Friday, 9 October 2026

नाना पाटेकर : किरदार पर्दे पर थे, असल कहानी इंसानियत की थी!

नाना पाटेकर : किरदार पर्दे पर थे, असल कहानी इंसानियत की थी! 

नाना पाटेकर ने भारतीय सिनेमा को अनेक यादगार भूमिकाएं दीं। उनके अभिनय की ऊर्जा, संवादों की तीव्रता और किरदारों की विश्वसनीयता उन्हें विशिष्ट बनाती है। लेकिन उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष फिल्मों से बाहर भी था—किसानों की मदद, ग्रामीण जीवन की समस्याओं से जुड़ाव और जरूरतमंदों के लिए काम करने की कोशिश।   उनकी कहानी को केवल पुरस्कारों, फिल्मों और चर्चित संवादों के सहारे नहीं समझा जा सकता। उसे समझने के लिए काशी की उस कार में हुई बातचीत और बीड में किसानों के बीच किए गए काम को भी याद करना होगा। मेरे लिए नाना की स्मृति में ये दोनों मुलाकातें एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। काशी में एक सहज, सरल और बेबाक अभिनेता मिला था। बीड में उसी व्यक्तित्व का वह रूप सामने आया, जो किसानों के दर्द को लेकर चिंतित था और मदद के रास्ते तलाश रहा था। किसी व्यक्ति की महानता का आकलन केवल इस बात से नहीं होता कि उसने कितने वर्ष जीवन जिया। इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उसने अपने समय, अपनी क्षमता और अपनी प्रसिद्धि का इस्तेमाल किस तरह किया। नाना की विरासत में अभिनय की उपलब्धियां भी हैं और समाज के प्रति संवेदनशील रहने का संदेश भी। आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी स्मृतियां एक सवाल छोड़ जाती हैं—क्या हम अपने आसपास के लोगों की तकलीफों को महसूस करते हैं? क्या हमारी सफलता किसी दूसरे के जीवन में थोड़ी राहत ला सकती है? और क्या प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचने के बाद भी हम अपनी जड़ों से जुड़े रह सकते हैं? नाना ने अपने तरीके से इन सवालों के जवाब दिए। आखिर उड़ गया पंछी… लेकिन अपने पीछे संवेदना, सादगी और इंसानियत की ऐसी यादें छोड़ गया, जो वक्त के साथ और गहरी होती जाएंगी

सुरेश गांधी

कुछ मुलाकातें औपचारिक होती हैं, कुछ यादगार। और कुछ ऐसी, जो बरसों बाद भी स्मृतियों के किसी कोने में उसी ताजगी से मौजूद रहती हैं, जैसे कल की ही बात हो। नाना पाटेकर से काशी में हुई मुलाकात मेरे लिए ऐसी ही थी। सामने भारतीय सिनेमा का एक बड़ा नाम था, लेकिन बातचीत में कहीं ऐसा नहीं लगा कि किसी विराट फिल्मी व्यक्तित्व के सामने बैठा हूं। न कोई बनावट, न औपचारिकता का बोझ और न अपने बड़े होने का अहसास कराने की कोशिश। सहजता ऐसी कि कुछ ही पलों में बातचीत का फासला मिट गया। आज जब नाना की स्मृतियां मन में उमड़ रही हैं, तो पर्दे पर उनके निभाए किरदारों के साथ काशी की वह मुलाकात भी आंखों के सामने तैरने लगती है। एक ऐसा अभिनेता, जो कैमरे के सामने अपने संवादों से व्यवस्था को चुनौती देता था और वास्तविक जीवन में किसानों के दर्द से जुड़कर उनकी मदद की कोशिश करता था। जिसकी आवाज में तल्खी थी, लेकिन मन में संवेदना; जिसका व्यक्तित्व बेबाक था, लेकिन व्यवहार में सादगी। नाना का जाना केवल एक अभिनेता की विदाई नहीं है। यह उस इंसान की अनुपस्थिति है, जिसने अपनी प्रसिद्धि के बावजूद आम आदमी की दुनिया से अपना रिश्ता बनाए रखा।

