Monday, 10 August 2026

हरियाली तीज : सावन की हरित स्मृति, स्त्री आस्था और भारतीय संस्कृति का जीवंत उत्सव

हरियाली तीज : सावन की हरित स्मृति, स्त्री आस्था और भारतीय संस्कृति का जीवंत उत्सव 

सावन की पहली घनी बदली जब तपती धरती पर झुकती है, तब केवल मौसम नहीं बदलता, भारतीय मन भी भीग उठता है। कच्ची पगडंडियों पर उग आई दूब, आम की डालियों पर पड़े झूले, हथेलियों पर खिली मेहंदी और मंदिरों में गूंजता शिवनामये सब मिलकर एक ऐसे सांस्कृतिक उत्सव का सृजन करते हैं जिसे भारतीय लोक हरियाली तीज के नाम से जानता है। यह पर्व स्त्री के श्रृंगार का उत्सव अवश्य है, किंतु उससे कहीं अधिक प्रकृति के पुनर्जागरण और संबंधों की हरित आस्था का महापर्व है। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में जहाँ मनुष्य प्रकृति से दूर और परिवार संवाद से रिक्त होता जा रहा है, वहीं हरियाली तीज हमें ठहरकर वर्षा की बूंदों की आवाज सुनना सिखाती है। यह पर्व बताता है कि भारतीय संस्कृति ने ऋतुओं को केवल देखा नहीं, जिया है; वृक्षों को केवल उपयोग की वस्तु नहीं माना, परिवार का सदस्य समझा है; और दाम्पत्य को केवल सामाजिक अनुबंध नहीं, आत्मिक साधना का रूप दिया है। हरियाली तीज वस्तुतः उस भारत की स्मृति है जहाँ हरियाली बाहर भी थी और भीतर भी 

सुरेश गांधी

श्रावण मास की भीगी हवाएँ जब धरती की तपन हर लेती हैं, आम्रवनों में झूले गूंजने लगते हैं, खेतों की मेड़ों पर हरियाली मुस्कराती है और आकाश में मेघों का मृदंग बज उठता है, तभी भारतीय लोकजीवन में एक उत्सव उतरता हैहरियाली तीज। यह केवल पंचांग की एक तिथि नहीं, बल्कि भारतीय स्त्री संवेदना, प्रकृति-प्रेम, दाम्पत्य मंगल, लोकसंगीत और सांस्कृतिक स्मृति का ऐसा उत्सव है जिसमें ऋतु, धर्म और लोकजीवन एक साथ स्पंदित होते हैं। हरियाली तीज का नाम लेते ही आँखों के सामने हरी चुनरियों में सजी महिलाएँ, पीपल और नीम की डालियों पर पड़े झूले, मेहंदी रचे हाथ, कजरी की स्वर लहरियाँ और शिव-पार्वती की आराधना का अलौकिक दृश्य उभर आता है। उत्तर भारत विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और हरियाणा में यह पर्व अत्यंत श्रद्धा और उल्लास से मनाया जाता है। काशी की गलियों से लेकर अवध के गाँवों तक, ब्रज की कुंजों से लेकर बुंदेलखंड की चौपालों तक हरियाली तीज सावन की आत्मा बनकर उपस्थित होती है। 

तप, प्रेम और पुनर्मिलन की कथा

हरियाली तीज का मूल शिव और पार्वती की दिव्य कथा से जुड़ा है। मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। अनेक जन्मों के उपरांत श्रावण शुक्ल तृतीया के दिन शिव ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें स्वीकार किया। इसीलिए यह तिथि स्त्री के अखंड सौभाग्य, अटूट प्रेम और आत्मिक समर्पण की प्रतीक मानी जाती है। इस कथा का गूढ़ संदेश यह है कि प्रेम केवल आकर्षण नहीं, साधना है; संबंध केवल सामाजिक व्यवस्था नहीं, आत्मिक अनुबंध है। भारतीय नारी ने इस कथा में अपने जीवन का सांस्कृतिक प्रतिरूप देखाधैर्य, निष्ठा, त्याग और विश्वास का प्रतिरूप। यही कारण है कि विवाहित महिलाएँ पति की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं तथा अविवाहित कन्याएँ मनोवांछित वर की कामना करती हैं।

