काशी : अब रफ्तार पकड़ती 'क्योटो विजन'
काशी का महामोक्ष : 25 हजार करोड़ की दो सड़कों ने बदल दिया विकास का भूगोल
मोदी का
'क्योटो
विजन'
अब
आकार
लेता
दिख
रहा
है;
गंगा-वरुणा
के
ऊपर
दौड़ेंगे
विकास
के
राजमार्ग,
जाम
से
जूझती
काशी
बनेगी
भारत
के
आधुनिक
शहरी
मॉडल
की
प्रयोगशाला
2014 में 'क्योटो' पर
उड़ता
था
मजाक,
2026 में
काशी
के
नाम
दर्ज
हुआ
देश
का
सबसे
बड़ा
शहरी
सड़क
निवेश
| 50 हजार
करोड़
से
अधिक
की
सड़क
परियोजनाओं
ने
बदली
तस्वीर
| राजनीति
से
आगे
बढ़कर
विकास
की
नई
इबारत
सुरेश गांधी
किसी शहर की
पहचान केवल उसके मंदिरों,
घाटों और इतिहास से
नहीं होती, बल्कि इस बात से
भी होती है कि
वह अपने भविष्य की
तैयारी किस तरह करता
है। बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी की अध्यक्षता में
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने वाराणसी को
जो दो मेगा एलिवेटेड
कॉरिडोर दिए, वह सिर्फ
दो सड़क परियोजनाओं की
मंजूरी नहीं है।
यह
उस विकास दर्शन पर लगी सरकारी
मुहर है, जिसकी शुरुआत
मोदी ने 2014 में काशी से
सांसद बनने के बाद
की थी। करीब 25,446 करोड़ रुपये की लागत वाले
गंगा एलिवेटेड कॉरिडोर और वरुणा एलिवेटेड
कॉरिडोर के साथ अब
2014 के बाद से केवल
सड़क अवसंरचना पर ही वाराणसी
को 50 हजार करोड़ रुपये
से अधिक की परियोजनाएं
मिल चुकी हैं।
किसी एक शहर में इतने बड़े पैमाने पर शहरी सड़क नेटवर्क पर हुआ यह निवेश अपने आप में असाधारण है। यह दिन इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि एक दशक पहले जब नरेंद्र मोदी ने काशी को जापान के क्योटो की तर्ज पर विकसित करने की बात कही थी, तब विपक्ष ने इसे चुनावी जुमला बताते हुए खूब तंज कसे थे।
कहा गया था कि "क्योटो तो नहीं, काशी नरक बन जाएगी।" लेकिन बारह वर्ष बाद तस्वीर बिल्कुल उलट है। जिन सड़कों पर कभी घंटों जाम लगता था, वहां आज फोरलेन, फ्लाईओवर, रिंग रोड, रोपवे और अब एलिवेटेड कॉरिडोर का विशाल नेटवर्क तैयार हो रहा है।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि मोदी ने काशी का विकास घाटों से उठाकर हाई-स्पीड कॉरिडोर तक पहुंचा दिया है।सिर्फ सड़क नहीं, शहर का नया नक्शा
सावन से महाकुंभ तक, हर आयोजन होगा आसान
नई परियोजनाएं इस समस्या का स्थायी समाधान प्रस्तुत करती हैं। श्रद्धालु शहर के बीच से गुजरे बिना सीधे एलिवेटेड मार्गों से निर्धारित एक्सेस प्वाइंट तक पहुंच सकेंगे। इससे स्थानीय नागरिकों और श्रद्धालुओं—दोनों को राहत मिलेगी।
दिल्ली में एक्सप्रेसवे हैं, मुंबई में सी-लिंक और कोस्टल रोड है, बेंगलुरु में एलिवेटेड कॉरिडोर हैं, हैदराबाद में आउटर रिंग रोड है।
लेकिन एक प्राचीन धार्मिक नगरी के भीतर, उसकी विरासत को सुरक्षित रखते हुए लगभग 25 हजार करोड़ रुपये की दो समानांतर एलिवेटेड शहरी सड़क परियोजनाएं देश में बेहद दुर्लभ उदाहरण हैं। यही कारण है कि विशेषज्ञ इसे केवल सड़क निर्माण नहीं, बल्कि हेरिटेज और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के संतुलन का राष्ट्रीय मॉडल मान रहे हैं।
