त्रिवेणी की गोद में समय का महायज्ञ, होती है स्वर्ग की अनुभूति
त्रिवेणी के तट पर बहती गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती केवल नदियाँ नहीं हैं, वे भारत की स्मृति हैं, उसका संस्कार हैं, उसका आत्मबोध हैं। प्रयागराज में जब कुम्भ का नाम लिया जाता है, तो यह केवल एक आयोजन नहीं रह जाता, बल्कि यह समय, समाज और सत्ता, तीनों की संयुक्त परीक्षा बन जाता है। आज जब प्रयागराज का कुम्भ क्षेत्र एक बार फिर श्रद्धालुओं, कल्पवासियों, साधु-संतों और पर्यटकों से गुलजार है, तब यह प्रश्न स्वतः खड़ा होता है कि क्या कुम्भ केवल अतीत की परंपरा है, या भविष्य का मार्गदर्शक? 44 दिनों तक चलने वाले इस ऐतिहासिक माघ मेले में पहले ही दिन यानी शनिवार 03 जनवरी को 31 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने संगम में आस्था की डुबकी लगाई. पूरा संगम तट हर-हर गंगे और जय मां गंगा के उद्घोष से गूंज उठा. जहां आस्था, परंपरा और आधुनिक व्यवस्थाओं का अद्भुत संगम देखने को मिला. व्हीलचेयर पर संगम स्नान करते बुजुर्ग, घाटों पर पेट्रोलिंग करती सुरक्षा गाड़ियां और चारों ओर श्रद्धालुओं का सैलाब, पहले स्नान पर्व ने माघ मेले की भव्यता का साफ संकेत दे दिया. रात के समय संगम क्षेत्र बेहद आकर्षक नजर आ रहा है नावों पर एलईडी लाइट से सजी रंगीन छतरियां, जल में सात रंगों के फव्वारे और घाटों पर कलर-कोडेड चेंजिंग रूम अद्भुत दृश्य प्रस्तुत कर रहे हैं
सुरेश गांधी
वर्तमान में प्रयागराज का
कुम्भ क्षेत्र माघ मेले के
रूप में जीवंत है।
पौष पूर्णिमा से आरंभ होकर
माघ पूर्णिमा और महाशिवरात्रि तक
चलने वाला यह मेला
कुम्भ परंपरा की निरंतरता का
जीवित प्रमाण है। कल्पवासी टेंटों
में साधना कर रहे हैं,
संतों के प्रवचन गूंज
रहे हैं, और हर
सुबह संगम तट पर
आस्था की डुबकी लगाकर
लोग जीवन के भार
को हल्का कर रहे हैं।
यह वही भूमि है
जहां कुम्भ के हर संस्करण
के बाद भी आस्था
समाप्त नहीं होती, बल्कि
नए रूप में लौट
आती है। प्रशासनिक दृष्टि
से भी यह माघ
मेला आगामी महाकुम्भ की ‘रिहर्सल’ जैसा
है, जहां व्यवस्थाएं परखी
जाती हैं, कमियां पहचानी
जाती हैं और सुधार
की दिशा तय होती
है। इन दिनों संगम
क्षेत्र में उमड़ती भीड़
को केवल संख्या में
बांधना भूल होगी। यह
भीड़ नहीं, विश्वास की नदी है।
वृद्ध दंपती, युवा साधक, ग्रामीण
महिलाएं, विदेश से आए शोधार्थी,
हर कोई संगम में
कुछ खोज रहा है।
कोई मोक्ष, कोई शांति, कोई
उत्तर। कल्पवास की परंपरा आज
भी जीवित है। ठंड, असुविधा
और न्यूनतम संसाधनों के बावजूद हजारों
लोग एक माह तक
संयमित जीवन जीने के
लिए प्रयागराज पहुँचे हैं। यह उस
भारतीय चेतना का प्रमाण है,
जो सुविधा नहीं, साधना को प्राथमिकता देती
है।
प्रयागराज कुम्भ क्षेत्र की सबसे बड़ी
चुनौती है, आस्था और
प्रशासन के बीच संतुलन।
वर्तमान माघ मेले में
प्रशासन ने सुरक्षा, स्वच्छता,
यातायात, स्वास्थ्य और डिजिटल निगरानी
पर विशेष ध्यान दिया है। सफाई
व्यवस्था पहले की तुलना
में अधिक व्यवस्थित दिखती
है। स्वास्थ्य शिविर, एम्बुलेंस और मोबाइल मेडिकल
यूनिट सक्रिय हैं। सीसीटीवी निगरानी
और ड्रोन कैमरों से भीड़ प्रबंधन
किया जा रहा है।
डिजिटल खोया-पाया केंद्र
श्रद्धालुओं के लिए राहत