प्रकृति और संस्कृति का अद्भुत संगम

हरियाली तीज का सबसे बड़ा वैशिष्ट्य इसका प्रकृति से जीवंत संबंध है। यह पर्व उस समय आता है जब वर्षा ऋतु धरती को नवजीवन देती है। खेतों में धान की रोपाई पूरी हो चुकी होती है, वृक्ष नए पत्तों से लद जाते हैं और वातावरण में मिट्टी की सोंधी गंध व्याप्त रहती है। भारतीय संस्कृति में हरियाली केवल रंग नहीं, जीवन का प्रतीक है। हरा रंग उर्वरता, आशा, समृद्धि और नवसृजन का द्योतक माना गया है। इसलिए इस दिन हरे वस्त्र धारण करने की परंपरा है। स्त्रियाँ हरी चूड़ियाँ पहनती हैं, हरी चुनरी ओढ़ती हैं और मेहंदी से हथेलियों पर हरियाली के अलंकार रचती हैं। यह सज्जा केवल श्रृंगार नहीं, प्रकृति के साथ आत्मीय तादात्म्य की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है। आज जब पर्यावरण संकट विश्वव्यापी चिंता बन चुका है, हरियाली तीज हमें स्मरण कराती है कि भारतीय पर्व मूलतः प्रकृति संरक्षण की लोकपद्धति रहे हैं। वृक्षों पर झूले डालना, पौधों की पूजा करना, वर्षा के स्वागत में गीत गानाये सब पर्यावरण के प्रति संवेदनशील जीवन-दृष्टि के प्रतीक हैं।

स्त्री उत्सव का लोकपक्ष

हरियाली तीज भारतीय स्त्री जीवन का अत्यंत आत्मीय उत्सव है। अनेक स्थानों पर विवाहित बेटियों को मायके बुलाने की परंपरा है। यह परंपरा केवल सामाजिक रस्म नहीं, भावनात्मक पुनर्संपर्क का माध्यम है। मायके पहुँचकर बेटी बचपन की स्मृतियों, सहेलियों और पारिवारिक स्नेह से पुनः जुड़ती है। सावन के झूले इस उत्सव का प्राण हैं। झूला केवल खेल नहीं, मन की उड़ान है। लोकगीतों में स्त्री का विरह, मिलन, प्रेम, हास्य और जीवनानुभव अद्भुत सहजता से व्यक्त होता है। कजरी की पंक्तियाँ सावन की भीगी संवेदनाओं को स्वर देती हैं। बनारस, मिर्जापुर और भदोही अंचल की कजरियाँ तो भारतीय लोकसंगीत की अमूल्य धरोहर मानी जाती हैं। हरियाली तीज स्त्रियों को सामूहिकता का अवसर भी प्रदान करती है। वे एकत्र होकर पूजा करती हैं, गीत गाती हैं, पारंपरिक व्यंजन बनाती हैं और अपने सुख-दुख साझा करती हैं। आधुनिक समाज में जहाँ पारिवारिक संवाद सीमित होता जा रहा है, यह पर्व स्त्री समुदाय के भावनात्मक स्वास्थ्य का भी आधार बनता है।

