Wednesday, 15 July 2026

काशी का महामोक्ष : 25 हजार करोड़ की दो सड़कों ने बदल दिया विकास का भूगोल

काशी : अब रफ्तार पकड़ती 'क्योटो विजन'

काशी का महामोक्ष : 25 हजार करोड़ की दो सड़कों ने बदल दिया विकास का भूगोल  

मोदी का 'क्योटो विजन' अब आकार लेता दिख रहा है; गंगा-वरुणा के ऊपर दौड़ेंगे विकास के राजमार्ग, जाम से जूझती काशी बनेगी भारत के आधुनिक शहरी मॉडल की प्रयोगशाला

2014 में 'क्योटो' पर उड़ता था मजाक, 2026 में काशी के नाम दर्ज हुआ देश का सबसे बड़ा शहरी सड़क निवेश | 50 हजार करोड़ से अधिक की सड़क परियोजनाओं ने बदली तस्वीर | राजनीति से आगे बढ़कर विकास की नई इबारत

सुरेश गांधी

     किसी शहर की पहचान केवल उसके मंदिरों, घाटों और इतिहास से नहीं होती, बल्कि इस बात से भी होती है कि वह अपने भविष्य की तैयारी किस तरह करता है। बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने वाराणसी को जो दो मेगा एलिवेटेड कॉरिडोर दिए, वह सिर्फ दो सड़क परियोजनाओं की मंजूरी नहीं है। 

यह उस विकास दर्शन पर लगी सरकारी मुहर है, जिसकी शुरुआत मोदी ने 2014 में काशी से सांसद बनने के बाद की थी। करीब 25,446 करोड़ रुपये की लागत वाले गंगा एलिवेटेड कॉरिडोर और वरुणा एलिवेटेड कॉरिडोर के साथ अब 2014 के बाद से केवल सड़क अवसंरचना पर ही वाराणसी को 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाएं मिल चुकी हैं। 

किसी एक शहर में इतने बड़े पैमाने पर शहरी सड़क नेटवर्क पर हुआ यह निवेश अपने आप में असाधारण है। यह दिन इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि एक दशक पहले जब नरेंद्र मोदी ने काशी को जापान के क्योटो की तर्ज पर विकसित करने की बात कही थी, तब विपक्ष ने इसे चुनावी जुमला बताते हुए खूब तंज कसे थे। 

कहा गया था कि "क्योटो तो नहीं, काशी नरक बन जाएगी।" लेकिन बारह वर्ष बाद तस्वीर बिल्कुल उलट है। जिन सड़कों पर कभी घंटों जाम लगता था, वहां आज फोरलेन, फ्लाईओवर, रिंग रोड, रोपवे और अब एलिवेटेड कॉरिडोर का विशाल नेटवर्क तैयार हो रहा है। 

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि मोदी ने काशी का विकास घाटों से उठाकर हाई-स्पीड कॉरिडोर तक पहुंचा दिया है।

सिर्फ सड़क नहीं, शहर का नया नक्शा

नई परियोजनाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे केवल ट्रैफिक कम करने के लिए नहीं बनाई जा रहीं। उनका उद्देश्य अगले 30-40 वर्षों की आबादी, पर्यटन, व्यापार और धार्मिक आयोजनों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पूरे शहर के विकास का नया ढांचा तैयार करना है। 
एक ओर 46 किमी लंबा गंगा एलिवेटेड कॉरिडोर, दूसरी ओर 43.218 किलोमीटर का वरुणा एलिवेटेड कॉरिडोरदोनों मिलकर लगभग 90 किलोमीटर का एलिवेटेड नेटवर्क तैयार करेंगे। 
यह नेटवर्क शहर के भीतर और बाहर से आने वाले यातायात को अलग-अलग स्तर पर संचालित करेगा। परिणामस्वरूप काशी की तंग गलियां अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखेंगी और तेज यातायात एलिवेटेड मार्गों से गुजर जाएगा।

सावन से महाकुंभ तक, हर आयोजन होगा आसान

आज सावन, देव दीपावली, महाशिवरात्रि या किसी भी बड़े पर्व पर लाखों श्रद्धालुओं के कारण शहर थम जाता है। 

नई परियोजनाएं इस समस्या का स्थायी समाधान प्रस्तुत करती हैं। श्रद्धालु शहर के बीच से गुजरे बिना सीधे एलिवेटेड मार्गों से निर्धारित एक्सेस प्वाइंट तक पहुंच सकेंगे। इससे स्थानीय नागरिकों और श्रद्धालुओंदोनों को राहत मिलेगी। 

