Thursday, 20 August 2026

रिश्ते टूटने से पहले क्यों नहीं सुनाई देती दरार की आवाज…

मैं सहीकी जिद कितनी जान लेगी?

रिश्ते टूटने से पहले क्यों नहीं सुनाई देती दरार की आवाज… 

लखनऊ में तीन मौतों ने एक बार फिर उस सवाल को हमारे सामने ला खड़ा किया है, जिसका जवाब किसी एक अपराध की फाइल में नहीं मिलेगा। पति-पत्नी का विवाद था, तलाक की कानूनी लड़ाई चल रही थी और देखते-देखते रिश्तों का तनाव ऐसी हिंसा में बदल गया कि एक परिवार के तीन लोग दुनिया से चले गए। यह सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि उस बेचैनी का भयावह चेहरा है जो धीरे-धीरे हमारे सामाजिक जीवन में जगह बनाती जा रही है। कभी कर्ज आदमी को तोड़ता है, कभी बेरोजगारी, कभी कारोबारी नुकसान और कभी रिश्तों की खटास। लेकिन संकट नया नहीं है। नया शायद हमारा संकट से निपटने का तरीका है। असहमति अब संवाद मांगने के बजाय टकराव मांगती है, असफलता आत्ममंथन के बजाय आक्रोश पैदा करती है और रिश्ते टूटने पर रास्ता अलग करने के बजाय सामने वाले को खत्म कर देने की मानसिकता सामने जाती है। आखिर हमारी सहनशीलता की सीमा इतनी छोटी क्यों हो गई है? क्या परिवारों में संवाद कम हुआ है, क्या समाज ने सुनना छोड़ दिया है या हम अपने भीतर के तूफान को संभालना भूलते जा रहे हैं? सवाल सिर्फ यह नहीं कि हत्यारा कौन था; सवाल यह भी है कि वह उस बिंदु तक पहुंचा कैसे

सुरेश गांधी  

लखनऊ की तीन मौतें सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, हमारे समय के उस सामाजिक संकट का आईना हैं जहां संवाद की जगह संदेह, धैर्य की जगह आवेश और समाधान की जगह प्रतिशोध लेता जा रहा है. कभी-कभी कोई घटना खबर से आगे बढ़कर सवाल बन जाती है। लखनऊ में एक बैंक अधिकारी महिला की उसके पति द्वारा हत्या, उसके बाद पति की अपनी बहन की हत्या और अंततः खुद को गोली मार लेने की घटना ऐसी ही है। एक परिवार के भीतर उपजा तनाव देखते-देखते तीन जिंदगियों का अंत बन गया। पुलिस इस पूरे घटनाक्रम के पीछे के कारणों की जांच कर रही है। प्रारंभिक सूचनाओं में पति-पत्नी के बीच लंबे समय से चल रहे विवाद और तलाक की कार्यवाही की बात सामने आई है। घटना से पहले आरोपित द्वारा सोशल मीडिया पर डाले गए संदेश की भी जांच हो रही है। यानी तथ्य अभी जांच के दायरे में हैं, लेकिन सवाल हमारे सामने पूरी तरह खड़ा हैआखिर मनुष्य अपने सबसे करीबी रिश्तों के बीच इतना हिंसक कैसे हो जाता है?

