चौकिया धाम : जहाँ चौकी पर प्रकट हुईं माँ शीतला

पूर्वांचल
की
धार्मिक
आस्था
में
जौनपुर
स्थित
माँ
शीतला
चौकिया
देवी
मंदिर
का
विशेष
स्थान
है।
यह
सिद्धपीठ
केवल
एक
प्राचीन
मंदिर
ही
नहीं,
बल्कि
श्रद्धा,
लोकविश्वास
और
पौराणिक
परंपराओं
का
जीवंत
केंद्र
माना
जाता
है।
जनश्रुति
के
अनुसार
यहाँ
विराजमान
माँ
शीतला
को
विंध्याचल
धाम
में
विराजने
वाली
माँ
विंध्यवासिनी
की
छोटी
बहन
माना
जाता
है।
इसी
कारण
पूर्वांचल
के
श्रद्धालुओं
के
बीच
यह
परंपरा
आज
भी
जीवित
है
कि
विंध्याचल
जाने
से
पहले
चौकिया
धाम
में
माता
शीतला
के
दर्शन
किए
जाएँ।
जौनपुर
शहर
से
कुछ
दूरी
पर
स्थित
यह
धाम
सदियों
से
लोगों
की
आस्था
का
आधार
बना
हुआ
है।
मान्यता
है
कि
यहाँ
सच्चे
मन
से
मांगी
गई
मुराद
अवश्य
पूरी
होती
है।
मंदिर
परिसर
में
मन्नत
का
धागा
बाँधने
की
परंपरा
भी
इसी
विश्वास
की
प्रतीक
है।
चैत्र
और
शारदीय
नवरात्र
के
अवसर
पर
यहाँ
लाखों
श्रद्धालुओं
की
भीड़
उमड़
पड़ती
है,
जब
पूरा
चौकिया
धाम
भक्ति,
श्रद्धा
और
उत्साह
से
आलोकित
हो
उठता
है।
यहाँ की प्राचीन कथाएँ,
देवी
के
प्राकट्य
की
लोकगाथाएँ
और
भक्तों
की
अटूट
श्रद्धा
इस
धाम
को
पूर्वांचल
के
प्रमुख
शक्ति
स्थलों
में
विशिष्ट
पहचान
प्रदान
करती
हैं

सुरेश गांधी
पूर्वांचल की आस्था, लोकविश्वास
और प्राचीन परंपराओं का जब भी
उल्लेख होता है, तो
जौनपुर स्थित माँ शीतला चौकिया
देवी मंदिर का नाम श्रद्धा
से लिया जाता है।
यह केवल एक मंदिर
नहीं, बल्कि सदियों से प्रवाहित होती
उस सांस्कृतिक धारा का केंद्र
है, जिसमें शिव और शक्ति
की आराधना, लोकमान्यताएँ, पौराणिक कथाएँ और जनभावनाएँ एक
साथ गुंथी हुई दिखाई देती
हैं। जौनपुर शहर से कुछ
दूरी पर स्थित यह
सिद्धपीठ पूर्वांचल के करोड़ों श्रद्धालुओं
के लिए आस्था का
दीपस्तंभ है। मान्यता है
कि यहाँ माँ शीतला
के दर्शन किए बिना विंध्याचल
धाम की यात्रा अधूरी
मानी जाती है। यही
कारण है कि चैत्र
और शारदीय नवरात्र में लाखों श्रद्धालु
पहले चौकिया धाम में माथा
टेकते हैं और फिर
विंध्याचल की ओर प्रस्थान
करते हैं।
इस धाम की
विशेषता केवल इसकी पौराणिकता
ही नहीं, बल्कि इसके पीछे छिपी
ऐतिहासिक कथाएँ, लोकगाथाएँ और आध्यात्मिक अनुभूतियाँ
भी हैं, जो इसे
उत्तर भारत के प्रमुख
शक्ति केंद्रों में स्थान दिलाती
हैं। लोकमान्यता के अनुसार इस
मंदिर का नाम भी
अपने आप में एक
कहानी समेटे हुए है।
कहा जाता
है कि सबसे पहले
देवी की मूर्ति किसी
भव्य मंदिर में नहीं, बल्कि
एक साधारण चबूतरे या चौकी पर
स्थापित की गई थी।
ग्रामीण और स्थानीय लोग
उस चौकी पर बैठकर
देवी की पूजा-अर्चना
करते थे। धीरे-धीरे उस चौकी
का महत्व बढ़ता गया और लोगों
ने उसे देवी का
स्थायी आसन मान लिया।
समय के साथ वही
चौकी “
चौकिया”
कहलाने लगी और देवी
का नाम माँ शीतला
चौकिया देवी पड़ गया।
यह नाम केवल एक स्थान
का परिचय नहीं,
बल्कि उस लोकसंस्कृति का
प्रतीक है जिसमें साधारण
से साधारण स्थल भी आस्था
के कारण तीर्थ बन
जाता है। चौकिया धाम से जुड़ी
एक अत्यंत रोचक और लोकप्रिय
लोककथा भी प्रचलित है।
मंदिर के प्रबंधकों और
स्थानीय लोगों के अनुसार कई
सौ वर्ष पहले देवचंद
