काशी विश्वनाथ : जहाँ मृत्यु भी मुक्ति बनकर मुस्कुराती है...
गंगा
की
कल-कल
धारा,
मंदिरों
की
घंटियों
की
मधुर
गूंज
और
संकरी
गलियों
में
हर-हर
महादेव
का
स्वर,
यह
केवल
एक
नगर
का
दृश्य
नहीं,
बल्कि
सनातन
संस्कृति
की
जीवित
आत्मा
है।
यही
काशी
है,
जिसे
शिव
की
नगरी,
मोक्ष
की
धरती
और
अनंत
आस्था
का
केंद्र
कहा
जाता
है।
इसी
काशी
के
मध्य
में
विराजमान
हैं
श्री
काशी
विश्वनाथ,
जिन्हें
श्रद्धालु
प्रेम
से
बाबा
विश्वनाथ
कहते
हैं।
भगवान
शिव
और
काशी
का
संबंध
केवल
धार्मिक
नहीं,
बल्कि
सृष्टि
के
आदि
काल
से
जुड़ा
आध्यात्मिक
संबंध
माना
जाता
है।
हिंदू
पुराणों
और
धार्मिक
ग्रंथों
में
काशी
की
महिमा
का
विस्तृत
वर्णन
मिलता
है।
मान्यता
है
कि
जब
सृष्टि
का
अंत
भी
हो
जाता
है,
तब
भी
काशी
का
अस्तित्व
बना
रहता
है
क्योंकि
यह
नगरी
स्वयं
भगवान
शिव
के
त्रिशूल
पर
विराजमान
है।
सनातन
परंपरा
में
काशी
को
भगवान
शिव
का
सबसे
प्रिय
स्थान
माना
गया
है।
शास्त्रों
में
कहा
गया
है
कि
शिव
स्वयं
इस
नगरी
के
स्वामी
हैं।
धार्मिक
मान्यता
है
“काश्यां
मरणान्मुक्तिः”
अर्थात
काशी
में
मृत्यु
होने
पर
आत्मा
को
मोक्ष
की
प्राप्ति
होती
है।
इसी
विश्वास
के
कारण
देश
ही
नहीं,
बल्कि
दुनिया
भर
से
श्रद्धालु
बाबा
विश्वनाथ
के
दर्शन
के
लिए
काशी
आते
हैं।
यहां
आने
वाला
हर
भक्त
केवल
पूजा
करने
नहीं,
बल्कि
जीवन
और
मृत्यु
के
रहस्य
को
समझने
की
आकांक्षा
लेकर
आता
है...
सुरेश गांधी
जब इतिहास अपनी
स्मृतियों की परतें खोलता
है और आध्यात्मिकता अपनी
सबसे प्राचीन धड़कनों को सुनाती है,
तब काशी का नाम
स्वयं ही उजागर हो
उठता है। यह वह
नगरी है जहां समय
भी ठहरकर सनातन चेतना को नमन करता
है। गंगा की अविरल
धारा, मंदिरों की घंटियों की
गूंज, संकरी गलियों में गूंजते शिव
नाम और दीपों की
स्वर्णिम आभाकृइन सबके मध्य विराजमान
हैं श्री काशी विश्वनाथ,
जिन्हें श्रद्धालु प्रेम से ‘बाबा विश्वनाथ’
कहते हैं। काशी विश्वनाथ
मंदिर केवल एक धार्मिक
स्थल नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का ऐसा शिखर
है, जहां आस्था, इतिहास,
दर्शन और संस्कृति एक
साथ स्पंदित होते हैं। सदियों
से यह मंदिर श्रद्धालुओं
को जीवन के सत्य,
मृत्यु के रहस्य और
मोक्ष के मार्ग का
बोध कराता आया है। सनातन
धर्म में काशी को
भगवान शिव की प्रिय
नगरी कहा गया है।
बारह ज्योतिर्लिंगों में विश्वनाथ का महत्व
भगवान शिव के बारह
ज्योतिर्लिंगों में काशी विश्वनाथ
का विशेष स्थान है। ज्योतिर्लिंग का
अर्थ है वह दिव्य
प्रकाश स्तंभ जिसमें भगवान शिव स्वयं विराजमान
होते हैं। विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग
