Thursday, 20 August 2026

गंगा की गोद में डूबा घाटों का संसार, छत पर जल रही चिताएं

गंगा की गोद में डूबा घाटों का संसार, छत पर जल रही चिताएं

जलस्तर 68.35 मीटर दर्ज, चेतावनी बिंदु 70.262 मीटर, खतरे का निशान 71.262 मीटर, खतरे के निशान से 2.912 मीटर नीचे है  

नमो घाट से पुरानापुल तक पुलिस आयुक्त और डीएम की बोट से निगरानी

84 घाट जलमग्न, मणिकर्णिका में शवदाह प्लेटफार्म डूबे

वरुणा किनारे सलारपुर-सरैया समेत निचले इलाकों पर प्रशासन की पैनी नजर

सुरेश गांधी

वाराणसी। काशी में गंगा का बढ़ता पानी अब सिर्फ घाटों की सीढ़ियां नहीं ढक रहा, बल्कि शहर की सदियों पुरानी जीवन-धारा के उन दृश्यों को भी बदल रहा है, जिनमें आस्था, मृत्यु और मोक्ष एक साथ सांस लेते हैं। गंगा के उफान ने काशी के सभी 84 घाटों को अपनी जलराशि में समेट लिया है। मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र जैसे महाश्मशान घाटों पर बाढ़ का असर सबसे मार्मिक है। शवदाह के पारंपरिक प्लेटफार्म पानी में डूब चुके हैं और मजबूरी में ऊंचे स्थानों तथा छतों पर अंतिम संस्कार किया जा रहा है।

गुरुवार शाम छह बजे केंद्रीय जल आयोग के राजघाट गेज स्थल पर गंगा का जलस्तर 68.35 मीटर दर्ज किया गया। चेतावनी बिंदु 70.262 मीटर, खतरे का निशान 71.262 मीटर और अब तक का उच्चतम बाढ़ स्तर (एचएफएल) 73.901 मीटर है। इस समय नदी खतरे के निशान से 2.912 मीटर नीचे है, लेकिन घाटों और तटवर्ती निचले क्षेत्रों में पानी के फैलाव ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। शाम छह बजे की स्थिति में जलस्तर का ट्रेंड स्थिर (Steady) दर्ज किया गया है। यह स्थिरता राहत जरूर देती है, लेकिन जमीनी हालात अभी सामान्य नहीं हुए हैं।

पुलिस आयुक्त मोहित अग्रवाल और जिलाधिकारी सत्येंद्र कुमार ने गुरुवार को नमो घाट से पुरानापुल तक बोट से गंगा और वरुणा तटवर्ती क्षेत्रों का निरीक्षण किया। जल पुलिस और एनडीआरएफ की नावों के साथ अधिकारियों ने नदी के बहाव, जलस्तर और उन आबादियों की स्थिति देखी, जहां पानी बढ़ने की स्थिति में जनजीवन सबसे पहले प्रभावित हो सकता है। केशव घाट से आगे बढ़ते हुए सलारपुर, सरैया, कोनिया, पुल कोहना, ढेलवरिया और सराय मोहना समेत कई संवेदनशील क्षेत्रों का जायजा लिया गया। निरीक्षण का उद्देश्य केवल पानी की ऊंचाई नापना नहीं था, बल्कि यह देखना भी था कि यदि नदी का स्तर फिर बढ़ता है तो लोगों को कितनी तेजी से सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया जा सकता है।

घाट डूबे तो काशी का रोजमर्रा भी पानी में उतर गया

गंगा के बढ़ते पानी ने घाटों के बीच की वह परिचित दुनिया बदल दी है, जहां सुबह की आरती से लेकर शाम की गंगा आरती तक जीवन अपनी परंपरागत लय में चलता है। घाटों की सीढ़ियां पानी में समा चुकी हैं और कई स्थानों पर घाटों का संपर्क भी बाधित है। सबसे कठिन दृश्य मणिकर्णिका महाश्मशान का है। यहां अंतिम संस्कार के लिए बने प्लेटफार्म गंगा में डूब गए हैं। सामान्य दिनों में जहां चिताओं की अग्नि और गंगा की धारा एक साथ दिखाई देती है, वहां अब पानी के बीच शवदाह की जगह तलाशनी पड़ रही है। ऊंची छतों पर अंतिम संस्कार किए जाने की तस्वीरें काशी की इस बाढ़ की गंभीरता का प्रतीक बन गई हैं। हरिश्चंद्र घाट की स्थिति भी प्रभावित है और वहां घाट से जुड़ी गलियों में अंतिम संस्कार किए जाने की स्थिति सामने आई है। यानी काशी में बाढ़ का असर केवल नदी किनारे रहने वाले परिवारों तक सीमित नहीं है। यहां नदी के साथ जुड़ी आस्था, संस्कार, कारोबार और रोजमर्रा की गतिविधियां भी जलस्तर के साथ ऊपर-नीचे हो रही हैं।

