स्वर्णिम काशी : जहां धरती पर उतर आया देवलोक
नभ से उतर आई तारिकाएं, दीपों ने ओढ़ा गंगा का आंचल
कार्तिक पूर्णिमा
की
गोधूलि
में
गंगा
तट
पर
25 लाख
दीपों
की
दिव्यता
से
अलौकिक
बना
काशी
का
महातीर्थ
नमो घाट
पर
मुख्यमंत्री
योगी
ने
जलाया
प्रथम
दीप,
88 घाटों
पर
आस्था
की
अनगिनत
ज्योतियां
एक
साथ
दमक
उठीं
मुख्यमंत्री ने
माँ
गंगा
की
विधिवत
पूजा
के
बाद
क्रूज
से
दशाश्वमेध
से
लेकर
शिवाला
तक
के
घाटों
का
अवलोकन
किया
महिला क्रिकेटरों
की
पेंटिंग
और
विदेशी
कलाकारों
की
प्रस्तुति
आकर्षण
का
केंद्र
पर्यटकों की
भारी
भीड़,
हर
हाथ
में
दीप,
हर
मन
में
शिव
सुरेश गांधी
वाराणसी। कार्तिक पूर्णिमा की संध्या, जब सूरज अपनी सुनहरी किरणें गंगा की लहरों में टिका रहा था, काशी धीर-धीरे एक अलौकिक रूप में ढल रही थी। जैसे ही पहला दीप नमो घाट पर प्रज्वलित हुआ, मानो सदियों पुरानी स्मृतियां, पौराणिक कथाएं और लोकमान्यता एक ही क्षण में जीवंत होकर सामने आ गईं। मानो आकाश अपना पूरा तारामंडल लेकर धरती पर उतर आया हो। काशी का दृश्य मानो स्वर्ग के किसी अप्रतिम लोक में परिवर्तित हो गया। मां गंगा के पवित्र तट पर दीपों की अनगिनत पंक्तियां सज उठीं तो शहर का हर घाट देवताओं के स्वागत को दीप्तिमान प्रतीत हुआ।
नमो घाट पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रथम दीप प्रज्ज्वलित कर देव दीपावली का शुभारंभ किया। और देखते ही देखते चौरासी घाटों की पंक्तियाँ 25 लाख दीपों की स्वर्णिम आभा से जगमगा उठीं। दीपों की रश्मियाँ ऐसी फूटीं कि अर्द्धचंद्राकार गंगा के हर मोड़ पर प्रकाश ही प्रकाश फैल गया।दीप जलते ही
घाटों का वातावरण पलों
में प्रकाश से भर उठा।
मां गंगा की लहरों
पर थिरकती लौ ऐसी लग
रही थी मानो आस्था
स्वयं नृत्य कर रही हो।
गंगा के अर्द्धचंद्राकार तट
पर सात किमी तक
फैली दीपमालाएं ऐसा दृश्य प्रस्तुत
कर रही थीं, मानो
आकाशगंगा स्वयं धरती पर अवतरित
हो गई हो।
खास यह रहा कि इस वर्ष देव दीपावली सिर्फ उत्सव नहीं, स्मरण और संवेदना भी थी। पहलगाम में शहीद हुए वीर जवानों को विशेष नमन किया गया।
घाटों पर महिला क्रिकेटरों के सम्मान में बनाई गई चित्रकला दीर्घा ने नारी शक्ति के उदय का संदेश दिया। यह काशी का वह रूप था, जहाँ परंपरा आधुनिकता से सहज संवाद कर रही थी।
बता दें, मुख्यमंत्री ने माँ गंगा की विधिवत पूजा के बाद क्रूज से दशाश्वमेध से लेकर शिवाला तक के घाटों का अवलोकन किया।
शिवाला घाट पर गंगा
की जल तरंगों पर
उभरते लेजर शो और
घाटों की हरित आतिशबाज़ी
ने इस दृश्य को
अतुलनीय बना दिया।
जहाँ तक दृष्टि
जाती, दीप ही दीप।
जहाँ तक मन पहुँचता,
भक्ति ही भक्ति। कार्यक्रम
में पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री
जयवीर सिंह, राज्य मंत्री रविन्द्र जायसवाल, महापौर अशोक तिवारी, विधायक
डॉ. नीलकंठ तिवारी, मुख्य सचिव एस.पी.