जब काशी में तलाश थी एक अलग मुलाकात की

नाना पाटेकर का काशी से रिश्ता पुराना रहा। वर्ष 1999, 2007, 2023 और 2024 में भी उनके बनारस आने की स्मृतियां जुड़ी हैं। बाद के दिनों में फिल्म ‘बनवास’ की शूटिंग के सिलसिले में भी उनका काशी आना हुआ। छावनी क्षेत्र में शूटिंग के दौरान उन्होंने पत्रकारों से बातचीत की और सवालों के जवाब भी दिए। लेकिन मेरे मन में उनसे कुछ अलग ढंग से मिलने और बातचीत करने की इच्छा थी। मौका तलाश रहा था। इसी बीच संकेत मिला कि वह श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन के लिए जाने वाले हैं। खास बात यह थी कि वे बिना किसी प्रोटोकॉल और पूर्व सूचना के, एक आम श्रद्धालु की तरह मंदिर जाना चाहते थे। इस जानकारी को गोपनीय रखने की बात कही गई थी, इसलिए इसे सार्वजनिक चर्चा का विषय बनाने के बजाय मैं मौके की प्रतीक्षा करने लगा। संकेत के मुताबिक मंदिर पहुंच गया। इंतजार लंबा था। तीन-चार घंटे बीत गए। फिर दर्शन कर लौटते समय अचानक नजर उन पर पड़ी। इशारा मिला कि पीछे आ जाऊं। मंदिर परिसर से बाहर निकलने के बाद कार में उनसे बातचीत का अवसर मिला। वह क्षण मेरे लिए इसलिए खास था कि इतने बड़े अभिनेता के साथ बातचीत में न किसी औपचारिक मुलाकात का दबाव था और न सवाल-जवाब का कोई मंच। सामने एक ऐसा व्यक्ति था, जो सहजता से बात कर रहा था। कुछ ही देर में यह अहसास पीछे छूट गया कि सामने भारतीय सिनेमा का एक बड़ा सितारा बैठा है। बातचीत एक इंसान से दूसरे इंसान के बीच हो रही थी।

फिल्म का थप्पड़ और नाना का मुस्कुराता जवाब

बातचीत के दौरान शूटिंग से जुड़ा एक प्रसंग सामने आया। मैंने उनसे एक युवक को थप्पड़ मारने की घटना के बारे में पूछा। सवाल सुनकर नाना मुस्कुराए। उनका जवाब था कि वह गुस्से में मारा गया थप्पड़ नहीं, फिल्म का हिस्सा था। उन्होंने बताया कि दृश्य के लिए जिस व्यक्ति को तय किया गया था, उसकी जगह अचानक दूसरा युवक आ गया और थप्पड़ उसे पड़ गया। उस छोटे-से प्रसंग में भी उनके जवाब देने का अंदाज ध्यान खींचने वाला था। न नाराजगी, न सवाल से बचने की कोशिश और न कोई भारी-भरकम सफाई। मुस्कुराते हुए बात स्पष्ट कर दी। यही उनकी खासियत थी। सवाल कैसा भी हो, जवाब देने का अपना अंदाज था। बात को अनावश्यक रूप से उलझाने के बजाय सीधे मुद्दे पर आना और अपनी बात सहजता से रखना। नाना के अभिनय में जिस तीखेपन को दर्शक देखते थे, बातचीत में वही व्यक्ति सहज और सरल नजर आता था। पर्दे का आक्रोश और वास्तविक जीवन का व्यवहार दो अलग-अलग स्थितियां थीं। उन्हें एक ही तराजू पर तौलना उनके व्यक्तित्व को अधूरा समझना होता।