दिल्ली में एक्सप्रेसवे हैं, मुंबई में सी-लिंक और कोस्टल रोड है, बेंगलुरु में एलिवेटेड कॉरिडोर हैं, हैदराबाद में आउटर रिंग रोड है। 

लेकिन एक प्राचीन धार्मिक नगरी के भीतर, उसकी विरासत को सुरक्षित रखते हुए लगभग 25 हजार करोड़ रुपये की दो समानांतर एलिवेटेड शहरी सड़क परियोजनाएं देश में बेहद दुर्लभ उदाहरण हैं। यही कारण है कि विशेषज्ञ इसे केवल सड़क निर्माण नहीं, बल्कि हेरिटेज और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के संतुलन का राष्ट्रीय मॉडल मान रहे हैं। 

2014 से 2026: विकास की लंबी यात्रा

पिछले बारह वर्षों में काशी विश्वनाथ धाम, रिंग रोड, बाबतपुर फोरलेन, दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन का विस्तार, नमो घाट, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम, रोपवे, स्मार्ट सिटी परियोजनाएं, घाटों का पुनर्विकास, रेलवे स्टेशन और एयरपोर्ट का विस्तारएक-एक कर विकास की परतें जुड़ती गईं। अब इन दो मेगा कॉरिडोरों ने उस श्रृंखला को नई ऊंचाई दे दी है।

सियासत के भी गहरे मायने 

यह फैसला केवल प्रशासनिक नहीं, राजनीतिक संदेश भी देता है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री ने अपने संसदीय क्षेत्र को देश की सबसे बड़ी शहरी सड़क परियोजनाओं में शामिल कर यह स्पष्ट संकेत दिया है कि काशी उनके विकास एजेंडे का केंद्र बनी हुई है। 
भाजपा इसे "मोदी की विकास गारंटी" के सबसे बड़े प्रमाण के रूप में प्रस्तुत कर रही है। वहीं विपक्ष के लिए अब "क्योटो" वाले पुराने तंज दोहराना आसान नहीं होगा, क्योंकि जमीन पर बदलता बुनियादी ढांचा स्वयं एक राजनीतिक जवाब बन चुका है।

काशी अब केवल तीर्थ नहीं, मॉडल सिटी बनने की ओर

वाराणसी की सबसे बड़ी चुनौती हमेशा यही रही कि हजारों वर्षों की विरासत को बचाते हुए आधुनिक शहर कैसे बनाया जाए। नई परियोजनाएं इसी प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास हैं। 
यदि निर्धारित समय में ये दोनों कॉरिडोर पूरे हो जाते हैं, तो काशी केवल आध्यात्मिक राजधानी नहीं रहेगी, बल्कि हेरिटेज संरक्षण और आधुनिक शहरी परिवहन के संतुलित मॉडल के रूप में दुनिया के सामने एक नई पहचान भी बना सकती है। इतिहास गवाह है कि शहर केवल इमारतों से नहीं बदलते, बल्कि दूरदृष्टि से बदलते हैं। 2014 में बोया गया "क्योटो" का बीज 2026 में एक विशाल शहरी परिकल्पना का रूप लेता दिखाई दे रहा है।

रफ्तार पकड़ता 'क्योटो विजन', बदलती काशी की तकदीर 

काशी को लेकर वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो 'क्योटो विजन' रखा था, वह लंबे समय तक राजनीतिक बहस का विषय बना रहा। एक दशक बाद अब यह अवधारणा कागज से निकलकर शहर के भूगोल पर उतरती दिखाई दे रही है। केंद्रीय मंत्रिमंडल से स्वीकृत गंगा और वरुणा एलिवेटेड कॉरिडोर केवल दो सड़क परियोजनाएं नहीं, बल्कि उस व्यापक शहरी दृष्टि का हिस्सा हैं, जिसका उद्देश्य हजारों वर्ष पुरानी सांस्कृतिक नगरी को आधुनिक परिवहन, नियोजित विस्तार और विश्वस्तरीय कनेक्टिविटी से जोड़ना है। करीब 25,446 करोड़ रुपये की इन परियोजनाओं के साथ 2014 के बाद वाराणसी में सड़क अवसंरचना पर स्वीकृत निवेश 50 हजार करोड़ रुपये के पार पहुंच चुका है। सवाल अब केवल यह नहीं कि काशी कितनी बदली है, बल्कि यह है कि क्या दुनिया की सबसे प्राचीन जीवंत नगरी विरासत और आधुनिकता के संतुलन का नया वैश्विक मॉडल बनने की ओर बढ़ रही है? यही इस विकास यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण और दूरगामी पहलू है 