को मोक्ष प्रदान करने वाला ज्योतिर्लिंग
माना जाता है। श्रद्धालुओं
का विश्वास है कि बाबा
विश्वनाथ के दर्शन मात्र
से पापों से मुक्ति मिल
जाती है। धार्मिक मान्यता
है कि विश्वनाथ शिवलिंग
स्वयंभू है। कुछ कथाओं
में कहा जाता है
कि इसकी स्थापना माता
शक्ति ने की, जबकि
कुछ मान्यताओं में भगवान विष्णु
द्वारा स्थापना का उल्लेख मिलता
है। शास्त्रों में बाबा विश्वनाथ
को ‘विश्वेश्वर’ कहा गया है,
जिसका अर्थ है संपूर्ण
संसार के स्वामी।
ज्ञानवापी और अविमुक्तेश्वर की परंपरा
धार्मिक ग्रंथों में ज्ञानवापी क्षेत्र
का भी उल्लेख मिलता
है। मान्यता है कि यहां
अविमुक्तेश्वर शिवलिंग स्थित था, जिसे कई
लोग काशी का प्रथम
शिवलिंग मानते हैं। यह स्थान
शिव और पार्वती का
आदि निवास स्थान माना जाता है।
कई पुराणों और महाभारत के
वन पर्व में भी
विश्वनाथ की महिमा का
वर्णन मिलता है।
इतिहास की धूप-छांव में विश्वनाथ मंदिर
काशी विश्वनाथ मंदिर
का इतिहास उतना ही प्राचीन
है जितनी काशी स्वयं। धार्मिक
ग्रंथों और ऐतिहासिक दस्तावेजों
में इस मंदिर का
उल्लेख मिलता है। प्राचीन काल
की झलक : इतिहासकारों के अनुसार, काशी
विश्वनाथ मंदिर का निर्माण प्राचीन
काल में हुआ था।
उस समय यह मंदिर
सनातन आस्था का प्रमुख केंद्र
था। विदेशी यात्रियों और विद्वानों ने
भी अपने लेखों में
काशी की धार्मिक महिमा
का वर्णन किया है। मध्यकालीन
संघर्ष और पुनर्निर्माण रू
मध्यकालीन दौर में यह
मंदिर कई बार आक्रमणों
का शिकार हुआ। 12वीं शताब्दी में
मंदिर को क्षति पहुंची,
लेकिन श्रद्धालुओं की आस्था ने
इसे बार-बार पुनर्जीवित
किया। 1669 में मुगल काल
के दौरान मंदिर को ध्वस्त कर
दिया गया और उस
स्थान पर ज्ञानवापी मस्जिद
का निर्माण कराया गया। यह घटना
काशी के धार्मिक इतिहास
का महत्वपूर्ण अध्याय मानी जाती है।
अहिल्याबाई होल्कर का ऐतिहासिक योगदान
वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर
का निर्माण 18वीं शताब्दी में
इंदौर की महारानी अहिल्याबाई
होल्कर ने कराया। उनके
प्रयासों से मंदिर पुनः
अपनी भव्यता के साथ स्थापित
हुआ। बाद में पंजाब
के महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर
के शिखर को स्वर्ण
मंडित कराया, जिससे मंदिर की भव्यता और
बढ़ गई।
काशी विश्वनाथ धाम का आधुनिक स्वरूप
हाल के वर्षों
में काशी विश्वनाथ धाम
परियोजना ने मंदिर परिसर
को भव्य स्वरूप प्रदान
किया है। अब गंगा
घाट से मंदिर तक
सीधा मार्ग उपलब्ध है। इस परियोजना
ने काशी को वैश्विक
धार्मिक पर्यटन के केंद्र के
रूप में स्थापित किया
है।
आरती परंपरा : शिव भक्ति का जीवंत अनुभव