बातचीत में किसान भी थे, सिनेमा भी और बदलता समाज भी

कार में हुई बातचीत केवल फिल्मों तक सीमित नहीं रही। किसानों की स्थिति, अपने रहन-सहन और फिल्म जगत में आए बदलावों पर भी चर्चा हुई। उनकी बातों से महसूस होता था कि उनकी दिलचस्पी केवल अपने अभिनय या फिल्मी उपलब्धियों तक सीमित नहीं थी। किसान का जीवन, उसकी मुश्किलें और ग्रामीण भारत की परिस्थितियां उनके लिए महज दूर की बातें नहीं थीं। फिल्मों की दुनिया में दशकों बिताने के बावजूद वे उस वास्तविक दुनिया से जुड़े सवालों पर बात करने को तैयार रहते थे, जहां जीवन का संघर्ष किसी पटकथा के मुताबिक नहीं चलता। फिल्म जगत में आए बदलावों पर चर्चा करते समय भी उनका अनुभव बोलता था। उन्होंने सिनेमा के बदलते तौर-तरीकों को करीब से देखा था। उनके अभिनय की ताकत इस बात में भी थी कि वे अपने किरदार को केवल संवादों से नहीं, बल्कि उसके भीतर के संघर्ष और संवेदना से जीवंत करते थे। काशी में हुई उस बातचीत ने मेरे मन में उनकी एक ऐसी छवि छोड़ी, जिसमें लोकप्रिय अभिनेता और सहज इंसान के बीच कोई कृत्रिम दूरी नहीं थी। काशी की गलियों में शूटिंग के बीच हुई वह मुलाकात आज एक अनमोल स्मृति बन गई है। तब शायद अंदाजा नहीं था कि सामने बैठे इस कलाकार की आवाज, उसकी बेबाकी और उसकी आंखों की चमक एक दिन तस्वीरों से निकलकर यादों में इतनी गहराई से उतर जाएगी। नाना पाटेकर को श्रद्धांजलि देना दरअसल उस कलाकार को नमन करना है, जिसने अभिनय को सिर्फ पर्दे पर नहीं जिया, बल्कि उसे आम आदमी की बेचैनी, व्यवस्था के सवाल और जिंदगी की तल्ख सच्चाइयों से जोड़ दिया। नाना ने किसानों के लिए बेहद संवेदनशीलता के साथ शानदार काम किया. उन्होंने पानी और जल संरक्षण से जुड़े मुद्दों पर काम किया. सामाजिक चेतना, सामाजिक जिम्मेदारी और समाज के प्रति संवेदनशीलता नाना के व्यक्तित्व की खास पहचान थीं.

बीड में फिर दिखा इंसानियत का वही चेहरा

नाना से जुड़ी मेरी स्मृतियां केवल बनारस तक सीमित नहीं हैं। वर्ष 2016 में महाराष्ट्र के बीड जिले में भी उनसे मुलाकात का अवसर मिला था। वहां अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ उनकी पहल ‘नाम फाउंडेशन’ किसानों और ग्रामीण परिवारों की मदद के लिए काम कर रही थी। मराठवाड़ा का यह इलाका सूखे और जलसंकट की मार झेलता रहा है। किसान परिवारों की परेशानियां और पानी की कमी ने यहां जीवन को कठिन बनाया। ऐसे में नाना और मकरंद अनासपुरे ने जरूरतमंद परिवारों की मदद तथा ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण के प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए फाउंडेशन की स्थापना की। बीड में नाना से खुलकर बातचीत हुई। काशी की मुलाकात में जो सहजता महसूस हुई थी, यहां भी उनका व्यवहार उसी छवि की याद दिलाता था। किसानों के सवालों पर बात करते हुए उनका सामाजिक सरोकार सामने आता था। यह केवल किसी अभिनेता की सामाजिक छवि बनाने का प्रयास नहीं था; उनके काम ने इस पहल को जमीन पर पहचान दिलाई। नाम फाउंडेशन के लिए जनसहयोग से बड़ी धनराशि जुटाई गई। विभिन्न रिपोर्टों में करीब 60 करोड़ रुपये जुटने का उल्लेख मिलता है। यह राशि नाना की निजी संपत्ति से बांटी गई रकम नहीं, बल्कि लोगों के सहयोग से जुटा धन था। उनकी भूमिका लोगों के भरोसे को किसानों और जरूरतमंद परिवारों की सहायता से जोड़ने में महत्वपूर्ण रही। बाद में भी जरूरतमंद मरीजों की मदद के सिलसिले में संपर्क बना रहा। मेरे माध्यम से कुछ गरीब मरीजों की सहायता भी हुई। ऐसे अनुभवों में किसी व्यक्ति की असली संवेदना सामने आती है। जब कोई जरूरतमंद मदद मांगता है, तब प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा का अर्थ तभी है, जब उससे किसी की मुश्किल कम हो सके।

