Wednesday, 14 October 2026

डांडिया की हर टकराहट में शक्ति का उद्घोष, अग्नि के घेरे में आस्था का अद्भुत रास

डांडिया की हर टकराहट में शक्ति का उद्घोष, अग्नि के घेरे में आस्था का अद्भुत रास  

नवरात्र का धार्मिक केंद्र देवी दुर्गा की उपासना है। गरबा और डांडिया इसी उपासना को लोकजीवन में अभिव्यक्त करते हैं। पारंपरिक मान्यताओं में गरबा को मंगल, समृद्धि और शुभता से भी जोड़ा जाता है। इसीलिए महिलाएं और युवतियां विशेष उत्साह से इसमें भाग लेती हैं। हालांकि इसका महत्व केवल महिलाओं या किसी एक आयु वर्ग तक सीमित नहीं है। नृत्य के गोल घेरे में स्त्री और पुरुष साथ-साथ कदम बढ़ाते हैं। यहां किसी एक व्यक्ति का प्रदर्शन पूरे आयोजन का उद्देश्य नहीं होता। हर सहभागी की गति और उपस्थिति मिलकर सामूहिक दृश्य रचती है। यही इसकी सामाजिक शक्ति है। देवी की आराधना के केंद्र में स्त्रीशक्ति की प्रतिष्ठा भी निहित है। दुर्गा को अन्याय का प्रतिरोध करने वाली, संकटों का सामना करने वाली और सृष्टि की रक्षा करने वाली शक्ति के रूप में स्मरण किया जाता है। यह भाव केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित न रहकर सामाजिक जीवन में भी अर्थवान हो सकता है। स्त्री के साहस, सम्मान और स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकार करना शक्ति-उपासना की व्यापक भावना से जुड़ा संदेश है। इसी तरह अलग-अलग समुदायों के लोगों का एक साथ उत्सव मनाना सामाजिक समरसता को बल देता है। गरबा का गोल घेरा किसी के लिए स्थायी ऊंच-नीच निर्धारित नहीं करता; उसमें शामिल होने वाले सभी लोग लय के सहभागी बनते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि केवल नृत्य से समाज की सारी असमानताएं समाप्त हो जाती हैं। लेकिन सामूहिक उत्सव लोगों को एक-दूसरे के निकट आने, साझा आनंद अनुभव करने और सांस्कृतिक विविधता को स्वीकार करने का अवसर अवश्य देते हैं। खास यह है कि इस मौके पर गर्भदीप से रणभूमि तक गरबा की आध्यात्मिक यात्रा, कहीं मां दुर्गा की तलवारों का प्रतीक बनती डांडिया की खनक तो कहीं सिर पर अग्नि का घट रखकर शक्ति की आराधना करतीं बालिकाएं

सुरेश गांधी

नवरात्र की रात जब ढोल की थाप वातावरण में गूंजती है, रंग-बिरंगे परिधानों में सजे स्त्री-पुरुष गोल घेरे में थिरकने लगते हैं और डांडिया की लकड़ियां एक-दूसरे से टकराकर झंकार पैदा करती हैं, तब लगता है मानो धरती पर भक्ति ने अपने पांव रख दिए हों। यह केवल नृत्य का दृश्य नहीं, भारतीय लोकचेतना का वह जीवंत उत्सव है, जिसमें आस्था लय बन जाती है, परंपरा रंगों में ढल जाती है और मां दुर्गा की शक्ति लोकजीवन की धड़कनों में उतर आती है। गरबा और डांडिया की यही विशिष्टता है कि इनके केंद्र में केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सृजन, जीवनचक्र और शक्ति की आराधना का भाव भी निहित है। गरबा के गोल घेरे में घूमते कदम सृष्टि की निरंतर गति का बोध कराते हैं, तो डांडिया की टकराहट देवी और महिषासुर के बीच हुए पौराणिक शक्ति-संघर्ष की स्मृति जगाती है। गुजरात की धरती पर जन्मी यह लोकपरंपरा आज देश के अनेक हिस्सों में नवरात्र की पहचान बन चुकी है। लेकिन इसके रंगों के पीछे छिपे आध्यात्मिक अर्थ और कुछ अनूठी परंपराएं इसे सामान्य नृत्योत्सव से कहीं अधिक विशिष्ट बनाती हैं।