का साधन बन रहा
है। हालांकि, चुनौतियां अब भी शेष
हैं। ठंड में अलाव
की समुचित व्यवस्था, दूरदराज़ से आने वाले
श्रद्धालुओं के लिए परिवहन
की सुविधा और कल्पवासियों के
लिए स्थायी शौचालय, ये ऐसे प्रश्न
हैं जिन पर निरंतर
निगरानी आवश्यक है। वैसे भी
कुम्भ बिना संतों के
अधूरा है। अखाड़ों की
परंपरा, शाही स्नान की
गरिमा और धर्मसभा की
गंभीरता, ये सब मिलकर
कुम्भ को केवल मेला
नहीं, महायज्ञ बनाते हैं। इस समय
प्रयागराज में विभिन्न अखाड़ों
के संत सामाजिक विषयों
पर भी मुखर हैं,
नशामुक्ति, पर्यावरण संरक्षण, सनातन संस्कृति की रक्षा जैसे
मुद्दे उनके प्रवचनों में
प्रमुख हैं। यह परिवर्तन
संकेत देता है कि
संत समाज अब केवल
आध्यात्मिक नहीं, सामाजिक भूमिका भी निभा रहा
है।
कुम्भ और माघ मेला
प्रयागराज की अर्थव्यवस्था की
धुरी बन चुके हैं।
होटल, धर्मशाला, नाविक, फूल विक्रेता, प्रसाद
विक्रेता, हस्तशिल्प कारीगर, हर वर्ग को
इससे आजीविका मिलती है। वर्तमान मेले
में स्थानीय उत्पादों की मांग बढ़ी
है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी संबल
मिला है। यह कहना
अतिशयोक्ति नहीं होगा कि
कुम्भ क्षेत्र अस्थायी शहर नहीं, बल्कि
एक चलता-फिरता आर्थिक
मॉडल है। आस्था के
इस महासागर के बीच पर्यावरण
सबसे संवेदनशील मुद्दा है। गंगा की
स्वच्छता, प्लास्टिक निषेध, जैविक कचरे का निस्तारण,
इन पर प्रशासन और
समाज दोनों की जिम्मेदारी है।
हालाँकि प्रयास दिख रहे हैं,
लेकिन श्रद्धालुओं की सहभागिता के
बिना यह लक्ष्य अधूरा
रहेगा। कुम्भ तभी सार्थक होगा,
जब आस्था गंगा को पूजने
के साथ-साथ उसे
बचाने का संकल्प भी
ले। प्रयागराज का वर्तमान कुम्भ
क्षेत्र आने वाले महाकुम्भ
की भूमिका है। यह समय
है सीखने का, सुधारने का
और उस भारत को
गढ़ने का, जहाँ परंपरा
और तकनीक साथ-साथ चलें।
कुम्भ केवल स्नान का
अवसर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चरित्र का प्रतिबिंब है।
मतलब साफ है जब
संगम पर सूर्य अस्त
होता है और आरती
की लौ जलती है,
तब लगता है कि
भारत स्वयं अपने अतीत, वर्तमान
और भविष्य से संवाद कर
रहा है। प्रयागराज का
कुम्भ हमें यह सिखाता
है कि भीड़ में
भी व्यवस्था संभव है, विविधता
में भी एकता संभव
है, और आस्था में
भी आधुनिकता संभव है। कुम्भ
कोई आयोजन नहीं, वह भारत की
आत्मा का उत्सव है।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का मंच
सरकार के लिए कुम्भ
केवल आयोजन नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक
शक्ति का वैश्विक प्रदर्शन
है। विदेशी श्रद्धालुओं और शोधार्थियों की
बढ़ती संख्या इस बात का
संकेत है कि प्रयागराज
अब विश्व आध्यात्मिक मानचित्र पर मजबूती से
स्थापित हो चुका है।
प्रयागराज का कुम्भ हर
बार यह सवाल छोड़
जाता है, क्या हम
आस्था को संभाल रहे
हैं या आस्था हमें
संभाल रही है? करोड़ों
लोगों का एक स्थान
पर एकत्र होना केवल धार्मिक
घटना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी
परीक्षा है। कुम्भ दरअसल
भारत की “मैनेजमेंट क्षमता”
का आईना है। यहां
कोई टिकट नहीं, कोई
निमंत्रण नहीं, फिर भी अनुशासन
अपेक्षित है। यह विरोधाभास
ही कुम्भ को अद्वितीय बनाता
है। इसके बावजूद राजनीतिक
दल कुम्भ को अक्सर आस्था