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लखनऊ की यह घटना कोई अलग-थलग दिखाई देने वाली सामाजिक प्रवृत्ति नहीं है। कभी पति-पत्नी के विवाद में हत्या हो जाती है, कभी कर्ज और आर्थिक संकट परिवार को आत्मघाती कदम की ओर धकेल देता है, कभी नौकरी या कारोबार का दबाव व्यक्ति को भीतर से तोड़ देता है और कभी मामूली विवाद ऐसी हिंसा में बदल जाता है जिसकी कल्पना कुछ घंटे पहले तक किसी ने नहीं की होती। कारण अलग-अलग हैं, लेकिन इनके पीछे एक साझा धागा दिखाई देता हैतनाव को संभालने की हमारी क्षमता कमजोर पड़ रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के 2024 के आंकड़ों के अनुसार देश में 1.70 लाख से अधिक आत्महत्याएं दर्ज हुईं और आत्महत्या के मामलों में पारिवारिक समस्याएं सबसे प्रमुख कारणों में रहीं। लगभग एक-तिहाई मामलों में पारिवारिक समस्या कारण के रूप में दर्ज की गई। आंकड़े केवल आत्महत्या की कहानी कहते हैं, लेकिन उनके पीछे छिपा सामाजिक संदेश कहीं ज्यादा बड़ा है। परिवार, जो कभी संकट के समय व्यक्ति की अंतिम शरणस्थली होता था, वही यदि तनाव का सबसे बड़ा केंद्र बन जाए तो व्यक्ति किस दरवाजे पर दस्तक देगा?

हर विवाद हत्या की ओर नहीं जाता, फिर कुछ विवाद क्यों पहुंच जाते हैं?

पति-पत्नी के बीच मतभेद कोई नई बात नहीं है। विचार अलग हो सकते हैं, आर्थिक फैसलों पर विवाद हो सकता है, विश्वास में दरार सकती है, विवाह टूट सकता है। यहां तक कि तलाक भी आधुनिक समाज में असामान्य घटना नहीं रह गया है। असहमति का होना समस्या नहीं है; असहमति को हिंसा में बदल देना समस्या है। यही वह बिंदु है जहां समाज को ठहरकर विचार करना होगा। हमने रिश्तों को निभाने की शिक्षा तो बहुत दी, लेकिन रिश्तों में असहमति को संभालने की शिक्षा कितनी दी? बच्चों को पढ़ाई, करियर और प्रतियोगिता की तैयारी कराई, लेकिन असफलता, अस्वीकार और भावनात्मक आघात से निपटना कितना सिखाया? युवाओं को आत्मनिर्भर बनाया, लेकिन भावनात्मक रूप से मजबूत बनाने का प्रयास कितना किया? आज बहुत से लोग आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं, तकनीकी रूप से सक्षम हैं और सामाजिक रूप से अत्यंत सक्रिय दिखाई देते हैं, लेकिन भीतर से अकेले हैं। मोबाइल पर सैकड़ों संपर्क हैं, सोशल मीडिया पर हजारों परिचित हैं, मगर संकट के समय दो लोगों को फोन करने का साहस नहीं होता। यह विरोधाभास खतरनाक है।

सहनशीलता कम हुई है या अपेक्षाएं बढ़ी हैं?

शायद दोनों। हमारा समय तुरंत परिणाम का समय है। तुरंत जवाब चाहिए, तुरंत सफलता चाहिए, तुरंत न्याय चाहिए, तुरंत संतुष्टि चाहिए। रिश्तों में भी यही अधीरता प्रवेश कर गई है। पहले मतभेद पर बातचीत की जगह ब्लॉक करना, पहली असहमति पर संबंध तोड़ना, छोटी चोट को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेना और अपनी बात माने जाने को व्यक्तिगत अपमान समझनाये प्रवृत्तियां धीरे-धीरे सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बन रही हैं। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और जटिल बनाया है। निजी जीवन अब पूरी तरह निजी नहीं रहा। रिश्तों के भीतर का तनाव स्क्रीन पर दिखाई देता है। आरोप सार्वजनिक होते हैं, जवाब सार्वजनिक होते हैं और कई बार अपमान भी सार्वजनिक हो जाता है। इससे विवाद केवल दो व्यक्तियों के बीच नहीं रहता; उसमें परिवार, मित्र, सहकर्मी और आभासी दुनिया के दर्शक भी शामिल हो जाते हैं। ऐसे में भावनाएं और अधिक भड़क सकती हैं। लखनऊ की घटना में भी पुलिस डिजिटल साक्ष्यों और घटनाक्रम की जांच कर रही है। सोशल मीडिया पर कथित संदेश सामने आया है, लेकिन किसी व्यक्ति के अंतिम शब्दों को ही पूरे अपराध का अंतिम सत्य मान लेना उचित नहीं होगा। जांच को तथ्य तय करने देना चाहिए।

