Thursday, 20 August 2026

यूपी में तावड़े का ‘शाह दांव’, सामने अखिलेश का पीडीए चक्रव्यूह

यूपी में तावड़े काशाह दांव’, सामने अखिलेश का पीडीए चक्रव्यूह

2019 में महाराष्ट्र की सियासत ने जिस विनोद तावड़े को चुनावी हाशिये पर धकेल दिया था, वही तावड़े अब भाजपा के सबसे बड़े चुनावी रण के सेनापति बनकर लौटे हैं। पांच साल पहले जिस राजनीतिक सफर पर विराम की आहट सुनाई दे रही थी, वह अब उत्तर प्रदेश की 403 सीटों की चुनावी कमान तक पहुंच चुका है। बिहार में संगठन, गठबंधन और बूथ मैनेजमेंट की परीक्षा में खरे उतरने के बाद भाजपा ने तावड़े के हाथों में यूपी की पतवार देकर साफ संकेत दिया है कि 2027 का मुकाबला नारों से ज्यादा सामाजिक गणित और संगठन की ताकत पर लड़ा जाएगा। यह नियुक्ति इसलिए भी अहम है क्योंकि यूपी में भाजपा के उस राजनीतिक मॉडल में दरार दिखाई दी है, जिसे 2014 में अमित शाह ने सामाजिक समीकरण और बूथ नेटवर्क के सहारे गढ़ा था। 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के  पीडीए पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यकसमीकरण ने भाजपा के मजबूत माने जाने वाले जनाधार को चुनौती दी। अब तावड़े के सामने केवल खिसके वोट बैंक को वापस लाने का सवाल नहीं, बल्कि बदल चुके सामाजिक समीकरणों के बीच भाजपा के लिए नया चुनावी गठजोड़ गढ़ने की चुनौती है। शांत स्वभाव, संगठन पर पकड़ और चुनावी माइक्रो-मैनेजमेंट के लिए पहचाने जाने वाले तावड़े को सरकार-संगठन के बीच तालमेल से लेकर सहयोगी दलों की गांठें खोलने, स्थानीय असंतोष साधने और बूथ तक कैडर में नई जान फूंकने तक कई मोर्चे संभालने होंगे। बिहार ने तावड़े को रणनीतिकार बनाया, अब यूपी तय करेगा कि वह भाजपा के कितने बड़ेगेम चेंजरहैं

सुरेश गांधी

उत्तर प्रदेश की सियासत में चुनावी बिसात अभी पूरी तरह बिछी भी नहीं है, लेकिन भाजपा ने 2027 के रण का अपना सबसे महत्वपूर्ण मोहरा मैदान में उतार दिया है। बिहार में संगठन और चुनावी प्रबंधन की परीक्षा में खरे उतरे भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री विनोद तावड़े को उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रभारी बनाया जाना महज संगठनात्मक फेरबदल नहीं, बल्कि मिशन-2027 की रणनीति का स्पष्ट संकेत है। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की नई टीम के गठन के अगले ही दिन तावड़े को यूपी की कमान सौंपकर भाजपा ने बता दिया है कि इस बार लड़ाई केवल नारों और रैलियों की नहीं, बल्कि बूथ, सामाजिक समीकरण और चुनावी माइक्रो-मैनेजमेंट की होगी। तावड़े के साथ राष्ट्रीय मंत्री जगदीश ईश्वरभाई पटेल को सह-प्रभारी बनाया गया है। विजयंत पांडा के बाद करीब ढाई वर्ष से प्रदेश में स्थायी प्रभारी का पद खाली था। ऐसे में तावड़े की नियुक्ति इसलिए भी अहम है कि वह यूपी के लिए बिल्कुल नया चेहरा नहीं हैं। पिछले कुछ वर्षों से राष्ट्रीय संगठन की जिम्मेदारियों के साथ वह प्रदेश की चुनावी गतिविधियों से जुड़े रहे हैं। अब उसी अनुभव को औपचारिक जिम्मेदारी में बदल दिया गया है।

