जिसने जिंदगी बचाई, उसकी गरिमा कौन बचाएगा?
पद्मश्री डॉ.
टीके
लहरी
के
साथ
कथित
मारपीट
सिर्फ
एक
बुजुर्ग
का
अपमान
नहीं,
हमारी
सामूहिक
संवेदना
का
आईना
है
सुरेश गांधी
वाराणसी. जिस हाथ ने
हजारों धड़कनों को थामकर जिंदगी
लौटाई, आज उसी हाथ
को सहारे की जरूरत है।
जिस चेहरे पर दशकों की
सेवा का तेज होना
चाहिए, वहां चोट के
निशान की तस्वीरें तैर
रही हैं। और सवाल
सिर्फ बीएचयू से नहीं, पूरे
समाज से है—आखिर
हम किस दिशा में
जा रहे हैं?
85 वर्ष के पद्मश्री
डॉ. टी.के. लहरी।
वह नाम जिसने चिकित्सा
को सिर्फ पेशा नहीं, साधना
माना। सेवानिवृत्ति के बाद भी
मरीजों की सेवा से
नाता नहीं तोड़ा। खबरों
के मुताबिक उन्होंने अपनी पेंशन का
बड़ा हिस्सा तक संस्थानों को
दान किया। जिस उम्र में
आदमी अपने अतीत की
स्मृतियों के सहारे बैठता
है, वह उम्र भी
उन्होंने मरीजों की सेवा में
गुजार दी।
और आज वही
चिकित्सक अस्पताल के आईसीयू में
कथित मारपीट और दुर्व्यवहार के
आरोपों के बीच हैं।
यह खबर पढ़कर गुस्सा
आता है। शर्म आती
है। और उससे भी
ज्यादा डर लगता है।
क्योंकि अगर आरोप सही
हैं तो यह केवल
एक व्यक्ति की पिटाई नहीं
है। यह उस पूरी
परंपरा पर प्रहार है
जिसमें वरिष्ठता का सम्मान होता
था, गुरु के सामने
सिर झुकता था और सेवा
करने वाले हाथों को
देवतुल्य माना जाता था।
आईसीयू कोई अखाड़ा नहीं
होता। वहां हर सांस
की कीमत होती है।
वहां मरीज जीवन और
मृत्यु के बीच खड़ा
होता है। ऐसे स्थान
पर किसी बुजुर्ग चिकित्सक
के साथ कथित दुर्व्यवहार
की बात सामने आना
अपने आप में झकझोर
देने वाली घटना है।
डॉ. लहरी के चेहरे
पर पड़े कथित चोट
के निशान केवल शरीर पर
नहीं हैं—वे व्यवस्था
के माथे पर भी
सवाल हैं।
सबसे बड़ा सवाल
है—घटना हुई तो
तत्काल क्या किया गया?
परिजनों को जानकारी कब
दी गई? अस्पताल प्रशासन
को कब पता चला?
कैमरे हैं तो फुटेज
सुरक्षित है या नहीं?
और अगर जांच हो
रही है तो उसकी
गति इतनी तेज क्यों
न हो कि किसी
को संदेह की गुंजाइश ही
न बचे? यहां किसी
को भी जांच से
पहले दोषी ठहराने की
जरूरत नहीं। लेकिन निष्पक्ष जांच में देरी
भी न्याय के प्रति अन्याय
बन सकती है।
बीएचयू देश की महान
शैक्षणिक संस्थाओं में है। उसके
अस्पताल में काम करने
वाला हर व्यक्ति सिर्फ
कर्मचारी या चिकित्सक नहीं,
एक बड़ी संस्थागत जिम्मेदारी
का वाहक है। इसलिए
इस मामले में खानापूर्ति नहीं,
तत्काल, पारदर्शी और विश्वसनीय कार्रवाई
चाहिए। अगर आरोप गलत
हैं तो जांच डॉ.