सादगी, जो किसी भूमिका का हिस्सा नहीं थी

नाना के व्यक्तित्व का सबसे उल्लेखनीय पहलू उनकी सहजता थी। वे बड़े अभिनेता थे, लेकिन हर समय बड़े अभिनेता की तरह दिखने की जरूरत महसूस नहीं करते थे। काशी में बिना प्रोटोकॉल दर्शन करने पहुंचने का प्रसंग भी इसी सादगी की याद दिलाता है। फिल्मी दुनिया में शोहरत के साथ कई बार व्यक्ति के आसपास औपचारिकताओं की दीवार खड़ी हो जाती है। आम आदमी तक पहुंचना कठिन हो जाता है। नाना की उस मुलाकात में ऐसा कुछ महसूस नहीं हुआ। उन्होंने बातचीत को सहज रखा और सवालों का जवाब देने में कोई बनावटी दूरी नहीं बनाई। उनकी बेबाकी भी इसी व्यक्तित्व का हिस्सा थी। वे अपनी बात साफ ढंग से रखते थे। पर्दे पर उनका आक्रोश किरदार का हिस्सा होता था, लेकिन वास्तविक जीवन में उनकी संवेदना किसानों, जरूरतमंदों और समाज के सवालों से जुड़ने में दिखाई देती थी। “आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने…” ‘क्रांतिवीर’ में नाना पाटेकर के मुंह से निकली यह पंक्ति महज फिल्म का संवाद नहीं थी। उसमें व्यवस्था से लड़ते एक आदमी का आक्रोश था, भीतर जमा वर्षों की बेचैनी थी और उस कलाकार की आवाज थी, जो अभिनय करते समय किरदार और खुद के बीच की सारी दीवारें गिरा देता था। विडंबना देखिए—जिस अभिनेता ने पर्दे पर मौत के सामने खड़े होकर दुनिया को ललकारा, उसकी अपनी जिंदगी की आखिरी पटकथा इतनी खामोश लिखी गई कि गुरुवार की सुबह खबर आई और पूरा देश स्तब्ध रह गया। 8 अक्टूबर की भोर में गोवा स्थित आवास पर 75 वर्षीय नाना पाटेकर ने अंतिम सांस ली। तड़के तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया। चिकित्सकों ने करीब 45 मिनट तक सीपीआर देकर उन्हें बचाने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली। नाना चले गए, लेकिन उनके साथ केवल एक अभिनेता नहीं गया। हिंदी और मराठी सिनेमा की वह आवाज चली गई, जिसे सुनकर पर्दे पर किरदार नहीं, पूरा समय बोलता था।

तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और पद्मश्री उनके खाते में आए