काशी में हरियाली तीज : भक्ति और लोक की संगमधारा

काशी में हरियाली तीज का विशेष महत्व है। श्रावण मास स्वयं शिवनगरी का प्रिय काल माना जाता है। काशी विश्वनाथ मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना होती है और अनेक शिवालयों में पार्वती-परमेश्वर का श्रृंगार किया जाता है। घाटों पर वर्षा की फुहारों के बीच शिवभक्ति और लोकगीतों का अद्भुत वातावरण बनता है। पुरानी काशी में आज भी महिलाएँ समूह बनाकर तीज गीत गाती हैं। घरों में घेवर, मालपुआ, पूड़ी-कचौड़ी और विविध पकवान बनाए जाते हैं। कई परिवारों में बहुओं कोसिंदाराभेजने की परंपरा है जिसमें वस्त्र, श्रृंगार सामग्री, मिठाइयाँ और उपहार सम्मिलित होते हैं। यह परंपरा रिश्तों में स्नेह और सम्मान की निरंतरता का प्रतीक है।

आस्था का अनुशासन

हरियाली तीज का व्रत प्रातः स्नान से आरंभ होता है। महिलाएँ स्वच्छ वस्त्र धारण कर शिव-पार्वती की प्रतिमा या चित्र स्थापित करती हैं। बिल्वपत्र, पुष्प, धूप, दीप, फल और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। अनेक स्थानों पर तीज कथा सुनने और सुनाने की परंपरा है। व्रत का आध्यात्मिक पक्ष अत्यंत महत्वपूर्ण है। उपवास केवल भोजन त्याग नहीं, इंद्रियनिग्रह और मन की एकाग्रता का अभ्यास है। दिन भर भक्ति, जप और पूजा में समय व्यतीत कर साधक अपने भीतर संयम और श्रद्धा का संस्कार विकसित करता है। भारतीय व्रत परंपरा का यही मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक पक्ष इसे केवल धार्मिक कर्मकांड से ऊपर उठाता है।

लोकगीतों में सावन की आत्मा

यदि हरियाली तीज से लोकगीतों को अलग कर दिया जाए तो उत्सव अधूरा रह जाएगा। कजरी, झूला, सावन और तीज गीतों में भारतीय स्त्री हृदय की सबसे कोमल अनुभूतियाँ सुरक्षित हैं। कहीं पिया के आने की प्रतीक्षा है, कहीं सखी-संवाद, कहीं बादलों से संदेश, कहीं मायके की स्मृति। लोकगीतों की विशेषता यह है कि वे जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों को सांस्कृतिक स्मृति में बदल देते हैं। लिखित इतिहास राजाओं का वृत्तांत देता है, किंतु लोकगीत समाज की आत्मा को सुरक्षित रखते हैं। हरियाली तीज इस लोकधरोहर के संरक्षण का जीवंत माध्यम है।

अर्थव्यवस्था और लोकशिल्प से जुड़ा पर्व

हरियाली तीज का एक आर्थिक पक्ष भी है। मेहंदी, चूड़ियाँ, वस्त्र, आभूषण, मिठाइयाँ, पूजन सामग्री और हस्तशिल्प की मांग इस अवधि में बढ़ जाती है। ग्रामीण और कस्बाई बाजारों में विशेष रौनक दिखाई देती है। अनेक कारीगरों और छोटे व्यापारियों की आय का यह महत्वपूर्ण अवसर बनता है। विशेषकर बनारसी साड़ी, हरी चुनरी, कांच की चूड़ियाँ और लोकश्रृंगार सामग्री से जुड़े कुटीर उद्योगों को इस पर्व से प्रत्यक्ष लाभ मिलता है। इस दृष्टि से हरियाली तीज सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था का भी एक महत्वपूर्ण अंग है।

आधुनिकता की चुनौती और उत्सव का रूपांतरण

समय के साथ हरियाली तीज के स्वरूप में परिवर्तन आया है। महानगरों में अपार्टमेंट संस्कृति, सीमित पारिवारिक ढाँचे और व्यस्त जीवनशैली ने सामूहिक उत्सवों की परंपरा को प्रभावित किया है। कई स्थानों पर तीज उत्सव होटल, क्लब या सामुदायिक सभागारों तक सीमित होता जा रहा है। सोशल मीडिया ने उत्सव को दृश्यात्मक आकर्षण तो दिया है, किंतु कभी-कभी उसका आध्यात्मिक और लोकपक्ष पीछे छूट जाता है। फोटो और प्रदर्शन की प्रवृत्ति के बीच व्रत, कथा, गीत और पारिवारिक संवाद की मूल भावना को बचाए रखना आवश्यक है। फिर भी यह कहना गलत होगा कि परंपरा समाप्त हो रही है। वस्तुतः वह नए रूपों में स्वयं को ढाल रही है। अनेक युवा महिलाएँ आज तीज को सांस्कृतिक पहचान और स्त्री समुदाय के उत्सव के रूप में पुनः अपनाती दिखाई देती हैं।