की राजनीति के चश्मे से
देखते हैं, लेकिन सच्चाई
यह है कि कुम्भ
सरकारों को गढ़ता भी
है और बिगाड़ता भी।
एक चूक वर्षों की
छवि को ध्वस्त कर
सकती है। ऐसे में
बड़ा साल तो यही
है, क्या केवल सरकार
जिम्मेदार है? जवाब है
नहीं। कुम्भ की सफलता समाज
के आचरण से तय
होती है। स्वच्छता, संयम
और सहयोग, इन तीनों के
बिना कोई भी महायोजन
सफल नहीं हो सकता।
यदि भारत को वैश्विक
नेतृत्व की ओर बढ़ना
है, तो कुम्भ जैसे
आयोजनों से सीखना होगा
कि विविधता में व्यवस्था कैसे
लाई जाए। कुम्भ केवल
गंगा में डुबकी नहीं,
यह आत्ममंथन है, व्यक्ति का
भी, समाज का भी
और सत्ता का भी।
हर सेक्टर में बने पीले और केसरिया स्वागत द्वार
प्रयागराज कुम्भ क्षेत्र में आस्था का सैलाब
त्रिवेणी संगम पर आस्था
एक बार फिर अपने
विराट रूप में दिखाई
दे रही है। माघ
मेले के अंतर्गत कुम्भ
क्षेत्र में देश के
कोने-कोने से श्रद्धालुओं
का आगमन जारी है।
पौष पूर्णिमा के बाद स्नानार्थियों
की संख्या में तेज़ बढ़ोतरी
दर्ज की गई है।
संगम तट पर सुबह
से लेकर देर रात
तक श्रद्धालुओं की कतारें आस्था
की गवाही दे रही हैं।
संगम और किला घाट
पर स्नानार्थियों की संख्या में
लगातार वृद्धि देखी जा रही
है. मेला क्षेत्र में
सुरक्षा के लिए अतिरिक्त
पुलिस बल तैनात है.
ठंड को देखते हुए
रैन बसेरों और अलाव की
व्यवस्था बढ़ाई गई है.
खास यह है कि
सुबह चार बजे से
ही संगम क्षेत्र में
चहल-पहल शुरू हो
जाती है। कल्पवासी अपने
तंबुओं से निकलकर गंगा
स्नान को जाते हैं।
साधु-संतों की टोलियाँ मंत्रोच्चार
के साथ आगे बढ़ती
हैं। ठिठुरती ठंड के बीच
भी श्रद्धालुओं के चेहरों पर
अद्भुत संतोष है। संगम पर
नाविकों की आवाज़, आरती
की घंटियाँ और हर-हर
गंगे का उद्घोष वातावरण
को आध्यात्मिक बना देता है।
दूर-दराज़ के गांवों
से आए लोग बताते
हैं कि कठिनाइयों के
बावजूद यहां आकर उन्हें
मानसिक शांति मिलती है।
प्रशासनिक व्यवस्था एक नज़र में
24×7 मेडिकल कैंप
और
एम्बुलेंस
सेवा
ड्रोन
और
सीसीटीवी
से
निगरानी
अस्थायी
शौचालयों
की
संख्या
बढ़ाई
गई
अलाव
और
गर्म
भोजन
की
व्यवस्था
योगी सरकार और प्रयागराज कुम्भ
प्रयागराज का कुम्भ केवल
धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सुशासन की परीक्षा भी
है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के
नेतृत्व में उत्तर प्रदेश
सरकार ने कुम्भ और
माघ मेले को अव्यवस्था
से निकालकर “सिस्टम आधारित आयोजन” का स्वरूप दिया
है। योगी सरकार की
प्राथमिकता स्पष्ट है, श्रद्धालु सुरक्षित
रहें, आस्था बाधित न हो और
व्यवस्था आधुनिक हो। पहले कुम्भ
का मतलब था - भीड़,
अव्यवस्था और आपात प्रबंधन।
अब कुम्भ का अर्थ है,
पूर्व नियोजन, तकनीक और जवाबदेही। मेला
क्षेत्र को सेक्टरों में
बाँटना, अफसरों की 24 घंटे ड्यूटी और
डिजिटल मॉनिटरिंग इसका प्रमाण है।
चौड़ी सड़कें और बेहतर यातायात
व्यवस्था, अस्थायी नहीं, टिकाऊ संरचनाएँ, स्वच्छता कर्मियों की तीन शिफ्टों
में तैनाती. योगी सरकार मानती
है कि श्रद्धालु अतिथि
हैं और अतिथि देवो
भवः केवल नारा नहीं,
नीति है।
’मेला रेल सेवा’
माघ मेला आने
वाले करोड़ों श्रद्धालुओं की सुविधा को
ध्यान में रखते हुए
भारतीय रेलवे ने एक अहम
डिजिटल पहल की है.