गर्भदीप की लौ में समाया सृष्टि का रहस्य

गरबा के अर्थ को समझने के लिए उसके केंद्र में जलने वाले दीपक को देखना पर्याप्त है। मिट्टी के छिद्रयुक्त घट में प्रज्वलित दीप की लौ अंधकार को चीरकर बाहर आती है। यह दृश्य मानो मनुष्य को याद दिलाता है कि शरीर मिट्टी से बना हो सकता है, लेकिन उसके भीतर चेतना का प्रकाश भी विद्यमान है। गरबा शब्द का संबंध संस्कृत के ‘गर्भ’ और गर्भदीप की परंपरा से जोड़ा जाता है। गर्भ यहां केवल जन्म का संकेत नहीं, बल्कि सृजन के उस रहस्य का प्रतीक है, जिससे जीवन निरंतर आकार लेता है। मिट्टी का घट मानो गर्भ का प्रतिनिधित्व करता है और उसके भीतर जलता दीप जीवन-ज्योति का। इसी दीप को केंद्र में रखकर जब महिलाएं गोलाकार नृत्य करती हैं, तो उनकी परिक्रमा जीवन की अनवरत गति का प्रतीक बन जाती है। जन्म, विकास, परिवर्तन और अंत—सृष्टि का पूरा चक्र इसी वृत्ताकार गति में देखा जा सकता है। कोई एक बिंदु स्थायी नहीं रहता, फिर भी चक्र चलता रहता है। भारतीय दर्शन में जीवन को गति और परिवर्तन से जोड़कर देखने की जो दृष्टि मिलती है, गरबा की संरचना उसी का सहज लोकाभिव्यक्त रूप प्रतीत होती है। दीपक की लौ ऊपर उठती है। शायद यही इस परंपरा का सबसे सुंदर संदेश है कि मनुष्य की चेतना भी परिस्थितियों की सीमाओं से ऊपर उठे। बाहरी अंधकार कितना भी गहरा हो, भीतर की ज्योति बुझनी नहीं चाहिए। आराधना के इस रूप में न कोई जटिल विधान है और न ही दर्शन की कठिन भाषा। मिट्टी का एक पात्र, उसमें जलता दीप और उसके चारों ओर घूमते कदम—इतने में ही जीवन के गहरे अर्थ प्रकट होने लगते हैं।

तीन तालियों में श्रद्धा, गोल घेरे में ब्रह्मांड

गरबा की लय में तालियों का विशेष स्थान है। कई पारंपरिक प्रस्तुतियों में तीन तालियों के साथ नृत्य किया जाता है। लोकमान्यता में इन तालियों को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रति श्रद्धा से जोड़ा जाता है। सृजन, पालन और संहार की ये तीन अवधारणाएं भारतीय धार्मिक चेतना में अस्तित्व के तीन अनिवार्य पक्षों का बोध कराती हैं। जब तालियों की ध्वनि ढोल की थाप के साथ मिलती है, तो पूरा वातावरण एक सामूहिक लय में बंध जाता है। अलग-अलग आयु, स्वभाव और पृष्ठभूमि के लोग एक ही ताल पर कदम बढ़ाते हैं। यहां व्यक्ति अपनी अलग पहचान के साथ भी समूह का हिस्सा बनता है। कोई आगे निकलता है, कोई पीछे रह जाता है, लेकिन नृत्य की लय सबको फिर एक घेरे में ले आती है। यही गरबा की सामाजिक सुंदरता भी है। इसमें सामूहिकता किसी भाषण से नहीं, सहभागिता से पैदा होती है। लोग एक-दूसरे के कदमों का ध्यान रखते हैं, तालमेल बनाते हैं और अपनी गति को दूसरों की गति के अनुरूप ढालते हैं। इस अर्थ में गरबा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, साथ चलने और साथ रहने की सांस्कृतिक शिक्षा भी है। पारंपरिक गरबा में आराधना का भाव प्रमुख रहता है। देवी के प्रति समर्पण यहां शब्दों से अधिक देह की गति, तालियों की गूंज और दीप के चारों ओर घूमते कदमों से व्यक्त होता है। शायद इसी कारण यह परंपरा पीढ़ियों के बीच सहजता से हस्तांतरित होती रही है।

