भीड़ भी नाराज़, सत्ता भी सख्त — पत्रकारिता जाए तो जाए कहां?
नई दिल्ली और रांची की सड़कों से उठी दो खबरों ने भारतीय पत्रकारिता के सामने खड़े सबसे बड़े संकट को उजागर कर दिया है। कहीं आंदोलन की रिपोर्टिंग करने पर पत्रकार पर एफआईआर दर्ज होती है, तो कहीं कैमरा और माइक्रोफोन लेकर पहुंचे पत्रकारों को भीड़ के आक्रोश का सामना करना पड़ता है। काशी के पत्रकारों में इस पूरे घटनाक्रम को लेकर गहरा आक्रोश है। उनका कहना है कि पत्रकार यदि सड़क की आवाज़ भी दर्ज नहीं कर पाएगा, तो लोकतंत्र की आंख धुंधली पड़ जाएगी। सवाल अब केवल अमन चोपड़ा का नहीं, बल्कि भयमुक्त पत्रकारिता और जनतंत्र की आत्मा का है
सुरेश गांधी
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ इन दिनों एक ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है, जहां पत्रकारिता केवल खबर जुटाने का काम नहीं रह गई है, बल्कि जोखिम, दबाव और भय के बीच संतुलन साधने की कठिन परीक्षा बनती जा रही है। झारखंड में छात्र आंदोलन की रिपोर्टिंग कर रहे वरिष्ठ पत्रकार अमन चोपड़ा से पुलिस पूछताछ और उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज होने की खबर ने जहां पत्रकार जगत को झकझोर दिया है, वहीं दिल्ली में हाल के विरोध प्रदर्शनों के दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों द्वारा पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार की घटनाओं ने एक और गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है — आखिर मैदान में काम करने वाला पत्रकार सुरक्षित किसके बीच है? काशी के पत्रकारों में इस पूरे घटनाक्रम को लेकर जबरदस्त आक्रोश है। वरिष्ठ पत्रकारों सहित टाइम्स नाउ के रिपोर्टर आशुतोष सिंह का कहना है कि आज पत्रकार को केवल सत्ता के दबाव से ही नहीं, बल्कि भीड़ की असहिष्णुता, सोशल मीडिया के उन्माद और तत्काल प्रतिक्रिया की संस्कृति से भी जूझना पड़ रहा है। वाराणसी में कई पत्रकार संगठनों ने इसे प्रेस की स्वतंत्रता और पत्रकार सुरक्षा से जुड़ा राष्ट्रीय प्रश्न बताया है।
रांची : रिपोर्टिंग से अपराध तक?
सोमवार को रांची में जेपीएससी-जेएसएससी परीक्षा अनियमितताओं के विरोध में हजारों छात्र विधानसभा मार्च के लिए निकले। पेपर लीक, भर्ती प्रक्रिया में कथित भ्रष्टाचार और चयन प्रणाली में पारदर्शिता की मांग को लेकर प्रदर्शन उग्र हुआ तो प्रशासन ने भारी पुलिस बल, बैरिकेडिंग और निषेधाज्ञा का सहारा लिया। इसी दौरान आंदोलन की रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकार अमन चोपड़ा को पुलिस पूछताछ के लिए ले जाने और बाद में एफआईआर दर्ज होने की खबर सामने आई। पत्रकार संगठनों का सवाल है कि यदि घटनास्थल पर मौजूद रहकर कैमरे और माइक्रोफोन के साथ रिपोर्टिंग करना भी संदेह की दृष्टि से देखा जाएगा तो स्वतंत्र पत्रकारिता का अर्थ क्या रह जाएगा?
दिल्ली : भीड़ के बीच कैमरा भी निशाना
दिल्ली में हाल के
विरोध प्रदर्शनों के दौरान कुछ
पत्रकारों ने आरोप लगाया
कि प्रदर्शनकारी समूहों ने कैमरे हटाने,
रिकॉर्डिंग बंद करने और
धक्का-मुक्की जैसी हरकतें कीं।
यह घटना बताती है
कि खतरा केवल प्रशासनिक
कार्रवाई से नहीं आता;
कभी-कभी वही भीड़,
जिसकी आवाज़ दुनिया तक पहुंचाने पत्रकार
मैदान में जाता है,
पत्रकार को ही संदेह
की निगाह से देखने लगती
है। मीडिया विशेषज्ञों का मानना है
कि यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक
संवाद के लिए अत्यंत
चिंताजनक है। आंदोलन की
वैधता तभी मजबूत होती
है जब वह स्वतंत्र
रिपोर्टिंग को स्वीकार करे।
काशी में उबाल
इस खबर ने वाराणसी के
पत्रकारों में जबरदस्त आक्रोश
पैदा कर दिया है।
काशी के पत्रकार संगठनों