1978 की ‘गमन’ से फिल्मों की यात्रा शुरू हुई। आगे ‘अंकुश’, ‘प्रतिघात’, ‘सलाम बॉम्बे!’, ‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘अग्निसाक्षी’, ‘तिरंगा’, ‘खामोशी’, ‘अब तक छप्पन’, ‘अपहरण’, ‘राजनीति’, ‘वेलकम’ और ‘नटसम्राट’ तक उन्होंने ऐसा संसार रचा जिसमें खलनायक, पुलिस अधिकारी, देशभक्त, पिता, अपराधी, हास्य चरित्र और टूटता हुआ कलाकार—हर चेहरा अपना लगता था। तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और पद्मश्री उनके खाते में आए, लेकिन नाना की सबसे बड़ी उपलब्धि पुरस्कारों की संख्या नहीं थी। उनकी उपलब्धि यह थी कि कोई भी उनका संवाद किसी दूसरे अभिनेता की आवाज में सोच ही नहीं सकता था।

‘क्रांतिवीर’ का वह दृश्य… जो लिखा नहीं गया था

नाना पाटेकर की अभिनय-यात्रा में ‘क्रांतिवीर’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, एक पड़ाव है। फिल्म के चरम दृश्य में उनका लंबा भाषण आज भी याद किया जाता है। खास बात यह कि वह दृश्य पूरी तरह लिखे हुए संवाद की तरह नहीं था। नाना ने उसे अपने भीतर से निकाला और पर्दे पर वह दृश्य इतिहास बन गया। बाद में उन्होंने खुद कहा था कि उन्हें उस समय बोले गए सारे शब्द याद भी नहीं थे। यही नाना थे। संवाद उनके पास आते नहीं थे, जैसे भीतर से फूट पड़ते थे। इसीलिए उनका अभिनय कई बार अभिनय की सीमा पार कर जाता था। नाना के निधन की खबर के बाद ‘क्रांतिवीर’ का वही दृश्य फिर याद आ रहा है— “आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने…” एक अभिनेता के संवाद की इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि उसकी मृत्यु के दिन वही संवाद फिर देश की स्मृति में लौट आए। नाना की कला में मृत्यु भी सिर्फ मृत्यु नहीं थी। वह जीवन से सवाल करती थी। ‘नटसम्राट’ में टूटता कलाकार हो या ‘क्रांतिवीर’ का विद्रोही, ‘परिंदा’ का अंधेरा हो या ‘खामोशी’ की संवेदना—नाना ने हर बार जीवन के उस हिस्से को छुआ, जिसे आम आदमी महसूस तो करता है, लेकिन शब्द नहीं दे पाता।

काशी में नाना—एक अभिनेता नहीं, बनारस को महसूस करता आदमी

नाना पाटेकर का वाराणसी से रिश्ता नया नहीं था। करीब ढाई दशक पहले, वर्ष 2000 में फिल्म ‘आंच’ की शूटिंग के सिलसिले में वह वाराणसी आए थे। चौबेपुर के छितौनी गांव में शूटिंग हुई थी। फिर वर्षों बाद वह काशी लौटे। 2023 में अनिल शर्मा की फिल्म ‘जर्नी’ की शूटिंग ने नाना को फिर बनारस की गलियों, घाटों और सुबह-ए-बनारस के बीच ला खड़ा किया। अस्सी घाट पर डमरू-मजीरे की धुन, भजन मंडली, गंगा किनारा और कैमरे के सामने नाना—काशी ने उन्हें फिर अपनी लय में समेट लिया। फिल्म की शूटिंग शहर के करीब 22 स्थानों पर हुई और लगभग 500 स्थानीय कलाकार भी इससे जुड़े। तब नाना ने कहा था कि वह 35 साल बाद बनारस को देखने के लिए उत्साहित हैं और शूटिंग खत्म होते ही सबसे पहले बनारस घूमना चाहते हैं। यही बात आज उनकी स्मृति में सबसे ज्यादा चुभती है। जिस बनारस को शूटिंग के बाद घूमने की बात उन्होंने कही थी, वह यात्रा अधूरी रह गई।

