डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी : जहाँ सिद्धांत झुके नहीं, सत्ता से बड़ा था राष्ट्र
उन्होंने विश्वविद्यालयों में ज्ञान का दीप जलाया, संसद में वैचारिक राजनीति की नई परंपरा स्थापित की, विभाजन के दौर में बंगाल के भविष्य की लड़ाई लड़ी और जम्मू-कश्मीर के प्रश्न पर अपने प्राण न्योछावर कर दिए। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन केवल एक नेता की जीवनी नहीं, बल्कि आधुनिक भारत की राष्ट्रीय चेतना का जीवंत दस्तावेज है। मतलब साफ है भारतीय इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनका मूल्यांकन उनके पदों से नहीं, बल्कि उनके विचारों की दीर्घायु से किया जाता है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ऐसे ही राष्ट्रपुरुष थे। वे एक साथ शिक्षाविद्, प्रखर चिंतक, संविधान के गंभीर अध्येता, स्वतंत्र भारत के पहले उद्योग मंत्री और राष्ट्र की एकता-अखंडता के अदम्य प्रहरी थे। उन्होंने सत्ता को कभी लक्ष्य नहीं बनाया; राष्ट्रहित उनके लिए सर्वोच्च था। यही कारण है कि जब सिद्धांत और सत्ता आमने-सामने आए, तो उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के पद का त्याग कर दिया। बंगाल के विभाजन के निर्णायक दौर में उनकी दूरदृष्टि ने पश्चिम बंगाल के भारत में बने रहने की लड़ाई को नई दिशा दी। भारतीय जनसंघ की स्थापना कर उन्होंने वैचारिक राजनीति का ऐसा अध्याय शुरू किया, जिसने आने वाले दशकों की राष्ट्रीय राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। जम्मू-कश्मीर में अलग विधान और अलग व्यवस्था के विरोध में उनका संघर्ष अंततः उनके बलिदान पर आकर रुका, लेकिन उनके द्वारा उठाए गए प्रश्न कभी समाप्त नहीं हुए। दशकों बाद जब अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधान हटाए गए, तो उनके संकल्प की पुनः व्यापक चर्चा हुई। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि विचारों की शक्ति समय से बड़ी होती है और राष्ट्र के लिए किया गया त्याग इतिहास के पन्नों पर नहीं, पीढ़ियों की चेतना में अमर होता है
सुरेश गांधी
किसी राष्ट्रपुरुष का
मूल्यांकन केवल इस आधार
पर नहीं होता कि
उसने अपने समय में
क्या किया, बल्कि इस आधार पर
भी होता है कि
उसके विचार आने वाली पीढ़ियों
को कितनी दिशा देते हैं।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन इसी
कसौटी पर परखा जाना
चाहिए। 23 जून 1953 को जब डॉ.
श्यामा प्रसाद मुखर्जी की हिरासत में
मृत्यु हुई, तब शायद
ही किसी ने सोचा
होगा कि उनके द्वारा
उठाए गए प्रश्न आने
वाले दशकों तक भारतीय राजनीति
के केंद्र में बने रहेंगे।
समय बदला, सरकारें बदलीं, राजनीतिक समीकरण बदलते रहे, लेकिन राष्ट्रीय
एकता, संघीय ढांचे, सांस्कृतिक पहचान और संविधान की
एकरूपता पर चलने वाली
बहस कभी समाप्त नहीं
हुई। यही किसी दूरदर्शी
नेता की सबसे बड़ी
पहचान होती है कि
उसका चिंतन उसके जीवनकाल से
कहीं आगे तक जीवित
रहता है। डॉ. मुखर्जी का सपना केवल
जम्मू-कश्मीर तक सीमित नहीं
था। वे ऐसे भारत
की कल्पना करते थे, जहां
नागरिक की पहचान क्षेत्र,
भाषा, जाति या संप्रदाय
से पहले भारतीय होने
की हो। उनके लिए
राष्ट्रवाद किसी के विरुद्ध
खड़ा होने का विचार
