और संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर सत्य की न्यायिक पड़ताल कराने की है। उनका दावा है कि वर्षों से जिन प्रश्नों पर सार्वजनिक विमर्श चलता रहा, उनका अंतिम उत्तर केवल अदालत ही दे सकती है। सीनियर रिपोर्टर सुरेश गांधी से हुई विस्तृत बातचीत में जैन ने इन चर्चित मुकदमों की पृष्ठभूमि, अपनी कानूनी रणनीति और न्यायिक प्रक्रिया पर खुलकर अपनी बात रखी 

सुरेश गांधी

भारतीय न्यायपालिका के सामने आज जिन मुकदमों ने इतिहास, आस्था और कानून को एक साथ खड़ा कर दिया है, उनमें राम जन्मभूमि, काशी का ज्ञानवापी परिसर, मथुरा की श्रीकृष्ण जन्मभूमि, धार की भोजशाला, संभल, कुतुब मीनार और ताजमहल प्रमुख हैं। इन लगभग सभी मामलों में हिंदू पक्ष की ओर से पैरवी कर रहे सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन मानते हैं कि इन विवादों को राजनीतिक चश्मे से नहीं, बल्कि न्यायालय की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। उनका दावा है कि उनकी पूरी कानूनी लड़ाई किसी समुदाय के खिलाफ नहीं, बल्कि संविधान, ऐतिहासिक दस्तावेजों, पुरातात्विक साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से उन प्रश्नों का उत्तर खोजने की है, जिन्हें दशकों तक दबाकर रखा गया। सीनियर रिपोर्टर सुरेश गांधी से विशेष बातचीत में जैन ने पहली बार इन सभी मुकदमों को एक साझा न्यायिक दृष्टि से जोड़ते हुए अपनी रणनीति, तर्क और सोच विस्तार से रखी।

विष्णु शंकर जैन बातचीत की शुरुआत ही उस धारणा को चुनौती देते हुए करते हैं, जिसे वह "सबसे बड़ा भ्रम" बताते हैं। उनके अनुसार अक्सर कहा जाता है कि राम मंदिर मामले में हिंदू पक्ष को अदालत में मुकदमा चलाने का अवसर "दिया गया" जैन का कहना है कि यह सोच भारतीय संविधान और न्यायपालिका की मूल भावना के विपरीत है। उनके शब्दों में, अदालत में जाने का अधिकार किसी समुदाय या सरकार की कृपा से नहीं, बल्कि संविधान से मिलता है। न्यायालय भावनाओं से चलता है, बहुमत से और राजनीतिक दबाव से; वह केवल साक्ष्यों, दस्तावेजों और कानून के आधार पर निर्णय देता है। राम जन्मभूमि आंदोलन का उल्लेख करते हुए जैन कहते हैं कि इसे केवल 2019 के फैसले से जोड़कर देखना इतिहास के साथ अन्याय होगा। उनके अनुसार यह मुकदमा 1950 से न्यायालयों में चल रहा था, 1989 में इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा, वहां लगभग तीन दशक तक सुनवाई हुई और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने वर्षों तक चली सुनवाई के बाद अंतिम निर्णय दिया। उनका तर्क है कि यदि किसी मुकदमे को सात दशकों तक अदालतें सुनती हैं, हजारों पृष्ठों के दस्तावेजों, गवाहियों और पुरातात्विक साक्ष्यों पर विचार करती हैं, तो यह कहना कि किसी पक्ष को "मौका दे दिया गया", न्यायिक प्रक्रिया की गंभीरता को कम करके आंकना है।

