खेल सिर्फ मैदान नहीं, समाज का आइना है : पद्मपति
खेल को अक्सर जीत - हार, स्कोरबोर्ड और ट्रॉफी तक सीमित कर दिया जाता है, लेकिन वरिष्ठ खेल पत्रकार पद्मपति शर्मा इसे समाज की धड़कन मानते हैं। उनके शब्दों में, “खेल मैदान पर जो दिखाई देता है, वही समाज के भीतर चल रही प्रक्रिया का प्रतिबिंब होता है।” जिस तरह खिलाड़ी अनुशासन, संघर्ष और संयम के साथ मैदान में उतरता है, उसी तरह समाज भी चुनौतियों के बीच अपनी दिशा तय करता है। खेल सिर्फ शारीरिक प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण की प्रयोगशाला है, जहाँ धैर्य, ईमानदारी, नेतृत्व और टीम भावना की असली परीक्षा होती है। पद्मपति शर्मा ने चार दशकों तक खेल पत्रकारिता के माध्यम से केवल मैच नहीं देखे, बल्कि खिलाड़ियों के संघर्ष, व्यवस्था की कमजोरियाँ और समाज की अपेक्षाएँ भी दर्ज कीं। उनके लिए खेल खबर नहीं, संस्कार है। जब खिलाड़ी जीत के बाद सिर झुकाता है या हार के बाद फिर खड़ा होता है, तो वह पूरे समाज को संदेश देता है कि सफलता और असफलता, दोनों में मर्यादा आवश्यक है। आज जब खेल भी बाज़ार और टीआरपी के दबाव में है, पद्मपति शर्मा की यह दृष्टि हमें याद दिलाती है कि खेल दरअसल समाज का आईना है, जो हमें हमारी सामूहिक ताकत, कमजोरी और संभावनाएं साफ़-साफ़ दिखाता है। प्रस्तुत है सीनियर रिपोर्टर सुरेश गांधी की वरिष्ठ खेल पत्रकार पद्मपति शर्मा की विशेष बातचीत के कुछ प्रमुख अंश :-
सुरेश गांधी
चार दशकों से अधिक समय तक खेल पत्रकारिता की धड़कन को करीब से महसूस करने वाले वरिष्ठ पत्रकार पद्मपति शर्मा आज भले ही सेवानिवृत्त हों, लेकिन खेल और खिलाड़ियों पर उनकी दृष्टि आज भी उतनी ही पैनी है। अख़बारों से लेकर टीवी न्यूज़ चैनलों तक अपनी बेबाक राय रखने वाले शर्मा जी मानते हैं कि खेल पत्रकारिता ने भारत में न केवल खेलों की दिशा बदली, बल्कि समाज की सोच को भी आकार दिया है। खास यह है कि उनसे हुई यह विशेष बातचीत केवल यादों का सफर नहीं, बल्कि भारतीय खेलों के भविष्य का खाका भी है।
प्रश्न
: आपकी
खेल
पत्रकारिता
की
यात्रा
कैसे
शुरू
हुई?
पद्मपति
शर्मा
: मेरी शुरुआत उस दौर में
हुई जब खेल पत्रकारिता
को “बीट” नहीं बल्कि
“शौक” माना जाता था।
अख़बारों में खेल पन्ने
सीमित होते थे और
रिपोर्टर को खुद यह
साबित करना पड़ता था
कि खेल भी समाज
की मुख्यधारा का विषय है।
मैंने क्रिकेट, हॉकी, फुटबॉल के छोटे-छोटे
टूर्नामेंट कवर किए, खिलाड़ियों
के साथ बसों में
सफर किया, होटल के गलियारों
में रात-रात भर
बातचीत की। वही अनुभव
मेरी असली पूंजी बने।
प्रश्न
: उस
दौर
और
आज
की
पत्रकारिता
में
सबसे
बड़ा
अंतर
क्या
देखते
हैं?