नहीं था, बल्कि भारत
की सांस्कृतिक निरंतरता, लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रीय आत्मसम्मान
का सकारात्मक दर्शन था।
उन्होंने कहा था—'एक
देश में दो विधान,
दो प्रधान और दो निशान
नहीं चलेंगे।' यह केवल एक
राजनीतिक नारा नहीं था,
बल्कि भारतीय गणराज्य की एकात्मकता का
उद्घोष था। इसी संकल्प
को लेकर वे जम्मू-कश्मीर की ओर बढ़े
और वहीं उनका जीवन
भारतीय राजनीति के सबसे रहस्यमय
अध्यायों में दर्ज हो
गया। स्वतंत्रता के बाद भारत
के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों
में से एक थी—रियासतों का एकीकरण। अधिकांश
रियासतें भारत में विलय
हो गईं, लेकिन जम्मू-कश्मीर का प्रश्न शुरू
से ही अलग और
जटिल बना रहा। 1947 में
पाकिस्तान समर्थित कबायली हमले, महाराजा हरि सिंह द्वारा
भारत के साथ विलय-पत्र पर हस्ताक्षर
और उसके बाद बनी
राजनीतिक परिस्थितियों ने इस राज्य
को विशेष संवैधानिक व्यवस्था की ओर अग्रसर
किया। भारतीय संविधान में जोड़ा गया
अनुच्छेद 370 इसी विशेष व्यवस्था
का आधार बना। इसके
तहत जम्मू-कश्मीर को अलग संविधान,
अलग ध्वज और अनेक
मामलों में विशेष अधिकार
प्राप्त हुए। समर्थकों का
मत था कि यह
व्यवस्था तत्कालीन परिस्थितियों में आवश्यक थी,
जबकि विरोधियों का तर्क था
कि इससे राष्ट्रीय एकीकरण
की प्रक्रिया प्रभावित होगी। इसी बहस के
केंद्र में डॉ. श्यामा
प्रसाद मुखर्जी का नाम सबसे
प्रमुखता से उभरता है।
उनका मानना था कि भारत
की संप्रभुता और संवैधानिक एकता
के लिए अलग संवैधानिक
व्यवस्था स्थायी समाधान नहीं हो सकती।
वे कहते थे कि
यदि भारत एक राष्ट्र
है, तो उसके नागरिकों
के अधिकार और संवैधानिक व्यवस्था
भी मूलतः एक होनी चाहिए।
भारतीय जनसंघ : वैचारिक राजनीति का नया अध्याय
मंत्रिमंडल से अलग होने
के बाद उन्होंने 1951 में
भारतीय जनसंघ की स्थापना की।
यह केवल एक नए
राजनीतिक दल का जन्म
नहीं था, बल्कि भारतीय
राजनीति में वैचारिक विपक्ष
के सशक्त उदय का संकेत
भी था। जनसंघ ने
राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, लोकतांत्रिक व्यवस्था, आर्थिक आत्मनिर्भरता और समान नागरिक
अधिकारों को अपने प्रमुख
सिद्धांतों के रूप में
प्रस्तुत किया। डॉ. मुखर्जी चाहते
थे कि संसद में
सरकार के निर्णयों पर
गंभीर और तथ्याधारित बहस
हो। उनके लिए विपक्ष
लोकतंत्र का विरोधी नहीं,
बल्कि उसका आवश्यक संतुलन
था।
जब इतिहास ने नई करवट ली
5 अगस्त 2019 भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की
सबसे महत्वपूर्ण तिथियों में दर्ज हो
गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व
में केंद्र सरकार ने संविधान के
अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधानों
और अनुच्छेद 35ए को निष्प्रभावी
करने तथा जम्मू-कश्मीर
के पुनर्गठन का निर्णय लिया।
सरकार ने इसे राष्ट्रीय
एकीकरण, समान संवैधानिक अधिकारों
और विकास की दिशा में
ऐतिहासिक कदम बताया। इस
निर्णय के बाद देशभर
में डॉ. श्यामा प्रसाद
मुखर्जी का नाम फिर
प्रमुखता से चर्चा में
आया। उनके समर्थकों ने
इसे उस संकल्प की
पूर्ति माना जिसके लिए
उन्होंने संघर्ष किया था। अनेक
राजनीतिक विश्लेषकों ने भी माना
कि छह दशक से
अधिक समय तक भारतीय
राजनीति को प्रभावित करने