शाह की याद दिलाता है फैसला

भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश की चुनावी कहानी में अमित शाह का नाम किसी राजनीतिक अध्याय की तरह दर्ज है। 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्हें यूपी का प्रभारी बनाया गया था। तब पार्टी लंबे राजनीतिक वनवास के बाद प्रदेश में वापसी की राह तलाश रही थी। शाह ने जातीय समीकरणों, बूथ प्रबंधन और संगठन विस्तार को एक साथ साधते हुए भाजपा की जमीन ऐसी तैयार की कि 2014 में भाजपा गठबंधन ने 80 में से 73 सीटें जीत लीं। इसके बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 312 सीटों पर विजय हासिल कर सत्ता में वापसी की। लेकिन एक दशक बाद राजनीतिक जमीन बदल चुकी है। 2022 में भाजपा की सीटें घटकर 255 रह गईं और 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी 37 सीटों के साथ प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जबकि भाजपा 33 सीटों पर सिमट गई। यानी जिस सामाजिक गठजोड़ और संगठनात्मक ढांचे के सहारे भाजपा ने उत्तर प्रदेश में अपना दुर्ग बनाया था, उसमें विपक्ष ने सेंध लगाने की क्षमता दिखाई है। यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें तावड़े की नियुक्ति को देखा जा रहा है। सवाल केवल यह नहीं कि वह भाजपा को चुनाव जिताएंगे या नहीं; बड़ा सवाल यह है कि क्या बिहार के रणनीतिकार तावड़े, उत्तर प्रदेश में अमित शाह की तरह कोई नया चुनावी मॉडल गढ़ पाएंगे?

पीडीए ने बदली सियासी भाषा

अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी ने 2024 में पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए के राजनीतिक सूत्र को प्रभावी ढंग से चुनावी विमर्श में उतारा। इसका असर भाजपा के उस सामाजिक आधार पर भी पड़ा, जिसे वह लंबे समय से अपनी सबसे मजबूत पूंजी मानती रही है। खासकर गैर-यादव पिछड़ा वर्ग और गैर-जाटव दलित मतदाताओं के बीच विपक्ष की बढ़ी पहुंच भाजपा के लिए चुनौती बनी। ऐसे में तावड़े के सामने केवल पुराना वोट बैंक वापस लाने की चुनौती नहीं है, बल्कि सामाजिक समीकरण की नई भाषा गढ़ने का भी सवाल है। यही कारण है कि तावड़े की नियुक्ति को भाजपा की ‘PDA की काटतलाशने की कवायद से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि इसका जवाब किसी एक जाति या समुदाय के समीकरण में नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व और संगठनात्मक पहुंच में तलाशना होगा।

बिहार की माइक्रो-मैनेजमेंट अब यूपी में

विनोद तावड़े की पहचान आक्रामक भाषण देने वाले नेता से अधिक एक शांत, धैर्यवान और संगठन-केंद्रित रणनीतिकार की रही है। एबीवीपी से राजनीतिक जीवन शुरू करने वाले तावड़े ने संगठन के छोटे से छोटे स्तर पर काम किया है। महाराष्ट्र भाजपा के महासचिव से मुंबई भाजपा अध्यक्ष, विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष, मंत्री और फिर राष्ट्रीय महामंत्री तक का सफर उनके संगठनात्मक अनुभव की लंबी पृष्ठभूमि बताता है।  2019 में महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव का टिकट कटने के बाद उनका राजनीतिक भविष्य भले धुंधला दिखाई दिया हो, लेकिन उन्होंने सार्वजनिक असंतोष का रास्ता नहीं चुना। 2020 में राष्ट्रीय सचिव और 2021 में राष्ट्रीय महामंत्री बनने के बाद उनकी राष्ट्रीय भूमिका लगातार बढ़ती गई। हरियाणा से लेकर बिहार तक संगठनात्मक जिम्मेदारियों ने उन्हें राज्यों के अलग-अलग राजनीतिक चरित्र को समझने का अवसर दिया। बिहार में उनकी सबसे बड़ी परीक्षा गठबंधन और सामाजिक समीकरणों के बीच संतुलन साधने की थी। अब वही अनुभव उत्तर प्रदेश के कहीं अधिक बड़े राजनीतिक कैनवास पर आजमाया जाएगा।