काशी विश्वनाथ मंदिर
में होने वाली पांच
आरतियां केवल धार्मिक अनुष्ठान
नहीं, बल्कि इन्हें ब्रह्मांड यानी सृष्टि के
पांच दार्शनिक यानी आध्यात्मिक अवस्थाओं
का प्रतीक मानी जाती हैं।
1. मंगला आरती
: सृष्टि का जागरण, सुबह
ब्रह्म मुहूर्त में होने वाली
मंगला आरती को सृष्टि
के जन्म का प्रतीक
माना जाता है। जब
मंदिर के पट खुलते
हैं और शिवलिंग पर
प्रथम प्रकाश पड़ता है, तब
ऐसा प्रतीत होता है मानो
ब्रह्मांड में चेतना का
उदय हो रहा हो।
या यूं कहे सुबह
तीन बजे बाबा विश्वनाथ
को जागृत किया जाता है।
मंत्रोच्चार और घंटियों की
ध्वनि के बीच जब
आरती होती है, तब
श्रद्धालुओं को ऐसा अनुभव
होता है मानो सृष्टि
का पुनर्जन्म हो रहा हो।
2. भोग आरती : पालन और संतुलन,
दोपहर में होने वाली
भोग आरती सृष्टि के
संरक्षण का प्रतीक है।
इस समय भगवान शिव
को भोग अर्पित किया
जाता है। यह संदेश
देती है कि शिव
केवल संहारक नहीं, बल्कि जीवन के संरक्षक
भी हैं।
3. सप्तऋषि आरती
: ज्ञान का प्रकाश, संध्या
समय होने वाली सप्तऋषि
आरती सात महान ऋषियों
की स्मृति में होती है।
यह आरती आध्यात्मिक ज्ञान
और वैदिक परंपरा का प्रतीक है।
दीपों की कतारें और
वैदिक मंत्र वातावरण को दिव्य बना
देते हैं।
4. श्रृंगार आरती
: सौंदर्य और वैभव, रात्रि
में बाबा विश्वनाथ का
अलंकरण किया जाता है।
यह आरती शिव के
सौंदर्य और दिव्य वैभव
का उत्सव है। चंदन, फूल
और अलंकारों से सजाए गए
शिवलिंग का दर्शन भक्तों
के मन को भक्ति
से भर देता है।
5. शयन आरती : ब्रह्मांड की लय, दिन
की अंतिम आरती ब्रह्मांडीय विश्राम
का प्रतीक है। इसमें भगवान
शिव को शयन कराया
जाता है। बता दें,
काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन प्रतिदिन
सुबह तीन बजे से
रात 11 बजे तक होते
हैं। मंदिर सुबह 2ः30 बजे खुलता
है और मंगला आरती
के साथ दर्शन प्रारंभ
होते हैं। भोग आरती
सुबह 11ः30 बजे तथा
सप्तऋषि आरती शाम सात
बजे होती है। इन
आरती के दौरान स्पर्श
दर्शन कुछ समय के
लिए बंद किया जाता
है।
महाशिवरात्रि और सावन का विशेष महत्व
महाशिवरात्रि के अवसर पर
काशी विश्वनाथ मंदिर में लाखों श्रद्धालु
जलाभिषेक करते हैं। सावन
माह में कांवड़ यात्रा
विशेष महत्व रखती है। श्रद्धालु
गंगा जल लाकर भगवान
शिव का अभिषेक करते
हैं।
काशी की सांस्कृतिक विरासत
काशी केवल धार्मिक
नगरी नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का केंद्र भी
है। यहां संगीत, साहित्य
और दर्शन की समृद्ध परंपरा
रही है। काशी की
गलियां, घाट और मंदिर
सनातन संस्कृति की जीवंत झलक
प्रस्तुत करते हैं।
मोक्ष का आध्यात्मिक दर्शन