वाले एक बड़े वैचारिक
प्रश्न का नया अध्याय
खुला। वहीं कुछ राजनीतिक
दलों और संवैधानिक विशेषज्ञों
ने इस निर्णय की
प्रक्रिया तथा संघीय ढांचे
पर इसके प्रभाव को
लेकर अलग दृष्टिकोण भी
रखा। लोकतंत्र की यही विशेषता
है कि महत्वपूर्ण निर्णयों
पर विविध मत सामने आते
हैं।
'एक भारत' की अवधारणा
डॉ. मुखर्जी के
विचारों का सबसे महत्वपूर्ण
आधार था—एकात्म भारत।
लेकिन 'एक भारत' का
उनका अर्थ सांस्कृतिक एकरूपता
नहीं था। वे भारत
की विविधताओं को उसकी शक्ति
मानते थे। उनका आग्रह
केवल इतना था कि
संविधान, राष्ट्रीय ध्वज, लोकतांत्रिक संस्थाओं और राष्ट्रीय संप्रभुता
के प्रश्न पर कोई दो
राय नहीं होनी चाहिए।
आज 'एक भारत, श्रेष्ठ
भारत' जैसी पहलें राज्यों
के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान, भाषाई सम्मान और राष्ट्रीय एकता
को मजबूत करने का प्रयास
करती हैं। यह भावना
उस व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि से जुड़ती है
जिसमें विविधता और एकता एक-दूसरे की पूरक हैं,
विरोधी नहीं।
आत्मनिर्भर भारत और उनका आर्थिक दृष्टिकोण
डॉ. मुखर्जी को
अक्सर केवल कश्मीर आंदोलन
के संदर्भ में याद किया
जाता है, जबकि उनका
आर्थिक दृष्टिकोण भी उतना ही
महत्वपूर्ण था। स्वतंत्र भारत
के पहले उद्योग मंत्री
के रूप में वे
मानते थे कि राजनीतिक
स्वतंत्रता तभी स्थायी होगी
जब देश आर्थिक रूप
से सशक्त बनेगा। आज विनिर्माण, स्टार्टअप,
डिजिटल अर्थव्यवस्था, रक्षा उत्पादन और स्थानीय उद्योगों
को बढ़ावा देने जैसे विषय
राष्ट्रीय नीति के केंद्र
में हैं। यद्यपि समय
और परिस्थितियां बदल चुकी हैं,
फिर भी आत्मनिर्भरता की
मूल अवधारणा उनके आर्थिक चिंतन
की याद दिलाती है।
उन्होंने बहुत पहले ही
यह समझ लिया था
कि आयात पर अत्यधिक
निर्भर राष्ट्र दीर्घकाल में आत्मविश्वासी नहीं
बन सकता।
शिक्षा : केवल डिग्री नहीं, राष्ट्र निर्माण का माध्यम
डॉ. मुखर्जी का
एक और बड़ा योगदान
शिक्षा के क्षेत्र में
था। उनका विश्वास था
कि विश्वविद्यालय केवल परीक्षा लेने
और प्रमाणपत्र देने वाली संस्थाएं
नहीं हो सकते। उन्हें
ऐसे नागरिक तैयार करने चाहिए जो
ज्ञानवान होने के साथ-साथ चरित्रवान भी
हों। आज जब शिक्षा
में कौशल, नवाचार, भारतीय ज्ञान परंपरा और अनुसंधान पर
जोर दिया जा रहा
है, तब उनका दृष्टिकोण
फिर प्रासंगिक लगता है। वे
चाहते थे कि भारतीय
युवाओं में वैज्ञानिक सोच
और सांस्कृतिक आत्मविश्वास साथ-साथ विकसित
हो।
लोकतंत्र में सशक्त विपक्ष की आवश्यकता
भारतीय लोकतंत्र में डॉ. मुखर्जी
की सबसे बड़ी देन
यह भी मानी जाती
है कि उन्होंने वैचारिक
विपक्ष को संस्थागत स्वरूप
देने का प्रयास किया।
उनका विश्वास था कि लोकतंत्र
केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं
है। संसद में प्रभावी
बहस, सरकार की जवाबदेही और
नीतियों की रचनात्मक समीक्षा
लोकतंत्र को मजबूत बनाती
है। आज जब संसद,
विपक्ष और लोकतांत्रिक संवाद
की भूमिका पर निरंतर चर्चा
होती है, तब उनका
यह विचार विशेष महत्व रखता है कि
असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं,
बल्कि उसकी शक्ति हो
सकती है—यदि वह
राष्ट्रहित और संवैधानिक मर्यादाओं
के भीतर व्यक्त की
जाए।
नई पीढ़ी के लिए संदेश?