समस्या सिर्फ मानसिक स्वास्थ्य की नहीं

हर हिंसक व्यक्ति मानसिक रोगी नहीं होता और हर मानसिक तनावग्रस्त व्यक्ति हिंसक नहीं होता। इसलिए ऐसी घटनाओं को केवल मानसिक बीमारी से जोड़ देना भी खतरनाक सरलीकरण होगा। मगर यह भी उतना ही सच है कि लंबे समय तक तनाव, अवसाद, अकेलापन, नशे की आदत, आर्थिक दबाव, पारिवारिक संघर्ष और असफलता का बोझ व्यक्ति की निर्णय क्षमता को प्रभावित कर सकता है। इसीलिए मानसिक स्वास्थ्य को बीमारी के अंतिम चरण में याद करने की बजाय रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बनाना होगा। जिस तरह शरीर में दर्द होने पर डॉक्टर से मिलने में संकोच नहीं किया जाता, उसी तरह मन में लगातार उथल-पुथल होने पर विशेषज्ञ से बात करना भी सामान्य होना चाहिए। काउंसलिंग कमजोरी नहीं है। मदद मांगना पराजय नहीं है। कुछ समय के लिए पीछे हट जाना कायरता नहीं है। कई बार किसी संकट से बाहर निकलने के लिए सिर्फ इतना जरूरी होता है कि व्यक्ति को कोई बिना निर्णय सुनाए उसकी बात सुन ले।

परिवार में सबसे बड़ा अभावसंवाद

आज घरों में लोग साथ रहते हैं, मगर कई बार साथ नहीं होते। एक कमरे में चार लोग हैं और चारों की आंखें चार अलग-अलग स्क्रीन पर हैं। भोजन की मेज पर बातचीत की जगह मोबाइल है। पति-पत्नी के बीच संवाद की जगह संदेश हैं। माता-पिता बच्चों की उपलब्धियां जानते हैं, उनकी बेचैनियां नहीं। भाई-बहन एक-दूसरे की तस्वीरें सोशल मीडिया पर देखते हैं, लेकिन जीवन की परेशानियां साझा नहीं करते।  

यह कैसी निकटता है?

परिवार का अर्थ केवल एक छत के नीचे रहना नहीं है। परिवार का अर्थ हैकिसी व्यक्ति को यह विश्वास होना कि संकट में वह बिना डर के अपनी बात कह सकता है। यदि कोई पति या पत्नी लगातार कह रहा है कि वह टूट चुका है, यदि किसी रिश्ते में लगातार धमकी, पीछा करने, अपमान या हिंसा के संकेत हैं, यदि कोई व्यक्ति बदला लेने की बात कर रहा है, यदि व्यवहार अचानक असामान्य हो गया हैतो इसे केवलगुस्साकहकर टाल देना बड़ी भूल हो सकती है। खतरे की घंटी हमेशा चीखकर नहीं बजती। कई बार वह बहुत धीमे बजती है।

तलाक अंत नहीं, एक रास्ता है

भारतीय समाज में विवाह आज भी केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं माना जाता। उसमें परिवार, सामाजिक प्रतिष्ठा, रिश्तेदार और भावनात्मक इतिहास सब जुड़ जाते हैं। यही कारण है कि जब विवाह टूटने की स्थिति आती है तो कई लोग इसे जीवन की सबसे बड़ी हार समझ लेते हैं। यह सोच बदलनी होगी। हर विवाह बचाया नहीं जा सकता। हर संबंध का पुनर्निर्माण संभव नहीं होता। कभी-कभी सम्मानजनक दूरी ही दोनों पक्षों के लिए बेहतर होती है। विवाह टूटना दुखद हो सकता है, लेकिन रिश्ते का टूटना जीवन का टूटना नहीं है। यह बात युवाओं को भी समझानी होगी और परिवारों को भी। किसी संबंध को बचाने के नाम पर हिंसा सहना समाधान नहीं है और संबंध टूटने के बाद बदला लेना तो बिल्कुल नहीं।