डांडिया की टकराहट में महिषासुर के अभिमान को चुनौती

गरबा की सौम्य परिक्रमा के बाद जब डांडिया की लय शुरू होती है, तो उत्सव का स्वरूप अधिक गतिशील हो उठता है। दोनों हाथों में रंगीन लकड़ियां लिए स्त्री-पुरुष आमने-सामने आते हैं। एक कदम आगे, दूसरा पीछे; कभी दाईं ओर घूमना, कभी बाईं ओर मुड़ना और फिर डांडिया का एक-दूसरे से टकराना—इस पूरी प्रक्रिया में नृत्य, अनुशासन और संवाद एक साथ दिखाई देते हैं। डांडिया को लोकपरंपरा में मां दुर्गा और महिषासुर के बीच हुए युद्ध से भी प्रतीकात्मक रूप से जोड़ा जाता है। चमकदार डांडिया की लकड़ियां देवी की तलवारों का आभास कराती हैं। उनकी हर टकराहट मानो उस संघर्ष की प्रतिध्वनि बन जाती है, जिसमें अहंकार और अत्याचार के विरुद्ध शक्ति खड़ी होती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, महिषासुर के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए देवी दुर्गा ने उससे युद्ध किया और अंततः उसका वध किया। यह प्रसंग नवरात्र की धार्मिक चेतना में अन्याय पर न्याय और अहंकार पर शक्ति की विजय का संदेश देता है। डांडिया इसी संदेश को लोकनृत्य की भाषा में सामने लाता है। हालांकि हर डांडिया प्रस्तुति को किसी युद्ध का शाब्दिक मंचन नहीं माना जा सकता, लेकिन इसकी प्रतीकात्मक व्याख्या में शक्ति और प्रतिरोध का भाव स्पष्ट दिखाई देता है। लकड़ियों की टकराहट के बीच संतुलन बनाए रखना भी जरूरी है। सामने वाले की गति समझे बिना कोई कदम पूरा नहीं होता। इस तरह डांडिया संघर्ष की छवि रचते हुए भी तालमेल और अनुशासन का महत्व सिखाता है। इसकी सबसे बड़ी खूबी यही है कि यहां शक्ति का उत्सव हिंसा का समर्थन नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होने के सांस्कृतिक संकल्प का प्रतीक बनता है।