लहरी की गरिमा और
आरोपी की प्रतिष्ठा—दोनों
को सच सामने लाकर
बचाए। और अगर आरोप
सही पाए जाते हैं
तो पद, पहचान और
प्रभाव की परवाह किए
बिना कठोरतम संस्थागत कार्रवाई हो।
क्योंकि संदेश साफ होना चाहिए—
बीएचयू में मरीज सुरक्षित
है। बुजुर्ग सुरक्षित हैं। शिक्षक सुरक्षित
हैं। और सेवा करने
वाले हाथों की गरिमा सबसे
ऊपर है। डॉ. टी.के. लहरी को
आज सिर्फ इलाज की जरूरत
नहीं है। उन्हें उस
सम्मान की जरूरत है,
जिसके वे दशकों की
सेवा के बाद अधिकारी
हैं। समाज को भी
तय करना होगा कि
वह तमाशबीन रहेगा या आवाज उठाएगा।
जिस व्यक्ति ने
जिंदगी भर दूसरों की
धड़कनें बचाईं, उसकी अपनी गरिमा
की धड़कन अगर हमारे सामने
टूट रही हो और
हम चुप रहें—तो
दोष केवल किसी एक
व्यक्ति का नहीं होगा।
तब कटघरे में पूरा समाज
खड़ा होगा। अब चुप्पी नहीं।
सच सामने आए। जांच पूरी
हो। दोष सिद्ध हो
तो तत्काल कार्रवाई हो। और यह
सुनिश्चित हो कि सेवा
का प्रतिफल अपमान नहीं, सम्मान हो।
मरीजों का सहारा रहे पद्मश्री डॉक्टर टीके
लहरी, आज खुद बिस्तर पर
बता दें, काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू)
का सर सुंदरलाल अस्पताल देश के प्रमुख चिकित्सा संस्थानों में गिना जाता है। यह वह
परिसर है, जहां चिकित्सा को सिर्फ पेशा नहीं, मानव सेवा का माध्यम मानने वाली कई विभूतियों
ने अपनी पूरी जिंदगी मरीजों के नाम कर दी। इन्हीं में पद्मश्री से सम्मानित और देश
के जाने-माने कार्डियोथोरेसिक सर्जन डॉ. टीके लहरी का नाम बेहद सम्मान से लिया जाता
है।
सादगी, अनुशासन और सेवा के प्रति अद्भुत
समर्पण डॉ. लहरी की पहचान रही है। वर्षों तक उनकी दिनचर्या ऐसी रही कि आधुनिक सुविधाओं
और निजी वाहन के विकल्प के बावजूद वह रोज करीब दो किलोमीटर पैदल चलकर अस्पताल पहुंचते
थे। यह उनके लिए महज अस्पताल तक पहुंचने का रास्ता नहीं था, बल्कि मरीजों तक पहुंचने
और उनकी सेवा करने की रोज की साधना थी।
अस्पताल पहुंचते ही उनका अधिकांश समय
मरीजों के बीच गुजरता। वह उनकी समस्याएं सुनते, इलाज करते और बीमारी से जूझ रहे लोगों
को चिकित्सकीय सलाह के साथ मानसिक संबल भी देते। उनके लिए मरीज महज एक केस या फाइल
नहीं था, बल्कि एक ऐसा इंसान था जिसे इलाज के साथ भरोसे और अपनत्व की भी जरूरत होती
है।
आज विडंबना देखिए—जो
डॉक्टर वर्षों तक दूसरों की जिंदगी बचाने और उन्हें बीमारी से लड़ने का हौसला देने
के लिए अस्पताल पहुंचते रहे, वही डॉ. लहरी आज खुद बीमारी से जूझ रहे हैं। बताया जा
रहा है कि वह करीब 15 दिनों से अस्वस्थ होकर बिस्तर पर हैं। इससे भी अधिक पीड़ादायक
सवाल यह है कि इतने लंबे समय तक अस्पताल प्रशासन को उनके अस्वस्थ होने की जानकारी तक
नहीं रही।
यह सवाल इसलिए और बड़ा हो जाता है क्योंकि
डॉ. लहरी कोई सामान्य चिकित्सक नहीं हैं। वह उस चिकित्सा परंपरा के प्रतिनिधि हैं जिसने
बीएचयू अस्पताल को देशभर में प्रतिष्ठा दिलाने में योगदान दिया। जिन मरीजों के बीच
उनकी मौजूदगी कभी उम्मीद का पर्याय हुआ करती थी, आज उन्हीं के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक
है कि क्या संस्थान अपने उन वरिष्ठ चिकित्सकों को भी याद रखता है, जिन्होंने अपना जीवन
संस्थान और मरीजों को दे दिया?
दो किमी की वह राह अब सवाल बन गई
डॉ. लहरी का रोज पैदल अस्पताल जाना आज एक स्मृति भर नहीं है। वह उस दौर की तस्वीर है जब चिकित्सक और मरीज के बीच रिश्ता सिर्फ उपचार तक सीमित नहीं था। डॉक्टर के लिए अस्पताल जाना नौकरी का हिस्सा नहीं, जिम्मेदारी थी और मरीज तक पहुंचना सेवा। आज जब चिकित्सा व्यवस्था तकनीक, मशीनों और व्यवस्थागत प्रक्रियाओं के बीच आगे बढ़ रही है, तब डॉ. लहरी जैसे चिकित्सक हमें याद दिलाते हैं कि चिकित्सा की असली ताकत मशीनों में नहीं, इंसान के प्रति संवेदना में होती है। जिस डॉक्टर ने जीवनभर मरीजों को सहारा दिया, आज वह खुद सहारे का इंतजार कर रहा है। यह केवल एक वरिष्ठ चिकित्सक की बीमारी की खबर नहीं, बल्कि उस संवेदना की परीक्षा भी है जिसे चिकित्सा संस्थान अपनी सबसे बड़ी पूंजी बताते हैं। डॉ. लहरी का हाल जानना सिर्फ औपचारिक जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए। यह उस ऋण को स्वीकार करना है, जो एक संस्थान अपने उन चिकित्सकों का कभी पूरा नहीं चुका सकता जिन्होंने अपना जीवन उसकी सेवा में लगा दिया।

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