जैन का मानना है कि राम जन्मभूमि का निर्णय केवल एक मंदिर या भूमि विवाद का फैसला नहीं था। उनके अनुसार इसने भारतीय न्यायशास्त्र में कई महत्वपूर्ण सिद्धांतों को स्पष्ट किया। वह विशेष रूप से 'देवता के विधिक व्यक्तित्व (Juristic Person)' और 'नेक्स्ट फ्रेंड' की अवधारणा का उल्लेख करते हैं। जैन कहते हैं कि पूर्व न्यायाधीश देवकीनंदन अग्रवाल द्वारा 1989 में भगवान श्रीरामलला विराजमान की ओर से मुकदमा दायर किया जाना भारतीय न्यायिक इतिहास का निर्णायक मोड़ था। उनके अनुसार इसी ने यह सिद्ध किया कि किसी मंदिर या देवस्थान के अधिकारों की रक्षा के लिए स्वयं देवता की ओर से भी न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जा सकता है। यही वह आधार है, जिसे जैन आगे ज्ञानवापी, श्रीकृष्ण जन्मभूमि, भोजशाला, संभल, कुतुब मीनार और ताजमहल जैसे मामलों से जोड़ते हैं। उनका कहना है कि लोग इन्हें अलग-अलग विवाद मानते हैं, जबकि उनकी दृष्टि में इन सबका मूल प्रश्न एक ही हैक्या किसी ऐतिहासिक दावे की जांच न्यायालय में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर हो सकती है? जैन का उत्तर हैहाँ, और होना भी चाहिए।

वह कहते हैं कि उनके द्वारा दायर प्रत्येक मुकदमे की बुनियाद आस्था नहीं, बल्कि अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए गए दस्तावेज, ऐतिहासिक अभिलेख, राजस्व रिकॉर्ड, पुरातात्विक सामग्री और विधिक तर्क हैं। उनके अनुसार यदि इन मुकदमों में पर्याप्त कानूनी आधार होता, तो अदालतें उन्हें सुनवाई के योग्य भी मानतीं। उनका कहना है कि किसी भी याचिका का स्वीकार होना ही यह संकेत देता है कि न्यायालय ने उसमें विचारणीय प्रश्न देखा है; अंतिम निर्णय अलग विषय है, लेकिन सुनवाई स्वयं न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है। जैन का कहना है कि उनके खिलाफ सबसे बड़ा आरोप यह लगाया जाता है कि वे इतिहास को अदालत में ले जा रहे हैं। इस पर उनका जवाब स्पष्ट हैजब किसी ऐतिहासिक स्थल से जुड़ा विवाद स्वामित्व, पूजा-अधिकार या संवैधानिक अधिकार का प्रश्न बन जाता है, तब उसका समाधान केवल इतिहास की पुस्तकों में नहीं, बल्कि न्यायालय में ही संभव है। उनके अनुसार अदालतें इतिहास नहीं लिखतीं, बल्कि प्रस्तुत साक्ष्यों का विधिक परीक्षण करती हैं और उसी आधार पर निर्णय देती हैं। यही कारण है कि वह बार-बार "तर्क, साक्ष्य और कानून" को अपनी पूरी कानूनी लड़ाई का आधार बताते हैं।

इसी सोच के साथ जैन बताते हैं कि राम मंदिर के निर्णय के बाद उन्होंने श्रीकृष्ण जन्मभूमि सहित अन्य मामलों में भी न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। उनका कहना है कि उनका उद्देश्य किसी प्रकार का सामाजिक तनाव पैदा करना नहीं, बल्कि उन दस्तावेजों और अभिलेखों की न्यायिक जांच कराना है, जिन्हें उनके अनुसार लंबे समय तक पर्याप्त महत्व नहीं मिला। उनके शब्दों में, "यदि हमारे दावे गलत हैं तो अदालत उन्हें खारिज कर देगी, लेकिन यदि साक्ष्य हमारे पक्ष में हैं तो न्याय भी अदालत ही करेगी। हमें सड़क का फैसला चाहिए और नारे का; हमारा भरोसा केवल भारतीय न्यायपालिका पर है। जैन का कहना है कि राम जन्मभूमि का निर्णय आने के बाद उनके सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि क्या वही न्यायिक सिद्धांत अन्य विवादित स्थलों पर भी लागू हो सकते हैं। उनके अनुसार इसी सोच के साथ श्रीकृष्ण जन्मभूमि, ज्ञानवापी, भोजशाला, संभल, कुतुब मीनार और ताजमहल जैसे मामलों में न्यायालय का दरवाजा खटखटाया गया। उनका दावा है कि इन सभी मुकदमों की प्रकृति भले अलग हो, लेकिन उनकी कानूनी आत्मा एक ही हैयदि किसी ऐतिहासिक या धार्मिक स्थल को लेकर गंभीर विवाद और दस्तावेजी आधार मौजूद हैं तो उसकी जांच न्यायालय के माध्यम से होनी चाहिए।