अग्नि के घेरे में आस्था, सिर पर जलता घट और हाथों में मशालें

गुजरात की कुछ विशिष्ट लोकपरंपराओं में गरबा और रास का ऐसा रूप भी देखने को मिलता है, जो दर्शकों को विस्मय से भर देता है। पारंपरिक वेशभूषा में सजी बालिकाएं सिर पर अग्नि से घिरा गरबा घट रखती हैं और हाथों में जलती मशालें लेकर लयबद्ध कदमों के साथ प्रस्तुति देती हैं। उनके सिर पर रखे पात्र की अग्नि और माथे के बीच कपड़े की एक परत होने का वर्णन इस परंपरा को और रोमांचक बना देता है। ढोल की गूंज, अग्नि की लपटें, मशालों से निकलती रोशनी और नर्तकियों के नियंत्रित कदम—इन सबके मेल से दृश्य किसी अलौकिक अनुभूति जैसा प्रतीत होता है। दर्शकों को लगता है मानो भक्ति ने अग्नि का रूप धारण कर लिया हो और साहस स्वयं नृत्य करने लगा हो। इस प्रकार के आयोजन के बारे में प्रचलित विवरणों में नवरात्र के तीसरे, छठे और नौवें दिन प्रस्तुतियों का उल्लेख मिलता है। हालांकि आयोजन की तिथियां और विधि अलग-अलग स्थानों की स्थानीय परंपराओं के अनुसार बदल सकती हैं। इसलिए इसे पूरे गुजरात में एक समान रूप से प्रचलित अनुष्ठान मानने के बजाय विशिष्ट क्षेत्रों की लोकपरंपरा के रूप में देखना उचित होगा। इस प्रस्तुति का आकर्षण केवल आग के रोमांच में नहीं, बल्कि कलाकारों की साधना, एकाग्रता और अभ्यास में भी है। सिर पर अग्नियुक्त पात्र संभालना और हाथों में मशाल लेकर संतुलित कदम बढ़ाना सहज काम नहीं। इसके लिए प्रशिक्षण, सावधानी और अनुशासन की आवश्यकता होती है। भक्त इसे माता की कृपा और शक्ति से जोड़कर देखते हैं। कलाकारों के लिए यह अनुभूति साहस और आत्मविश्वास का आधार बन सकती है। दर्शकों के लिए यह आस्था का ऐसा दृश्य है, जिसमें लोककला अपनी सामान्य सीमाओं से आगे बढ़कर असाधारण रूप धारण करती दिखाई देती है। फिर भी इस परंपरा की प्रशंसा करते समय सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अग्नि के साथ किसी भी प्रस्तुति में प्रशिक्षित कलाकारों, सुरक्षित दूरी, अग्निशमन प्रबंध और उपयुक्त सावधानियों का होना आवश्यक है। आस्था की गरिमा तभी बनी रहती है, जब कलाकारों की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो।

चनिया-चोली, केडिया और लोकसंगीत में उतरता गुजरात

गरबा और डांडिया की दुनिया में रंगों का अपना अलग व्याकरण है। महिलाओं की चनिया-चोली, पुरुषों के कढ़ाईदार केडिया, सिर पर बंधी पगड़ी और पारंपरिक आभूषण इस उत्सव को दृश्यात्मक भव्यता प्रदान करते हैं। कपड़ों पर की गई कढ़ाई, शीशों का काम और रंगों का संयोजन गुजरात की लोककला की विशिष्ट पहचान सामने लाता है। जब गोल घेरे में घूमते घाघरे हवा में फैलते हैं, पायलें झंकारती हैं और आभूषणों की चमक रोशनी के साथ बदलती है, तो पूरा आयोजन किसी जीवंत चित्र की तरह दिखाई देता है। यहां वेशभूषा केवल सजने-संवरने का साधन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत को अपने शरीर और व्यवहार में धारण करने का तरीका भी है। इस दृश्य को संगीत अपनी पूर्णता देता है। ढोल की गहरी थाप, मंजीरे की झंकार, तालियों की आवाज और लोकगायकों की पुकार नृत्य को गति प्रदान करती है। ‘अंबा आवो तो रमीये’ जैसे पारंपरिक गीत देवी के आह्वान और सामूहिक उल्लास का भाव जगाते हैं। वहीं गुजराती लोकसंगीत की अन्य लोकप्रिय धुनें लोगों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ती हैं। गरबा की असली पहचान उसकी सामूहिक लय में है। गीत गाने वाला, ढोल बजाने वाला और गोल घेरे में नृत्य करने वाला—हर व्यक्ति उत्सव को आगे बढ़ाने में अपनी भूमिका निभाता है। यही सहभागिता इसे केवल मंच पर होने वाले प्रदर्शन से अलग बनाती है।

