अक्षय आस्था, अक्षय समृद्धि : काशी में उतरा पुण्य का स्वर्णिम आभा, विश्वनाथ धाम में दिव्यता, बाज़ारों में धन की वर्षा
शिव की
नगरी
में
धर्म,
दर्शन
और
धन
का
अद्भुत
त्रिवेणी
संगम,
अक्षय
तृतीया
पर
भक्ति
भी
उमड़ी
और
खरीदारी
भी
चमकी
सुरेश गांधी
वाराणसी. सनातन आत्मा ने एक बार फिर अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर अपने शाश्वत स्वरूप का भव्य उद्घोष किया। ऐसा लगा मानो समय ठहर गया हो और युगों पुरानी परंपराएं वर्तमान में सजीव होकर जनमानस को आलोकित कर रही हों। एक ओर जहां श्री काशी विश्वनाथ धाम में मंत्रोच्चार, घंटानाद और हर-हर महादेव के जयघोष से वातावरण गुंजायमान रहा, वहीं दूसरी ओर काशी के बाजारों में समृद्धि का उत्सव अपने चरम पर दिखाई दिया, सोना-चांदी से लेकर बाइक तक, हर वस्तु की खरीद में शुभता का विश्वास झलकता रहा।
अक्षय तृतीया, अर्थात वह तिथि जो
कभी क्षय न हो।
काशी में इस दिन
का महत्व केवल धार्मिक नहीं,
बल्कि सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि
से भी अत्यंत व्यापक
है। भोर की पहली
किरण के साथ ही
विश्वनाथ धाम के कपाट
खुले और श्रद्धालुओं की
लंबी कतारें बाबा के दर्शन
को उमड़ पड़ीं। हर
चेहरे पर आस्था की
चमक थी, हर मन
में पुण्य संचय की आकांक्षा।
धाम परिसर में विविध धार्मिक
अनुष्ठानों का आयोजन अत्यंत
विधिपूर्वक संपन्न हुआ। भगवान श्रीहरि
विष्णु के बद्रीनारायण स्वरूप
का मनोहारी श्रृंगार किया गया, फूलों
की सजीव छटा, चंदन
की सुगंध और दीपों की
लौ से सारा वातावरण
दिव्य हो उठा। ऐसा
प्रतीत हुआ मानो स्वयं
देवत्व धरती पर अवतरित
हो गया हो।
इस शुभ दिन से एक अत्यंत प्राचीन और आध्यात्मिक परंपरा का भी शुभारंभ हुआ, भगवान श्री विश्वनाथ के विग्रह पर ‘कुंवरा’ (शॉवर) की स्थापना। यह व्यवस्था श्रावण मास तक निरंतर जलाभिषेक का प्रतीक है, जो शिवभक्ति की निरंतरता और तप की शीतलता को दर्शाती है। जल की यह अविरल धारा मानो जीवन के प्रवाह और आस्था की अखंडता का संदेश दे रही हो। मध्यान्ह भोग आरती के समय भगवान श्री विश्वेश्वर का विविध फलों के रस से विशेष अभिषेक किया गया। आम, बेल, खरबूजा और अंगूर जैसे मौसमी फलों के रस से अभिषेक की यह परंपरा केवल पूजा नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भाव भी है। जैसे-जैसे तापमान बढ़ रहा है, वैसे-वैसे इस अभिषेक में शीतलता और करुणा का भाव और भी प्रखर हो उठता है।
धाम में सेवा
भाव की अद्भुत झलक
भी देखने को मिली। श्रद्धालुओं
और वहां कार्यरत कर्मचारियों
के लिए बेल, नींबू
और दही से बने
शीतल पेयों का वितरण किया
गया। यह केवल सेवा
नहीं, बल्कि काशी की उस
संस्कृति का प्रतीक है
जिसमें ‘अतिथि देवो भवः’ और
‘सेवा ही धर्म’ की
भावना रची-बसी है।
उधर, जैसे ही दिन
चढ़ा, काशी के बाजारों
में रौनक अपने शबाब
पर पहुंच गई। सर्राफा बाजारों
में ग्राहकों की भीड़ उमड़
पड़ी। सोने-चांदी के
आभूषणों की खरीद को
अक्षय पुण्य से जोड़ा जाता
है, और इस बार
भी लोगों ने खुलकर खरीदारी
की। नए डिजाइनों के
गहनों से सजी दुकानों
पर उत्साह, उम्मीद और उल्लास साफ
झलक रहा था।
सिर्फ आभूषण ही नहीं, बल्कि
ऑटोमोबाइल सेक्टर में भी जबरदस्त
उछाल देखने को मिला। बाइक
और स्कूटी के शोरूम ग्राहकों
से भरे रहे। युवाओं
में नई बाइक खरीदने
का जोश साफ दिखाई
दिया, मानो अक्षय तृतीया
उनके सपनों को गति देने
का अवसर बन गई
हो। कई शोरूमों में
तो सुबह से ही
बुकिंग की लाइन लग
गई और शाम तक
डिलीवरी का सिलसिला चलता
रहा। काशी के वस्त्र बाजार,
इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकानें और
घरेलू सामानों के शोरूम भी
इस उत्सव से अछूते नहीं
रहे। हर खरीदारी में
एक विश्वास था, आज का
निवेश जीवन में सुख-समृद्धि को अक्षय बना
देगा।
इस प्रकार, काशी में अक्षय तृतीया केवल एक पर्व नहीं, बल्कि जीवन का उत्सव बनकर सामने आई, जहाँ एक ओर आत्मा की तृप्ति के लिए भक्ति का मार्ग खुला, वहीं दूसरी ओर भौतिक समृद्धि के लिए बाजारों ने अपने द्वार खोले। अंततः, श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास ने समस्त श्रद्धालुओं और सनातन समाज को इस पावन पर्व की शुभकामनाएं देते हुए भगवान श्रीहरि विष्णु और माता लक्ष्मी से सभी के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की कामना की। काशी की यह अक्षय परंपरा यूँ ही अनंत काल तक चलती रहे, और हर वर्ष इसी प्रकार आस्था और अर्थव्यवस्था का यह अद्भुत संगम जनजीवन को समृद्ध करता रहे, यही इस पर्व का सच्चा संदेश है।



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