और वरिष्ठ पत्रकारों ने इसे प्रेस
की स्वतंत्रता पर गंभीर प्रहार
बताते हुए कहा कि
यदि आंदोलन की रिपोर्टिंग भी
अपराध मानी जाने लगे
तो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ
असुरक्षित हो जाएगा। वरिष्ठ
पत्रकारों ने तीखी प्रतिक्रिया
व्यक्त करते हुए कहा
कि पत्रकारिता कोई पक्ष नहीं,
सार्वजनिक दायित्व है। काशी के
पत्रकारों ने चेतावनी दी
कि यदि पत्रकारों के
साथ इस प्रकार की
घटनाएं बढ़ती रहीं तो देशव्यापी
पत्रकार सुरक्षा आंदोलन की आवश्यकता पड़ेगी।
कई संगठनों ने बैठक बुलाकर
प्रेस की स्वतंत्रता, कवरेज
के दौरान सुरक्षा और पत्रकार संरक्षण
कानून की मांग उठाने
का निर्णय लिया है। कई
पत्रकारों ने सोशल मीडिया
पर भी कड़ी प्रतिक्रिया
व्यक्त करते हुए कहा
कि यह केवल एक
पत्रकार का मामला नहीं,
बल्कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता का
प्रश्न है। एक वरिष्ठ
पत्रकार ने कहा, “पत्रकार
लोकतंत्र का गवाह होता
है; गवाह को डराया
जाएगा तो इतिहास अधूरा
लिखा जाएगा।”
सड़क पर उतरती पत्रकारिता
डिजिटल युग में पत्रकारिता
का सबसे कठिन हिस्सा
मैदान में उतरना बन
गया है। कैमरे के
सामने खड़े पत्रकार को
एक साथ कई मोर्चों
पर सजग रहना पड़ता
है :
प्रशासनिक
रोक-टोक
भीड़
का
आक्रोश
राजनीतिक
आरोप-प्रत्यारोप
सोशल
मीडिया
ट्रोलिंग
वीडियो
क्लिपिंग
के
आधार
पर
त्वरित
निर्णय
यानी
खबर
जुटाने
वाला
व्यक्ति
अब
स्वयं
खबर
बनने
लगा
है।
लोकतंत्र
का
असली
आईना
भारत का लोकतंत्र
आंदोलनों, विरोध प्रदर्शनों और सार्वजनिक असहमति
की लंबी परंपरा पर
खड़ा है। किसान आंदोलन
हो, छात्र आंदोलन हो, श्रमिक संघर्ष
हो या नागरिक प्रदर्शन
— इन सबकी कहानी जनता
तक पत्रकार ही पहुंचाता है।
यदि पत्रकार घटनास्थल से अनुपस्थित हो
जाए तो सत्ता का
संस्करण और भीड़ का
संस्करण ही शेष रह
जाएगा; तथ्य बीच रास्ते
में खो जाएंगे। इसलिए
पत्रकार की सुरक्षा केवल
पेशे का प्रश्न नहीं,
जनता के सूचना-अधिकार
का प्रश्न है।
पत्रकारों की प्रमुख मांगें
कवरेज
के
दौरान
सुरक्षा
की
गारंटी
पत्रकारों
पर
दर्ज
मामलों
की
स्वतंत्र
समीक्षा
पुलिस
और
प्रशासन
के
लिए
स्पष्ट
मीडिया
प्रोटोकॉल
आंदोलनों
के
दौरान
मीडिया
पहुंच
सुनिश्चित
करना
पत्रकार
सुरक्षा
कानून
पर
राष्ट्रीय
बहस
रांची की एफआईआर और
दिल्ली के दुर्व्यवहार की
घटनाएं अलग-अलग शहरों
की खबरें नहीं हैं; वे
एक ही संकट की
दो तस्वीरें हैं। एक तरफ
सत्ता का संदेह है,
दूसरी तरफ भीड़ का
अविश्वास। इन दोनों के
बीच खड़ा पत्रकार लोकतंत्र
की आंख है। आंख
पर पट्टी बांध दी जाए
तो लोकतंत्र देखना बंद कर देता
है। आज आवश्यकता केवल
किसी एक पत्रकार के
समर्थन की नहीं, बल्कि
उस सिद्धांत की रक्षा की
है जिसके कारण जनता सच
जान पाती है। कलम
पर दबाव और कैमरे
पर हमला अंततः समाज
की स्मृति पर हमला है।
पत्रकारिता भयमुक्त रहेगी तभी लोकतंत्र निर्भीक
रहेगा।
लोकतंत्र में रिपोर्टिंग की भूमिका
मीडिया विशेषज्ञों का कहना है
कि छात्र आंदोलन, श्रमिक आंदोलन, किसान आंदोलन या किसी भी
सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन की रिपोर्टिंग लोकतांत्रिक
प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा
है। पत्रकार का दायित्व घटनास्थल
से तथ्य जुटाना और
विभिन्न पक्षों को सामने लाना
होता है। यदि रिपोर्टिंग
करने वाले पत्रकारों को
हिरासत, पूछताछ या एफआईआर का
सामना करना पड़े तो
इससे स्वतंत्र पत्रकारिता पर प्रतिकूल प्रभाव
पड़ सकता है।
काशी के पत्रकार बोले
“समाचार कवरेज
अपराध
नहीं
हो
सकती।”
“पत्रकारिता को
भयमुक्त
वातावरण
चाहिए।”
“लोकतंत्र में सवाल पूछना और रिपोर्टिंग करना मौलिक दायित्व है।”





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