ज्ञानवापी प्रकरण का उल्लेख करते हुए विष्णु शंकर जैन कहते हैं कि उनके लिए यह मामला किसी धार्मिक बहस का नहीं, बल्कि न्यायिक परीक्षण का विषय है। उनका कहना है कि उन्होंने अदालत से केवल इतना आग्रह किया कि परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराया जाए ताकि वास्तविक स्थिति न्यायालय के सामने सके। उनके अनुसार न्यायपालिका अनुमान या राजनीतिक विमर्श के आधार पर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक रिपोर्ट, पुरातात्विक अध्ययन और अभिलेखीय साक्ष्यों के आधार पर निर्णय करती है। जैन का दावा है कि सर्वेक्षण और उपलब्ध रिकॉर्ड उनके पक्ष को मजबूत करते हैं, लेकिन वह यह भी जोड़ते हैं कि अंतिम निष्कर्ष न्यायालय को ही निकालना है। श्रीकृष्ण जन्मभूमि को लेकर जैन कहते हैं कि 25 सितंबर 2020 को दायर मुकदमे का उद्देश्य केवल पूजा-अधिकार का प्रश्न उठाना नहीं था, बल्कि न्यायालय के समक्ष उपलब्ध ऐतिहासिक सामग्री का विधिक परीक्षण कराना भी था। उनके अनुसार राम जन्मभूमि प्रकरण ने यह सिद्ध कर दिया कि यदि किसी धार्मिक स्थल से जुड़ा अधिकार और इतिहास न्यायिक विवाद का विषय बनता है, तो अदालत उसकी सुनवाई कर सकती है। उनका दावा है कि मथुरा से जुड़े मामले में भी अनेक ऐतिहासिक दस्तावेज, राजस्व अभिलेख और अन्य सामग्री न्यायालय के समक्ष रखी गई है।

धार की भोजशाला का जिक्र आते ही विष्णु शंकर जैन का स्वर और गंभीर हो जाता है। उनका कहना है कि भोजशाला केवल एक इमारत का विवाद नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत का प्रश्न है। जैन का दावा है कि अदालत में प्रस्तुत दस्तावेजों, पुरातात्विक अभिलेखों और ऐतिहासिक संदर्भों से यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि इस स्थल की वास्तविक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या रही। उनके अनुसार यदि किसी स्थान के अतीत को लेकर दो अलग-अलग दावे मौजूद हैं तो न्यायालय के समक्ष उपलब्ध सामग्री का परीक्षण ही सबसे निष्पक्ष रास्ता है। संभल का उल्लेख करते हुए जैन कहते हैं कि देश में कई ऐसे स्थल हैं जिनके बारे में समाज में लंबे समय से अलग-अलग धारणाएं प्रचलित हैं। उनके अनुसार किसी भी दावे का उत्तर नारों से मिलेगा और टेलीविजन की बहसों से। उनका कहना है कि यदि किसी पक्ष के पास दस्तावेज हैं तो वह अदालत में रखे, दूसरा पक्ष भी अपना पक्ष रखे और न्यायालय विधि के अनुसार निर्णय करे। जैन का दावा है कि उनकी पूरी रणनीति इसी संवैधानिक प्रक्रिया पर आधारित है।