403 सीटें, हजारों चेहरे और एक संगठन

उत्तर प्रदेश का चुनाव केवल 403 विधानसभा सीटों का गणित नहीं है। यह क्षेत्र, जाति, स्थानीय नेतृत्व, धार्मिक-सामाजिक समीकरण, किसान, युवा, महिला, रोजगार, कानून-व्यवस्था और सरकार के प्रति स्थानीय धारणा जैसे असंख्य मुद्दों का जोड़ है। तावड़े को सबसे पहले भाजपा के बूथ नेटवर्क को चुनावी ऊर्जा में बदलना होगा। पन्ना प्रमुख से लेकर मंडल और जिला संगठन तक कार्यकर्ताओं की सक्रियता सुनिश्चित करनी होगी। सत्ता में लंबे समय तक रहने के बाद स्थानीय विधायकों के प्रति पैदा हुई नाराजगी को समझना होगा और टिकट वितरण में जीत की संभावना तथा संगठन की अपेक्षाओं के बीच संतुलन बैठाना होगा। यही नहीं, भाजपा के सहयोगी दलोंनिषाद पार्टी, अपना दल (एस), सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोकदलके साथ सीटों तथा सामाजिक प्रतिनिधित्व का संतुलन भी साधना होगा। बिहार में गठबंधन प्रबंधन का अनुभव यहां उनके लिए उपयोगी हो सकता है, लेकिन यूपी के सहयोगी समीकरण कहीं अधिक बहुस्तरीय हैं।

योगी सरकार और संगठन के बीच सेतु

तावड़े के सामने एक और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेल की होगी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार, प्रदेश भाजपा संगठन और केंद्रीय नेतृत्व के बीच राजनीतिक संदेश और चुनावी रणनीति में एकरूपता बनाए रखना जरूरी होगा। 2027 का चुनाव भाजपा के लिए सत्ता की निरंतरता का चुनाव है। इसलिए सरकार की उपलब्धियों को बूथ तक पहुंचाने के साथ-साथ स्थानीय स्तर की नाराजगी को समय रहते पहचानना भी उतना ही जरूरी होगा। संगठन को केवल चुनाव के समय सक्रिय करने के बजाय अभी से लगातार चुनावी मोड में रखना तावड़े की कार्यशैली की असली परीक्षा होगी।

अवध और पूर्वांचल पर विशेष निगाह

2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को जिन इलाकों में अपेक्षाकृत ज्यादा राजनीतिक चुनौती मिली, उनमें अवध और पूर्वांचल के कई हिस्से महत्वपूर्ण रहे। काशी और अयोध्या जैसे प्रतीकात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्रों से लेकर पूर्वांचल की पिछड़ा-दलित राजनीति तक, हर क्षेत्र का अपना अलग समीकरण है। तावड़े का अनुभव यहां काम सकता है। वाराणसी में वह पहले भी संगठनात्मक बैठकों और चुनावी रणनीति से जुड़े कार्यक्रमों में सक्रिय रहे हैं। हालांकि उन्हें वाराणसी का औपचारिक चुनाव प्रभारी कहना सटीक नहीं होगा, लेकिन काशी समेत पूर्वांचल की राजनीतिक जमीन से उनका परिचय जरूर है। अब इस परिचय को व्यापक चुनावी रणनीति में बदलना उनके लिए चुनौती होगा।