उत्तर
: सबसे बड़ा अंतर है
संवेदनशीलता और समय का।
पहले खबर लिखने से
पहले हम रुकते थे,
सोचते थे, खिलाड़ियों की
मानसिक स्थिति समझते थे। आज सब
कुछ “ब्रेकिंग” हो गया है।
खबर पहले और सत्य
बाद में, यह प्रवृत्ति
चिंताजनक है। हालांकि तकनीक
ने पत्रकार को ताकत भी
दी है, लेकिन अगर
विवेक नहीं होगा तो
वही तकनीक पत्रकारिता को कमजोर भी
कर देगी।
प्रश्न
: खिलाड़ी
और
पत्रकार
के
रिश्ते
पहले
ज्यादा
आत्मीय
थे,
क्या
आज
वह
भरोसा
टूट
गया
है?
उत्तर
: काफी हद तक हां।
पहले खिलाड़ी पत्रकार को अपना समझते
थे। हार के बाद
भी खुलकर बात करते थे।
आज खिलाड़ी एक ब्रांड है,
उसके चारों ओर पीआर टीम
है, कॉन्ट्रैक्ट हैं, स्क्रिप्टेड बयान
हैं। आज का खिलाड़ी
बुरा नहीं है, लेकिन
व्यवस्था ने उसे घेर
लिया है। पत्रकार और
खिलाड़ी के बीच जो
मानवीय रिश्ता था, वह कहीं
न कहीं औपचारिकता में
दब गया है।
प्रश्न
: क्रिकेट
का
वर्चस्व
क्या
अन्य
खेलों
के
लिए
नुकसानदेह
नहीं
रहा?
उत्तर
: क्रिकेट का वर्चस्व सच्चाई
है, लेकिन इसे केवल नकारात्मक
रूप में नहीं देखना
चाहिए। क्रिकेट की लोकप्रियता ने
खेल संस्कृति को जीवित रखा।
हां, यह भी सच
है कि हॉकी, एथलेटिक्स,
कुश्ती जैसे खेल लंबे
समय तक उपेक्षित रहे।
लेकिन अब तस्वीर बदल
रही है। नीरज चोपड़ा,
पीवी सिंधु, बजरंग पुनिया जैसे नामों ने
यह साबित किया कि भारतीय
दर्शक केवल क्रिकेट तक
सीमित नहीं है, उसे
नायक चाहिए।
प्रश्न
: टीवी
डिबेट्स
और
सोशल
मीडिया
पर
खेल
चर्चा
को
आप
कैसे
देखते
हैं?
उत्तर
: टीवी डिबेट्स में आजकल विश्लेषण
कम और शोर ज्यादा
है। खेल को भी
राजनीति और टीआरपी के
चश्मे से देखा जाने
लगा है। सोशल मीडिया
ने आम आदमी को
आवाज़ दी, यह अच्छी
बात है, लेकिन बिना
जानकारी की राय भी
उतनी ही तेजी से
फैलती है। यह खेल
और खिलाड़ियों, दोनों के लिए खतरनाक
हो सकता है।
प्रश्न
: आपके
करियर
के
सबसे
यादगार
पल
कौन-से
रहे?
उत्तर
: 1983 का विश्व कप मेरे जीवन
का ऐतिहासिक क्षण है। तब
किसी ने नहीं सोचा
था कि भारत चैंपियन
बनेगा। कपिल देव की
कप्तानी और टीम की
जिद ने इतिहास रचा।
2011 का विश्व कप भी भावनात्मक
था। जब धोनी ने
छक्का लगाया तो लगा जैसे
एक पत्रकार के रूप में
नहीं, बल्कि एक भारतीय के
रूप में मेरी भी
आंखें भर आईं।
प्रश्न
: आज
भारत
खेल
महाशक्ति
बनने
की
ओर
बढ़
रहा
है,
आप
कितना
आश्वस्त
हैं?
उत्तर
: मैं पूरी तरह आश्वस्त
हूँ। खेलो इंडिया, टारगेट
ओलंपिक पोडियम जैसी योजनाओं ने
जमीनी स्तर पर बदलाव
किया है। छोटे शहरों
और गांवों से खिलाड़ी निकल
रहे हैं। अब चुनौती
यह है कि खेल
को राजनीति से दूर और
व्यवस्था को भ्रष्टाचार से
मुक्त रखा जाए।
प्रश्न
: युवा
खेल
पत्रकारों
के
लिए
आपकी
सबसे
बड़ी
सीख
क्या
होगी?