सुरेश गांधी

गंगा-वरुणा के ऊपर दौड़ती सड़कें केवल कंक्रीट नहीं, बल्कि उस परिकल्पना का विस्तार हैं जिसे 2014 में एक राजनीतिक संकल्प माना गया था। अब सवाल यह नहीं कि काशी बदली या नहीं, बल्कि यह है कि क्या दुनिया का सबसे प्राचीन जीवंत शहर आधुनिक भारत का सबसे बड़ा 'हेरिटेज-अर्बन मॉडल' बनने की ओर बढ़ रहा है? साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी ने वाराणसी से लोकसभा चुनाव लड़ते हुए कहा था कि "काशी को क्योटो की तर्ज पर विकसित किया जाएगा," तब इस कथन की राजनीतिक चर्चा ज्यादा हुई थी और शहरी नियोजन पर विमर्श कम। विरोधियों ने इसे चुनावी भाषण बताया। समर्थकों ने इसे एक बड़े विजन के रूप में देखा। बारह वर्ष बाद जब केंद्रीय मंत्रिमंडल ने गंगा एलिवेटेड कॉरिडोर और वरुणा एलिवेटेड कॉरिडोर जैसी लगभग 25,446 करोड़ रुपये की परियोजनाओं को मंजूरी दी, तो यह स्पष्ट हो गया कि यह केवल दो सड़कें नहीं हैं; यह एक लंबी विकास यात्रा का नया पड़ाव हैं। यदि इतिहास की दृष्टि से देखा जाए तो यह केवल वाराणसी की कहानी नहीं है। यह उस प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास भी है कि क्या कोई पांच हजार वर्ष पुराना शहर अपनी आत्मा को सुरक्षित रखते हुए आधुनिक भी बन सकता है?

 

भारत में अक्सर 'क्योटो मॉडल' का अर्थ केवल चौड़ी सड़कें और चमकदार इमारतें समझ लिया जाता है, जबकि जापान का क्योटो अपनी पहचान इसलिए नहीं रखता कि वहां आधुनिक सड़कें हैं। उसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वहां हजारों वर्ष पुरानी सांस्कृतिक विरासत और अत्याधुनिक शहरी व्यवस्था साथ-साथ चलती हैं। यही वह अवधारणा थी जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने 2014 में काशी के संदर्भ में रखा था। बारह वर्षों में काशी विश्वनाथ धाम, नमो घाट, रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर, रिंग रोड, बाबतपुर फोरलेन, रेलवे स्टेशनों का पुनर्विकास, रोपवे, घाटों का सौंदर्यीकरण, स्मार्ट सिटी परियोजनाएं और अब लगभग 89.257 किलोमीटर लंबे दो एलिवेटेड कॉरिडोर उसी विजन की अगली कड़ी बनकर सामने आए हैं। गंगा और वरुणा एलिवेटेड कॉरिडोर का सबसे बड़ा महत्व उनकी लंबाई नहीं है। महत्व इस बात का है कि पहली बार वाराणसी के ऊपर एक दूसरा यातायात स्तर तैयार किया जा रहा है। 

अभी तक बनारस का पूरा यातायात एक ही सतह पर चलता था। वही सड़क श्रद्धालु भी इस्तेमाल करता था, स्थानीय नागरिक भी, ट्रक भी और पर्यटक भी। नई परियोजनाओं के बाद पहली बार लंबी दूरी का यातायात एलिवेटेड कॉरिडोर पर चलेगा, जबकि शहर का स्थानीय जीवन नीचे अपनी स्वाभाविक गति से चलता रहेगा। यही आधुनिक शहरी नियोजन का मूल सिद्धांत है। दुनिया में कई शहरों के पास शानदार सड़कें हैं। दुबई के पास बहुस्तरीय एक्सप्रेसवे हैं। सिंगापुर के पास स्मार्ट ट्रांसपोर्ट सिस्टम है। टोक्यो के पास विशाल एलिवेटेड नेटवर्क है। मुंबई के पास कोस्टल रोड और अटल सेतु है। दिल्ली के पास एक्सप्रेसवे का जाल है। लेकिन विश्व के सबसे प्राचीन जीवंत धार्मिक नगरों में से एक के भीतर, दो नदियों के समानांतर लगभग 90 किलोमीटर का एलिवेटेड नेटवर्क विकसित करने का उदाहरण अत्यंत दुर्लभ है। यही कारण है कि यह परियोजना केवल सड़क निर्माण नहीं, बल्कि हेरिटेज इंजीनियरिंग का उदाहरण बन सकती है।