धार्मिक मान्यता है कि काशी
में मृत्यु के समय भगवान
शिव स्वयं भक्त के कान
में तारक मंत्र देते
हैं। यही विश्वास काशी
को मोक्ष की नगरी बनाता
है।
विश्वनाथ : श्रद्धा का शाश्वत प्रतीक
काशी विश्वनाथ मंदिर
केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि
आत्मा की शांति और
आध्यात्मिक मुक्ति का केंद्र है।
यहां आने वाला हर
श्रद्धालु स्वयं को भगवान शिव
के सान्निध्य में अनुभव करता
है।
अनंत आस्था का प्रकाश स्तंभ
श्री काशी विश्वनाथ
मंदिर भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का शाश्वत प्रतीक
है। सदियों के संघर्ष और
पुनर्निर्माण के बावजूद यह
मंदिर श्रद्धालुओं के विश्वास का
केंद्र बना हुआ है।
काशी केवल एक नगर
नहीं, बल्कि मोक्ष का मार्ग, सनातन
संस्कृति का प्रकाश स्तंभ
और शिव की अनंत
कृपा का प्रतीक है।
जब गंगा की धारा
बहती है और शिव
नाम गूंजता है, तब काशी
स्वयं आध्यात्मिक चेतना का जीवंत स्वरूप
बन जाती है।
ज्योतिर्लिंग की दिव्य उत्पत्ति
सनातन धर्म में बारह
ज्योतिर्लिंगों का विशेष महत्व
है, जिनमें काशी विश्वनाथ को
सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। पुराणों के
अनुसार, एक बार भगवान
ब्रह्मा और भगवान विष्णु
के बीच श्रेष्ठता को
लेकर विवाद उत्पन्न हुआ। तभी भगवान
शिव एक अनंत ज्योति
स्तंभ के रूप में
प्रकट हुए। दोनों देवताओं
ने उस ज्योति स्तंभ
का आरंभ और अंत
खोजने का प्रयास किया,
लेकिन वे असफल रहे।
तब भगवान शिव ने अपनी
अनंत सत्ता का बोध कराया।
इसी घटना के प्रतीक
रूप में ज्योतिर्लिंगों की
स्थापना हुई। काशी विश्वनाथ
ज्योतिर्लिंग को मोक्षदायिनी शक्ति
का केंद्र माना जाता है।
श्रद्धालुओं का विश्वास है
कि यहां भगवान शिव
स्वयं भक्तों के दुख हरते
हैं और उन्हें आध्यात्मिक
ऊर्जा प्रदान करते हैं।
मंदिर की वास्तुकला और आध्यात्मिक स्वरूप
काशी विश्वनाथ मंदिर
नागर शैली की वास्तुकला
का अद्भुत उदाहरण है। मंदिर का
स्वर्ण शिखर सूर्य की
किरणों में चमकता हुआ
श्रद्धालुओं को दिव्यता का
अनुभव कराता है। गर्भगृह में
स्थापित शिवलिंग अत्यंत पवित्र माना जाता है।
मंदिर परिसर में माता अन्नपूर्णा,
काल भैरव और अन्य
देवी-देवताओं के मंदिर स्थित
हैं, जो काशी की
धार्मिक परंपरा को और समृद्ध
करते हैं।
धार्मिक पर्यटन और स्थानीय जीवन
काशी विश्वनाथ धाम
परियोजना के बाद धार्मिक
पर्यटन में उल्लेखनीय वृद्धि
हुई है। इससे स्थानीय
व्यापार, हस्तशिल्प और रोजगार के
अवसर बढ़े हैं। श्रद्धालुओं
की बढ़ती संख्या ने
काशी की आर्थिक और
सांस्कृतिक पहचान को और मजबूत
किया है।





No comments:
Post a Comment