लोकआस्था से महानगरों तक, फिर विश्व मंच पर

गुजरात के सामाजिक और धार्मिक जीवन में रचा-बसा गरबा अब किसी एक प्रदेश की सांस्कृतिक सीमा में सिमटा नहीं है। देश के अनेक महानगरों में नवरात्र के दौरान बड़े-बड़े आयोजन होते हैं। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और वाराणसी जैसे शहरों में भी गरबा और डांडिया की रातें उत्सव का आकर्षण बनती हैं। भारतीय समुदायों के माध्यम से यह परंपरा विदेशों तक पहुंची है और कई देशों में नवरात्र के दौरान इसका आयोजन किया जाता है। इस विस्तार ने गरबा को नई पहचान दी है। अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले और विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले लोग एक ही घेरे में नृत्य करते हैं। पारंपरिक गुजराती गीतों से परिचित न होने वाले लोग भी ताल और कदमों के सहारे इस उत्सव में शामिल हो जाते हैं। यही लोकसंस्कृति की जीवंतता है। वह अपनी मूल पहचान को बनाए रखते हुए नए परिवेश से संवाद करती है। गरबा के मामले में भी यही हुआ है। गुजरात की क्षेत्रीय परंपरा राष्ट्रीय उत्सव का हिस्सा बनी और फिर प्रवासी भारतीयों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक पहचान प्राप्त करने लगी। इस यात्रा में एक महत्वपूर्ण संदेश छिपा है। संस्कृति केवल संग्रहालयों और पुस्तकों में सुरक्षित रखने की वस्तु नहीं, बल्कि जीने और साझा करने की प्रक्रिया है। जब कोई नई पीढ़ी पारंपरिक पोशाक पहनकर गरबा के कदम सीखती है, तो वह अनजाने में अपनी विरासत के साथ एक रिश्ता भी बना रही होती है।

जब लोकधुनों पर आधुनिक संगीत की रोशनी पड़ी

समय के साथ गरबा के आयोजन भी बदले हैं। पहले सीमित स्थानों पर दीपक, तालियों और लोकगीतों के सहारे होने वाले कार्यक्रम अब विशाल मैदानों, सजे हुए पंडालों और रंगीन प्रकाश व्यवस्था तक पहुंच गए हैं। कहीं लाइव लोकसंगीत की प्रस्तुति होती है, तो कहीं आधुनिक वाद्ययंत्रों और इलेक्ट्रॉनिक बीट्स का इस्तेमाल किया जाता है। कई आयोजनों में बड़े मंच, प्रसिद्ध कलाकार, प्रायोजक और प्रवेश टिकट भी उत्सव का हिस्सा बन चुके हैं। इससे गरबा को व्यापक दर्शक मिले हैं और स्थानीय कलाकारों के लिए नए अवसर भी पैदा हुए हैं। दूसरी ओर, बढ़ते व्यावसायीकरण ने यह प्रश्न भी खड़ा किया है कि कहीं भक्ति और लोकपरंपरा की मूल भावना चमक-दमक के पीछे तो नहीं छूट रही। इस बदलाव को केवल नकारात्मक या सकारात्मक खांचे में बांटना उचित नहीं होगा। लोकसंस्कृति समय के साथ बदलती है। नए संगीत और तकनीक का इस्तेमाल अपने आप में परंपरा के विरुद्ध नहीं है। असली प्रश्न यह है कि बदलाव के बीच मूल सांस्कृतिक अर्थ कितना सुरक्षित रहता है। यदि आयोजन में लोकगीतों, पारंपरिक तालों, स्थानीय कलाकारों और देवी की आराधना को उचित स्थान मिलता है, तो आधुनिक व्यवस्था भी विरासत को आगे ले जाने का माध्यम बन सकती है। लेकिन जब आयोजन केवल प्रदर्शन, प्रतिस्पर्धा और दिखावे तक सीमित हो जाए, तब उसके भीतर मौजूद आध्यात्मिक पक्ष कमजोर पड़ने का खतरा रहता है। गरबा की पहचान महंगी रोशनी से नहीं, उस सामूहिक लय से बनती है जिसमें हर सहभागी स्वयं को एक बड़े सांस्कृतिक अनुभव का हिस्सा महसूस करता है।