माली नामक व्यक्ति को
एक रात सपना आया।
उस सपने में देवी
ने उसे बताया कि
उनकी मूर्ति पास के एक
कुएं में स्थित है
और उसे निकालकर स्थापित
किया जाए।
सपने से
जागने के बाद देवचंद
माली ने लोगों को
यह बात बताई और
सभी मिलकर उस कुएं तक
पहुंचे। जब कुएं की
खुदाई की गई तो
उसमें से देवी की
मूर्ति प्राप्त हुई। देवचंद माली ने उस
मूर्ति को एक चौकी
पर स्थापित किया और पूजा-अर्चना प्रारंभ कर दी। धीरे-धीरे यह स्थान
प्रसिद्ध होने लगा और
बाद में उसी चौकी
को मंदिर का रूप दे
दिया गया।
आज वही
स्थल भव्य चौकिया शीतला
धाम के रूप में
स्थापित है।
प्राचीनता की गवाही देता चौकिया धाम
जौनपुर शहर से लगभग
6 किमी की दूरी
पर स्थित चौकिया धाम का इतिहास
अत्यंत प्राचीन माना जाता है।
यह स्थल अनादिकाल से
शिव और शक्ति की
साधना का प्रमुख केंद्र
रहा है। भारतीय परंपरा
में शक्ति पूजा का महत्व
अत्यधिक रहा है, और
इसी परंपरा की एक सशक्त
अभिव्यक्ति के रूप में
चौकिया धाम का उद्भव
हुआ।
इतिहासकारों के अनुसार प्राचीन
काल में जौनपुर क्षेत्र
में अहीर शासकों का
शासन था। जौनपुर का
पहला अहीर शासक हीरा
चंद्र यादव को माना
जाता है।
उस समय
यह क्षेत्र अनेक जनजातीय और
स्थानीय समुदायों की सांस्कृतिक परंपराओं
का संगम था।
माना
जाता है कि चौकिया
देवी का मंदिर किसी
समय यादवों की कुलदेवी के
रूप में स्थापित किया
गया होगा, किंतु इतिहास और लोकपरंपराओं के
आधार पर यह संभावना
अधिक प्रबल मानी जाती है
कि इस मंदिर का
निर्माण भर समुदाय द्वारा
कराया गया था।
भर समुदाय
प्राचीन भारत में अनार्य
परंपरा से जुड़ा माना
जाता है,
और अनार्य
परंपराओं में शिव तथा
शक्ति की उपासना प्रमुख
रूप से की जाती
थी। यही कारण है
कि जौनपुर क्षेत्र में भरों की
उपस्थिति और उनकी धार्मिक
प्रवृत्तियों के आधार पर
चौकिया देवी मंदिर का
निर्माण उनसे जोड़ा जाता
है।
शांति और शीतलता की देवी
भारतीय संस्कृति में शीतला माता
को रोगों से रक्षा करने
वाली और जीवन में
शीतलता प्रदान करने वाली देवी
माना जाता है। पौराणिक
ग्रंथों में भी उनकी
महिमा का वर्णन मिलता
है।
मार्कण्डेय पुराण में शीतला देवी
के संदर्भ में प्रसिद्ध श्लोक
मिलता है : —
“शीतले तू जगन्नमाता, शीतले तू जगत्पिता।
शीतले तू जगद्धात्री, शीतलाय नमो नमः॥”
इस श्लोक का
अर्थ है कि शीतला
देवी ही जगत की
माता,
पिता और धात्री
हैं,
अर्थात समस्त सृष्टि की पालनकर्ता हैं।
इसी कारण उन्हें आनंददायिनी और शीतलता की
प्रतीक देवी माना जाता
है। उनके दर्शन मात्र
से मानसिक शांति और आत्मिक संतोष
प्राप्त होता है।
इब्राहिम शाह शर्की और मंदिर की कथा
चौकिया धाम की ऐतिहासिकता
से जुड़ी एक और कथा
जौनपुर के शर्की काल
से जुड़ी हुई है। कहा
जाता है कि जब
जौनपुर के शासक इब्राहिम
शाह शर्की ने गोमती नदी
के किनारे स्थित विजय मंदिर को
ध्वस्त करने का प्रयास
किया, तो कुछ हिंदू
भक्तों ने वहां स्थापित
शीतला देवी की मूर्ति
को सुरक्षित स्थान पर ले जाकर
छिपा दिया।
बताया जाता है कि
वही मूर्ति बाद में देवचंदपुर
क्षेत्र में स्थापित की
गई,
जो आज चौकिया
धाम के रूप में
प्रसिद्ध है। इस घटना ने इस
स्थान की पवित्रता और
