स्वर्वेद महायज्ञ : आध्यात्मिक चेतना का वह महाकुंभ, जिसने मनुष्यता को नए संकल्प दिए
जहाँ सेवा,
सत्संग
और
साधना
एक
हो
जाते
हैं
उमरहां
का
स्वर्वेद
धाम
बना
वैश्विक
अध्यात्म
का
केंद्र
अज्ञान के
आवरण
हटाने
का
विराट
संदेश,
संत
विज्ञान
देव
जी
ने
साधकों
को
दिया
मनोबल
का
मंत्र
देश-विदेश
से
उमड़ा
जनसैलाब,
स्वर्वेद
महामंदिर
बना
अध्यात्म,
समागम
का
प्राणधाम
सुरेश गांधी
वाराणसी. उमरहाँ स्थित स्वर्वेद महामंदिर धाम में विहंगम
योग संत समाज का
102वां वार्षिकोत्सव उस अध्यात्मिक महोत्सव
की तरह सम्पन्न हुआ,
जिसकी आभा और आस्था
दोनों दूर-दूर तक
फैल गईं। 25 हजार कुण्डीय स्वर्वेद
ज्ञान महायज्ञ के समापन अवसर
पर पूरा परिसर सुगंधित
आहुतियों, मंत्रोच्चार और श्रद्धा की
पवित्र तरंगों से ऐसा आलोकित
हुआ कि मानो धरा
पर देवत्व उतर आया हो।
देश-विदेश से
पहुंचे लाखों श्रद्धालुओं ने अपनी-अपनी
कामनाओं और कल्याण की
भावना से यज्ञ अग्नि
में आहुति समर्पित की। दो दिनों
तक सेवा, सत्संग और साधना की
त्रिवेणी में डूबकर श्रद्धालुओं
ने आत्मिक शांति और प्रेरणा प्राप्त
की। उत्तर प्रदेश के अलावा गुजरात,
महाराष्ट्र, राजस्थान, दिल्ली, बंगाल, हरियाणा, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, असम, उत्तराखंड सहित
कई राज्यों और विदेशों से
श्रद्धालु पहुंचे। अनुमानतः डेढ़ लाख से
अधिक अनुयायियों ने स्वर्वेद महामंदिर
के दर्शन किए। स्वर्वेद के
अमृत-ज्ञान की धारा निरंतर
बहती रही और हर
साधक अपने भीतर एक
नई ऊर्जा, नया संकल्प और
नया प्रकाश लेकर वापस लौटा।
स्वर्वेद महामंदिर धाम का यह
महा आयोजन केवल अध्यात्म का
उत्सव नहीं रहाक. यह आस्था
की विजय, मानवता की एकता और
आत्मोन्नति की सामूहिक यात्रा
का तेजस्वी प्रतीक बन गया।
भक्ति जड़ नहीं, चेतन हो : सद्गुरु स्वतंत्रदेव जी का संदेश
उन्होंने कहा,
आज की भक्ति में
अज्ञान और आडंबर अधिक
है। जड़ भक्ति से
ऊपर उठकर चेतन भक्ति
को अपनाने की आवश्यकता है।
विहंगम योग वही विशुद्ध
मार्ग है, जिसमें साधक
विकारों से मुक्त होकर
अपने शुद्ध, दिव्य स्वरूप को प्राप्त करता
है।
अज्ञान ही दुखों का मूल : विज्ञानदेव जी महाराज
समापन सत्संग में संत प्रवर
श्री विज्ञानदेव जी महाराज ने
कहा, मनुष्य के भीतर अच्छाइयां
और बुराइयां दोनों हैं, लेकिन अज्ञान
उसे दुख की ओर
धकेलता है। कठिनाइयों से
घबराने की नहीं, उनसे
उबरने की प्रेरणा अध्यात्म
देता है। स्वर्वेद का
स्वर साधक को वह
सामर्थ्य देता है जिससे
वह अपने भीतर स्थित
परमात्मा के प्रकाश को
पहचान सके। उनकी प्रेरणादायी
वाणी साधकों के लिए आस्था
ही नहीं, जीवन-संस्कार का
संदेश भी बन गई।
लाखों हाथों का एक संकल्प, सेवा, सत्संग और साधना
देश-विदेश से
आए लाखों अनुयायियों ने एक साथ
अपने हाथ उठाकर सेवा,
सत्संग और साधना का
संकल्प लिया। इस क्षण ने
पूरे प्रांगण को एकता, समर्पण
और आध्यात्मिक संकल्प की अद्भुत ऊर्जा
से भर दिया। साधकों
ने यह भी संकल्प
लिया कि विहंगम योग
के प्रमुख ग्रंथ स्वर्वेद का संदेश जन-जन तक पहुँचाएँगे।
आरती, वंदना और शांति-पाठ से हुआ महायज्ञ का समापन
समापन आरती के दौरान
मंत्रों की गूंज, दीपों
की उजास और भक्तिभाव
की तरंगों ने माहौल को
ऐसा पवित्र बना दिया कि
हर श्रद्धालु के मन में
एक दिव्य शांति उतर आई।



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