नृत्य में छिपा तन और मन का संतुलन

गरबा और डांडिया का आनंद केवल मन तक सीमित नहीं रहता। लगातार कदम बढ़ाना, घूमना, हाथों को लय में चलाना और संगीत के साथ तालमेल बनाना शारीरिक सक्रियता का भी अच्छा माध्यम है। पर्याप्त गति से किया गया नृत्य हृदय की धड़कन बढ़ाता है, शरीर को सक्रिय रखता है और मन को प्रसन्न करने में मदद कर सकता है। हालांकि इसका लाभ नृत्य की गति, अवधि और व्यक्ति की शारीरिक क्षमता पर निर्भर करता है। इसे हर व्यक्ति के लिए समान रूप से उपयुक्त या किसी बीमारी का उपचार नहीं माना जाना चाहिए। लंबे समय तक नृत्य करने वालों को बीच-बीच में विश्राम, पर्याप्त पानी और आरामदायक जूते या उपयुक्त पादरक्षा का ध्यान रखना चाहिए। बंद या भीड़भाड़ वाले स्थानों में वायु-संचार, फर्श की स्थिति और लोगों के बीच पर्याप्त जगह होना भी जरूरी है। बुजुर्गों, बच्चों और स्वास्थ्य संबंधी सीमाओं वाले लोगों को अपनी क्षमता के अनुरूप भागीदारी करनी चाहिए। इस दृष्टि से गरबा सामूहिक आनंद के साथ सक्रिय जीवनशैली को अपनाने का अवसर भी बन सकता है। नृत्य की लय शरीर को गति देती है, जबकि समूह में शामिल होने का अनुभव सामाजिक जुड़ाव को मजबूत करता है।

 परंपरा का असली उजास भीतर जलता है

गरबा की यात्रा मिट्टी के एक छोटे से दीप से शुरू होकर रंग-बिरंगे परिधानों, लोकगीतों, डांडिया की खनक और अग्नि के अद्भुत रास तक पहुंचती है। कहीं दीप के चारों ओर घूमते कदम सृष्टि की गति का बोध कराते हैं, तो कहीं लकड़ियों की टकराहट शक्ति और प्रतिरोध का प्रतीक बन जाती है। किसी आयोजन में पारंपरिक लोकधुनें गूंजती हैं, तो किसी में आधुनिक संगीत उत्सव को नई गति देता है। इन सभी रूपों के भीतर एक साझा सूत्र है—मां शक्ति के प्रति श्रद्धा और जीवन के उल्लास को सामूहिक रूप से अनुभव करने की इच्छा। नवरात्र की रातों में जब सैकड़ों कदम एक ही लय में उठते हैं, तो लगता है मानो हर व्यक्ति अपने भीतर के भय, संकोच और थकान को पीछे छोड़कर आनंद की ओर बढ़ रहा हो। डांडिया की खनक में संघर्ष की स्मृति है, गरबा की परिक्रमा में जीवन का दर्शन और अग्नि के रास में साहस तथा साधना का विस्मयकारी रूप। परंपराएं तभी जीवित रहती हैं, जब उनके बाहरी स्वरूप के साथ उनका भीतरी अर्थ भी अगली पीढ़ी तक पहुंचता है। गरबा के लिए दीप जलाना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही जरूरी उस दीप के संदेश को समझना भी है। डांडिया उठाना जितना आकर्षक है, उतना ही जरूरी उसके प्रतीक में निहित अनुशासन और शक्ति के अर्थ को पहचानना भी है। गरबा अंततः उसी ज्योति का उत्सव है, जो मिट्टी के घट में भी जलती है, मनुष्य की चेतना में भी और समाज को जोड़ने वाली साझा आस्था में भी। डांडिया की हर टकराहट मानो यही कहती है कि शक्ति का वास्तविक अर्थ केवल विजय नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस है। और अग्नि के बीच थिरकते कदम याद दिलाते हैं कि आस्था जब साधना, अनुशासन और आत्मविश्वास से जुड़ती है, तो लोकपरंपरा भी असाधारण बन जाती है।

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