स्टारडम से खेत तक लौट आया नाना

नाना की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा शायद फिल्में नहीं, फिल्मों के बाद की जिंदगी है। जिस आदमी ने करोड़ों रुपये कमाने वाले उद्योग में दशकों बिताए, वह धीरे-धीरे गांव और खेत की तरफ लौट गया। महाराष्ट्र के ग्रामीण जीवन और किसानों की पीड़ा से उनका जुड़ाव महज दिखावा नहीं था। 2015 में उन्होंने मकरंद अनासपुरे के साथ नाम फाउंडेशन की शुरुआत की। सूखा, किसान परिवारों की परेशानी, जल संरक्षण और ग्रामीण विकास उनके सामाजिक जीवन का बड़ा हिस्सा बन गए। उनका मानना था कि किसानों को केवल आर्थिक मदद नहीं, यह भरोसा भी चाहिए कि वे अकेले नहीं हैं। यानी— मुंबई ने उन्हें अभिनेता बनाया, लेकिन गांव ने उन्हें फिर इंसान बना दिया।

नाना की सबसे बड़ी फिल्म—उनकी अपनी जिंदगी

नाना पाटेकर की जिंदगी को अगर किसी फिल्म की तरह देखें तो इसमें नायक का प्रवेश किसी आलीशान कार से नहीं होता। वह गांव से आता है। गरीबी देखता है। मुंबई जाता है। पोस्टर बनाता है। रंगमंच पर खड़ा होता है। छोटे किरदार करता है। एक दिन देश उसे ‘क्रांतिवीर’ के रूप में पहचानता है। फिर वही आदमी ‘नटसम्राट’ बनकर अपने ही भीतर टूटता दिखाई देता है। और जब देश उसे स्टार मान चुका होता है, वह खेतों में लौटकर किसान के दुख को अपना दुख बना लेता है। यही नाना की असली कहानी है। उनके अभिनय की ऊंचाई जितनी बड़ी थी, उनके जीवन की सादगी उतनी ही गहरी।

परदा गिरा… किरदार नहीं

नाना पाटेकर अब कैमरे के सामने नहीं आएंगे। कोई नई फिल्म के सेट पर उनके लिए ‘लाइट… कैमरा… एक्शन’ नहीं बोलेगा। काशी की किसी गली में अचानक उनकी झलक नहीं मिलेगी। मुंबई के किसी स्टूडियो में उनकी भारी आवाज नहीं गूंजेगी। मुरुड की मिट्टी में उनका बचपन अब सिर्फ स्मृति होगा। डोंजे के खेतों में उनकी मौजूदगी अब एक खालीपन की तरह महसूस होगी। लेकिन अभिनेता नाना पाटेकर के लिए शायद यही सबसे बड़ा सच है— कलाकार शरीर से जाता है, किरदारों से नहीं। ‘क्रांतिवीर’ का आक्रोश रहेगा। ‘परिंदा’ की बेचैनी रहेगी। ‘खामोशी’ की संवेदना रहेगी। ‘वेलकम’ की हंसी रहेगी। ‘अब तक छप्पन’ का तेवर रहेगा। ‘नटसम्राट’ की पीड़ा रहेगी। और काशी की स्मृतियों में वह आदमी भी रहेगा, जो कैमरे के सामने जितना बड़ा अभिनेता था, कैमरे के पीछे उतना ही सहज इंसान। नाना पाटेकर चले गए। लेकिन उनकी आवाज अभी बाकी है। किसी पुराने दृश्य में। किसी संवाद में। किसी रंगमंच की खामोशी में। किसी किसान के खेत में। किसी बनारसी गली की स्मृति में। और शायद किसी दिन फिर कोई पर्दा उठेगा… और सामने नाना होंगे। “आ गए… मेरी मौत का तमाशा देखने?”  इस बार जवाब पूरा देश देगा— नहीं नाना… आपकी मौत का तमाशा देखने नहीं, आपकी पूरी जिंदगी को सलाम करने आए हैं।

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