2014 से 2026: विकास की लंबी यात्रा
पिछले बारह वर्षों में
काशी विश्वनाथ धाम, रिंग रोड,
बाबतपुर फोरलेन, दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन का विस्तार, नमो
घाट, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम, रोपवे, स्मार्ट सिटी परियोजनाएं, घाटों
का पुनर्विकास, रेलवे स्टेशन और एयरपोर्ट का
विस्तार—एक-एक कर
विकास की परतें जुड़ती
गईं। अब इन दो
मेगा कॉरिडोरों ने उस श्रृंखला
को नई ऊंचाई दे
दी है।
सियासत के भी गहरे मायने
काशी अब केवल तीर्थ नहीं, मॉडल सिटी बनने की ओर
रफ्तार पकड़ता 'क्योटो विजन', बदलती काशी की तकदीर
काशी को लेकर वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो 'क्योटो विजन' रखा था, वह लंबे समय तक राजनीतिक बहस का विषय बना रहा। एक दशक बाद अब यह अवधारणा कागज से निकलकर शहर के भूगोल पर उतरती दिखाई दे रही है। केंद्रीय मंत्रिमंडल से स्वीकृत गंगा और वरुणा एलिवेटेड कॉरिडोर केवल दो सड़क परियोजनाएं नहीं, बल्कि उस व्यापक शहरी दृष्टि का हिस्सा हैं, जिसका उद्देश्य हजारों वर्ष पुरानी सांस्कृतिक नगरी को आधुनिक परिवहन, नियोजित विस्तार और विश्वस्तरीय कनेक्टिविटी से जोड़ना है। करीब 25,446 करोड़ रुपये की इन परियोजनाओं के साथ 2014 के बाद वाराणसी में सड़क अवसंरचना पर स्वीकृत निवेश 50 हजार करोड़ रुपये के पार पहुंच चुका है। सवाल अब केवल यह नहीं कि काशी कितनी बदली है, बल्कि यह है कि क्या दुनिया की सबसे प्राचीन जीवंत नगरी विरासत और आधुनिकता के संतुलन का नया वैश्विक मॉडल बनने की ओर बढ़ रही है? यही इस विकास यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण और दूरगामी पहलू है
सुरेश गांधी
गंगा-वरुणा के
ऊपर दौड़ती सड़कें केवल कंक्रीट नहीं,
बल्कि उस परिकल्पना का
विस्तार हैं जिसे 2014 में
एक राजनीतिक संकल्प माना गया था।
अब सवाल यह नहीं
कि काशी बदली या
नहीं, बल्कि यह है कि
क्या दुनिया का सबसे प्राचीन
जीवंत शहर आधुनिक भारत
का सबसे बड़ा 'हेरिटेज-अर्बन मॉडल' बनने की ओर
बढ़ रहा है? साल
2014 में जब नरेंद्र मोदी
ने वाराणसी से लोकसभा चुनाव
लड़ते हुए कहा था
कि "काशी को क्योटो
की तर्ज पर विकसित
किया जाएगा," तब इस कथन
की राजनीतिक चर्चा ज्यादा हुई थी और
शहरी नियोजन पर विमर्श कम।
विरोधियों ने इसे चुनावी
भाषण बताया। समर्थकों ने इसे एक
बड़े विजन के रूप
में देखा। बारह वर्ष बाद
जब केंद्रीय मंत्रिमंडल ने गंगा एलिवेटेड
कॉरिडोर और वरुणा एलिवेटेड
कॉरिडोर जैसी लगभग 25,446 करोड़
रुपये की परियोजनाओं को
मंजूरी दी, तो यह
स्पष्ट हो गया कि
यह केवल दो सड़कें
नहीं हैं; यह एक
लंबी विकास यात्रा का नया पड़ाव
हैं। यदि इतिहास की
दृष्टि से देखा जाए
तो यह केवल वाराणसी
की कहानी नहीं है। यह
उस प्रश्न का उत्तर खोजने
का प्रयास भी है कि
क्या कोई पांच हजार
वर्ष पुराना शहर अपनी आत्मा
को सुरक्षित रखते हुए आधुनिक
भी बन सकता है?