आज का युवा
वैश्विक अवसरों, तकनीकी क्रांति और डिजिटल दुनिया
के बीच अपने भविष्य
का निर्माण कर रहा है।
ऐसे समय में डॉ.
मुखर्जी का जीवन यह
संदेश देता है कि
आधुनिकता और राष्ट्रीय पहचान
साथ-साथ चल सकती
हैं। वैश्विक बनना अपनी जड़ों
से कट जाना नहीं
है। उनका जीवन यह
भी सिखाता है कि सिद्धांतों
के बिना राजनीति केवल
सत्ता का खेल बन
जाती है और चरित्र
के बिना शिक्षा केवल
सूचना का संग्रह रह
जाती है। राष्ट्र निर्माण
के लिए दोनों का
संतुलन आवश्यक है।
इतिहास का निष्पक्ष मूल्यांकन जरूरी
डॉ. श्यामा प्रसाद
मुखर्जी का मूल्यांकन केवल
राजनीतिक आग्रह या विरोध के
आधार पर नहीं होना
चाहिए। इतिहास की दृष्टि से
वे एक विद्वान शिक्षाविद्,
स्वतंत्र भारत के पहले
उद्योग मंत्री, संवैधानिक प्रश्नों पर गंभीर चिंतक,
प्रभावशाली सांसद और वैचारिक राजनीति
के प्रमुख स्तंभ थे। उनके अनेक
विचारों से सहमति या
असहमति हो सकती है,
लेकिन यह अस्वीकार नहीं
किया जा सकता कि
उन्होंने स्वतंत्र भारत की नीतिगत
बहसों को गहराई से
प्रभावित किया। किसी भी लोकतांत्रिक
समाज की परिपक्वता इसी
में है कि वह
अपने ऐतिहासिक व्यक्तित्वों को न तो
अंध-पूजा का विषय
बनाए और न ही
पूर्वाग्रह का। बल्कि उनके
योगदान, सीमाओं और विचारों का
संतुलित अध्ययन करे।
राष्ट्रपुरुष की विरासत
डॉ. श्यामा प्रसाद
मुखर्जी ने कोई विशाल
साम्राज्य नहीं बनाया, न
ही वे लंबे समय
तक सत्ता के शीर्ष पर
रहे। उनकी सबसे बड़ी
विरासत उनके विचार हैं—राष्ट्र सर्वोपरि, शिक्षा का भारतीयकरण, आर्थिक
आत्मनिर्भरता, लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व और राष्ट्रीय एकता।
इतिहास ऐसे व्यक्तित्वों को
वर्षों की सत्ता से
नहीं, बल्कि उनके विचारों की
आयु से याद रखता
है। डॉ. मुखर्जी का
जीवन इसी सत्य का
प्रमाण है कि सिद्धांतों
के लिए लड़ा गया
संघर्ष समय के साथ
और अधिक प्रासंगिक हो
सकता है। आज जब
भारत विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य
लेकर आगे बढ़ रहा
है, तब डॉ. श्यामा
प्रसाद मुखर्जी का जीवन केवल
अतीत का गौरव नहीं,
बल्कि भविष्य की प्रेरणा भी
है। उनका संदेश आज
भी उतना ही स्पष्ट
है—राष्ट्र की शक्ति उसकी
सीमाओं से नहीं, उसके
नागरिकों के चरित्र, उसके
लोकतंत्र की मजबूती और
उसकी सांस्कृतिक चेतना से निर्मित होती
है। इसीलिए डॉ. श्यामा प्रसाद
मुखर्जी केवल इतिहास का
एक अध्याय नहीं हैं; वे
भारत की उस निरंतर
चलती राष्ट्रीय चेतना के प्रतीक हैं,
जो समय के साथ
बदलती अवश्य है, किंतु अपने
मूल आदर्शों से कभी विचलित
नहीं होती।


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