गोयल, कमिश्नर एस. राजलिंगम, पुलिस
कमिश्नर मोहित अग्रवाल, जिलाधिकारी सत्येंद्र कुमार सहित प्रशासनिक व
पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी
उपस्थित रहे।
घाटों पर उमड़ा श्रद्धालुओं का जनसैलाब
एक ओर भक्ति की लहरें लिए बैठा था, तो दूसरी ओर 6 लाख से अधिक भक्त गंगा आरती में शामिल होकर “हर-हर महादेव“ की महाध्वनि से वातावरण गुंजायमान कर रहे थे।
घंटों की ध्वनि, शंखनाद, जलधारा का कलकल और दीपों से उठती मधुशीतल उजास, सब मिलकर काशी को देवलोक का प्रतिरूप बना रहे थे।गंगा की गोद में बहते तैरते दीप मानो हर मनोकामना को अपने साथ प्रकाश में बाँधकर आगे बढ़ रहे थे। कैमरों की चमक, पर्यटकों की विस्मय भरी आँखें और श्रद्धालुओं की झुकी पलकें, सबकुछ एक सम्मिलित भाव में डूबा हुआ प्रतीत होता था।
आकाश में टूटते रंगों की आतिशबाजी, संगीत-संध्याओं में बहते राग, शिव तांडव की धुनों पर थिरकती श्रद्धा और लोकगीतों का मधुर विस्तार, सब मिलकर काशी को एक ऐसा सौंदर्य प्रदान कर रहे थे, जिसे समझने के लिए दृष्टि नहीं, श्रद्धा की आवश्यकता थी।
यह दृश्य देखने वालों ने कहा, “काशी सिर्फ रोशनी में नहाई नहीं, काशी स्वयं रोशनी बन गई है।” देव दीपावली की जड़ें उस पौराणिक प्रसंग में हैं, जब देवताओं ने त्रिपुरासुर वध के उपलक्ष्य में स्वर्ग को दीपों से सजाया था। काशी में आज भी वही दीप जगते है वही स्मृति, वही विजय, वही सनातन विश्वास।रात गहराती रही,
और दीयों की गंगा बहती
रही... काशी झिलमिलाती रही.और हर हृदय
के भीतर एक ही
मंत्र बार-बार बजता
रहा, “हर-हर महादेव।
हर-हर गंगे।”
त्रिपुरासुर-विजय की स्मृति का महापर्व
देव दीपावली वही शुभ घड़ी है जब भगवान शिव ने राक्षस त्रिपुरासुर का संहार कर ब्रह्मांड की रक्षा की थी। मान्यता है कि उसी आनंदोत्सव में देवता काशी में प्रकट हुए और गंगा तट पर दीपों का पर्व मनाया। इसी स्मरण में आज भी काशी उज्ज्वल रहती है।
दूसरी कथा
राजा दिवोदास से जुड़ी है,
जिनके धर्मशील शासन में देवताओं
का प्रवेश वर्जित था। अंततः शिव
के पुनः आगमन के
स्वागत में देवताओं ने
घाटों को दीपों से
अलंकृत किया, यहीं से काशी
में दीपोत्सव की परंपरा जीवंत
हुई।
आस्था, कला और राष्ट्रगौरव का समन्वय
इस पावन पर्व में भक्ति के साथ देश के वीरों को भी नमन किया जाता है। थलसेना, वायुसेना, नौसेना, सीआरपीएफ और एनसीसी द्वारा शहीदों के सम्मान में आकाशदीप अर्पित किए गए। घाटों पर भव्य गंगा आरती, शास्त्रीय संगीत, तैरते मंचों पर नृत्य, नौकाओं की साज-सज्जा, सबने मिलकर काशी को प्रकाश नगरी बना दिया। इस रात काशी केवल शहर नहीं, अनुभव है। दीपों की लौ कहती है, “जहाँ श्रद्धा जलती है, वहाँ अंधकार ठहर नहीं पाता।” श्रद्धालु, पर्यटक, संन्यासी, विद्वान, कलाकार हर कोई इस आभा में भीगा हुआ दिखा।
कैमरों में कैद होती रोशनी, जलधारा पर तैरते दीपों की कतारें, और आँखों में भरी श्रद्धाकृकाशी को फिर से वैश्विक आस्था के केंद्र के रूप में अभिव्यक्त कर रही थीं। इस वर्ष आयोजन में स्मृति और संवेदना भी रची-बसी थी। पहलगाम में शहीद हुए जवानों को विशेष रूप से नमन किया गया।घाटों पर महिला क्रिकेटरों की चित्रकला प्रदर्शित की गईकृजिससे श्रद्धा के साथ नारी शक्ति का उत्सव भी जुड़ा। आकाश में निरंतर होती आतिशबाजी रंगों का मानो स्वर्गिक वर्षाविहंगम दृश्य प्रस्तुत करती रही।
उधर, गंगा किनारे संगीत और कला की त्रिवेणी बहती रही, शास्त्रीय रागों से लेकर शिव-तांडव की धुनें, भक्ति-भाव से लेकर लोक-संस्कृति की मधुर लहरियाँ, सब मिलकर वातावरण में ऐसा माधुर्य भर रही थीं कि हर हृदय अपने आप ही “हर-हर महादेव” की ध्वनि में खो जाता। काशी की देव दीपावली केवल दृश्य का उत्सव भर नहीं है, यह आस्था, परंपरा और सनातन स्मृति का पुनर्स्मरण है। कथा यही कहती है, त्रिपुरासुर वध के बाद देवताओं ने स्वर्ग को दीपों से सजाया था। आज काशी में वे दीप उसी पौराणिक विजय का जीवंत रूप हैं। उस रात दीयों की गंगा बहती रही, और काशी फिर से अमर, अविनाशी और अनादि होकर झिलमिलाती रही।













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