वाराणसी की सबसे बड़ी समस्या कभी सड़क की चौड़ाई नहीं थी। समस्या यह थी कि हजारों वर्ष पुराने शहर में आधुनिक यातायात की मांग लगातार बढ़ती गई। आज हर वर्ष करोड़ों श्रद्धालु आते हैं। हवाई यात्रियों की संख्या बढ़ रही है। पर्यटन लगातार बढ़ रहा है। पूर्वांचल का व्यापार भी तेजी से बढ़ रहा है। यदि इसी गति से विकास होता रहा और सड़कें पुरानी ही रहतीं, तो अगले दस वर्षों में बनारस का यातायात लगभग ठहर सकता था। यही वह बिंदु है, जहां गंगा और वरुणा कॉरिडोर भविष्य की जरूरतों का उत्तर बनकर सामने आते हैं। 2014 के बाद यदि केवल सड़क अवसंरचना को देखें तो वाराणसी को रिंग रोड, बाबतपुर फोरलेन, राष्ट्रीय राजमार्गों का विस्तार, फ्लाईओवर, रेलवे ओवरब्रिज, शहर के प्रमुख मार्गों का चौड़ीकरण, और अब गंगा एवं वरुणा एलिवेटेड कॉरिडोर, मिलाकर 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाएं मिल चुकी हैं। किसी एक संसदीय क्षेत्र में सड़क अवसंरचना पर इतना निवेश अपने आप में अध्ययन का विषय है।

यह परियोजना केवल इंजीनियरिंग नहीं है। यह राजनीति भी है। मोदी ने लगातार यह संदेश दिया है कि उनके लिए वाराणसी केवल संसदीय क्षेत्र नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक राजधानी है। इसी कारण यहां विकास परियोजनाओं को प्रतीकात्मक महत्व भी मिलता है। विश्वनाथ धाम इसका उदाहरण था। अब गंगा और वरुणा कॉरिडोर उसी श्रृंखला का अगला अध्याय हैं। इतनी बड़ी परियोजनाओं के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। भूमि अधिग्रहण, पर्यावरणीय संतुलन, गंगा और वरुणा के पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा, निर्माण के दौरान यातायात प्रबंधन, और निर्धारित समय में कार्य पूरा करनाये सभी कसौटियां होंगी। इतिहास गवाह है कि बड़ी परियोजनाओं का मूल्यांकन उनकी घोषणा से नहीं, बल्कि समय पर गुणवत्तापूर्ण निर्माण से होता है। यदि निर्धारित समयसीमा के भीतर दोनों परियोजनाएं पूरी हो जाती हैं, तो वर्ष 2030 तक वाराणसी की तस्वीर आज से बिल्कुल अलग होगी। हवाई अड्डे से आने वाला यात्री बिना भीड़भाड़ में फंसे शहर के प्रमुख हिस्सों तक पहुंचेगा। श्रद्धालु धाम तक कम समय में पहुंचेंगे। लॉजिस्टिक्स तेज होगी।

नए शहरी क्षेत्र विकसित होंगे। और सबसे महत्वपूर्णपुरानी काशी की गलियां अपनी सांस्कृतिक पहचान के साथ जीवित रह सकेंगी। काशी की सबसे बड़ी ताकत उसका अतीत है। लेकिन केवल अतीत के सहारे कोई शहर भविष्य नहीं बनाता। भविष्य तब बनता है जब विरासत और विकास एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि सहयोगी बन जाएं। गंगा और वरुणा के ऊपर बनने वाले एलिवेटेड कॉरिडोरों को इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए। शायद इसलिए 2014 में बोया गया 'क्योटो विजन' का बीज अब केवल एक राजनीतिक नारा नहीं रह गया है। वह धीरे-धीरे कंक्रीट, स्टील, पुलों, इंटरचेंजों और आधुनिक शहरी नियोजन के रूप में आकार ले रहा है। और यदि यह प्रयोग सफल हुआ, तो आने वाले वर्षों में काशी केवल भारत की आध्यात्मिक राजधानी नहीं रहेगी; वह दुनिया के सामने यह उदाहरण भी पेश करेगी कि विरासत को बचाते हुए विकास की रफ्तार कैसे पकड़ी जाती है।

आज काशी में केवल दो कॉरिडोरों की चर्चा नहीं है, बल्कि उस विश्वास की चर्चा है कि सदियों पुरानी यह नगरी अब अपने अतीत की गरिमा को संभालते हुए भविष्य की रफ्तार भी पकड़ चुकी है। शायद इसलिए आज बनारस की चौपालों से लेकर चाय की दुकानों तक एक ही बात सुनाई दे रही है यह केवल सड़क नहीं, काशी के अगले सौ वर्षों का रास्ता है।

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