पर्यावरणीय संदेश  

आज जब नदियाँ प्रदूषित हैं, वृक्ष कट रहे हैं और जलवायु परिवर्तन मानव सभ्यता के सामने गंभीर चुनौती बन चुका है, हरियाली तीज का संदेश अत्यंत प्रासंगिक हो उठता है। यदि इस पर्व को वृक्षारोपण, जल संरक्षण और जैव विविधता संरक्षण से जोड़ा जाए तो यह सांस्कृतिक उत्सव पर्यावरण आंदोलन का भी आधार बन सकता है। विद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं और नगर निकायों को चाहिए कि वे हरियाली तीज पर पौधारोपण अभियान, लोकगीत प्रतियोगिता, पारंपरिक हस्तशिल्प मेले और पर्यावरण जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करें। इससे नई पीढ़ी उत्सव के सांस्कृतिक और पारिस्थितिक दोनों आयामों से परिचित होगी।

भारतीय नारी और सांस्कृतिक आत्मबल

हरियाली तीज को केवल पति की दीर्घायु के व्रत तक सीमित करके देखना उसके व्यापक सांस्कृतिक अर्थ को संकुचित करना होगा। यह पर्व स्त्री की भावनात्मक शक्ति, सांस्कृतिक नेतृत्व और परिवार को जोड़ने वाली उसकी केंद्रीय भूमिका का भी उत्सव है। भारतीय परिवारों में अनेक परंपराएँ स्त्रियों के माध्यम से ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचरित हुई हैंभोजन, भाषा, गीत, पूजा, रिश्तों की मर्यादा और उत्सव संस्कृति। हरियाली तीज इस सांस्कृतिक उत्तराधिकार की सजीव अभिव्यक्ति है।

सावन की हरित चेतना को बचाए रखने का पर्व

हरियाली तीज भारतीय जीवनदर्शन का बहुआयामी उत्सव है। इसमें धर्म है पर कट्टरता नहीं; श्रृंगार है पर भोगवाद नहीं; लोक है पर असभ्यता नहीं; प्रकृति है पर उपभोग नहीं। यह पर्व हमें सिखाता है कि मनुष्य और प्रकृति का संबंध आत्मीय होना चाहिए, दाम्पत्य का आधार विश्वास होना चाहिए और समाज की शक्ति उसकी सांस्कृतिक स्मृति में निहित होती है। जब सावन की वर्षा धरती को हराभरा करती है, तब हरियाली तीज हमारे भीतर भी एक हरित चेतना जगाती हैप्रेम की, विश्वास की, पर्यावरण की और संस्कृति की। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम इस उत्सव को बाहरी आडंबर से बचाकर उसकी मूल आत्मा से जोड़ें। यदि आने वाली पीढ़ियाँ झूले की उस धीमी गति में लोकजीवन की धड़कन सुन सकें, मेहंदी की उस हरियाली में प्रकृति का स्पर्श महसूस कर सकें और शिव-पार्वती की कथा में संबंधों की गरिमा पहचान सकें, तभी हरियाली तीज सच अर्थों में जीवित रहेगी। सावन की भीगी संध्या में गूंजती एक पुरानी कजरी मानो आज भी यही कहती हैधरती की हरियाली बची रहे, मन की हरियाली बनी रहे और gभारतीय संस्कृति की यह अमर ऋतु पीढ़ियों तक यूँ ही झूमती रहे। 

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