वरुणा ने भी बढ़ाई चिंता

गंगा के साथ वरुणा नदी के तटवर्ती इलाकों की स्थिति भी प्रशासन के लिए चुनौती बनी हुई है। सलारपुर और सरैया जैसे क्षेत्रों में पानी पहुंचने से निचली आबादी पर विशेष निगरानी रखी जा रही है। पहले से संवेदनशील क्षेत्रों में घर-घर जागरूकता अभियान चलाने और लोगों को सुरक्षित निकासी मार्गों की जानकारी देने के निर्देश दिए गए हैं। पुलिस आयुक्त और जिलाधिकारी ने स्पष्ट किया कि किसी भी संभावित स्थिति में प्रतिक्रिया का समय न्यूनतम रखा जाना चाहिए। इसी उद्देश्य से पुलिस, जल पुलिस और एनडीआरएफ को लगातार सक्रिय रहने को कहा गया है।

राहत शिविर सक्रिय, निगरानी चौबीसों घंटे

पुलिस आयुक्त मोहित अग्रवाल ने बताया कि बाढ़ राहत शिविर प्रारंभ कर दिए गए हैं। सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर पुरुष और महिला पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई है। राहत शिविरों और संवेदनशील क्षेत्रों में सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं तथा पुलिस एवं एनडीआरएफ को राउंड--क्लॉक पेट्रोलिंग के निर्देश दिए गए हैं। उन्होंने कहा कि नागरिकों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। नदी और जलभराव वाले क्षेत्रों में बच्चों तथा बुजुर्गों को जाने से रोकने के लिए जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। किसी भी आकस्मिक स्थिति में तत्काल राहत एवं बचाव कार्रवाई के लिए टीमें तैयार रखी गई हैं। जिलाधिकारी सत्येंद्र कुमार ने गंगा और वरुणा के जलस्तर तथा प्रवाह की निरंतर निगरानी के निर्देश दिए। जलस्तर में होने वाले हर परिवर्तन की तत्काल समीक्षा करने के साथ संबंधित अधिकारियों और नियंत्रण कक्ष को सूचना देने को कहा गया है। राहत शिविरों में पेयजल, प्रकाश, स्वच्छता, आवश्यक संसाधन, पहुंच मार्ग तथा राहत सामग्री की व्यवस्था सक्रिय रखने पर जोर दिया गया है, ताकि जरूरत पड़ने पर प्रभावित परिवारों को बिना विलंब सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया जा सके।

नदी किनारे अब चेतावनी ही सुरक्षा कवच

प्रशासन ने नदी और जलभराव वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों से सावधानी बरतने की अपील की है। लोगों से कहा गया है कि वे अफवाहों पर भरोसा करें और केवल प्रशासन द्वारा जारी अधिकृत सूचनाओं को ही मानें। नदी किनारे बच्चों और बुजुर्गों की आवाजाही रोकने, जलभराव वाले रास्तों से दूरी बनाए रखने और प्रशासन के निर्देश पर तत्काल सुरक्षित स्थानों पर जाने की अपील की गई है। गुरुवार को नमो घाट से पुरानापुल तक चली यह बोट निगरानी दरअसल काशी की उस चिंता का प्रत्यक्ष निरीक्षण थी, जहां नदी अभी खतरे के निशान से नीचे है, लेकिन उसका पानी शहर की संवेदनशील नसों तक पहुंच चुका है। जलस्तर फिलहाल 68.35 मीटर पर स्थिर है, मगर घाटों का जलमग्न होना बता रहा है कि बाढ़ को केवल खतरे के निशान से नहीं आंका जा सकता। काशी के लिए नदी सिर्फ नदी नहीं है। यहां गंगा शहर की स्मृति, आस्था और जीवन का हिस्सा है। इसलिए जब गंगा घाटों की सीढ़ियां निगलती है तो पानी केवल पत्थरों पर नहीं चढ़ताउसका असर काशी के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन तक पहुंचता है। फिलहाल प्रशासन की नजर जलस्तर की हर हलचल पर है। पुलिस, एनडीआरएफ और जल पुलिस को चौबीस घंटे तैयार रखा गया है। राहत शिविर सक्रिय हैं और संवेदनशील इलाकों में निगरानी बढ़ा दी गई है। गंगा का जलस्तर स्थिर जरूर है, लेकिन काशी अभी सामान्य होने से दूर है।

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