महत्व को और भी
बढ़ा दिया।
तालाब और भर समुदाय की परंपरा
चौकिया धाम के पीछे
स्थित विशाल तालाब भी इस मंदिर
की ऐतिहासिकता का प्रमाण माना
जाता है। इतिहासकारों के
अनुसार भर समुदाय तालाबों
के निर्माण में विशेष रुचि
रखता था।
इसी कारण
यह माना जाता है
कि मंदिर के पास स्थित
यह तालाब भी उन्हीं के
द्वारा बनवाया गया होगा। आज
भी श्रद्धालु मंदिर में दर्शन करने
से पहले इस तालाब
में स्नान करते हैं और
फिर माता के दरबार
में प्रवेश करते हैं।
पूर्वांचल की आस्था का प्रमुख केंद्र
चौकिया शीतला धाम केवल जौनपुर
का ही नहीं,
बल्कि
पूरे पूर्वांचल का प्रमुख धार्मिक
केंद्र है। गोरखपुर,
देवरिया,
बलिया,
मऊ,
आजमगढ़,
गाजीपुर,
अंबेडकरनगर और अयोध्या सहित
अनेक जिलों से श्रद्धालु यहां
आते हैं। मंदिर परिसर
में वर्षभर पूजा-
अर्चना,
विवाह,
मुंडन और जनेऊ संस्कार
जैसे धार्मिक आयोजन होते रहते हैं।
नवरात्र में उमड़ता आस्था का सैलाब
चैत्र और शारदीय नवरात्र
के समय इस मंदिर
की भव्यता देखते ही बनती है। इन दिनों मंदिर परिसर में लाखों श्रद्धालुओं
की भीड़ उमड़ पड़ती
है। सुबह से लेकर
देर रात तक दर्शन
का सिलसिला चलता रहता है।
भक्तजन माता को कड़ाही,
चुनरी,
नारियल और प्रसाद अर्पित
करते हैं।
मन्नत का धागा और आस्था का विश्वास
चौकिया धाम की एक
विशेष परंपरा है मन्नत का
धागा बांधना। भक्तजन मंदिर में दर्शन के
बाद एक धागा बांधते
हैं और माता से
अपनी मनोकामना पूरी होने की
प्रार्थना करते हैं। जब
उनकी मन्नत पूरी हो जाती
है तो वे पुनः
मंदिर आकर उस धागे
को खोलते हैं और माता
को प्रसाद चढ़ाते हैं। यह परंपरा
इस मंदिर की पहचान बन
चुकी है।
सोहारी और लप्सी का प्रसाद
यहां माता को
विशेष रूप से सोहारी
और लप्सी का प्रसाद चढ़ाने
की परंपरा है। माना जाता
है कि यह प्रसाद
माता को अत्यंत प्रिय
है और इसे अर्पित
करने से भक्तों की
मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती हैं।
6 करोड़ की लागत से हो रहा जीर्णोद्धार
समय के साथ
मंदिर की लोकप्रियता बढ़ती
गई और श्रद्धालुओं की
संख्या में भी लगातार
वृद्धि होती रही। इसी
को देखते हुए अब चौकिया
धाम का व्यापक जीर्णोद्धार
किया जा रहा है।
करीब 6 करोड़ रुपये की लागत से
मंदिर परिसर को आधुनिक सुविधाओं
से सुसज्जित किया जा रहा
है। इसमें श्रद्धालुओं के लिए बेहतर
व्यवस्था, मार्ग, प्रकाश व्यवस्था और अन्य सुविधाएं
विकसित की जा रही
हैं।
आस्था, इतिहास और संस्कृति का अद्भुत संगम
चौकिया शीतला धाम केवल एक
धार्मिक स्थल नहीं,
बल्कि
आस्था,
इतिहास और संस्कृति का
अद्भुत संगम है। यहां
की लोककथाएं,
पौराणिक संदर्भ,
ऐतिहासिक घटनाएं और भक्तों का
अटूट विश्वास इस स्थल को
विशेष बनाते हैं। सदियों से
यह मंदिर लोगों को मानसिक शांति,
आध्यात्मिक शक्ति और जीवन में
शीतलता प्रदान करता आया है।
आज भी जब कोई
श्रद्धालु चौकिया धाम में प्रवेश
करता है,
तो उसे
ऐसा प्रतीत होता है मानो
वह केवल मंदिर में
नहीं,
बल्कि उस आध्यात्मिक परंपरा
में प्रवेश कर रहा है
जो हजारों वर्षों से भारतीय संस्कृति
की धड़कनों में बसती आई
है।
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