कानून अंतिम सुरक्षा-रेखा है, पहली नहीं

ऐसी घटनाओं के बाद स्वाभाविक रूप से पुलिस, कानून-व्यवस्था और हथियारों की उपलब्धता पर सवाल उठते हैं। इन सवालों का जवाब जरूरी है। अवैध हथियारों पर रोक, लाइसेंसी हथियारों की निगरानी, घरेलू हिंसा की शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई और खतरे के संकेत मिलने पर पुलिस की संवेदनशील प्रतिक्रिया बेहद जरूरी है। लेकिन कानून हर घर के भीतर मौजूद तनाव को नहीं देख सकता। पुलिस उस समय पहुंचती है जब शिकायत होती है या अपराध सामने आता है। उससे पहले समाज की भूमिका शुरू होती है। पड़ोसी को पता है कि घर में रोज झगड़ा होता है। रिश्तेदार जानते हैं कि पति-पत्नी महीनों से अलग हैं। मित्र जानते हैं कि कोई व्यक्ति गुस्से और अवसाद में है। सहकर्मी देखते हैं कि किसी का व्यवहार बदल गया है। फिर भी हम अक्सर कहते हैं—‘उनका निजी मामला है।यहीं शायद हमारी सबसे बड़ी चूक है। हर निजी मामला सार्वजनिक हस्तक्षेप नहीं मांगता, लेकिन जहां हिंसा की आशंका हो वहां चुप्पी संवेदनशीलता नहीं, लापरवाही बन सकती है।

स्कूल और दफ्तर भी बनें भावनात्मक सुरक्षा-स्थल

हम बच्चों को गणित का तनाव समझाते हैं, परीक्षा का दबाव समझाते हैं, प्रतियोगिता की तैयारी कराते हैं; लेकिन असफल प्रेम, दोस्ती टूटना, परीक्षा में असफलता, नौकरी का तनाव या परिवार में विवाद से कैसे निपटना हैइसकी व्यवस्थित शिक्षा बहुत कम मिलती है। स्कूलों और कॉलेजों में काउंसलिंग व्यवस्था मजबूत होनी चाहिए। कार्यस्थलों पर कर्मचारी सहायता कार्यक्रम केवल कागज पर नहीं, व्यवहार में होने चाहिए। बैंकों, कॉरपोरेट संस्थानों, सरकारी कार्यालयों और पुलिस जैसे तनावपूर्ण क्षेत्रों में नियमित मानसिक स्वास्थ्य परामर्श को सामान्य बनाया जाना चाहिए। यह खर्च नहीं, निवेश है। एक काउंसलर की बातचीत शायद किसी एक परिवार को टूटने से बचा सकती है। एक मित्र की गंभीरता से सुनी गई बात शायद किसी व्यक्ति को गलत निर्णय लेने से रोक सकती है।

हमेंजीतनेकी जगहबचनेकी संस्कृति बनानी होगी

आज हर विवाद में कोई जीतना चाहता है और कोई हारता है। पति चाहता है कि पत्नी उसकी बात माने, पत्नी चाहती है कि पति उसकी बात माने। परिवार चाहता है कि उनका पक्ष सही साबित हो। सोशल मीडिया चाहता है कि उसका नैरेटिव जीत जाए। लेकिन रिश्तों में हर विवाद का विजेता जरूरी नहीं होता। कभी-कभी दोनों पक्ष हारते हैं। और कभी-कभी तीसरा कोई नहीं, पूरा परिवार हार जाता है। इसलिए हमें यह सीखना होगा कि किसी बहस का उद्देश्य सामने वाले को हराना नहीं, समस्या को हराना है। पति-पत्नी में विवाद हो तो सवाल यह नहीं होना चाहिए किकौन जीता?’ सवाल होना चाहिए—‘रिश्ता कैसे सुरक्षित रहेगा?’ और यदि रिश्ता नहीं बच सकता तो कम से कम मनुष्य तो सुरक्षित रहें।

अगली घटना से पहले क्या किया जा सकता है?