रेलवे ने ‘मेला रेल
सेवा’ नाम से एक
नया डिजिटल पोर्टल लॉन्च किया है, जो
मेला अवधि के दौरान
यात्रियों के लिए वन-स्टॉप सॉल्यूशन के तौर पर
काम करेगा. इस पोर्टल के
जरिए श्रद्धालुओं को ट्रेन से
जुड़ी पूरी जानकारी, स्टेशन
से संबंधित गाइड, यात्री सुविधाएं, मेडिकल सहायता और आपातकालीन सेवाओं
की जानकारी एक ही प्लेटफॉर्म
पर उपलब्ध होगी. खासतौर पर संगम स्नान
के लिए प्रयागराज पहुंचने
वाले लाखों श्रद्धालुओं को इससे बड़ी
राहत मिलेगी.
हेलीकॉप्टर और पैरा ग्लाइडिंग
माघ मेले में
इस बार हेलीकॉप्टर सेवा
और पैरा ग्लाइडिंग की
शुरुआत हुई है. मंडलायुक्त
सौम्या अग्रवाल ने बताया कि
माघ मेले में पर्यटन
को बढ़ावा देने के लिए
लोकप्रिय कलाकारों को भी आमंत्रित
किया जाएगा.
मेले में छाईं दो नई ’मोनालिसा’
इस बार माघ
मेले में सबसे ज्यादा
चर्चा में रहीं दो
नई ‘मोनालिसा’ की. अफसाना जो
केवल माला बेचती हैं
और महाकुंभ में चर्चित मोनालिसा
की रिश्तेदार बताई जा रही
हैं. वहीं, बासमती, जो माला के
साथ-साथ दातून भी
बेच रही हैं. सादगी
और मुस्कान के साथ इन
दोनों ने श्रद्धालुओं और
कैमरों का ध्यान अपनी
ओर खींच लिया.
प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद
मेले में 17 अस्थायी
थाने और 42 पुलिस चौकियां बनाई गई हैं.
10 हजार से अधिक पुलिसकर्मी
तैनात हैं. एंटी टेररिस्ट
स्क्वायड (एटीएस) की दो टीमें
मोर्चा संभाल रही हैं. प्रमुख
स्नान पर्वों पर अत्याधुनिक हथियारों
से लैस स्नाइपर संवेदनशील
स्थानों पर तैनात किए
गए हैं. इसके अलावा
ड्रोन, सीसीटीवी, वॉच टावर से
24×7 निगरानी, पुलिस, पीएसी, पैरामिलिट्री, आरएएफ, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, जल पुलिस और
गोताखोरों की तैनाती की
गई है.
सुविधाएं ही सुविधाएं
श्रद्धालुओं की सुविधा के
लिए 3800 रोडवेज बसें, 75 ई-बसें और
500 से अधिक ई-रिक्शा
लगाए गए हैं. शहर
और मेला क्षेत्र में
रंग-बिरंगे संकेतक बोर्ड और हेल्प डेस्क
स्थापित किए गए हैं.
अग्नि सुरक्षा के लिए 17 फायर
स्टेशन बनाए गए हैं,
जबकि सफाई व्यवस्था के
लिए 3300 सफाईकर्मी तैनात हैं. माघ मेले
में स्वच्छता और सुरक्षा दोनों
पर विशेष ध्यान दिया जा रहा
है.माघ मेला क्षेत्र
को 7 सेक्टरों में बांटा गया
है. करीब 800 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले मेले
में 126 किलोमीटर लंबे मार्ग चेकर्ड
प्लेट से तैयार किए
गए हैं. रात के
समय संगम क्षेत्र बेहद
आकर्षक नजर आ रहा
है नावों पर एलईडी लाइट
से सजी रंगीन छतरियां,
जल में सात रंगों
के फव्वारे और घाटों पर
कलर-कोडेड चेंजिंग रूम अद्भुत दृश्य
प्रस्तुत कर रहे हैं.
इस वर्ष माघ मेले
में कुल छह महत्वपूर्ण
स्नान पर्व होंगे. पहला
3 जनवरी बीत चुका है,
14 जनवरी (मकर संक्रांति), तीसरा
18 जनवरी, चौथा 23 जनवरी, पांचवां 1 फरवरी एवं छठा 15 फरवरी
(महाशिवरात्रि). दावा है हर
प्रमुख स्नान पर एक करोड़
से अधिक श्रद्धालु पहुंचेंगे.
पौष पूर्णिमा से कल्पवासियों का
व्रत शुरू हो चुका
है. आचार्य चौक, दंडीवाड़ा, खाक
चौक और प्रमुख आध्यात्मिक
संस्थाओं के शिविर पूरी
तरह सज चुके हैं.
करीब 20 लाख कल्पवासी 3 जनवरी
से 1 फरवरी तक कल्पवास करेंगे.
वहीं पहले स्नान पर्व
पर 31 लाख से ज्यादा
श्रद्धालुओं ने गंगा में
पवित्र डुबकी लगाई. 44 दिनों तक चलने वाले
इस मेले में 12 से
15 करोड़ श्रद्धालुओं और पर्यटकों के
आने की संभावना है.






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