कुतुब मीनार परिसर पर दायर याचिका के संबंध में जैन कहते हैं कि उनका उद्देश्य किसी स्मारक का स्वरूप बदलना नहीं, बल्कि उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों और अभिलेखों की न्यायिक जांच कराना है। उनके अनुसार अनेक ऐतिहासिक विवरणों और स्थापत्य संबंधी तथ्यों को अदालत के समक्ष रखा गया है। उनका कहना है कि यदि किसी ऐतिहासिक प्रश्न पर गंभीर संदेह व्यक्त किया जाता है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में उसका सबसे उपयुक्त मंच न्यायपालिका ही है। ताजमहल पर पूछे गए प्रश्न के उत्तर में विष्णु शंकर जैन अपने पुराने रुख को दोहराते हैं। उनका दावा है कि ताजमहल के इतिहास को लेकर कई ऐसे प्रश्न हैं जिनकी वैज्ञानिक और न्यायिक जांच होनी चाहिए। वह कहते हैं कि उनकी याचिका का उद्देश्य किसी स्थापित धारणा को केवल चुनौती देना नहीं, बल्कि न्यायालय से यह अनुरोध करना है कि परिसर के बंद कमरों सहित उन सभी पहलुओं की विशेषज्ञों द्वारा जांच कराई जाए, जिन पर वर्षों से सवाल उठते रहे हैं। जैन यह भी दावा करते हैं कि उन्होंने अपने पक्ष में विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों, दस्तावेजों और शोध सामग्री का हवाला अदालत के समक्ष रखा है। उनके अनुसार यदि उनके दावे गलत हैं तो न्यायालय उन्हें स्वीकार नहीं करेगा, लेकिन यदि जांच से उनके पक्ष की पुष्टि होती है तो इतिहास के कई अध्याय नए सिरे से समझे जाएंगे।

बातचीत के दौरान विष्णु शंकर जैन Places of Worship Act का भी उल्लेख करते हैं। उनका कहना है कि उन्होंने इस कानून के कुछ प्रावधानों को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है। जैन का तर्क है कि यदि किसी नागरिक को लगता है कि उसके संवैधानिक या धार्मिक अधिकार प्रभावित हुए हैं, तो न्यायालय का दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं किया जा सकता। उनका कहना है कि इस विषय पर अंतिम निर्णय सर्वोच्च न्यायालय को करना है और उन्हें न्यायपालिका की निष्पक्षता पर पूरा विश्वास है। अपने पिता वरिष्ठ अधिवक्ता हरिशंकर जैन का उल्लेख करते हुए विष्णु शंकर जैन कहते हैं कि उन्होंने बचपन से एक ही सीख दी—"भावनाएं अदालत में नहीं, साक्ष्य चलते हैं।" जैन कहते हैं कि वर्षों तक आलोचना झेलने के बावजूद उनके पिता ने न्यायपालिका पर विश्वास नहीं छोड़ा और वही विश्वास आज उनकी अपनी कानूनी यात्रा का भी आधार है। बातचीत के अंत में विष्णु शंकर जैन कहते हैं कि उनके लिए राम मंदिर, ज्ञानवापी, श्रीकृष्ण जन्मभूमि, भोजशाला, संभल, कुतुब मीनार और ताजमहल सात अलग-अलग मुकदमे नहीं, बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने रखे गए एक ही मूल प्रश्न के अलग-अलग अध्याय हैं। उनका कहना है कि इतिहास के विवादों का समाधान भीड़, राजनीति या भावनाओं से नहीं, बल्कि अदालत, संविधान, तर्क और साक्ष्यों से होना चाहिए। "यदि हमारे पास प्रमाण नहीं होंगे तो अदालत हमें अस्वीकार कर देगी, लेकिन यदि प्रमाण हैं तो न्याय मिलने का सबसे बड़ा मंच भी अदालत ही है। इसलिए हमारी पूरी लड़ाई न्यायपालिका के भीतर है, न्यायपालिका के बाहर नहीं।" यही विश्वास उनके प्रत्येक मुकदमे और कानूनी रणनीति की आधारशिला है।

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