2014 की जमीन और 2027 का आसमान अलग

अमित शाह के 2014 के उत्तर प्रदेश मॉडल की सफलता के पीछे नरेंद्र मोदी की प्रचंड लहर, कांग्रेस और बसपा की कमजोरी, सपा की सत्ता-विरोधी धारणा और भाजपा द्वारा सामाजिक गठजोड़ का विस्तार जैसे कई कारक थे। 2027 का उत्तर प्रदेश उन परिस्थितियों से अलग है। आज विपक्ष के पास 2024 की सफलता का आत्मविश्वास है। सपा ने PDA को राजनीतिक पहचान दी है। भाजपा सत्ता में लंबे समय से है। इसलिए केवल 2014 की रणनीति को दोहराना पर्याप्त नहीं होगा। तावड़े को शायदशाह मॉडलकी हूबहू नकल नहीं, बल्किनया तावड़े मॉडलतैयार करना होगाजिसमें बिहार का गठबंधन प्रबंधन, बूथ स्तर का माइक्रो-मैनेजमेंट, सामाजिक संतुलन और उत्तर प्रदेश की स्थानीय राजनीतिक जरूरतें एक साथ जुड़ें।

तावड़े के सामने पांच बड़ी चुनौतियां

पहलीपीडीए की काट। गैर-यादव ओबीसी और दलित मतदाताओं में विपक्ष की बढ़ी पैठ को रोकना। दूसरीकैडर की धार। सत्ता के लंबे दौर के बाद कार्यकर्ताओं में आई संभावित निष्क्रियता को चुनावी ऊर्जा में बदलना।  तीसरीस्थानीय असंतोष। विधायकों और स्थानीय नेतृत्व के प्रति नाराजगी को टिकट वितरण से पहले पहचानना। चौथीगठबंधन का गणित। सहयोगी दलों के साथ सीटों और सामाजिक प्रतिनिधित्व का ऐसा संतुलन बनाना, जिसमें किसी का आधार कमजोर पड़े।  पांचवींसरकार-संगठन समन्वय। लखनऊ से लेकर बूथ तक एक ही राजनीतिक संदेश और रणनीति सुनिश्चित करना।

क्या तावड़े बनेंगे भाजपा के नएखेवनहार’?

विनोद तावड़े की राजनीतिक यात्रा में सबसे दिलचस्प अध्याय 2019 के बाद लिखा गया। जिस समय महाराष्ट्र की चुनावी राजनीति में उनके लिए रास्ता बंद होता दिख रहा था, उसी समय दिल्ली की संगठनात्मक राजनीति में उनके लिए नया दरवाजा खुल रहा था। उन्होंने शोर नहीं किया, संगठन नहीं छोड़ा और इंतजार को निष्क्रियता नहीं बनने दिया। बिहार ने उनके चुनावी प्रबंधन पर पार्टी के भरोसे को मजबूत किया। अब उत्तर प्रदेश ने उन्हें सबसे बड़ा मंच दिया है।  सामने अखिलेश यादव का पीडीए है, पीछे 2024 की चुनावी चेतावनी और सामने 2027 की सत्ता की परीक्षा। भाजपा को यदि फिर से अपना पुराना सामाजिक किला मजबूत करना है तो तावड़े को केवल वोटों का गणित नहीं, विश्वास का भूगोल भी साधना होगा। अमित शाह ने 2014 में उत्तर प्रदेश की बिखरी राजनीतिक जमीन पर भाजपा के लिए एक नया नक्शा खींचा था। अब उसी प्रदेश में तावड़े के सामने चुनौती है कि उस नक्शे पर आई दरारों को भरें और नई सियासी इबारत लिखें। बिहार की जीत ने तावड़े को रणनीतिकार साबित किया है; उत्तर प्रदेश 2027 तय करेगा कि वह कितने बड़े चुनावीगेम चेंजरहैं।

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