भारत में अक्सर 'क्योटो मॉडल' का अर्थ केवल चौड़ी सड़कें और चमकदार इमारतें समझ लिया जाता है, जबकि जापान का क्योटो अपनी पहचान इसलिए नहीं रखता कि वहां आधुनिक सड़कें हैं। उसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वहां हजारों वर्ष पुरानी सांस्कृतिक विरासत और अत्याधुनिक शहरी व्यवस्था साथ-साथ चलती हैं। यही वह अवधारणा थी जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने 2014 में काशी के संदर्भ में रखा था। बारह वर्षों में काशी विश्वनाथ धाम, नमो घाट, रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर, रिंग रोड, बाबतपुर फोरलेन, रेलवे स्टेशनों का पुनर्विकास, रोपवे, घाटों का सौंदर्यीकरण, स्मार्ट सिटी परियोजनाएं और अब लगभग 89.257 किलोमीटर लंबे दो एलिवेटेड कॉरिडोर उसी विजन की अगली कड़ी बनकर सामने आए हैं। गंगा और वरुणा एलिवेटेड कॉरिडोर का सबसे बड़ा महत्व उनकी लंबाई नहीं है। महत्व इस बात का है कि पहली बार वाराणसी के ऊपर एक दूसरा यातायात स्तर तैयार किया जा रहा है।
अभी तक बनारस
का पूरा यातायात एक
ही सतह पर चलता
था। वही सड़क श्रद्धालु
भी इस्तेमाल करता था, स्थानीय
नागरिक भी, ट्रक भी
और पर्यटक भी। नई परियोजनाओं
के बाद पहली बार
लंबी दूरी का यातायात
एलिवेटेड कॉरिडोर पर चलेगा, जबकि
शहर का स्थानीय जीवन
नीचे अपनी स्वाभाविक गति
से चलता रहेगा। यही
आधुनिक शहरी नियोजन का
मूल सिद्धांत है। दुनिया में
कई शहरों के पास शानदार
सड़कें हैं। दुबई के
पास बहुस्तरीय एक्सप्रेसवे हैं। सिंगापुर के
पास स्मार्ट ट्रांसपोर्ट सिस्टम है। टोक्यो के
पास विशाल एलिवेटेड नेटवर्क है। मुंबई के
पास कोस्टल रोड और अटल
सेतु है। दिल्ली के
पास एक्सप्रेसवे का जाल है।
लेकिन विश्व के सबसे प्राचीन
जीवंत धार्मिक नगरों में से एक
के भीतर, दो नदियों के
समानांतर लगभग 90 किलोमीटर का एलिवेटेड नेटवर्क
विकसित करने का उदाहरण
अत्यंत दुर्लभ है। यही कारण
है कि यह परियोजना
केवल सड़क निर्माण नहीं,
बल्कि हेरिटेज इंजीनियरिंग का उदाहरण बन
सकती है।
यह परियोजना केवल
इंजीनियरिंग नहीं है। यह
राजनीति भी है। मोदी
ने लगातार यह संदेश दिया
है कि उनके लिए
वाराणसी केवल संसदीय क्षेत्र
नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक
राजधानी है। इसी कारण
यहां विकास परियोजनाओं को प्रतीकात्मक महत्व
भी मिलता है। विश्वनाथ धाम
इसका उदाहरण था। अब गंगा
और वरुणा कॉरिडोर उसी श्रृंखला का
अगला अध्याय हैं। इतनी बड़ी
परियोजनाओं के सामने चुनौतियां
भी कम नहीं हैं।
भूमि अधिग्रहण, पर्यावरणीय संतुलन, गंगा और वरुणा
के पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा, निर्माण
के दौरान यातायात प्रबंधन, और निर्धारित समय
में कार्य पूरा करना—ये
सभी कसौटियां होंगी। इतिहास गवाह है कि
बड़ी परियोजनाओं का मूल्यांकन उनकी
घोषणा से नहीं, बल्कि
समय पर गुणवत्तापूर्ण निर्माण
से होता है। यदि
निर्धारित समयसीमा के भीतर दोनों
परियोजनाएं पूरी हो जाती
हैं, तो वर्ष 2030 तक
वाराणसी की तस्वीर आज
से बिल्कुल अलग होगी। हवाई
अड्डे से आने वाला
यात्री बिना भीड़भाड़ में
फंसे शहर के प्रमुख
हिस्सों तक पहुंचेगा। श्रद्धालु
धाम तक कम समय
में पहुंचेंगे। लॉजिस्टिक्स तेज होगी।
नए शहरी क्षेत्र
विकसित होंगे। और सबसे महत्वपूर्ण—पुरानी काशी की गलियां
अपनी सांस्कृतिक पहचान के साथ जीवित
रह सकेंगी। काशी की सबसे
बड़ी ताकत उसका अतीत
है। लेकिन केवल अतीत के
सहारे कोई शहर भविष्य
नहीं बनाता। भविष्य तब बनता है
जब विरासत और विकास एक-दूसरे के विरोधी नहीं,
बल्कि सहयोगी बन जाएं। गंगा
और वरुणा के ऊपर बनने
वाले एलिवेटेड कॉरिडोरों को इसी दृष्टि
से देखा जाना चाहिए।
शायद इसलिए 2014 में बोया गया
'क्योटो विजन' का बीज अब
केवल एक राजनीतिक नारा
नहीं रह गया है।
वह धीरे-धीरे कंक्रीट,
स्टील, पुलों, इंटरचेंजों और आधुनिक शहरी
नियोजन के रूप में
आकार ले रहा है।
और यदि यह प्रयोग
सफल हुआ, तो आने
वाले वर्षों में काशी केवल
भारत की आध्यात्मिक राजधानी
नहीं रहेगी; वह दुनिया के
सामने यह उदाहरण भी
पेश करेगी कि विरासत को
बचाते हुए विकास की
रफ्तार कैसे पकड़ी जाती
है।











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