बहुत कुछ। परिवारों में नियमित संवाद हो। विवाद बढ़ने पर दोनों पक्ष कुछ समय के लिए अलग होकर शांत हों। हिंसा या धमकी के संकेत को गंभीरता से लिया जाए। तलाक या वैवाहिक विवाद में काउंसलिंग और मध्यस्थता की सुविधा आसानी से उपलब्ध हो। आर्थिक संकट में व्यक्ति को अकेला छोड़ा जाए। मानसिक तनाव पर बातचीत को सामान्य बनाया जाए। नशे और हथियारों के दुरुपयोग पर कठोर निगरानी हो। सोशल मीडिया पर निजी विवाद को तमाशा बनने से रोका जाए। और सबसे महत्वपूर्णक्रोध के चरम क्षण में निर्णय लेने की आदत विकसित करनी होगी। कुछ मिनट का विराम कई बार पूरी जिंदगी बचा सकता है। किसी को फोन करना, घर से बाहर निकल जाना, हथियार से दूरी बनाना, किसी विश्वसनीय व्यक्ति के पास चले जाना, कानूनी सहायता लेना या विशेषज्ञ से बात करनाये छोटे कदम हैं, लेकिन इनका महत्व बहुत बड़ा है।

तीन मौतों के बाद सबसे बड़ा सवाल

लखनऊ की घटना पर कुछ दिन चर्चा होगी। पुलिस जांच आगे बढ़ेगी। डिजिटल साक्ष्य सामने आएंगे। अदालत में मामला पहुंचेगा। खबरें बदल जाएंगी और शहर किसी दूसरी घटना में व्यस्त हो जाएगा। लेकिन अगर इस घटना से समाज ने सिर्फ इतना सीखा किकितना खतरनाक पति था’, तो हमने असली सबक खो दिया। हमें यह पूछना होगा कि ऐसे व्यक्ति के भीतर तनाव किस स्तर तक पहुंचा था? क्या कोई संकेत पहले मिले थे? क्या परिवार को कुछ असामान्य लगा था? क्या किसी ने हस्तक्षेप की कोशिश की? क्या कानूनी या सामाजिक सहायता उपलब्ध थी? और सबसे बड़ा सवालक्या हम अगली ऐसी घटना से पहले किसी टूटते व्यक्ति तक पहुंच सकते हैं? यह किसी क्रांति को दबाने का मामला नहीं है। यह किसी एक अपराधी को कठघरे में खड़ा कर देने से भी समाप्त नहीं होगा। यह हमारे सामाजिक ताने-बाने में आई महीन दरारों को पहचानने का प्रश्न है। कर्ज आदमी को तोड़ सकता है, बेरोजगारी उसे तोड़ सकती है, बीमारी उसे तोड़ सकती है, विवाह का संकट उसे तोड़ सकता है। मगर टूटना और किसी को तोड़ देना दो अलग बातें हैं। समाज का काम यही है कि जब कोई व्यक्ति टूटने लगे तो उसे हिंसा की ओर जाने से पहले संभाल लिया जाए। रिश्तों में मतभेद रहेंगे। विवाह टूटेंगे। कारोबार डूबेंगे। नौकरियां जाएंगी। मुकदमे चलेंगे। जिंदगी में हार भी होगी और अपमान भी। मगर मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि वह इन सबके बावजूद अगली सुबह देखने की क्षमता बनाए रखे। हमारी असली लड़ाई समस्याओं से नहीं, समस्याओं के सामने हार मान लेने की मानसिकता से है। लखनऊ की तीन मौतें हमें यही चेतावनी देती हैंघर की दीवारों के भीतर उठती आवाजों को सुनिए। हर चुप्पी शांति नहीं होती। हर गुस्सा सामान्य नहीं होता। हर धमकी मजाक नहीं होती। और जब किसी रिश्ते में प्रेम खत्म हो जाए, तो रास्ता अलग हो सकता है। लेकिन जिंदगी का रास्ता बंद नहीं होना चाहिए।

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