उत्तर
: खेल पत्रकारिता ग्लैमर नहीं, साधना है। खिलाड़ी की
हार में संवेदना और
जीत में संतुलन जरूरी
है। तथ्यों से समझौता मत
कीजिए, और यह याद
रखिए, आप इतिहास लिख
रहे हैं, सिर्फ खबर
नहीं।
प्रश्न
: प्रधानमंत्री
के
संसदीय
क्षेत्र
वाराणसी
में
खेल
इतिहास
का
एक
नया
अध्याय
लिखा
जा
रहा
है।
पहली
बार
उत्तर
प्रदेश
की
धरती
पर
72वीं
सीनियर
राष्ट्रीय
वॉलीबॉल
चैंपियनशिप
का
आयोजन
4 से
11 जनवरी
तक
किया
जा
रहा
है।
यह
आयोजन
डॉ.
संपूर्णानंद
स्पोर्ट्स
कॉम्प्लेक्स,
सिगरा
में
होगा,
जहां
मुकाबले
दो
अत्याधुनिक
टफलेक्स
कोर्ट
पर
खेले
जाएंगे,
जिनकी
गुणवत्ता
अंतरराष्ट्रीय
मानकों
के
अनुरूप
है।
आप
इस
आयोजन
को
किस
रूप
में
देखते
हैं?
उत्तर
(पद्मपति
शर्मा)
: मैं इसे केवल एक
खेल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि पूर्वांचल और उत्तर प्रदेश
के खेल भविष्य की
मजबूत नींव व पुनर्जागरण
के रूप में देखता
हूँ। प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र
वाराणसी में राष्ट्रीय स्तर
की चैंपियनशिप का आयोजन यह
दर्शाता है कि अब
खेल आयोजन महानगरों तक सीमित नहीं
रह गए हैं। डॉ.
संपूर्णानंद स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में अंतरराष्ट्रीय मानकों
के टफलेक्स कोर्ट यह साबित करते
हैं कि प्रदेश अब
प्रतिभा के साथ-साथ
विश्वस्तरीय खेल अधोसंरचना भी
तैयार कर रहा है।
इस तरह के आयोजन
स्थानीय युवाओं के लिए प्रेरणा
बनते हैं। जब खिलाड़ी
अपने ही शहर में
राष्ट्रीय स्तर के मुकाबले
देखते हैं, तो उनके
सपनों को दिशा मिलती
है। मेरे लिए यह
चैंपियनशिप इस बात का
संकेत है कि काशी
अब सांस्कृतिक राजधानी के साथ-साथ
खेलों की नई पहचान
गढ़ रही है। डॉ.
संपूर्णानंद स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में अंतरराष्ट्रीय मानकों
के अनुरूप बने दो टफलेक्स
कोर्ट यह संदेश देते
हैं कि अब उत्तर
प्रदेश केवल प्रतिभा देने
वाला प्रदेश नहीं, बल्कि विश्वस्तरीय खेल ढांचा उपलब्ध
कराने वाला राज्य भी
बन रहा है। इससे
खिलाड़ियों का आत्मविश्वास बढ़ेगा
और स्थानीय युवाओं को राष्ट्रीय स्तर
की प्रतिस्पर्धा को करीब से
देखने और समझने का
अवसर मिलेगा।
अनुभव की
आवाज़,
भविष्य
का
संकेत
मेरा मानना है
कि पद्मपति शर्मा की बातें केवल
स्मृतियों का संकलन नहीं,
बल्कि खेल पत्रकारिता का
दर्पण हैं। उनका अनुभव
बताता है कि खेल
मैदान में जीत-हार
से आगे भी बहुत
कुछ है, संघर्ष, अनुशासन,
चरित्र और समाज। आज
जब खेल खबरें सेकेंडों
में वायरल हो जाती हैं,
तब ऐसे वरिष्ठ पत्रकारों
की दृष्टि हमें ठहरकर सोचने
का अवसर देती है।



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